स्मृति शेष: उजुआ जैसे गांवों की पीड़ा को देखते हुए बेमतलब महसूस होता है गांधी 150 पर आयोजित महोत्सवों का उल्लास

अनिन्दो बनर्जी
उजुआ गांव दरभंगा प्रमंडल के दक्षिणी छोर पर स्थित कुशेश्वर स्थान पूर्वी प्रखंड में है, जो राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केन्द्र के आंकलन के अनुसार बाढ़ के ‘अति उच्च जोखिमग्रस्त’ की श्रेणी में आता है। गांव कमला तथा कोसी नदियों की जलधारों के बीच अवस्थित है जिसकी वजह से इसे न सिर्फ हर साल कम से कम छह महीनों का जलजमाव झेलना पड़ता है,बल्कि हर बाढ़ के बाद गांव की जमीन के कुछ हिस्से कटकर पानी में समाहित हो जाते हैं। कटाव का सबसे बुरा असर गांव में रहने वाले अनुसूचित जाति के परिवारों पर पड़ता है जिन्हें बसने के लिए नए सिरे से जमीन की तलाश करनी पड़ती है। वर्ष 2000 के बाद से गांव में बाढ़ का प्रकोप बढ़ा है। स्थानीय लोगों के अनुसार इसका बड़ा कारण उत्तर बिहार में बड़ी तादाद में तटबंधों, सेतुओं तथा अन्य संरचनाओं का निर्माण किया जाना है जो नदियों के स्वाभाविक प्रवाह में अवरोध पैदा करते हैं। उत्तर बिहार की कई बड़ी नदियां कुशेश्वर स्थान या आसपास के इलाके से गुजरती हुई गंगा में मिलती हैं।
2011 की जनगणना के अनुसार 407 परिवारों वाले उजुआ गांव की कुल जनसंख्या 2158 है, जिसमें महिलाओं का हिस्सा 48.7 प्रतिशत है, यानी लगभग 949 का लिंगानुपात जो राज्य के औसत लिंगानुपात (918) से बेहतर है। गाँव की आबादी में छह साल से कम उम्र के बच्चों का अनुपात लगभग 30.5 प्रतिशत है तथा इस उम्रवर्ग का लिंगानुपात (1126) राज्य के बाल लिंगानुपात (935) से काफी अच्छा है। 2011 की जनगणना के अनुसार गाँव में 41 प्रतिशत लोग ही साक्षर हैं। महिलाओं में साक्षरता दर महज 24.5 प्रतिशत है। जनगणना में कामगारों के रूप में चिह्नित 980 लोगों में मुख्य कामगारों का अनुपात 93.1 प्रतिशत है जिनमें 81 प्रतिशत खेतिहर मजदूर व 17.2 प्रतिशत किसान के रूप में चिह्नित हैं। गाँव में तीन-चौथाई मकान कच्चे हैं तथा 79.9 प्रतिशत मकान सिर्फ एक कमरे के हैं।

उजुआ गांव की कुल आबादी में अनुसूचित जातियों का हिस्सा 46.7 प्रतिशत है। गांव में बसे अनुसूचित जातियों में मुसहर तथा रविदास जाति के परिवारों की संख्या सबसे ज्यादा है जिनमें से अधिकांश नदी की धार से लगे गांव के पश्चिमी हिस्से में बसे हैं। 2013 से 2015 के बीच कटाव की वजह से गांव के 50 परिवारों को विस्थापित होना पड़ा जिनमें 35 मुसहर जाति के तथा 15 मल्लाह जाति के परिवार थे। विस्थापित परिवारों ने शुरु में गांव के मध्य भाग में स्थित सरकारी जमीन से होकर गुजरती सड़क पर बसने की कोशिश की, लेकिन इस जमीन से सटे प्लॉट संख्या 384 के मालिकों ने उन्हें खदेड़ दिया। एक प्रभावशाली जाति के इन भूस्वामियों को शायद इस बात का डर था कि कहीं सरकार उस जमीन की स्थायी बन्दोबस्ती विस्थापितों के नाम पर न कर दे। आज भी गांव के ज्यादातर अनाबाद सरकारी या अनाबाद सार्वजनिक जमीन पर कुछ प्रभावशाली परिवारों का ही कब्जा है। विस्थापितों को मजबूरन नदी के किनारे वाले हिस्से में वापस आना पड़ा तथा मल्लाह जाति के एक भूस्वामी की विवादित जमीन पर शरण लेना पडीा। मुसहर, रविदास, मल्लाह, कुर्मी तथा ब्राह्मण जाति के समुदायों के अलावे गांव में बसे अन्य सामाजिक समूहों में कानू तथा मुसलमान प्रमुख हैं।

गांव में भूमिहीन अनुसूचित जातियों द्वारा जमीन हासिल करने के संघर्ष का लंबा इतिहास है। इस संघर्ष की शुरुआत जमींदारी उन्मूलन के बाद सन 1955-56 से ही हो चुकी थी, जब मुसहर और रविदास जाति के भूमिहीनों ने मल्लाह जाति के भूमिहीनों के साथ मिलकर प्रभावशाली स्थानीय जमींदा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। यद्यपि इस मुहिम को कोई विशेष सफलता नहीं मिली। लगभग एक दशक बाद सन 1967-68 में जमीन्दार ने टकराव से बचने के लिए कुछ स्थानीय प्रभावशाली परिवारों को अपनी जमीन का एक बड़ा हिस्सा बेच दिया। इस घटना के बाद से उजुआ गांव में शक्ति का एक नया समीकरण पैदा हुआ तथा समय के साथ गांव के ज्यादातर सार्वजनिक संसाधनों पर एक खास समुदाय का एकाधिकार स्थापित हो गया। वर्तमान में न सिर्फ गांव की ज्यादातर जमीन पर इस समुदाय का कब्जा है, बल्कि इसी जाति के एक परिवारविशेष के नियंत्रण में गांव की उचित मूल्य की दुकान, प्राथमिक विद्यालय इत्यादि संचालित हैं। इस परिवार का एक वंशज अपने आपराधिक कार्यकलापों और चरित्रगत दोषों की वजह से आज भी स्थानीय दलित समाज, खासकर मुसहर जाति की महिलाओं के लिए बड़ा सिरदर्द बना हुआ है।


बिहार सरकार के अभिलेखों के मुताबिक उजुआ गांव की कुल जमीन लगभग 773.5 एकड़ है। इनमें लगभग 78.3 एकड़ जमीन ‘अनाबाद सर्वसाधारण’ श्रेणी तथा लगभग 30.4 एकड़ जमीन ‘अनाबाद बिहार सरकार’ श्रेणी में वर्गीकृत है। लगभग 1.19 एकड़ जमीन बिहार भूदान यज्ञ समिति तथा 28 डेसीमल जमीन शिक्षा विभाग के नाम दर्ज है। गांव की बाकी जमीन कुल 220 भूस्वामियों के नाम अभिलेखित है, जिनमें 125 भूधारकों की जमीन 1 एकड़ से कम तथा 166 भूधारकों की जमीन 1 हेक्टेयर से कम है। गांव में 83 परिवार पूर्णतः भूमिहीन, यानी वास की जमीन से भी वंचित हैं। 39 भूधारक ऐसे हैं जिनकी कुल जमीन 5 डेसीमल तक सीमित है,जबकि 14 भूधारकों के पास 5 से 10 डेसीमल के बीच जमीन है। गांव में सबसे अधिक जमीन लक्ष्मण झा के नाम दर्ज है जिनकी कुल जमीन 72.15 एकड़ है। अन्य बड़े भूस्वामियों में रघुवर प्रसाद सिंह (31.71 एकड़), जागेशवर राय (31.66 एकड़), आनंदी दाई (30.28 एकड़), कपिलेशवर सिंह (28.13 एकड़), गुंजेशवरी बउआसिन (24.95 एकड़) तथा रामलोचन राय (24.92 एकड़) शामिल हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार पिछले 30 सालों में कटाव की वजह से नदी की धार लगभग 50 मीटर खिसककर उनकी बसावट के करीब आ पहुंची है। गूगल अर्थ के उपग्रहीय तस्वीरों से इस बात की पुष्टि होती है।

आजीविका के स्थानीय साधनों के अभाव की वजह से गांव में बड़ी संख्या में लोगों को आजीविका के लिए दूर शहरों की ओर पलायन करना पड़ता है। पलायन मुख्य रूप से गर्मी के शुरूआती दौर, बरसात और सर्दी के महीनों में होता है। ऐसे भी अप्रैल से सितम्बर तक का दौर गांव के लिए अत्यधिक मुश्किल समय वाला होता है, जब कुशेश्वर स्थान से गाँव तक के चंद मीलों का फासला नाव से तय करने में लगभग आधे दिन का समय लग जाता है। जलजमाव के इस कठिन दौर में जुलाई और अगस्त का महीना विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण हो जाता है। गांव के अनेक परिवारों को भोजन की कमी से जूझना पड़ता है। इस दौरान गांव में खेती का कोई काम नहीं होता। जलजमाव कम होने के बाद ही मक्के की बुआई की जाती है तथा अगले साल गर्मी के महीनों में खरपतवारों की सफाई के साथ मक्के की कटाई कर ली जाती है।
आवश्यक हस्तक्षेप
आपदाओं की मारकता तथा जोखिमों को कम करने की चुनौती से संबंधित विमर्श जब अकादमिक गलियारों से आगे निकलकर समाज के हाशिए पर रहनेवाले समुदायों के पास पहुंचता है,तो इसके मायने पूरी तरह बदल जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में, जहां साल-दर-साल किसी समुदाय को अपना अस्तित्व बचाए रखने का संघर्ष करना पड़ता हो, जीवनरक्षा की ठोस व टिकाऊ पहलों के बिना स्थायी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती। उजुआ गांव जैसे दलित बहुल गांवों के सन्दर्भ में बात की जाए तो ठोस पहलों का आशय सिर्फ भूमि पुनर्वितरण व प्रशासनिक दक्षता की ऐसी व्यवस्था ही होता है जिससे बार—बार कटाव झेलने वाले या विस्थापित होने वाले परिवारों को गांव में उपलब्ध सरकारी जमीन पर सहज और सुनियोजित रूप से बसाया जा सके। ऐसी पहलों के अभाव में आपदा सुरक्षा से संबधित मुख्यधारा के विमर्श निरर्थक ही प्रतीत होते हैं।

उजुआ गांव में 75 परिवार ऐसे हैं, जिन्होंने नदी के कटाव में अपनी जमीन पूरी तरह खो दी है तथा वर्तमान में अस्थायी तौर पर दूसरे भूधारकों की जमीन पर बसे हुए हैं। ऐसे परिवारों की सूची उपलब्ध है। ऐसे परिवारों के पुनर्वास के लिए गाँव में उपलब्ध 78.3 एकड़ अनाबाद सर्वसाधारण जमीन का उपयोग किए जाने की जरूरत है। बिहार सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग के पत्रांक-1 प्रा. आ.-25.2014.293 आ.प्र. दिनांक 21.01.2015 में बाढ़ प्रवण जिलों के जिलाधिकारियों का निर्देशित किया गया है कि वह बाढ़ एवं कटाव से विस्थापित परिवारों को पुनर्वासित करने हेतु बिहार रैयती भूमि लीज नीति 2014 के तहत भूमि अर्जन कर लम्बित मामलों का निष्पादन कर सकते हैं। आपदा प्रबंधन विभाग के प्रधान सचिव महोदय के इस पत्र के आलोक में उजुआ गांव के विस्थापित परिवारों को भी लाभ पहुंचाया जा सकता है।
गांव में नदी से सटी लगभग 500 वर्ग मीटर जमीन किसी भी समय नदी के कटाव का शिकार हो सकती है। ऐसे परिवारों के हित में समय रहते गाँव की सरकारी जमीन का कुछ हिस्सा आवंटित किया जा सकता है, ताकि उन्हें भविष्य में कटाव का प्रभाव न झेलना पड़े। गांव में 83 परिवार पूर्णतः भूमिहीन हैं तथा वास की जमीन से भी पूरी तरह वंचित हैं। जिनमें से 72 परिवार अनुसूचित जाति के हैं। इन परिवारों के नाम गाँव में उपलब्ध अनाबाद सर्वसाधारण जमीन की बंदोबस्ती किए जाने तथा ऐसे भूखंड को वर्तमान में कब्जा जमाए परिवारों के अतिक्रमण से मुक्त कराए जाने की जरूरत है।

उजुआ गांव में भूमिहीनों के संघर्ष का लंबा इतिहास है। पिछले चालीस वर्षों में संघर्ष को नेतृत्व देने वालों में रघुनाथ सदा की भूमिका खास रही है जिन्होंने विभिन्न प्रकार के अहिंसक व लोकतांत्रिक तरीकों का प्रयोग करते हुए स्थानीय अंचल कार्यालय से लेकर राज्य मुख्यालय तक के विभिन्न प्रभावशाली अधिकारियों और राजनेताओं तक अपने गांव के भूमिहीन तबके की आवाज पहुंचाने की अथक कोशिशें की हैं,लेकिन बिना किसी नतीजे के। बिहार सरकार द्वारा पिछले कुछ सालों में भूमिहीनों के नाम पर शोर-शराबे के साथ चलाए गए कई अभियान, जिनमें ऑपरेशन भूमि दखल देहानी, अभियान बसेरा, महादलित वासभूमि योजना इत्यादि प्रमुख हैं। इन अभियानों से कुशेश्वर स्थान जैसे बदहाल इलाके पूरी तरह वंचित दिखते हैं। जिस गांव में 57 एकड़ से अधिक सीलिंग-अधिशेष जमीन उपलब्ध हो तथा 110 एकड़ से ज्यादा अलग-अलग प्रकार की सार्वजनिक जमीन मौजूद हो, वहां पुश्तों से बसे भूमिहीनों के जायज अधिकारों को कई दशकों से लगातार नकारे जाने का कोई औचित्य नहीं दिखता। गांधीजी के 150 वें वर्षं पर आयोजित महोत्सवों का उल्लास उजुआ जैसे गांवों की पीड़ा को देखते हुए बेमतलब महसूस होता है।
(सामाजिक समस्याओं के अध्येता,प्रैक्सिस,पटना।)

बिहार में जन वितरण प्रणाली-चुनौतियाँ और सुधार की ज़रूरतें

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *