रेड़ीमऊ से रड़िमऊ…से रणमऊ और आज रनमऊ तक के सफर पर सरपट दौड़ता हमारा गांव

शैलेंद्र प्रताप सिंह
सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी
हमारा गांव रणमऊ (रायबरेली)। हमने गांव का वह रूप भी देखा है जो सैकड़ों सालों से, शायद जबसे पहिये का आविष्कार हुआ होगा, हाथी की मदमस्त चाल की तरह खरामा-खरामा जिंदगी जी रहा था पर फिर मेरे देखते ही देखते उसने घोड़े की सरपट दौड़ की तरह चाल बहुत तेज कर दी और अब हमारा गांव यहां आ पहुंचा है कि लगता है अब यह हमारा वाला पुराना गांव रणमऊ  है ही नहीं ।
आज के हमारे गांव रणमऊ की कहानी यह है कि जब हमारे पूर्वज पड़ोस में ही पिलखा तालुके से यहां 1857 की क्रांति के आसपास शिफ़्ट हुये थे तो यहां मेडिसिनल पौधा रेड़ी के पेड़ बहुत होने के कारण इसे रेड़ीमऊ कहा जाता था। नाम शुद्ध होते होते रेड़ीमऊ से रड़िमऊ…से रणमऊ और आज रनमऊ तक का सफर मेरे देखते-देखते हो चुका है।
इसी रणमऊ गांव में मेरी पैदाइश 11जनवरी 1954 की है । 11 जनवरी कैसे जन्म तिथि तय हुई, इसकी भी एक कहानी है। मेरी मां मेरे पैदा होने की कुछ बातें बताती थी । कहती थी जाड़े के दिन थे, काफी ठंड थी। पूष का महीना था। उजाले पाख की सप्तमी थी। रात का खाना पीना हो चुका था, उसके बाद तुम पैदा हुये। अम्मा इससे ज्यादा कुछ बता नही सकती थी और यह सब मेरी समझ में आता नही था।

मातृदिवस पर मां की याद
अम्मा को बार-बार याद कर मैं बहुत भावुक होना नहीं चाहता। पर आज अम्मा के लिये कुछ लिखने का मन हो रहा है तो लिख रहा हूं ।

नयी गढी (रींवा) खानदान की मेरी अम्मा दोहरे बदन की हृष्टपुष्ट शरीर वाली सुंदर महिला थी। वह खाना बनाने और खाना खिलाने में बहुत माहिर और खुद खाना खाने की शौकीन भी थीं। एक दिन मुझे बता रही थी कि जब तुम पैदा हुये थे तो उस रात उसने 7-8 रोटी और खूब कटोरा भर हरियरा (पौष्टिक आहार) खाया था। जो भी आता वह यह जरूर पूछती थी कि खाना खायो कि नहीं। नही खाये हौ तो खाव ।

अम्मा हम बच्चों के लिये सदैव एक आदर्श, प्यार से लबालब, ममतामयी मां के रूप में ही रहीं। इस रूप में कभी कभी वह संयुक्त परिवार के मूल्यों के विरुद्ध भी चली जाती थी जिसका कभी उसे अफसोस नही रहा। हां, मै जरूर कभी— कभी बहुत असहज महसूस करता था। उसने कभी मुंह से नहीं कहा पर उसकी आंखों से अपने बच्चों के लिये प्यार छलकता ही रहता था। मैं उसकी सबसे छोटी औलाद था। जिस दिन भी मुझे उससे कुछ दिनों के लिये अलग होना होता था, वह सुबह से ही दुखी हो जाती थी और चलते वक्त तो खुद भी रोती और मुझे भी खूब रुलाती थीं ।
कभी कभी कहती थी कि जो हमरे पास खूब पैसा ह्वात, तुमका नौकरी न करै देइत, दूर न जाय देइत। इसी कारण जब यूनिवर्सिटी के दिनों में कोई साथी कहता था कि हमें अपनी मां से डर लगता है तो हंसी आती थी कि मां से कोई कैसा डर सकता है।
अम्मा दकियानूसी ख्यालों से भी बहुत दूर थी। घर की शख्त परदा प्रथा की भी समर्थक नहीं थी। तमाम कर्मकांडों में भी उसकी रुची नही थी। मुझे याद आता है कि जब मैं करीब 15 साल का था, बडे भाई स्व भंवर भाई साहब (काका के बडे पुत्र) हमें अपनी मोटरसाइकिल मे बिठाकर लखनऊ से गांव की तरफ आ रहे थे। रास्ते मे बिकती दिखी ताज़ी मछली, उन्होने खरीदा। उस दिन शायद एकादशी थी, घर की महिलायें व्रत थी। घर की व्रत रखे महिलायें ने घोर विरोध शुरू कर दिया कि आज तो घर में मछली घुस ही नही सकती। जोरदार चों चों होने लगी। भंवर भाई साहब भी डर गये। अम्मा भी व्रत थी पर वह इस विरोध को बर्दाश्त नही कर पायी और बोली कि लाव, हम बनाइत है। कौनो व्रत लरिकन बच्चन से बडा नही ह्वात है। आंगन मे उसने मछली बनायी और हम सबको खूब खिलायी।
मुझे याद आता है अम्मा नब्बे साल की हो चुकी थी, मैं बिटिया के पास (वर्ष 2013) न्यूज़ीलैंड जा रहा था। अम्मा से कहा कि इस बीच मत मरना। अम्मा ने कहा, ‘ अबै कऊन चिंता, जब बुढ़ाब तो चिंता किह्यो? ‘ मतलब जब तक हाथ पैर चल रहे है, सारी इंद्रियां ठीक से काम कर रही है तो काहे की चिंता।
मैं कोशिश करता रहता था कि महीने दो महीने में उससे मिलने गांव रणमऊ जरूर पहुंचूं और जब भी गांव जाता, उसे दवाओं आदि के नाम पर चार-पांच हज़ार रुपये जरूर देता। कभी-कभी कहती मत दो, बहुत हो गया है रुपिया तो मैं कहता कि अम्मा ले ले, बेटा—बेटी को जरूरत नही, एक तू ही तो है लेने वाली, कुछ दिन बाद तू भी नहीं रहेगी, फिर कौन लेगा, मैं किसको दूंगा, ले ले। तब वह ले लेती।
14 जुलाई 2018 की सायं करीब 1820 बजे अम्मा (95 वर्ष) की चेतना ने शरीर की सभी इंद्रियों के पूरी तरह शिथिल हो जाने के बाद उसका साथ छोड़ दिया। गालिब की मृत्यु पर हाली ने लिखा था ,
‘ दिल में मुद्दत से थी ख़ालिस जिसकी, वही बर्छी जिगर के पार है आज ।
कुछ ऐसा ही हाल था मेरा। बर्छी जिगर के पार थी। जब पिता जी की मृत्यु हुई थी, मैं बिलकुल नहीं रोया था पर तमाम कोशिशों के बाद भी अम्मा ने रुला दिया था। हां यह जरूर था कि कभी यह नही लगा कि अम्मा को नही जाना चाहिये। इस मामले में मैं बुद्ध की सम्यक दृष्टि वाला हूं। जो आया है, वह जायेगा। हाथ पैर और इंद्रियां जब जबाब दे जाय, तो जाना चाहिये, और यह भी कि जाओ,आराम करो, ज़िंदगी चेतना की यात्रा है। मीर के शब्दों में ‘यानी रात बहुत जागे थे, सुबह हुई आराम किया ।
अम्मा जहां होगी,खुश होगी,आशीर्वाद दे रही होगी।
यूं तय हुआ जन्म दिवस
…तो बात हो रही थी जन्म दिवस की तो जब मैं लखनऊ पढ़ने के लिये गया तो साथियों को जन्म दिन मनाते देखा। काफी कोफ़्त हुई और जब एक बार गांव रणमऊ आया तो मैने अपने घर के पंडित जी को पकड़ा कि वह कुंडली से हमारी अंग्रेजी जन्म तिथि निकाले। पंडित जी भले आदमी थे, उन्होंने कहा कि जरूर। उस समय का पत्रा निकालकर बताऊँगा और एक दिन उन्होंने बताया की 11 जनवरी 54 की रात 9.30 बजे की पैदाइश है। मैं खुश हुआ। जन्म की तारीख मिली। अम्मा की बताई बातें भी उसी अनुरूप थी पर मन में शंका थी कि कहीं पंडित जी ने पत्रा देखने मे ग़लती न कर दी हो। बड़ा हुआ , कम्प्यूटर कुंडली का ज़माना आया, पंडित जी की बताई सूचनायें कम्प्यूटर पर डाली तो वहीं जन्मांक आया जो पैदाइश के समय का पंडित जी ने बनाया था। बस जन्म दिन निश्चित हो गया ।

रायबरेली से कानपुर जाने वाली मुख्य सड़क के बीसवें कि मी के आगे से दाहिनी ओर क़रीब एक कि मी का धूलभरा गलियारा गांव रणमऊ जाने का था जिस पर बैलगाड़ी भी चलती थी । पूरब से पश्चिम चलता गलियारा मेरे घर से मिला हुआ दक्षिण दिशा से निकलता था। इस गलियारे में गर्मियों में खूब धूल लू उड़ती थी और बरसात में खूब कीचड़ होती थी। बरसात में चलना संभव नहीं होता था। घर का सदर दरवाजा पश्चिम को था। मुख्य सड़क पर मेरे बचपन में बसे चलने लगी थी पर पहले बताते हैं कि उस पर ऊंट गाडी चलती थी ।
घर में दर्जनों बैल मुख्यत: खेती के लिये थे। आस पास के गांवों को पैदल ही यात्रा होती थी। दूर जाने के लिये साइकिलें आ गयी थी। गर आसपास की बाजार जाना है , बुजुर्गों और महिलाओं को कही आना जाना है, किसी के यहाँ पार्टी आदि में सम्मिलित होने बुजुर्गों को जाना है तो बैलगाड़ी स् यात्रा शुरू हो जाती। बाबा बैलगाड़ी से ही हर इतवार ( रविवार) को और कभी—कभी बुधवार को भी लालगंज की बाजार (करीब आठ कि मी) जाते थे, सप्ताह भर का जरूरी सामान लाने। वर्ष 1960 में, मेरी बड़ी बहन माधुरी दिद्दा की बारात भी लालगंज रेलवे स्टेशन से बैलगाड़ी से ही लायी गयी थी। हम बैलगाड़ी से ही रायबरेली और लालगंज रेलवे स्टेशन गये थे अपने दो बड़े भाईयों (महेंद्र और नरेंद्र भाई साहब ) की बारात में ट्रेन पकड़ने के लिये। मतलब आसपास की शादी ब्याह, बारात आदि कामों के लिये, उस समय बैलगाड़ी ही मुख्य साधन थी। इसमें अलग से कोई विशेष खर्चा भी नही लगता था।

बैलगाड़ी से ही अपने बड़े परिवार के बीरभान काका की बरात अटौरा (करीब दस कि मी (हम सब बैलगाड़ियों से ही गये थे। शीला दीदी का तिलक चढ़ाने केसरुआ गांव (करीब 15 कि मी) भी हम बैलगाड़ी से ही गये थे और उधर से बारात भी बैलगाड़ी से ही आयी थी। जैसे आजकल देखा जाता है कि कोई कौन सी कार से मेहमान आया है, उस समय बैल देखे जाते थे, कैसे बैल हैं? बैलों से ही वाह—वाह होती थी। मालिक की इज्जत बढ़ती। उसके बैलों को लेकर आज की कारों की तरह चर्चायें होती। बैल या भैंस किसी के यहां खरीदकर आती थी तो गांव के लोग देखने आते थे, भीड़ जुटती थी। लोग अपनी अपनी राय देते थे ।

गांव में मेरा घर सामंती संस्कृति से ओत प्रोत था। घर की चहरदीवारी के अंदर ही घर की महिलायें रहती थी । मुख्य दरवाज़े से कोई महिला बाहर झांक भी नहीं सकती थी । बाबा की अनुमति नहीं थी कि घर की कोई बच्ची स्कूल जाये । सामंती समाज में व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं होता है, महत्वपूर्ण होती हैं संस्थायें, महत्वपूर्ण होते है सामंती मूल्य, मूल्य जिन्हे पुरुषों ने अपने लिहाज से बनाया है। सामंती मूल्य व्यक्तित्व के संपूर्ण समर्पण पर टिका होता है। मेरी दोनों बड़ी बहनें घर पर ही पढ़ी लिखी। मेरा संयुक्त परिवार इलाके का प्रतिष्ठित परिवार था। पिता जी गांव के प्रधान थे। पर्दा बहुत होता था। महिलाओं को सडक से घर तक आने के लिये, बैलगाड़ी जाती थी जिसमें पर्दा बनाया जाता था। तब तक महिला घूंघट में सड़क किनारे बैठी रहती थी। पर्दा लगी बैलगाड़ी दरवाजे पर उल्टा लगायी जाती तब महिलायें उतर कर अंदर घर जाती थी और इसी तरह घर से निकलकर बाहर बस पकड़ने सडक पर या पास के बस स्टेशन तक पर्दा लगी बैलगाड़ी से महिलायें बाहर निकलती थी। धीरे-धीरे पर्दा प्रथा में आज काफी छूट मिल गयी है। घर की बहुये गांव रणमऊ के ही जूनियर हाई स्कूल में ही टीचर है। घर की बहुये आज वरिष्ठ अधिकारी भी है।
गांव रणमऊ में अब यह बैलगाड़ी वाली संस्कृति गायब है । बैलगाड़ी को सदियों से प्राप्त महत्वपूर्ण दर्जा उससे छिन गया है। मुझे यह खुशी है कि मैंने बैलगाड़ी से भी बारातें की है और हवाई जहाज से भी। मेरठ के मित्र अभिनव ने अपने भाई की शादी गोवा से की, एयर टिकट आया, हम सपरिवार गोआ तक प्लेन से गये, वहां सात सितारा होटल में समुद्र के किनारे तीन दिन शादी में शिरकत कर उसी तरह सपरिवार वापस लौटे। घर की बारातों में भी मैं भाई राजेश के बेटे ऋषु की शादी में घर वालों के साथ सामूहिकता का मज़ा लेते , उत्सव मनाते रायपुर (छत्तीसगढ) ट्रेन से गया पर लौटा था प्लेन से । आज घर में ट्रैक्टर आ गये है, पहले जो काम बैलों से लिये जाते थे, वे सब काम अब ट्रैक्टर से लिये जाते थे। तमाम कारें आ गये है। अब हमारी बैलगाड़ीय संस्कृति करीब—करीब गांव घर से गायब है।

मेरे घर के उत्तर में बडा तालाब था। घर और तालाब के बीच एक बडी ही गझिन फुलवारी (बगिया) थी जिसमें मुख्य: रूप से बांस थे और साथ ही साथ कुछ नीम, जामुन,करौदा, खजूर आदि के पेड थे। यह बांस कोठियां इस किस्म की थी जिससे लाठिया बनती थी और उनकी मेलों ठेलों में खूब बिक्री होती थी। मैने अपने दरवाजे लाठियां बनते और उनका मेलों में बिकने के लिये जाना देखा है।  गांव रणमऊ की लाठी और गांव के अनुसूचित जाति के लोगों द्वारा बनाये जाने वाले जूते पूरे जवार (इलाके) में बहुत प्रसिद्ध थे । आपस में कहावत की तरह धमकाया जाता था कि रणमऊहा लाठी या रणमऊवा जूते से अभी पिटाई करूंगा ।
फुलवारी में पेड़ों की संख्या अधिक होने कारण वहां लकड़बग्घा और सियार आदि जानवर भी छुपे रहते थे । बताया गया कि फुलवारी की तरफ़ से घर के पिछले दरवाजे से आकर एक लकड़बग्घा मेरे सबसे बड़े भाई नरेंद्र भाई साहब को , जब वह बहुत छोटे थे और सो रहे थे, उठाकर ले जा रहा था कि किसी की नज़र पड़ गयी, शोर हुआ, लाठियां लेकर लोग दौड़े तब वह उन्हें छोड़कर भागा। लकड़बग्घे के दांत के निशान उनके सर पर बाद तक दिखते थे ।
फुलवारी में तरह-तरह की चिड़िया भी रहती थी। बचपन में कुछ चिड़ियों की आवाजें अपशगुन मानी जाती थी और माना जाता था कि यह अपशगुन आवाज कोई जान ले जायेगी। एक बार फुलवारी में नकरहई चिडिया बोल रही थी और मैं बहुत डरा हुआ था कि जाने क्या होगा? किसकी जान जायेगी। उस समय बचपन में गांव घर में भूत—प्रेत और अपशगुन आदि की बातें होती रहती थी और बच्चों पर डर हावी रहता था। फुलवारी में धीरे धीरे बांस की कोठियां हमारे बचपन से ही खत्म होने लगी थी। आज तो यह फुलवारी पूरी तरह गायब है।

गांव रणमऊ के ताल-तलैये
वैसे तो बड़े ताल से पूरे साल ही गांव के लोगों द्वारा कटिया लगाकर मछलियां मारी जाती थी, जो चाहे , खाने भर की मझली जब चाहे मार ले। कभी उधर गया तो गांव के कहारों के दो चार बच्चे कटिया डाले बैठे दिख ही जाते थे पर दिसंबर में हर साल बाबा ग्रामसभा से ठेका लेकर पूरी तैयारी से मछली मरवाते थे। करीब दो हफ्ते का यह कार्यक्रम होता था। पूरे गांव के लोगो को शेयर देते थे। खूबब मछली निकलती थी। पहले बांध बनाकर अतरिक्त पानी कठोइया से पानी निकालने का इंजन मंगवाकर पानी निकलवाया जाता था, फिर शिकार होता था। हर तरह की मछलियों यथा पढिना, मांगुर,सींगी, सौल, टेंगन आदि के लिये अलग अलग बड़े बड़े गढ्ढे (पांड) बनाये जाते थे। गांव भर खूब मछली खाता और अतरिक्त मछली बाजार बिकने जाती थी। आय शेयर के हिसाब से गांव में बंटती थी। हम बच्चों सहित गांव के लोगों की यह करीब दो हफ़्तों की पिकनिक होती थी। पूरा गांव शिकार मारने या देखने में मशगूल रहता था।
बरसात में कई कई दिन तक पानी बरसता ही रहता था, कभी तेज तो कभी झलबदरा बनकर। बडा ताल साल भर भरा रहता था। गर्मियों में लोग इसमें खूब नहाते थे। मुझे याद है एक बार महेंद्र भाई साहब अपनी पीठ पर लादकर मुझे बड़े तालाब में इस पार से उस पार तैर कर गये और आये थे।
बचपन की बरसात में  गांव रणमऊ से सडक तक पहुंचना भी आसान नही होता था। कीचड़ के साथ-साथ बड़े तालाब का पानी कभी कभी गलियारे के ऊपर से भी बहता था। स्कूल करीब डेढ़ कि मी दूर था जहां जाने में भी कीचड़ से गुजरना होता था।

बडे तालाब में जाड़े भर सैलानी (migratory) चिड़ियों का बसेरा पड़ा रहता। सींक पर (पिनटेल) तो सदैव रहती थी, शुरखाब भी अक्सर, काज / गीज और स्वान तथा नील सर, लाल सर भी कभी कभी दिख जाती थी। काका की लाइसेंसी बंदूक आ गयी थी और उससे चिड़ियों के शिकार होते थे। हमने भी उससे किये शिकार खाये है। अक्सर कुछ लोग बाहर से विशेषकर लालगंज से डा राय इस बडे तालाब (झील) में शिकार खेलने आते थे। उनके ऐसे ही एक आगमन में मेरा फाइलेरिया मर्ज पकड़ा गया था। जब भी बड़े तालाब की तरफ़ जाओ, मछली की ताक में तरह—तरह के बगुले खूब दिखायी देते थे। किंगफ़िशर टाइप एक ही स्थान पर पंखों के सहारे तालाब के ऊपर ठहर कर तेज डुबकी लगाकर मछली पकड़ने वाली छोटी छोटी चिड़ियों को देखने में मजा आती थी। अब ताल में पानी नही रहा, मछली का वैसा शिकार नहीं रहा । अब बसहा नाला भी करीब-करीब सूख गया है और बडा ताल काफी सिकुड़ गया है।

गांव रणमऊ में जगह जगह तलैया भी खूब थी। घर के पास ही नीम के दो तीन पेड़ और उसके बाद इमली का बड़ा पेड़ था । गजब की इमली फलती थी। हम बच्चे खूब खाते थे। पकने के पहले ही खट्टी इमली भी खाने का मन करता था। नीची डालियों को झुकाकर खाने भर की इमली हम बच्चों को भी मिल जाती थी। बचपन में इमली और करोंदे खाने में मुझे बहुत मजा आता था।

इमली के पेड़ के आगे एक बडी तलैया, उसके आगे पुलिया से मिली तलैया और इन दोनों तलैया के बायें हमारा खलिहान था और उसके बायें फिर हाथिन वाली तलिया थी। ताल तो ताल इन तलैयों में भी पानी करीब-करीब पूरे साल रहता था। बड़े ताल और हाथिन वाली तलिया का पानी तो कभी खत्म हुआ ही नहीं। बताया जाता था कि हाथिन वाली तलिया में इतना पानी है कि हाथी डूब जाये, इसी लिये इसे हाथिनवाली तलिया कहते थे।इस हाथिन की तलिया के किनारे तमाम पेड़ होते थे जिनमें बया चिड़िया का बसेरा रहता , उसके खूब सुंदर-सुंदर घोंसले लटकते और पानी में पनमुर्गियां घूमती रहती थी। नौकरी में एक बार बागडी के नाम से बिहार के एक अधिकारी ने उसका मीट खिला दिया, बाद में पता चला बया को ही बिहार में बागडी कहते है तो बहुत दुख हुआ। आजतक भी बचपन में जो खिलाया गया , वही खा पाता हूं, नया-नया खाने से हिचकता हूं।
बरसात में चारों ओर ताल—तलैयों और गांव से बड़े तालाब होकर निकलने वाले बसहा नाला के कारण गांव रणमऊ  के चारों तरफ पानी ही पानी रहता था पर कभी बाढ़ नहीं आती थी। पानी में छोटी—छोटी सहरी मछलियां खूब बहती रहती और जिन्हें देखने में हम बच्चों को बहुत मजा आती था। बचपन की बरसातों और इन बहती मछलियों को याद कर आज भी गुदगुदी होने लगती है। गांव में खूब ताल तलैयों के कारण जल स्तर बहुत ऊपर रहता था ।
गांव के पश्चिम दक्षिण में एक बडी तलैया के किनारे गांव के देवता मेड़कीबीर बाबा थे। यह  गांव रणमऊ के बाबा थे। यहां से ही हर परिवार के समारोह शुरू होते थे। शादियों में वहां जाकर गांव की महिलायें भी पूजा पाठ करती थी और जहां मैं भी अक्सर सिर नवाने, बाबा का आशीर्वाद लेने जाता था। इस तलैया में गर्मी में नहाया भी हूं। अब सब तलैया सूख गयी है। शायद ही बरसात के बाद किसी में पानी टिकता हो।

बचपन में  गांव रणमऊ में कुयें का ही पानी पिया जाता था। कुंये खुले होते थे। लाज़िम है कुछ अनावश्यक चीजें वहां गिरती रहती थी पर पानी मीठा और ठंढा रहता था, प्यास खूब बूझती थी। पानी का स्तर इतने नजदीक था कि ताल की तरफ तो दो तीन फुट पर ही पानी मिल जाता था। हमारे घर के अंदर भी कुआं था और दरवाजे डेरा की तरफ भी, चाचा बाबा के दरवाजे भी। गांव में भी कई कुयें थे जिससे ही पीने के पानी की कभी किल्लत नहीं होती थी। आज पानी का स्तर सैकड़ों फीट नीचे चला गया है । जल स्तर घटने और हैंड पम्प आने के बाद अब गांव के कुंये करीब-करीब सूख गये है। उनकी कोई अब जरूरत भी नहीं समझी जाती।
(लेखक परिचय: बैसवाड़ा रायबरेली के गांव रणमऊ में जनवरी 1954 को पैदा हुआ। हाई स्कूल गांव के पड़ोस के कालेज से ही । वर्ष 1974 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में मास्टर डिग्री प्राप्त की और उसी वर्ष पी पी एस में चयनित हुआ। IPS ( 89 ) की वरिष्ठता प्राप्त कर सात जिलों में पुलिस अधीक्षक, मेरठ , सहारनपुर और मुरादाबाद रेंज का पुलिस उप महानिरीक्षक। वर्ष 2013 में IG रेलवे इलाहाबाद के पद से रिटायर हुआ। गांव रणमऊ की कहानी का पहला कड़ी। क्रमश: जारी…)

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