बहुत बदला गांव लेकिन आज भी जीवंत है बचपन के गांव की स्मृति


रेखा सिंह
अभिनेत्री फिल्म, टेलीविजन एवं रंगमंच

हम सब शहरी जरूर हो गए लेकिन आज भी हमारे अंदर गांव वही युवा है! जब स्मृतियों को हम कुरेदतें हैं तो बचपन के दिन ,जो गाँव में बीते हैं याद आने लगतें हैं। मन सोचने पर मजबूर होता है कि कितना सुंदर था हमरा गांव और वहां की रीति-रिवाजें। पर्व-त्योहार, खानपान, रहन-सहन भाईचारा भी कम न था। लेकिन अब कभी गांव जाना होता है तो बदले हुए गाँव और वहां के रीति-रिवाज को देखकर मन दुःखी हो जाता है।

एक तरह से बदलना भी ठीक है, और यह स्वभाविक भी है लेकिन इस तरह बदलना कि न वो शहर बन सका न ही अब वह विशुद्ध गांव ही रहा। अपनी संस्कृति, परंपराओं को लोग बिसराने लगें हैं और दिखावे के इस दौर में दूसरे राज्य की परंपराओं, उनकी रिवाजो को अपना रहे हैं। हमारा गांव भी अब पहले जैसा नहीं रहा, यहां भी खूब बदलाव हुए हैं। लोग इतने समय के पाबंद हो गए हैं कि अब न इनके जीवन में अपनी संस्कृति को बचाने की फिक्र है न इन्हें अपनी परम्पराओं से कोई सरोकार। सब भागे जा रहें हैं अपने धुन में, पीछे जो छूट रहा है इसकी चिंता किसी को नहीं है।

हमारा गांव, बिहार के मधुबनी जिला अंतरगत बेनीपट्टी प्रखंड में शाहपुर गांव है। चारो तरफ से हरे भरे शाहपुर गांव में वैसे तो हरेक जाति के लोग रहतें हैं लेकिन यह राजपूतों का गांव कहा जाता है!  कारण राजपूतों की संख्या इस गांव में और जातियों के अपेक्षा अधिक थी। अगर भौगोलिक दृष्टि से देखा जाय तो यह गांव दो-दो नदियों  के मुहाने पर बसा हुआ है। पश्चिम दिशा में खिरोई नदी बहती है, तो इसके उत्तर दिशा में बुढ़नद!  वैसे तो गांव के बगल से नदी गुजरना सौगात है लेकिन इसकी वजह से यह गांव हर साल बाढ़ के विभीषिका को झेलता आ रहा है। गांव के बीचों बीच 5 बीघे का तालाब और ठीक तालाब के दक्षिण मुहाने पर राधा-कृष्ण की सुंदर सफेद मंदिर और पश्चिमी कोने पर ब्रह्म स्थान जो राह चलते बटोहियों को भी थोड़ी देर वहां विश्राम करने का मन हो ही जाता था। और बटोही वहां रुकते भी थे।

सलीके से बसा चैकोर नुमा यह गांव कभी विद्वानो का गढ़ रहा है। शिक्षित होने के साथ-साथ सामाजिक कार्यों में एकजुट होकर कार्य करने के लिए भी जाना जाता था यह गांव। पास-पड़ोस के गांवों के अपेक्षा इस गांव की प्राकृतिक सुंदरता अलग दिखती थी। ये बात सिर्फ इसलिए नहीं कि यह मेरा गांव है, बल्कि इसलिए कि इस गांव के लोगों का व्यवहार, जीवन शैली और गांवों के अपेक्षा बहुत ही कुशल था।

आप शाहपुर गांव में जैसे ही प्रवेश करेंगे तो सबसे पहला जो घर आता है वह डोम जाति की है। अगर दूसरे रास्ते से भी प्रवेश करतें है, तो उधर से भी पहला घर पासी (मुसलमान) का है। दक्षिण दिशा से प्रवेश करतें हैं तो कुम्हार और कामत का है और बीच गांव में केवल राजपूतों का ही घर है। ब्रम्हणों का टोला भी हटके है, जिससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि पहले जाति व्यवस्था कैसी रही होगी !

ऐसे में जब मैं बचपन के बीते दिनों में झांकती हूँ तो गाँव से जुड़े कितने किस्से-कहानियां मेरे मन में उब-डूब करने लगतें हैं। कितनी सरलता थी जीवन में। कितने रागरंग, मस्तियाँ कितना प्रेम जो अब नहीं रहा। हर महीने पूजा-पबनी! मतलव हर समय खुशी मनाने के रास्ते त्योहार के माध्यम से निकल ही आते थे। बचपन के खेल भी निराले थे। शायद ही कोई खिलौना हम लोग खेलने के लिए खरीदे होंगे। सारे खिलौने खुद से ही बनाते थे। चाहे वह कनियाँ-पुतड़िया का खेल हो या गिल्ली डंडा सब खुद से बनाते थे नहीं तो घर के जो बड़े-बुजुर्ग या नोकर-चाकर बना देता था।

ओह, पेड़ पर भी चढ़ना कमाल था। हमलोग कभी तोड़े हुए घर में रखे हुए फल नहीं खाते थे, स्कूल से आते थे और सीधे अपने बाड़ी के अमरूद के पेड़ पर छलांग लगा देते थे। गर्मी हो या सर्दी नितदिन दिन में कमसे कम एक बार अमरूद पेड़ पर तो चढ़ते ही थे।

एकबार की बात है, हम सब भाई बहन स्कूल से वापस आये, दोपहर के भोजन किए और लपक गए अमरूद के पेड़ पर। मेरी एक सहेली है मोनी वो भी हमारे साथ ही पढ़ती थी और स्कूल से आने के बाद हमलोग साथ-साथ खेला करते थे और अमरूद के गाछ पर भी चढ़ते थे। उस दिन मोनी बोली, चलो रेखा, आज हमलोग छोटे बाबा के बाड़ी का लताम तोड़ते हैं, अभी दोपहर है इसलिए बाबा-दादी  अंदर घर में सो रहे होंगे।

हमे भी मोनी की बात अच्छी लगी और हम हां बोल कर उसके साथ हो लिए। पहले जाकर हमदोनों ने बाबा-दादी का मुआयना किया कि सच में दोनों सोये हैं या जागे हैं! मुआयना करने के बाद मालूम पड़ा कि सच में दोनों सो र्शे हैं, अब आसानी से हमलोग पके-पके अमरूद का मजा लेंगे। मोनी मुझे बोली-देखो, मैं पेड़ पर चढ़ती हूँ, तुम नीचे रहकर अमरूद लोकना.. और हां, धीरे-धीरे बोलना।

मैं बोली अच्छा ठीक है तुम चढ़ो लेकिन ध्यान से, बगल वाले डाल पर विरहणी का खोता है, बचके कहीं तुम्हें काट न ले। मोनी धीरे से इशारा की मुझे कि तुम निश्चिंत रहो मैं आराम से अमरूद तोड़ूंगी।

मोनी, ऊपर वाले डाल पर चढ़ी, मैं नीचे से उसे इशारे में बताए जा रही थी कि ईधर पका वाला अमरूद है, उधर भी पका है। वह-जल्दी-जल्दी अमरूद तोड़-तोड़ कर गिराने लगी और मैं अपने फ्रॉक में समेटते गई। डर ये भी लग रहा था कि कहीं बाबा-दादी न आ धमके। अच्छा खासा अमरूद का गठरी तैयार कर लिया हमने। अब मैं मोनी को इशारा की कि जल्दी उतरो वार्ना दादी-बाबा आ जाएंगे।

मोनी जल्दी से बगल वाले डाल पर छलांग लगा दी जिस पर विरहणी का खोंता था। बाप रे, वह खोंता क्षणभर में मोनी के सर पर आ गिरा। वह जोड़-जोड़ से चिल्लाने लगी…रेखा हमरा बचो, हमरा विरहणी काटि रहल अछि…

बाप रे, वह दृश्य देखकर मैं अचंभे में पड़ गई, मोनी के माथे पर कमसे कम पचासो विरहणी लटक रहे थे, दूसरा मोनी के चिल्लाने से बाबा-दादी भी जग गए थे क्योंकि उनके ड्योढ़ी का दरवाजा खुलने की आवाज मुझे सुनाई पड़ी! मैं न आव देखी न ताव किसी बाघ से डरे हिरण के बच्चे की तरह कुलांचे मारकर मैं वहां से भाग खड़ी हुई और बाबा के घर के पीछे लगे टाट में जाकर छिप गईं।

इतने में बाबा कि आवाज मेरे कानों में सुनाई पड़ी।

वह चिल्ला कर बोल रहे थे…ई राक्षस बच्चा सब एकोटा लताम नै रहे देत… ओह केहन ई बच्चा सब छै।

मोनी भी चिल्लाये जा रही थी, अपने ऊपर बाल में फंसे विरहणी को निकलने की खुद ही कोशिश कर रही थी। यह देखकर मुझे बहुत दुःख हो रहा था लेकिन बाबा-दादी और विरहणी के डर से मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी कि मैं जाकर मोनी की सहायता करूं। इतने में दादी भी वहां आ गई, वो भी गुस्से में ही थी लेकिन मोनी का हाल देखकर उल्टे पैर घर में गई और मिट्टी तेल वाला डिबिया और प्याज काटकर ले आई, जल्दी जल्दी मोनी के सर, कान, नाक पर रगड़ने लगी …और बार-बार मोनी को यह भी बोल रही थी… कि तों सब बानर बच्चा छे, एको गो बतियो लताम नै रहे दैत जाय छैं त्यं  विरहणी काइट लेलकोउ… .आब एहन चोरी वाला काज नै करहें।

मैं ये सब देख रही थी। मोनी का रोना धीरे-धीरे काम होने लगा फिर दादी उसको सहारा देकर उसके घर ले जाने को उठी कि हम पकड़ाने के डर से जल्दी से वहाँ से नो दो ग्यारह हो गए। मन में बहुत ग्लानि भी हो रही थी कि हम अपनी सहेली  को विरहणी काटने से नहीं बचा पाए ! लेकिन बच्चा जाति को इनसब चीजों का असर ज्यादे दिनों तक नहीं रहता। फिर से वही रूटीन अमरूद तोड़ने का।

हमारा खेल भी मौसम के हिसाब से होता था। गर्मी में बुढ़िया कबड्डी, लुक्का-छिपी, खो खो इत्यादि। बरसात में कनियां-पुतड़िया या  कित-कित मतलब इन्डोर खेल बरसात में। कभी-कभी हम बच्चे नाटक भी खेलते थे। अधिकतर रामायण या महाभारत ही इसका भी कारण था उस समय टीवी पर रामायण और महाभारत लोगों का सबसे प्रिय धारावाहिक हुआ करता था।

हमारी प्रारम्भिक शिक्षा गांव में ही हुई है।  सन, 1962 के समय में मेरे दादा जी स्वतंत्रता सेनानी श्री मुनीश्वर सिंह द्वारा बनवाया गया स्कूल, शाहपुर के अलावे कई और गांवों का शिक्षा केन्द्र हुआ करता था।  बहुत दूर-दूर से पढ़ने के लिए लोग आते थे इस स्कूल में। स्कूल के प्रांगण में छात्रावास  भी हुआ करता था जिसमें दूर-दराज के बच्चे पढ़ने के लिए रहते थे। पहली कक्षा से लेकर दशमी तक की पढ़ाई यहां होती थी।

कमाल की बात है, पहली से लेकर पांचमी कक्षा तक हम बच्चे स्कूल के प्रांगण में लगा पीपल या बरगद के पेड़ के नीचे बोरी पर बैठकर पढ़ाई करते थे। न पंखा न बिजली एकदम शुद्ध वातावरण में! टिफिन होते ही कुछ बच्चे घर चले जातें थें भोजन करने तो कुछ भोजन नहीं करके खेलने में ही मस्त। छठी कक्षा से  बेंच पर बैठने का अवसर मिलता था। और तो और हमलोग खुद ही अपनी कक्षा की सफाई करते थे, फूलों की क्यारियों में फूल भी रोपते थे और खुद ही पानी भी डालते थे। कितना आनंद आता था, सोंचकर मन एकदम उसी बचपने में लौटना चाहता है। शिक्षक सब भी बहुत मेहनती और अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार होते थे। कोई-कोई शिक्षक भी निखट्टू होते थे इस में कोई दो राय नहीं, लेकिन शिक्षा व्यवस्था अभी के तुलना में दुरुस्त जरूर था।

मेरे गांव में कृष्णजन्माष्टमी के अवसर  पर मेले लगते थे। इस मेले में दूसरे-दूसरे गांव के लोग भी आते थे। राधेकृष्ण मंदिर के प्रांगण में एक धर्मशाला भी हैं जिसमें कोई भी आगन्तुक , साधु-महात्मा आकर रहते थे, उसी धर्मशाला में जनमाष्मी की मूर्तियां सजाई जाती थी। दिन भर मेले में हमलोगों का समय बीतता था। पापा हम सब भाई-बहनों को  पन्द्र -बीस रुपये देते थे मेला घूमने के लिए। उसी पैसे से हमलोग खूब खरीदारी करते थे, फूंकना, पिपही, चूड़ी, बाला , मीठा पान खाते हुए जब शाम को घर आते थे, तो अम्मां फरही-कचरी के साथ बहुत सारा पकवान परोसकर खाने को देती थी। पापा भी हमलोगों के साथ बैठकर खाते थे और दिनभर के मेले की किस्से हम भाई बहनों से सुनते थे। कभी-कभी मेले से समय पर घर नहीं लौटने पर डांट भी जमकर परती थी।

राधेकृष्ण के मंदिर से याद आया कि सावन का महीना आते ही राधेकृष्ण के मंदिर को खूब सजाया जाता था। अष्टजाम और कीर्तन रातदिन हुआ करता था। गांव भर से चंदा इक्ठा कर युवाओं की टोली पूजा का सारा इंतजाम करते थे। भजन कीर्तन करने के लिए कीर्तनियाँ मंडली को बुलाया जाता था जो महीने भर रहकर भजन-कीर्तन करते थे। शाम होते ही गांव के बड़े-बुजुर्गों और बच्चों के साथ सारी महिलाएं भी अष्टजाम देखने की तैयारी में जल्दी-जल्दी घर का काम-काज निपटा कर राधेकृष्ण के मंदिर पर आ जाया करती थीं।  युवक-युवतियां तो कुछ ज्यादे ही उत्साहित रहते थे, कारण अष्टजाम के बहाने कम से कम अपने मन के मीत का तो दर्शन हो ही जाता था। अलग-अलग पंक्तियों में बैठे  वे जोड़े खुद को राधेकृष्ण के हर प्रेमगीत में खुद अपना जगह बना लेते थे। आंखों ही आँखों में इशारा होता था और मौका मिलते ही शौचालय जाने के बहाने वहां से दोनों निकल कर क्षणभर ही सही लेकिन एकदूसरे में खो जाया करते थे।

लाख छुपके-छुपाके मिलन होती थी लेकिन किसी न किसी की नजर उस प्रेम में लिप्त जोड़े पर ही जाया करती थी। सुबह होते ही गांव में काना-फुसी शुरू, फलनमा के बेटी फलनमा के बेटा संग मंदिर के पीछे गुटुर गू कर रही थी, है कृष्ण कैसा जमाना आ गया… बोलने वाले को ये भी पता है कि कभी कृष्ण-राधा भी यही करते थे, जिसके लिए आज भी वे पूजे जाते हैं लेकिन उन्हें कौन समझाए कि प्रेम कभी पाप नहीं होता, प्रेम पूजने से ज्यादा करने के लिए होता है…..खैर पूरे गांव यही शोर कि फलनमा कि बेटी बदचलन है, और दूसरे दिन से उन जोड़े को मंदिर पर जाना बंद हो जाता था।

खैर, अभी भी मुझे वह भजन याद है जिस भजन को सुनकर  लोग झूम उठते थे। कृष्ण आप बेसे बृंदावन में मेरी उमर गुजर गई गोकुल में…..। और दूसरा ये गीत भी कहाँ जा छुपे हो वो प्यारे कन्हैया सभा बीच लाज लूटी जा रही है…..! फिल्मी धुन पर बने एक से एक भजन जो श्रोताओं को वहाँ से जल्दी हिलने नहीं देते थे।  गांव की बहुएं भी अष्टजाम का इंतजार कई महीने पहले से ही करने लगती थीं, क्योंकि अष्टजाम के बहाने ही कम से कम उन्हें घर से बाहर निकलने का, नए कपड़े और गहने पहनने का और अष्टजाम के बहाने  सास, नन्द, गोतनी के किस्से बतियाने के अवसर तो मिल ही जाया करते थे।  गांव में उस समय सवर्णों की बहुएं घर से दिन में बाहर नहीं निकलती थीं, वेसे देखा जाय तो बहुएं आज भी दिन में बाहर नहीं निकलतीं हैं। तो खैर बहुओं के लिए यह सुनहरा अवसर होता था। हम बच्चे भी अपनी-अपनी दादी,नानी या चाची, बुआ, मौसी के साथ अष्टजाम देखने जाने में कभी पीछे नहीं रहते थे। नितदिन शाम की पढ़ाई जल्दी-जल्दी निपटा कर, भोजन करके बड़ी मां के साथ पूजा के थाल हाथ में लिए मंदिर पहुंच ही जाती थी।

मंदिर के प्रांगण में सिर्फ सवर्णों का ही प्रवेश मान्य था। हरिजन स्त्री-पुरुष बाहर से ही अष्टजाम या भगवान के दर्शन किया करते थे। देर रात जब अष्टजाम समाप्त हो जाता था तो हमलोग घर वापस आते थे। हमें याद है, कई बार मंदिर से नंगे पांव घर आना पड़ता था, क्योंकि मंदिर के प्रांगण में चप्पल ले जाना वर्जित था इसलिए चप्पल बाहर ही निकाल दिया करते थे और आते समय पता चलता था कि चप्पल  वहां से कोई उड़ा ले गया है। अब मुझे नहीं लगता कि उस तरह के अष्टजाम और कीर्तन आज के समय में होता होगा। इन दो-तीन दशकों में बहुत कुछ बदल गया।

गाँव की तो ऐसी दशा है कि अधिकांशतः सवर्णों के घरों में ताला लटक रहें हैं और जो गांव रह भी रहें हैं, उनको इस तरह के आयोजनों से अब लगाव नहीं। अब गांव में कृष्णजन्माष्टमी तो नहीं मनाया जाता है लेकिन गणेश उत्सव मराठियों के तर्ज पर जरूर मनाया जाता है।

पहले गांव में शादी-ब्याह, जन्म, मुंडन-उपनयन या मरनी-हरनी में भी भोज-भात का आयोजन खूब धूम-धाम से होता था। शादी-ब्याह में तो कई दिनों तक भोज होते ही रहता था। तिलक से शुरू होता था और दुल्हन आने तक बहुरक्षा तक भोज ही भोज होता था। वैसे भी मिथिलांचल का भोज जगजाहिर है। चाहे जमीन क्यों न बेचना पड़े लेकिन भोज तो महो-महो वाला ही होना चाहिए। हालांकि यह परंपरा कहीं से उचित नहीं है लेकिन लोग परम्परा से अधिक दिखाबे में अधिक व्यय कर देतें हैं।

पहले जब भी गांव में भोज होता था तो गांव भर के लोग सब आपस में मिलजुलकर भोजन तैयार करते थे, जो घरबैया होते थे उनका काम था बस पैसा खर्च करना बांकी चिंता समाज के लोगों की होती थी।

कितना भी धन्ना सेठ के यहां भोज का आयोजन होता लेकिन भोज जमीन पर बैठकर ही खिलाया जाता था। भोजन बनाने वाले से लेकर खिलाने वाले तक अपने समाज के ही लोग रहते थे। भोजन परोसने वाले को श्बारीकश् कहा जाता था जो अपने ही गाँव के अपने ही जात-भाई हुआ करते थे। भोजन करने वालों के लिए पुआल से बने ष्बीड़ीष् दिया जाता था बैठने के लिए । फिर भोज्य सामग्री को केले के पत्तल पर परोसा जाता था। केला का पत्तल खरीदना नहीं पड़ता था, वह किसी के भी बाड़ी-झाड़ी में ही मिल जाया करता था।

जितने भी गांव के सवर्ण सब आते थे भोजन करने उन सबके साथ खबास जरूर आता था, जो मालिक को पानी पीने के लिए लोटा या ग्लास लेकर आता था। खबास का नाम भी खूब होता था, मंगरुआ, बेचना, चुल्लबा, फेकना, दुःखना….शायद जिसका जन्म जिस परिस्थिति में होता होगा वही नाम लोग रख देते होंगे।

 घर के जितने समांग(सदस्य) आते थे उतने लोटे एक कठौती में भरकर खबास लाता था। कारण भोज में पानी पीने के लिए पात्र नहीं दिया जाता था पात्र सबके अपने-अपने घर से आता था। जब भोजन कर सारे लोग उठ जाते थे तो पत्तल पर बचे जूठन उठाकर खबास लोग उसी कठौती में रख लेता था अपने-अपने घर ले जाने के लिए।

खैर, अब न कोई केले के पत्तल पर भोज खिलाता है और ना ही अब कोई अपना समांग भोज परोसता है। जमीन पर बैठकर भोजन करने की परंपरा जाती रही। अब खबास तो मिलता ही नहीं तो लोटा ढोने की बात तो छोड़ ही दीजिए। अब जूठन उठाने की भी परंपरा खबास के साथ जाती रही।और यह सही भी है। अब  गांव में भी भोज बुफे सिस्टम या रेडीमेड सिस्टम में होने लगा है। लोग कुर्सी पर बैठ कर या खड़े-खड़े खुद से भोजन निकालकर श्भोजश् खातें हैं। कैसा लगता है जब अपना-अपना थाली उठाये लोग वेटर के सामने जा जाकर भोजन लेता है! मुझे तो ये सिस्टम बिल्कुल पसंद नहीं, जो मजा जमीन पर बैठ कर केला के पत्तल में भोज खाने का था और पूछ-पूछ कर,आग्रहपूर्वक भोज खिलाने का था वो अब कहाँ?

शादी-विवाह के रीत-रिवाज भी अब पहले जैसा नहीं रहा। न गीत त नाद बस डीजे के धुन पर नागिन डांस। ओह, कितना सुहाना लगता था गांव में शादी-विवाह का मौसम! लग्न शुरू होते ही लाउडस्पीकर पर शारदा सिंहा जी के गाये विवाह गीत मन को भेद देता था!  लगता था सच में कोई बेटी अभी अपने बाबुल का घर छोड़ रही हो।

पहले गांव में विवाह के कई दिन पूर्व से ही विध-विधान शुरू हो जाया करते थे। पांच या सात दिन पहले उद्योग के नाम से एक रस्म होता था जिस में लड़की या लड़का जिनकी शादी होने वाली होती है, उन्हें पीले हल्दी से रंगे वस्त्र पहनाया जाता था और गांव भर की स्त्रियां जिन्हें हंकार देकर बुलाया जाता था।  वह सब मिलकर बन्ने या बन्नी को उपटन लगाया करती थीं। यह उपटन भी विशेष तरह से बनते थे। पीले सरसों और थोडे से मेथी दाने को भून कर उसे फिर हल्दी के साथ सिलवट पर गांव की हजामिन खूब बारीक से पिसती थी। उस उपटन से बनने वाली दुल्हन या दूल्हे को अच्छी तरह मालिश किया जाता था। जब उपटन खत्म हो जाता था तो सरसों के तेल से मालिश करती महिलाएं हंसी-ठिठोली करती रहती। पीले वस्त्र में में अधूरी लिपटी युवती एकदम छुईमुई सी शर्मा जातीं । तेल मालिश के बाद काले काजल उनके आँखों में लगाए जाते और उम्मीद की जाती कि बुरे नजरों के वार से यह काजल बचाएगा।

 गीत गाने वाली महिलाओं को मिथिलांचल में गीतहारिन कहा जाता है। रस्म शुरू होने से पहले महिलाएं मंगल गीत गाती थीं और फिर बेटी विवाह के दर्द भरे मैथिली गीत। जिसे सुनकर पत्थर दिल इंसान भी रो दे। दादी- चाची सब के आखों से आंसू टपकते रहते और गीत गाती रहती और बीच-बीच में यह भी ध्यान देतीं कि जिसकी शादी होने वाली है वह लड़की रो रही है या नहीं!  हां, शायद यह भी भी एक रस्म ही होता था रोने वाला। जो लड़की उपटन लगाने के समय नहीं रोती थी, तो उसकी बड़ी शिकायत करती थीं महिलाएं। कितनी कठोर बेटी है, देखो जरा सा भी आखों से पानी नहीं निकल रहा! मन ही मन खुश हो रही है कि ससुराल जाएंगे..ण्गीत-नाद के साथ शिकवा-शिकायत का भी एक एपिसोड चलता था।

बाबा कौने नगरिया जुअबा खेल एली हमरो के हारि एली यो

इस गीत में बेटी, पिता से पूछती है कि  कहां मुझे हार कर आ गए!  बहुत ही दिल दहलाने वाली यह गीत है।

इसी तरह के अनेको गीत गाती थी महिलाएं।

इन सब गीतों के बाद महिलाएं गाली गीत गाकर खूब मस्ती करती थीं। इस गीत के माध्यम से भाभी-नन्द, देवर-जीजा, फुआ-फूफा, साला-सरहज सबको गालियाया जाता था और कोई भी इस गाली को बुरा नहीं मानते थे। अगर कोई बुरा माना तो उसके लिए शामत ही थी। गीतहारिन उसे और बाल्टी भर-भर कर गाली सुनाती थी।

एक गाली गीत मुझे अभी भी याद है,जैसे… आगि आने गेलै छिनरो भैया के अगन्मा, चोराय अनले गे गोजनोटा तर बेलनमा…..हा.. हा.. हा..

सच में मैं उन दिनों इस गीत का मतलब भी नहीं समझती थी  बस दादी, बुआ लोगों के साथ गाती थी। जब सारी महिलाएं गाली गाते-गाते थक जाती थीं तब उन्हें घर जाने की याद आती थी। उन्हें जाते समय सर भर कर तेल देने और सिंदूर लगाने का रिवाज था ! सिंदूर उन्हीं महिलाओं को लगाया जाता था जो सोहागिन होती थीं।

तेल-सिंदूर के बाद पान, मसाला बांटने का भी रिवाज था। मसाले में सुपारी, मुमफली, नारियल, छुहारे और सौंफ जरूर दिया जाता था। सब बांटने के बाद महिलाएं अपने-अपने घर को जाती थीं।

यह सिलसिला दोपहर से रात तक चलता था। विवाह से पांच या तीन दिन  पहले मरबा और मटकोर  होता था। हरे-हरे बांस से मंडप बनाया जाता था। बढई बांस काटकर लाता था और आँगन में लड़की के पिता के साथ गाँव के और पांच लोग मिलकर मरवा गाड़ते थें और उसे सजाने का काम गांव के युवाओं का होता था। सारी-सारी रात जागकर  वे सब मंडप सजाते थे।

अब न आंगन रहा, न बांस का मंडप और न ही युवाओं  के माथे मंडप सजाने की जिम्मेदारी। अब तो गांव में भी डेकोरेशन करने वालों की अपनी टीम आती है और एक दिन में सारे मंडप-कोहबर  सजाकर-धजा कर चली जाती है।

बदलते हुए गंाव में अभी भी मन खोजता है अपने बचपन के गांव को।

बिहार के गांवो की यात्रा

गांव की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। आईये आपको लिये चलती हूं बिहार के उन गांवों के दर्शन के लिए जिन्हें मुझे न्यूज18 बिहार-झारखंड के चुनावी कार्यक्रम के दौरान देखने और समझने का अवसर प्राप्त हुआ! बिहार के इन गांवो में घूमते हुए मुझे अपना ही गांव याद आया। गांव की तरक्की भी दिखी और बदहाली भी। गांव में बदलाव की आस से भी रूबरू होना पड़ा और विकास का बाट जोहते ग्रामीणों से संवाद का मौका भी मिला। महसूस हुआ, बिहार के गांव टेलीविजन के बहस, अखबारी पन्नों के चटखारी खबरों से अलग रंगत लिये हुए भी हैं। आज भी बिहार के गांव अपनी पुरातन परंपराओं को सहेजे, कथित शहरी बदलाव की बयार में बिना बहे तरक्की की राह पर सरपट दौड़े चले जा रहे हैं। अपनी चुनावी यात्रा में बिहार के जिस गांव में गई, मुझे अपना ही गांव नजर आया। आप भी जब शहर से दूर सुदूर गांव में जाएंगे तो असली बिहार नजर आता है। लेकिन दुख इस बात का भी है कि आजादी के 70 साल बाद भी यहां की जनता  पेट के लिए ही लड़ाई लड़ रही है। पेट के लिए मजबूरन अपना राज्य छोड़ने को मजबूर है! यहां देखने वाली बात यह है कि जब हम पेट से उबर नहीं पाएं हैं तो आगे क्या सोंच पाएंगे?

यहां ठहरकर एक अपने गांव से ईतर एक गांव की चर्चा जरूर करना चाहूंगी। जी हां पूर्णिया, सुपौल की चुनावी यात्रा के दौरान जब पूर्व मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री जी के गांव पहुंची, वहां की स्थिति देखने लायक थी!

मुझे तो ऐसा महसूस हो रहा था जैसे फणीश्वरनाथ रेणु जी की कालजयी रचना  मैला आंचल का सारा दृश्य मेरे आखों के सामने जीवंत हो रहें हों! वही गरीबी, वही अशिक्षा। वहां स्थानीय लोगों से बात करने पर पता चला कि अभी भी यहां के लोग भूख से मरते हैं! अस्पताल और स्कूल दोनों मात्र कहने के लिए हैं। वहां कई ऐसे घर हैं जहां अभी भी कई-कई दिनों तक चूल्हे नहीं जलते! कारण गरीबी! कोई रोजगार नहीं, खेती भी वैसी नहीं कि उसके भरोसे जीवन जिया जाय। महंगाई ऐसी की प्रतिदिन 300 रुपये मात्र कमाने वाला श्रमिक कैसे अपना परिवार चला पाएगा?

कोरोना काल में जो मजदूर, दूर देश से अपना रोजी-रोटी छोड़कर,जान बचाने अपने गांव पहुंचे थे कि गांव में महामारी से वे बच जाएंगे लेकिन उनके साथ एकदम उल्टा हुआ, महामारी तो उन्हें छूने से रही लेकिन भूख और गरीबी ने उन्हें लील लिया। पता नहीं सरकारी सहयोग अगर मिला तो इन गरीबों तक क्यों नहीं पहुँच पाया?

हालांकि इस मुद्दे पर किसी नेता ने अपना शांति भंग नहीं किया, उन सब के लिए तो वही बात थी। सब धन बाइसे पसेरी।

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