राजस्थान पंचायत चुनाव में जीत से उत्साहित भाजपा ने कहा.. किसान आंदोलन के खिलाफ जनमत

पंचायत खबर टोली

नयी दिल्ली: एक तरफ देश के अलग-अलग हिस्सों के किसान राजधानी में प्रवेश के सभी मुहानों पर डेरा डाले हुए हैं। विपक्षी दल खुद को किसान हितैषी बताते हुए नरेंद्र मोदी की सरकार पर हमलावर है। वहीं पार्टी नेताओं के हौसले राजस्थान के पंचायत चुनाव में मिली अप्रत्याशित जीत से बुलंद हैं और केंद्रीय नेता इसे किसान आंदोलन के विरूद्ध और पार्टी के पक्ष में जनमत मान रहे हैं। आज इसी जीत की खुशी जाहिर करने के केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर सामने आये और राजस्थान के पंचायत चुनाव नतीजों को बीजेपी के पक्ष में किसानों का फैसला बताया।


क्या कहा जावड़ेकर ने
प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि राजस्थान में जिला परिषद और पंचायत समिति के चुनाव में भाजपा को अप्रत्याशित जीत मिली है। ग्रामीण इलाकों के मुख्यत: किसान ढाई करोड़ वोटर थे, ये उनका फैसला है। उन्होंने कहा कि जिला परिषद के चुनाव में 636 सीटों पर चुनाव हुआ 353 सीटें भाजपा ने जीती हैं। पंचायत समिति की 4371 सीटों में बीजेपी ने 1990 सीटें जीती हैं। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने राजस्थान की जीत को बड़ी जीत बताते हुए कहा कि 21 जिला परिषदों में 14 पर बीजेपी को जीत मिली। जबकि कांग्रेस 5 पर जीती। ब्लॉक पंचायत में 222 के चुनाव में से 93 पर बीजेपी को बहुमत मिला है।
भाजपा ने बदला ट्रेंड

प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि आमतौर पर राजस्थान का ट्रेंड ये रहा है कि जिसकी राज्य में सरकार होती है, उसे ज्यादा सफलता मिलती है, लेकिन इस बार उल्टा हुआ है। कांग्रेस की सरकार है जबकि मतदाताओं ने इस बार बीजेपी का साथ दिया है। कांग्रेस ने परिसीमन किया, पैसों को जोर दिखाया. ढाई करोड़ वोटरों में सब किसान ही थे, इसका मतलब है कि राजस्थान में करोड़ों की संख्या में किसान कृषि सुधार के पक्ष में है।


कहां किसे बहुमत
चुनाव नतीजों की बात करें तो भाजपा को बूंदी, झालावाड़, भीलवाड़ा, पाली, अजमेर, टोंक, उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, चूरू, जालौर, सीकर, झुन्झुनू में बहुमत मिला है। जबकि कांग्रेस को हनुमानगढ़, प्रतापगढ़, जैसलमेर, बांसवाड़ा और बीकानेर में बहुमत हासिल हुआ है। वहीं, बाड़मेर, डूंगरपुर और नागौर में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है।
बता दें कि झुंझुनू में आजादी के बाद पहली बार भारतीय जनता पार्टी का बोर्ड बनेगा। झुंझुनू जिला परिषद के 35 वार्डो में भाजपा को 20, कांग्रेस को 13 सीटें मिली है। जबकि दो निर्दलीय यहां से जीते हैं। इससे पहले लगातार कांग्रेस का बोर्ड ही झुन्झुनू में बनता आया है।
कांग्रेसी दिग्गजों के साख को लगा बट्टा
पंचायत चुनाव मे प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा से लेकर पीसीसी पूर्व चीफ और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट को पंचायत चुनाव में तगड़ा झटका लगा है। अपने क्षेत्रों में खास पकड़ रखने वाले इन मंत्रियों और दिग्गजों को जनता ने विपरित परिणाम देकर चौंका दिया है। आपको बता दें कि डोटासरा ने निर्वाचन क्षेत्र लक्ष्मणगढ़ में कांग्रेस 25 में से केवल 11 सीटों पर ही कब्जा जमा पाई। यहां भाजपा ने 13 और एक निर्दलीय ने जीत का परचम लहराया। इसी तरह निम्बाहेड़ा में सहकारिता मंत्री उदयलाल आंजना भी सिर्फ 17 में से तीन सीट ही कांग्रेस को जीता पाए। यहां बीजेपी ने 14 सीटों पर कब्जा जमाया। खेल मंत्री अशोक चांदना डिहौली क्षेत्र में 23 में से 13 पंचायत समितियों में बीजेपी और 10 पर कांग्रेस दिखी। अजमेर में चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा को बड़ा झटका लगा। यहां 11 पंचायत समितियों में 9 पर भाजपा की बढ़त मिली है। वहीं कांग्रेस दो पर ही है।

सचिन पायलट को भी लगा झटका
पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट को पंचायत चुनाव टोंक और अजमेर दोनों ही जगह पर मायूसी हाथ लगी। टोंक में जिला परिषद सीटों की 25 सीटों में 10 ही कांग्रेस के कब्जा रहा। वहीं अजमेर में पंचायत समिति में भी कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। कई स्थानों पर निर्दलीय और हनुमान बेनीवाल की पार्टी आरएलपी की भूमिका रहेगी। उन्होंने भी बीजेपी-कांग्रेस दोनों की पार्टियों का खेल बिगाड़ा। आपको बता दें कि आरएलपी 56 और 422 सीटों पर निर्दलीयों ने जीत का परचम लहराया है। इसके अलावा सीपीआईएम ने 16, सीटों पर फिलहाल जीत हासिल की है।

क्या कहते हैं सरपंच
राजसमंद जिले के ग्राम पंचायत मंडावर की सरपंच प्यारी रावत कहती हैं भाजपा को मिली ये जीत नरेंद्र मोदी और कमल निशान को मिली जीत है। राजस्थान में भाजपा सरकार के दौरान पंचायत के विकास के लिए जो योजनायें लागू की गयीं थी उनकी जीत है। इसके साथ नरेंद्र मोदी की जो महिला कल्याण,किसान विकास की जो भी योजनायें हैं उसका प्रत्यक्ष लाभ जनता ​को मिलता है। कोरोना काल में जिस तरह से प्रत्येक महिला के खाते में पैसे आये, जन धन योजना का लाभ मिला, या फिर निशुल्क गैस कनेक्शन जैसी योजना से लोगों को प्रत्यक्ष लाभ मिला है। ऐसे में लोग प्रत्याशी तो देखते ही हैं लेकिन उनका ध्यान मोदी जी की योजनाओं पर होता है। यह पूछे जाने पर कि कांग्रेस के हार के पीछे क्या वजह से प्यारी रावत कहती हैं कि ऐसा नहीं है कि कांग्रेस सरकार ने अच्छा काम नहीं किया है या फिर भाजपा द्वारा जारी योजना को लागू नहीं रखा है। कांग्रेस के सर्वोच्च नेतृत्व और काम करने के ​तरीके,योजना को लागू करने के तरीके के प्रति लोगों में एक तरह से अंसंतोष होता है जिसकी वजह से पार्टी को नुकसान होता है।

राजसमंद जिले के ग्राम पंचायत मंडावर की सरपंच प्यारी रावत

सरपंच संघ राजस्थान के प्रदेश अध्यक्ष भंवर लाल जानु कहते हैं कि भाजपा ने अपने पूर्व के शाषण काल में जिस तरह से पंचायतों को मजबूत किया था उसका प्रत्यक्ष फायदा भाजपा को पंचायत चुनाव में मिला है। भाजपा शाषण काल में मनरेगा के अंदर काफी कार्य कराये गये थे। सड़के बनाई गईं। खेती का काम हुआ, पानी,बिजली सब काम किया गया। इसके अलावां भी गांव की बेहतरी के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने काम किया। लेकिन इसके बरक्स यदि कांग्रेस को देखें तो पिछले दो साल में पंचायत मद में कोई भी पैसा खर्च होता नहीं दिखता। यहां तक जो पूर्व की सरकारों में गांव के विकास के लिए काम किया गया था उसको भी बरकरार नहीं रखा गया। न सड़क ठीक किये गये और न बिजली पानी की व्यवस्था। यहां तक प्रधानमंत्री आवास योजना के मद में जो राज्य सरकार को अपने हिस्से का पैसा देना होता है वो राशि भी राज्य सरकार ने नहीं दिया जिसके वजह से योजना ठप पड़ी हुई है। भंवरलाल कहते हैं कि सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस पार्टी के आपसी खींचतान का हुआ। यहां तक की पिछले 6 माह से न तो राज्य में पंचायती राज्य मंत्री है और न ही पी डब्लयूडी मंत्री। इसी से समझ सकते हैं कि गांव के विकास के प्रति कांग्रेस कितना गंभीर है और इसका नुकसान पार्टी को इस चुनाव में उठाना पड़ा है।

सरपंच संघ राजस्थान के प्रदेश अध्यक्ष भंवर लाल जानु

यह है हार के प्रमुख कारण
जानकारों की मानें, तो कांग्रेस को मिली यह हार कई पहलूओं से जोड़कर देखी जा सकती है। प्रदेश में चले डूंगरपुर आंदोलन, गुर्जर आंदोलन और सियासी संकट के दौरान गुटबाजी का असर कांग्रेस पर पड़ा। कांग्रेस का अशोक गहलोत और सचिन पायलट खेमे में बट जाना बड़ा फैक्टर माना जा रहा है। इसके अलावा संगठनों नियुक्तियां ना कर पाना, विधायकों के भरोसे जमीनी स्तर पर चुनावों को लड़ने की मंशा और टिकट बंटवारे में परिवारवाद भी हार के प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।

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