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मन चलि जात अजौ…

प्रो डाॅ ओम प्रकाश सिंह मर ही जाता मैं शहर में बच गया गांव की शीतल हवाएं साथ हैं।   अपने गांव को याद करना और उसके बारे में बात करना सुखद है। मैं 1977 ई. तक गांव में ही रहा हूं। पढ़ने-लिखने के क्रम में उस समय का छूटा, गांव आज भी छूटा ही …

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जहाँ भी रहे गाँव वाला बने रहे

 डॉ संध्या सिंह मेरे बाजी (डॉ. केदारनाथ सिंह) कहीं भी रहे पर गाँव उनकी रगो में बसता था और बहता था। गाँव, गाँव के लोग, खेत खलिहान, भागड़ यहाँ तक कि खेत में खड़ा ‘कुदाल’ भी उनको आमंत्रित करते रहे। उनकी कविताओं में ये बिंब बार-बार आते हैं। ड्राइंगरूम में कुदाल की जगह ढूढँते-ढूढँते वे …

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हिंदी भुला जानी…

 केदारनाथ सिंह पर किस तरह मिलूँ कि बस मैं ही मिलूँ, और दिल्‍ली न आए बीच में क्‍या है कोई उपाय! – ‘ गाँव आने पर’ जहाँ गंगा आ सरजू ई दूनो नदी क संगम बा, ओसे हमरे गाँव के दूरी लगभग आठ किलोमीटर होई। दूनो नदी क बीच में पड़ला के वजह से एह …

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जहां भी रहे, गांववाला बने रहे

डाॅ संध्या सिंह मेरे पिता डाॅ केदार नाथ सिंह की दो शादियां थी। पहली शादी चंपारण में हुई थी जो मात्र सवा महीने ही जीवित रही। मेरे पिता को दादी की संपत्ति के साथ ही अन्य तरह की बहुत सारी सपत्ति मिलती चली गई। परिवार में सिर्फ दो ही वारिश थे। मेरे पिता और एक …

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‘फलाने कै लड़िकवा’ से ‘डॉ. ताराशंकर’ हो चुका हूं

डाॅ तारा शंकर गाँव विशुनपुर, जिला बस्ती, उत्तर प्रदेश। उम्र 34 साल 5 महीने। 19 साल से घर-गाँव से दूर शहर में रह रहा हूँ। घर से शहर बस्ती, बस्ती से इलाहाबाद और फिर 2007 से देश के दिल दिल्ली में। शायद बदलाव के सबसे तेज दौर वाली पैदाइश है हमारी जनरेशन। तकनीक बदली, संचार …

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