जहाँ भी रहे गाँव वाला बने रहे

 डॉ संध्या सिंह मेरे बाजी (डॉ. केदारनाथ सिंह) कहीं भी रहे पर गाँव उनकी रगो में बसता था और बहता था। गाँव, गाँव के लोग, खेत खलिहान, भागड़ यहाँ तक कि खेत में खड़ा ‘कुदाल’ भी उनको आमंत्रित करते रहे। उनकी कविताओं में ये बिंब बार-बार आते हैं। ड्राइंगरूम में कुदाल की जगह ढूढँते-ढूढँते वे …

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