डाॅ हरिकेश सिंह
यह प्रश्न मेरे मन में अक्सर आता है कि गांधीजी ने जिस ग्राम-स्वराज का सपना देखा था, वह कैसा था। यह जरुर है कि जिस संदर्भ में गांधी ने गांव को समझा और गांव की लोकतांत्रिक पद्धति को ऐसा सुदृढ़ बनाने का प्रयास किया कि कोई व्यक्ति केवल गांव के जीवन को देखे तो समझ जाए कि भारत का लोकतंत्र वास्तविक लोकतंत्र है। परन्तु आज विसंगतियां हैं।
भारत का गांव महानगरों की संस्कृति से आच्छादित हुआ है और परिवर्तित भी हुआ है। गांव की अपनी सहजता मिटने लगी है। नगर और महानगर हमारे लिए घृणा की वस्तु नहीं हो सकते, परन्तु गांव का पूरा का पूरा शोषण हो, गांव वाले का शोषण हो और उसकी आजीविका के जितने साधन हैं उनका शोषण हो, उनकी जीवन पद्धति पर भी काॅरपोरेट घरानों का प्रभाव हो तो सोचना तो पड़ेगा। देश की अधिकांश जनता के साधनों, सुविधाओं को एकजगह एकत्रित कर दिया गया तो नगर बन गया, महानगर बन गया। अब तो जनसंचार माध्यमों से आने वाली विषयवस्तु भी नगरीय होती है उससे गांव प्रदुषित हो रहे हैं। सांस्कृतिक रूप से गांव ने अपने गांवपन को ही खो दिया है और गांधी ने जो सोचा था वह गांव नहीं रहा।
गांधी ने निर्वाचन वाली ग्राम-पंचायतों के बारे में नहीं सोचा था। जबकि हमने जिस लोकतंत्र को स्वीकार किया है उसमें राष्ट्र की पंचायत को चुनाव द्वारा निर्धारित करते हैं तो गांव की पंचायत भी उसीतरह बन रही है। आप देखें तो 1992 के बाद जो ग्राम पंचायत का एक्ट आया उसके बाद तो गांव में सुविधाओं के नाम पर आर्थिक भ्रष्टाचार बढ़ा है और निर्माण भी हो रहा है तो शहरी माॅडल पर। यह नहीं होना चाहिए। अस्पताल, स्कूल, सड़क तो गांव और शहर को एक जैसी चाहिए। परन्तु द्वंदों का निर्धारण, झगड़ों को सुलझाना, लोगों का पारस्परिक उठना-बैठना सब बदल गया है। जहां निर्वाचन पहुंचा है वहां कटुता बढ़ी है। और गांव का आदमी जिस परस्परिकता के भाव से रहता था, वह समाप्त हो गया है। जिसको महात्मा गांधी समुदाय या कम्यूनिटी कहते थे। उनका कहना था कि शिक्षा पाठशाला से अधिक समुदाय में होगी। परन्तु आज हमने शिक्षा को समुदाय से इतना अलग कर दिया, इतना नगरीकरण हो गया शिक्षा का कि गांव से जो लोग शहर में आकर फिर वापस गांव जाते हैं वे गांव को, गांव के जीवन अर्थात सांस्कृतिक कौशलों को भूल गए हैं। गांव की भाषा नहीं जानते। गांव का आचरण नहीं जानते।

गांधी जी ने सोचा था कि गांव के संसाधन का उपयोग और गांव की समस्याओं का समाधान गांव के अंदर ही हो जाए। अब इसका प्रयास हो भी रहा है। लोक अदालतों के माध्यम से, चौपाल के माध्यम से। परन्तु चौपाल के पहले भी ई-चौपाल लग गया न। तो हम यह नहीं कहते हैं कि जनसंचार या इलेक्ट्रानिक मीडिया का उपयोग न हो। परन्तु गांव का जो स्वरूप होना चाहिए था जिसको अंग्रेजी में इथाॅस बोलते हैं, गांव का जो तेवर था वह तो गांव जैसा रहना चाहिए। इसलिए अगर आज गांधी होते तो अधिक छटपटाते। परन्तु जिसको बिहार या उत्तर प्रदेश का पिछड़ापन कहते हैं, गवांरूपन कहते हैं उसमें मानवता बहुत अधिक है। और वह वही मानवता है जो गांधी चाहते थे। इसलिए हम लोगों को अपने शिक्षण संस्थानों के माध्यम से यह बात स्पष्ट करनी है कि आज भी गांव का वातावरण पर्यावरण की दृष्टि से स्वच्छ है। खान—पान की चीजें स्वच्छ हैं। अभी गांव का आदमी उतना धूर्त नहीं हुआ है जितना अज्ञेय के शब्दों में शहर का आदमी हुआ है। उनकी कविता है-
हे सांप
तुम शहरों में तो रहे नहीं,
सभ्य होना तो सीखा नहीं,
फिर यह जहर कहां से पाया
डंसना कैसे सीखा।
अज्ञेय जी तो शहर के आदमी थे, शहर को जानते थे। उनको यही लगा कि गांव का आदमी बिगड़ा है तो शहर में आकर बिगड़ा है।
लोकमानस ग्रामीण हो तो वह दूसरे पर बोझ नहीं बनेगा। गांव का आदमी कष्ट सह लेता था लेकिन कर्ज नहीं लेता था। कष्ट सहना और कर्ज न लेना यही किसी व्यक्ति को बचा भी सकता है। गांधी ने श्रम के सिद्धांत की बात कही थी। उसमें यही बात छिपी थी कि मानव की गरीमा और स्वतंत्रता अपने श्रम पर आधारित होगी तो दो चीजें होगी। अपनी स्वतंत्रता बचेगी और वह दूसरे का शोषण नहीं करेगा। गांव के श्रम को शहर की सुविधा के लिए दे दिया गया इसलिए गांव उजड़ते जा रहे हैं, उखड़ते जा रहे हैं।
मैं आज भी अपने को गांव का आदमी मानता हूं और गांव भी मेरा परिवार ही है। मेरा गांव घरिहा, मरदह प्रखंड में है जो गाजीपुर जिले में हैं। भौगौलिक स्थिती को देखें तो यह गाजीपुर जिले के एकदम उत्तर है जो मउ जनपद के नजदीक है। मैं बिल्कुल साधारण परिवार के मीडिल स्कूल के अध्यापक का पुत्र हूं। मेरी प्रारंभिक शिक्षा गांव में हुई है। फिर माध्यमिक शिक्षा बगल के मउ में हुई और बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से बीएसी, एमएसी और आगे की पढ़ाई किया।
गांव में जो प्राइमरी स्कूल है वहां हमारे समय में दस गांवों के बच्चे आते थे। वह विद्यालय ग्रामीण समाजीकरण का बड़ा केन्द्र था। हर वर्ग के बच्चे वहां पढ़ने आते थे गरीब हो, अमीर हो, पिछड़ी जाति का हो, अगड़ी जाति का हो। सब एक साथ पढ़ते थे। धूल में खेलना हो, साफ-सफाई, दूसरी गतिविधियों में सभी एकसाथ होते थे। चाहे प्रार्थना हो, राष्ट्र गान हो सबकी सहभागिता होती थी। जिसे कहते हैं सामुदायिक सामूहिकता, वह थी। वह सबसे बड़ा प्रशिक्षण का केन्द्र था। अब उसमें परिवर्तन हो रहा है। हाल में जब मैं गांव गया तो देखा कि मेरे गांव में अंग्रेजी स्कूल खुल गया है, जो थोड़ा भी सक्षम है अपने बच्चे को वहीं पढ़ने के लिए भेज रहा हैं। बच्चे बगल के कस्बे में भी जा रहे हैं पढ़ने। तो गांव की संस्कृति का जो परिचय स्कूल करा रहा था, वह नहीं हो रहा है। अब गांव के सभी बच्चे एक साथ नहीं पढ़ रहे है। जबकि गांधी ने सोचा था कि सभी बच्चों को एकसमान बुनियादी शिक्षा मिलनी चाहिए।
फिर भी गांव एक तंत्र में बंधा हुआ है। गांव में अभी भी लोगों के दरवाजे पर जाते हैं और चाचा, दादा, बाबू, भतीजा, मामा बोलते हैं। आज भी भारत का गांव गांधी के ग्रामस्वराज के लिए बहुत परिपक्व स्थल है। परन्तु उसका शोषण हो रहा है। नीलहों ने जितना शोषण किया उससे अधिक शोषण गांव का आज हो रहा है। गांव और गरीब को विकास का सपना दिखाकर सरकारें तो बदल जाती है, पर ग्राम के विकास की वैसी योजनाएं लागू नहीं होती जो होना चाहिए। सबसे बड़ी बात है कि गांव का आदमी समर्थ हुआ शिक्षा द्वारा, गांव के संसाधन द्वारा, अपने परिवार के संसाधन द्वारा। पर उनमें से अधिकांश लोग गांव की तरफ नहीं जा रहे हैं। यह अधिक चिंता का विषय है। गांव को पढ़े लिखे लोगों से अपेक्षा है। हम परदेशियों का दायित्व बनता है कि गांव में कम से कम जागरूता तो पैदा करें। आज गांव में लोग छोटे-छोटे झगड़े को लेकर न्यायालयों का चक्कर लगाने लगे है, उनको समझा कर हम संसाधनों की बचत कर सकते हैं। गांव की जीवन पद्धति की गुणवता के लिए जरूरी है कि हम उनको स्वच्छता के बारे में बताएं। शिक्षा-रोजगार के अवसरों के बारे में बताएं। रोजगार के कौशलों को बताएं।
पलायन सिर्फ महानगरों में ही नहीं हो रहा। छोटे नगरों में भी हो रहा है। स्थिति यह है कि मेेरे गांव का लड़का जो शिक्षित है। चार किलोमीटर दूर कस्बे में रह रहा है और उसके पिता को शाम का खाना मिलेगा कि नहीं, इसकी चिंता नहीं करता। मजदूर जो मजबूर है वह भी भाग रहा है गांव से क्योंकि अब वह मोटा काम नहीं करना चाहता। वह वहां रिक्शा चलाना चाहता है। सूरत में, हरियाणा में और पंजाब की खेती तो यूपी-बिहार के लोग ही संभाले हुए हैं। अब सवाल यहीं पर है। उसको मनरेगा में 300 रूपया मजदूरी मिलती तो शायद वह गांव में रहता भी। पर हम तथाकथित पढ़े लिखे लोग, बैंक के लोग, पदाधिकारी वह रकम ले रहे हैं। आर्थिक कारण से पलायन तो कर रहा है लेकिन सामाजिक, सांस्कृतिक रुप में कट जा रहा है। फिर जब वह वहां अकेले पड़ता है, उसको सहयोग करने वाला कोई नहीं होता है। उसको जो सहयोग कर सकते हैं वे उसका शोषण कर रहे हैं। बहुत सारी ऐसी घटनाएं घट रही हैं। यह बोध पैदा करना है कि गांव में रहने का मतलब है कि सबका सबसे सरोकार है। मत जाओ गांव छोड़ कर। गांव के आसपास नौकरी मिल रही है तो जाओ लेकिन गांव छोड़ कर मत जाओ।

पहले यही परदेसी चाहे कलकता में रहे या बंबई में लेकिन लौटता था। लौटता था तो उसकी पहली आकांक्षा होती थी कि घर पर जमीन खरीदे। जब वह जमीन खरीदता था तो अपने जमीर से जुड़ जाता था। आज गांव का जो परदेशी है, वह अपने परिवार के जमीन के हिस्से के प्रति सतर्क है। उसको हम कैसे बेच लें और बैंक में पैसा जमा कर दें, यह चाहता है। यह परिवर्तन हो रहा है।
गांव को तो बचाना है पर कैसे बचेगा। बैंक में पैसा डाल कर, गांव की जमीन बेच कर या गांव की जमीन को किसी भी हालत में बचा कर। और गांव की जमीन बचाने वाला ही गांव बचा सकता है। हालत यह है कि जो जितना बड़ा पद पर गया है उसके घर में यही बात होती है। जो बाहर रहने लगता है, कभी गांव किसी पर्व या समारोह में आता है तो चाहता है कि खेत बेच कर भी चले जाएं। गांव को बोझ समझ रहे हैं, रिश्तों को बोझ समझ रहे हैं। नेवता-हकारी करना सोशल इनवेस्टमेंट है। सामाजिक निवेश है। किसी के साथ उठते—बैठते हैं, उसके साथ भोजन करते है। सहभोज करना स्वयं में सरोकार है। उस शक्ति को आदमी तब समझता है जब अकेले में रोता है और आंसू पोछने, पूछने वाला कोई नहीं होता। गांव में आंसू पोछने वाले लोग हैं।
जिस आदर्श ग्राम की चर्चा होती है, वह किसी गांव को देखकर नहीं होती। दिमाग में शहर होता है, चर्चा गांव का करते है। लगता है कि आपने इस देश का गांव नहीं देखा, किसी छोटे से देश का गांव देख लिया। स्वीटजरलैंड आदि का गांव देखकर उस तरह का ढांचा सोच लें तो गलत हैं। कुछ नगरीय सुविधाओं को गांव में ले जाना वांछनीय हो सकता है परन्तु वह आदर्श गांव नहीं हो सकता। आदर्श गांव तो वह है जिसमें जीने के ढ़ग में आधुनिकता आए, विद्यालय और शौचालय में आधुनिकता आए। आदर्श गांव वो है जिसमें लोगों के अंदर का भाव स्वजनता का हो, ऐसी मान्यता हो कि सब परिवार के ही लोग हैं। उसको आदर्श गांव कहेंगे। जैसे छठ पर्व मनाते हैं सब लोग एक दूसरे से मिलकर पर्व मनाते हैं। छठ के घाट की सफाई से लेकर व्यवस्था तक सब लोग मिल कर करते है। प्रसाद वितरण होता है। जो समाजीकरण है गांव का, वह प्रमुख है। गांव के जीवन का सबल पक्ष जैसे सामूहिकता, पारस्परिक प्रेम भाव, आपसी बातचीत, चाहे वो किसी भी जाति से हों उनकी समस्याओं का समाधान हो। गांधी ने हिन्द स्वराज में यही कहा था। उन्होंने कहा कि गांव में पुलिस न जाने पाए। पर आज गांव में पुलिस जाती है। सबसे गंदा काम हमने किया कि गांव में शराब का ठेका पहुंचा दिया। उसी राह से लड़के-लड़कियां आते-जाते हैं। कुछ छुप कर दूर जा कर पीते हैं, इक्के दूक्के तो खूलेआम पीते हैं, दूसरे गांव से आकर भी पीते हैं। बिहार में शराब बंदी से स्वास्थ कितना सुधरा है। गरीबों के पैसे की बचत हुई है। घर में मारपीट नहीं हो रही, आपस में सबंध सुधर रहे हैं।

मैं चन्द्रशेखर जी की भारत यात्रा से जुड़ा था। वह यात्रा लगभग 15 हजार किलोमीटर चली थी। सुदूर दक्षिण से लेकर और सिक्किम तक। उन्होंने सात बिन्दुओं को उजागर किया था। स्वच्छ पानी, शौचालय, विद्यालय, गांव की पंचायत आदि। कटनी, मध्यप्रदेश में जिस पानी को लोग पीते थे, वह इतना गंदा था कि लोगों को पेट में कीड़ा होता था। उसके बाद पेट में सड़न होती थी, फिर पैर के नीचले हिस्से से कीड़े निकलते थे। उसेे भी उन्होंने देखा। उनकी भारत यात्रा बहुत ही महत्वपूर्ण थी। जगह—जगह पर उन्होंने ग्रामदान कराया। वे चाहते थे कि भारत का जो ग्राम-लोक है वह आपस में संवाद करे। इसके लिए उन्होंने जगह जगह भारत यात्रा केन्द्र बनाए थे, करीब 7 हजार केन्द्र थे। उन केन्द्रों को वे विकास केन्द्र का रूप देना चाहते थे। वे ऐसे विकास केन्द्र होंगे जो बिना किसी सरकारी अमले के लोक भाषा में, लोक जीवन के लिए, लोक विकास की बात करेंगे। पर उसमें भटकाव आया। जो उनके साथ भारत यात्री थे, वे भी उस चीज को नहीं समझ पाए। प्रयास असफल रहा। यात्रा खत्म होते ही उनके सहयोगी डा. सुब्रमण्यम स्वामी ने प्रश्न उठा दिया था कि यह तो पद के लिए यात्रा है। उन्होंने यह भी कह दिया कि यात्रा में जो धन आया, जमीन ली गयी, गांव लिया गया उसका हिसाब नहीं दिया गया। जब सह-यात्री संदेह करने लगता है तो व्यापक लक्ष्य नहीं पाया जा सकता है। 
यद्यपि चंद्रशेखर जी का कार्य बहुत ही प्रशंसनीय था। हरियाणा के तीन गांवों के लोगों ने भोंडसी में जमीन दिया तो उसे भुवनेश्वरी आश्रम के रूप में विकसित किया गया। और वहां जो लोग जाते थे, वे एक वृक्ष लगाते थे। परन्तु उस पर विराम लग गया। मेरा मानना है कि सभी सामाजिक दायित्व वाले व्यक्ति को गांव में जाना चाहिए। और मैं इस मायने में चन्द्रशेखर जी और नानाजी देशमुख दोनों का बहुत आदर करता हूं। गांव के लिए, गांव के नाम पर विदेशी चंदा या सरकारी पैसा ले लेना बहुत होता है। पर वे लोग गांव को नहीं जानते। एक कलक्टर अगर किसी गांव में जाकर एक रात रूक जाता है तो उससे गांव आदर्श नहीं होता। और यही हो रहा है। वे निर्देश देते हैं कि गांव में ये अधिकारी, वो अधिकारी रूकेंगे। वो अधिकारी अपने गांव मे ंतो रूकते ही नहीं, दूसरे के गांव में क्या रूकेंगे। और जब रूकते हैं तो जब वहां कुटी बनती है, वह सात सितारा होटलों से कम नहीं होती। वर्धा वाली कुटिया होनी चाहिए या साबरमती या चंपारण वाली कुटिया होनी चाहिए।
कुलपति, जेपी विश्वविद्यालय, छपरा, बिहार।
