Poetry

जहाँ भी रहे गाँव वाला बने रहे

 डॉ संध्या सिंह मेरे बाजी (डॉ. केदारनाथ सिंह) कहीं भी रहे पर गाँव उनकी रगो में बसता था और बहता था। गाँव, गाँव के लोग, खेत खलिहान, भागड़ यहाँ तक कि खेत में खड़ा ‘कुदाल’ भी उनको आमंत्रित करते रहे। उनकी कविताओं में ये बिंब बार-बार आते हैं। ड्राइंगरूम में कुदाल की जगह ढूढँते-ढूढँते वे …

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जहां भी रहे, गांववाला बने रहे

डाॅ संध्या सिंह मेरे पिता डाॅ केदार नाथ सिंह की दो शादियां थी। पहली शादी चंपारण में हुई थी जो मात्र सवा महीने ही जीवित रही। मेरे पिता को दादी की संपत्ति के साथ ही अन्य तरह की बहुत सारी सपत्ति मिलती चली गई। परिवार में सिर्फ दो ही वारिश थे। मेरे पिता और एक …

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टीकाकरण गीत

टीकाकरण गीत “चल चल बहिनी हो, चल चल ननदो हो चल चल ससुई हो, चल चल गोतनी हो बड़की गोतिनिया के छोटकी ननदिया के सबके बोलाव तूहूं, फेर न मौका आई टीकाकरण बूथवा पर एएनएम दीदी आईं। टीका लगवाई बबुआ के, रोग से बचाईं हृष्ट पुष्ट बबुआ बनी, जग जीत आई, टीकाकरण बूथवा पर आशा …

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