दादी के जीवन का आकर्षण नानी के जीवन से गायब दिखा…

डॉ सुधा सिंह
दादी की तुलना में नानी कमला देवी को मैंने अधिकतर सबमिसिव भाव में देखा। उनके चार बेटे और बहुओं का परिवार था उसका तनाव बिल्कुल नहीं लेती थीं। घर के अंदर सेवा-टहल और आज्ञापालन के लिए समर्थ बहुएं थीं। वे घर के कमाऊ और आधुनिक मिजाज मुखिया की पत्नी थीं और इसी भाव से रहती थीं। बंटवारे में जो घर मिला था, उसके अलावा नानाजी ने सड़क से सटा कई कमरों वाला एक बड़ा घर बनवाया था। बाहर की तरफ कई गाय-भैंस बंधी रहती थी। घर में धान कूटने, आटा पीसने और किसानी के लिए आवश्यक मशीनें हुआ करती थीं। जरूरत की चीजों के साथ उनका कमरा नए घर में ‘सीरा घर’ के पास हुआ करता था। मुझे मालूम नहीं, इस घर को ‘सीरा घर’ क्यों कहते हैं। शायद ‘श्री’ बिगडकर ‘सीरा’ बन गया हो। यादव परिवारों में ‘सीरा घर’ कुलदेवी-देवताओं का घर हुआ करता है। दूध-दही, घी और पूजा इत्यादि में काम आनेवाली वस्तुएं वहीं रखी जाती हैं। मेरी नानी अपनी बेटियों को देने-लेने में भी बहुत उदार थीं। हमें नानीघर से सुंदर सुंदर कपड़े मिला करते थे।
                                                                                                                                                                                                लेकिन सारी सुविधाओं के बावजूद मुझे दादी के जीवन में जो जीवंतता और आकर्षण दिखता, वह नानी के जीवन से गायब था। दादी मुझे इस कारण प्रिय थी कि वे सामाजिक जीवन में सक्रिय भागीदारी करती थीं। हालांकि खेती हमारे यहां बंटाई पर होती थी, परिवार में किसी ने हल नहीं चलाया था। पढ़े-लिखे नौकरीपेशा लोगों का परिवार था। लेकिन खाद, पटौनी आदि झमेले दादी को ही निपटाने होते थे। घरेलू कामकाज से वे उतनी ही मुक्त थीं जितनी नानी। लेकिन उनका दिन निहायत सक्रिय तरीके से बीतता था। सक्रिय नानी भी रहती थीं पर केवल घर के भीतर के निर्णयों में। दादी की दिनचर्या मुँह-अंधेरे शुरू होती थी। वे सुबह उठ, हाथ-मुंह धो, सबसे पहले ‘सीरा घर’ में जाकर मक्खन बिलोती थीं। मेरी नींद कई बार मक्खन बिलोने वाली हांड़ी में उनके हाथों की लयबद्ध थापों से खुलती थी। मैं चुपचाप नींद से उठकर दादी के पीछे खड़ी हो जाती और ताजा ताजा मक्खनों से मेरे छोटे हाथ भर जाते। बाकी मक्खन सबको बांटने के बाद हाड़ी में ‘सीका’ (छीका-दूध दही की हाड़ी रखने के लिए रस्सी से बनी जाली, जिसे बिल्ली आदि से बचाने के लिए छत से लटकाकर टांगा जाता था।) पर रख दिया जाता था, बाद में इसका घी बनता था। मट्ठा-रोटी, छिलके समेत आलू की रसदार सब्जी या अन्य मौसमी सब्जियां हमें नाशते में मिलतीं। अक्सर परोर, कुम्हड़ा आदि तोड़ने के लिए मैं घर के पीछे बने बड़े से खंडहर की चारदीवारी या भंसाघर (रसोई) और बथान (गाय-भैंस बाँधने की जगह) की खपरैलों पर चढ़ती। भैंस का ताजा निकाला गया दूध बिना गर्म किए हम बच्चे पीते।
इसके बाद दादी की बाहरी दुनिया की गतिविधियां शुरू होतीं। मैं दादी के साथ खेतों पर फसल बोआई, धान या गेहूं की कटाई करवाने, खाद डलवाने, पानी पटवाने जाती। खेत में काम करने वाले मजदूरों को चना, जौ का सत्तू, लाल मिर्च की बुकनी, प्याज, अचार सेर या डेढ़ सेर तौल कर दिया जाता। यह सब उनकी मजदूरी का हिस्सा था। कभी दादी घर पर तेली बुलवाकर अनाज तौलवातीं। हमारे गांव में धान, गेहूं, आलू, ईख, आदि की फसल होती थी। दलहन और सब्जियां जरूरत के अनुसार कुछ खेतों में कट्ठा, दो कट्ठा में बोया जाता था।

जब फसल की कटाई होती या आलू उखाडे जाते हम बच्चों का त्योहार मन जाता। धान, गेहूं या आलू तौलकर बोरियां बन जाने पर जो दो-तीन पसेरी अनाज या आलू अतिरिक्त बच जाता, उसमें से खलिहान में जितने बच्चे घर और पास-पड़ोस के होते सबको हिस्सा मिलता। हम अपने नन्हें फ्रॉक के घेरे में जैसे दुनिया की दौलत बटोरे हुए सीधे जमंगल साव (उनका ठीक नाम शायद जयमंगल साव रहा होगा) या उनके भाई हीरा साव की दुकान भागते। अपने नन्हें फ्रॉकों के घेरे को उनके तराजू के पलड़े पर खाली करते और बड़ी आशा में उसके बदले मिल सकने वाली खाने-पीने की वस्तुओं के बारे में सोचते। लेकिन जमंगल साव भी अपने फन में माहिर ही थे, वे हमें भूरा या कुछ सस्ती चाकलेट के अलावा कभी कुछ नहीं पकड़ाते। लेकिन वह उस समय हमारे लिए सब मिठाइयों पर भारी होता, हमारा उत्साह कम नहीं होता था।

बाकी समय मैं बुआओं के पीछे लगी रहती थी क्योंकि उनका भी घर के बाहर एक संसार था, जिसमें फूल लोढ़ने या हाथ-पैरों में रचाने के लिए मेंहदी लाने के लिए बगीचा जाना, हम उम्र स्त्रियों के साथ एक-दूसरे के घर जाकर बिना अवसर के ही शादी, ब्याह, सोहर, देवी आदि के गीत गाना शामिल होता ताकि जब शादी-ब्याह और अन्य अवसरों पर बुलाहट हो तो ‘रेघ’ ठीक से चल सके। गांव में ‘सखी’ बनाने का कार्यक्रम भी होता था। मेरी छोटी बुआ की सखी ‘बिद्दा’ (विद्या) दीदी थीं। वे आपस में बातचीत के दौरान एक-दूसरे का नाम न लेकर ‘सखी’ संबोधित करती थीं। कुछ वस्तुओं के स्नेहपूर्ण आदान-प्रदान के साथ ‘सखी’ बनने की प्रक्रिया पूरी होती थी। मेरी चाची का प्रवेश हम बच्चों की दुनिया में रात को तेल का ‘मलवा’ और राक्षसों-परियों की कहानी के साथ होता था। हम चाची को घेरकर कहानी सुनने में मगन हो जाते थे। मेरी चाची कहानी, मुहावरे, लोकोक्तियों की चलता फिरता खजाना हैं। घर की छोटी बहू होने के नाते खाने-पीने के बाद सबसे पहले दादी के हाथ-पैरों में तेल लगाना और फिर हम बच्चों के पास तेल लगाने के लिए आना उनका नित्य का कर्म था। उनकी सुनाई कहानियां हमें जादुई दुनिया की सैर करातीं।
गांव में शाम के खाने-पीने के बाद पुरुषों का जमावड़ा किसी न किसी बाबा के दालान पर लगता। वहां कबीर, तुलसी की चौपाइयों से लेकर आल्हा-उदल और अन्य लोकचर्चाएं हुआ करतीं, गांव के बुजुर्ग पुरुष सदस्यों के साथ-साथ युवक भी उसमें शामिल होते और मैं भी उसमें घुसी रहती। इसके अलावा देवीथान पर पूजा होती और कई शाम देवी के गीत पुरूषों द्वारा गाए जाते, ढोलðरे, झाल बजते। हमारे लिए एक और अजूबा चीज हुआ करती जो हममें कौतूहल भी पैदा करती और जिससे हम डरते भी। ऐसा तब होता जब हमारे घर में नाक से सीमंत तक भखरा सिंदूर (पीला सिंदूर) लगाए एक लंबे और स्वस्थ डील-डौल की सांवली-सी भगतिन आती और घर के आंगन में ‘देवता’ खेलाती। अपने खुले काले लंबे और बालों को अपने सिर के इर्द-गिर्द हवा में लहराते, लाल चढ़ी हुई आंखों से कहीं और देखते हुए वह विचित्र मुद्रा में शरीर को हिलाने लगाती। साथ आए ढोल और बाजे वाले बजाना शुरू कर देते, थोड़ी देर वह उसी तरह झूमती रहती फिर शांत हो जाती। घर की सारी स्त्रियां उसके पांव छूकर आशीर्वाद लेतीं। मेरी दादी उसको अच्छा-खासा अनाज दान में देतीं। इसी तरह भगत जी और ओझा जी भी गांव का अनिवार्य हिस्सा थे। एक नाऊ परिवार भी था। शादी, ब्याह, मुंडन, मरनी आदि में गांव और गंांव के बाहर की रिशतेदारियों में न्योता देने में जगन नाऊ की पूछ होती। उनकी पत्नी इन अवसरों पर घर की स्त्रियों के नाखून काटने, आलता से पैर रंगने का काम करतीं। जगन नाऊ जर्राह का भी काम करते। यानी छोटे-मोटे फोड़ा-फुंसी का नशतर चुभाकर स्थाई इलाज करते। मुझे याद है मेरे गले की हंसली (कॉलर बोन) पर एक फोड़ा हो गया था, इन्हीं नाऊ महोदय ने उसका नशतरी इलाज किया। मैं खूब चिल्लाई, लेकिन कोई उपाय न था। खटिया पर लिटाकर, हाथ-पैर पकड़कर नशतर चुभो दिया गया, फोड़ा तो ठीक हो गया लेकिन आज भी गले पर उसका निशान है। गांव में डॉक्टर एक भी नहीं था। बगल के गांव, ‘पेढ़का’ से एक मुसलमान कंपाउंडर जो कि ‘डाक्टर साहब’ ही कहे जाते थे, इलाज के लिए आते थे। इंजेक्शन, पुड़िया में पिसी हुई अंग्रेजी दवाइयां और एक आला उनके पास हुआ करता था। गांव वाले उनको ‘सनउला डाक्टर’ पुकारते थे। डॉक्टरी के बदले फीस के रूप में उन्हें अनाज ही दिया जाता था।


छठ, होली, दीवाली के अलावा ‘रोशनाई’ का एक बड़ा मेला गांव में लगता था। इसमें तरह-तरह की चीजें बिकती थीं। खाने-पीने से लेकर जरूरत की सारी चीजें मेले में बिकतीं। यह मुसलमानों का मेला था जो मुहर्रम के अवसर पर लगा करता था, लेकिन इसमें हिंदू भी बढ़-चढ़कर भाग लेते थे। तब गांव में देवीथान के अलावा कोई मंदिर नहीं था, लेकिन एक मस्जिद बहुत पहले से थी। मुझे मेरे घर के सामने रहने वाले मुसलमान परिवार के घर की याद है। उसमें दो भाइयों और छोटे भाई की पत्नी के साथ विधवा मानो बुबु रहा करतीं थीं। उनके छोटे भाई कलकत्ता में नौकरी करते थे। जबकि बड़े भाई काफी उम्र के थे और मकान के एक हिस्से में रहते थे।

छोटे कद की मानो बुबु से हमने ईद की सेवइयां खूब खाई हैं जिसे वे खटिया में मशीन लगाकर, उसमें आटे की लोइयां डालकर घर में ही बनाती थीं। उनके हाथ के मोटे ‘रोट’ का स्वाद आज भी नहीं भूला जो कई तरह के अनाज, सूखे मेवे, मीठा आदि डालकर बनता था। वैसी ‘रोट’ फिर कभी नहीं मिली। उनके यहां से ईद पर बड़े थाल में, क्रोशिए से बने झालर वाले मेजपोश से ढंककर, हमारे लिए पकवान आते थे जिन्हें हम बड़े चाव से खाते थे। उनके बड़े भाई के पास अक्सर लोग छोटे बच्चों को लेकर अलाय-बलाय दूर करने और नजर उतरवाने आते थे। वे नमाज पढ़कर फूंक मारते थे और पानी पढ़कर देते थे। लोगों का मानना था कि वे सच्चे व्यक्ति हैं और उनकी दिल से निकली दुआ, उनके बीमार नौनिहालों को ठीक कर देगी और उन्हें ‘सनउला डाक्टर’ की जरूरत नहीं पड़ेगी।

गांव के कुछ मुसलमान परिवार काफी समृद्ध थे। उनके पास कई बीघे की खेती थी। दरअसल गांव की जमींदारी इन मुसलमान परिवारों के पास ही थी। इनके संगमरमर लगे बड़े-बडे घर थे। शमीम मियां आजकल राजनीति में हैं। उनके परिवार का बनवाया ‘बेलछी मार्केट’ बिहारशरीफ में है जो करीब पचीस साल पहले बना जब बड़े शहरों में भी मॉल नहीं बने थे।


आज मेरे गांव में बिजली है, गैस है, डामर की सड़क पहले भी थी, अब पक्की बन गई है। बिहारशरीफ से गांव तक बस सेवा है। कई सरकारी योजनाएं गांव में चल रही हैं। दलितों के लिए सरकारी आवास बने हैं। कुल पांच-छह सौ घरों का यह गांव पहले भी महत्वपूर्ण चुनावी दर्जा रखता था। लेकिन आज एक बड़ा फर्क आया है कि मुसलमान, हिन्दू मोहल्लों से अपने घर बेच कर हट रहे हैं और तेली और अन्य जातियों के नए पैसे वाले लोग उन घरों को खरीद रहे हैं। मेरे घर के सामने रहनेवाली मामोनो बुबु का घर भी बिक गया। घर के उत्तर रहनेवाले, समय-असमय गालियां बकने वाले ‘मातो मियां’ मर गए और उनका घर भी किसी हिंदू ने खरीदा। हमारा घर भी बंट चुका है। एक हिस्से में चाचा जी का परिवार और दूसरा हिस्सा हमें मिला है। संयोग से घर का जो हिस्सा हमारे परिवार को मिला है, उससे सटा हुआ ही मानो बुबु और मातो मियां का घर था, जो जब भी गांव जाऊंगी, याद आएगा ही। मैंने अपना गांव जैसा देखा, जिया और चाहा, मेरी स्मृति में उसका ताना-बाना वैसा बना रहे, यही इच्छा है।
(दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर डॉ सुधा सिंह के गांव की कहानी का दूसरा और अंतिम कड़ी)

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मेरा ‘गांव’-मेरा ‘देस’

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