डाॅ तारा शंकर
गाँव विशुनपुर, जिला बस्ती, उत्तर प्रदेश। उम्र 34 साल 5 महीने। 19 साल से घर-गाँव से दूर शहर में रह रहा हूँ। घर से शहर बस्ती, बस्ती से इलाहाबाद और फिर 2007 से देश के दिल दिल्ली में। शायद बदलाव के सबसे तेज दौर वाली पैदाइश है हमारी जनरेशन। तकनीक बदली, संचार के साधन बदले और उससे ज्यादा इंसान बदले। बहुत से बदलाव देखे -खुद में भी, गाँव में और शहर में भी। कुछ अच्छे तो कुछ अवांछनीय भी।
गाँव आज भी दिल में बसता है। ‘फलाने कै लड़िकवा’ से ‘डॉ. ताराशंकर’ हो चुका हूँ। दिनभर बाँस के कइन वाले कटिया से मछली मारने वाला पीएचडी करके यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहा है। पढ़ने का सफर खड़िया-मिट्टी से शुरू होकर आज इंकलेस पैड तक आ पहुँचा है। नरकट की कलम का सफर अब टच पैड तक आ चुका है, लकड़ी की तख्ती अब लैपटॉप में बदल चुकी है। बोली अवधी-भोजपुरी से हिंदी और फिर हिंदी से अंग्रेजी हो चुकी है। बैलगाड़ी और साइकिल से चलने वाला अब मेट्रो ट्रेन से आता जाता है।

बैलों की जगह ट्रैक्टरों ने ले ली, बैल गाड़ियों की जगह निजी भार वाहन ट्रालियों ने ले ली है। गोबर की खाद की जगह केमिकल फर्टीलाइजर्स ले चुके हैं। गाय-भैसों के चराने वाली फुर्सत लगभग गायब है। दस किस्म के फसलों की जगह अब कुछ चुनिंदा कैश क्रॉप ले चुके हैं तो दलहनें गायब हो चुकी हैं। जोन्हरी-पेटुआ-तिल-अरहर जैसी फसलें अब कोई नहीं बोता। देसी की जगह हाइब्रिड ले चुके हैं। हर गाँव में चलने वाले कोल्हुओं से आने वाली गुड़ की खुशबू भी अब गायब होती जा रही है। आपस में मिल-जुलकर खेती करने की जगह अब पैसे खर्च करके मजदूरों से खेती की जाने लगी है। खेतों का आकर छोटा हो जा रहा है। पुरखों के बगीचे उजड़ चुके हैं और नई संतति बस आम खाने में अधिक यकीन रखती है, बगीचे लगाने में कम। रहने के लिए घर बड़े होते जा रहे हैं लेकिन स्वच्छ हवा अब पुराने दिनों की बात होने लगी है। सर्दियों में कौड़े या बोरसी की आग सेंकने अब पड़ोसी नहीं आते। बोर्सियों की जगह धीरे धीरे इलेक्ट्रिक हीटर लेते जा रहे हैं। ढिबरी अब फ्लूरेसेंट लैंप और ट्यूबलाइट से रिप्लेस हो चुकी है। लालटेन तो कब का गुजरा जमाना बन चुका है। जीवनसाथी टॉर्च अब मोबाइल और चाइनीज टॉर्च से हटाया जा चुका है। घर बड़े हो गए हैं, लेकिन नाबदान छोटे और दो घरों के बीच गली तो एकदम खत्म। एक-एक इंच जमीन अब नाक का सवाल है!
संयुक्त परिवार धीरे-धीरे एकल परिवार बनते जा रहे हैं। खेती से गुजारा मुश्किल होता जा रहा है तो लोग दिल्ली-मुंबई भाग रहे हैं या फिर परचून-चाय की दुकान खोल रहे हैं। नौकरियों के लिए मारामारी मची है। गाँव से युवाओं का पलायन शहर की तरफ तेजी से हो रहा है-मजबूरी में भी और शहरी आकर्षण के कारण भी। चौपाल अब फेसबुक और व्हाट्सऐप पर ही लगता है…वर्चुअल। रामलीला खत्म, नाच खत्म, कबड्डी और सुर्र भी खत्म। गाँव के बड़े-बूढों का हर बच्चे पर रहने वाला अभिभावकत्व नहीं है अब। आवागमन और संचार के साधन तो सब हैं बस, आत्मीयता थोड़ी कम हुई है। हर युवा के हाथ में मोबाइल है, कहना मुश्किल है कि इससे फायदा ज्यादा है या नुकसान। आर्थिक निर्वाह की जुगत सबकी ‘फुर्सत’ और इत्मीनान छीनती जा रही है। युवा नए व्यसनों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। शराब-गुटखे-तंबाखू-सिगरेट अब उम्र की सीमा पार कर चुके हैं। यह जरूर है अब कोई भूखे पेट नहीं सोता, किसी की दया पर निर्भर नहीं रहता। किसी के यहाँ बेगार करने की मजबूरी अब लगभग नहीं है। जातिवाद कुछ मामलों में कमजोर हुआ है या कहें कि महीन हो चला है।
घरों में साइकिल की जगह मोटरसाइकिलों ने ले ली है (पेट्रोल की कीमतों के बारे में न पूछें), अंतरदेशी खतों की जगह मोबाइल ने, न्योतों की जगह मोबाइल मेसेज लेते जा रहे हैं। विवाह के न्योते अब हल्दी की गांठ द्वारा नहीं, वेडिंग कार्ड द्वारा भेजे जाते हैं। बैंक एटीएम से पिछड़ते जा रहे हैं तो मनी आर्डर अब इन्टरनेट बैंकिंग हो चुका है। पीसीओ की जगह मोबाइल ने ले ली है। कैसेट-वीसीआर की जगह पहले सीडी ने ली और फिर सीडी पेनड्राइव द्वारा पीछे छोड़ी जा चुकी है। पेंसिल से कैसेट में फँसे रील को सही करने का 90 का दशक हमेशा के लिए बिछड़ चुका है। समोसा-खोमचा-पकौड़ी के साथ-साथ अब बर्गर-पिज्जा-मोमो भी आ चुके हैं। भेली को पहले चीनी ने हटाया, फिर बिस्कुट ने और अब चॉकलेट और केक रेस में आगे हैं। मिट्टी के खिलोने अब टेड्डी बियर से बदले जा चुके हैं, आउटडोर गेम अब विडियोगेम और टीवी द्वारा हटाए जा चुके हैं। रिश्तेदार अब गेस्ट हो चुके हैं। पड़ोसी थोड़े अनजान हो चुके हैं। रिश्तों में मतलब और पैसा तेजी से घुसने लगा है। प्राथमिक पाठशाला अब मोंटेसरी और कॉन्वेंट वाले इंग्लिश मीडियम स्कूलों से पछाड़ा जा चुका है। ‘माटसाब’ और ‘गुरुजी’ अब ‘सरजी’ हो चुके हैं। पड़ोसियों से ‘इसके बदले वो की जगह’ पैसा वाला लेन-देन होने लगा है। खटिया की जगह बेड ले चुका है। बेना की जगह वाटरकूलर ले चुका है। हालाँकि बेटियाँ अब पहले की तरह बोझ नहीं समझी जातीं। बेटों से बेहतर पढ़-लिख रही हैं। उनके विवाह की उम्र भी बढ़ी है। लेकिन रेप और घरेलू हिंसा आज भी कम होने का नाम नहीं ले रही है। होम अप्लायांसेंस आने से घर की महिलाओं का काम आसान तो हुआ है लेकिन काम कम नहीं हुआ है।

छप्पर अब छत हो गए, कच्चे घर पक्के हो गए हैं। खडंजे अब पक्की सड़क होते जा रहे हैं। झाड़ा उर्फ टट्टी अब लैट्रीन बन चुका है। मिट्टी के चूल्हे अब एलपीजी गैस चूल्हे लेने लगे हैं, तालाब-पोखरे गायब होते जा रहे हैं। और जब तालाब नहीं तो तालाब के कमल और क्वइयां, भसीड़-केरमुआ-तिन्नी सब बीते दिनों की बातें हो चली हैं। पानी का स्तर जो पहले बारिश में बैलों के लिए खूंटा गाड़ने पर मिल जाता था, वो अब कई फीट नीचे जा चुका है। कुआँ अब हैंडपंप से और टिल्लू पम्प से रिप्लेस होता जा रहा है। साफ पानी के नाम पर आरओ नए बिजनेस के रूप में उभरा है। बारिश में अब मछलियाँ कम ही आती हैं। लोगों के हाथों में पैसा तो पहले से बहुत ज्यादा आ रहा है लेकिन अनिश्चितता और मंहगाई उसे टिकने नहीं देती। दहेज बढ़ता ही जा रहा है। ग्राम पंचायत एक तरफ महिलाओं-दलितों में जागरूकता ला रहे हैं तो दूसरी तरफ चुनाव के दौरान गाँव कई खेमों में बाँट जाता है। अब यह खेमेबाजी शाश्वत बनती जा रही है। किसी के दुआर पर अब कम ही लोग बैठते हैं। रात के खाने के बाद बुजुर्गों का आस-पड़ोस में जाकर हँसी-मजाक द्वारा दिनभर की थकान मिटाना अब बीती बातें हो गयी हैं।
इन सारे बदलावों ने जीतना सम्मिलत असर डाला है, उससे कहीं अधिक अपनों से निरंतर दूर जाने का असर है। विडंबना ही है कि अपनी संतान के लिए उच्च शिक्षा हर माँ-बाप की इच्छा होती है, लेकिन उच्च शिक्षा के बाद नौकरियाँ में शहर में ही लगती हैं। पढ़ाई अथवा कमाई की मजबूरी हमें अपने बूढ़े होते माँ-बाप-दादा-दादी से दूर ही करता जाता है। और किसी दिन अचानक उनके हमेशा के लिए दूर हो जाने की खबर मिलती है। फिर एहसास होता है कि शहरी होना इतना आसान नहीं। बहुत कीमत वसूलता है यह-असमय और कुसमय। पहले पूरा गाँव-जवार गर्व करता था कि ‘फलाने के बेटवा दिल्ली पढ़े गईल बा। लेकिन अब उन्हें भी दुःख होता है कि ‘ओकरौ शहर के हवा लग गईल। भुलाय गईल आपन गाँव-गिराँव’। अंदर तक हिला देती है ये निराशा और दुःख। यह सही है कि गाँवों का शहर बनते जाना समय की अनिवार्यता और अवश्यंभावी है, लेकिन इन बदलावों में आत्मीयता, फुर्सत और उत्सवधर्मिता बची रहे तो जीवन का रंग उतना जल्दी फीका न हो!
(दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर।)
