जरूरी है अंदर के गांव को बचा कर रखना

डॉ प्रदीप कांत चौधरी
चपन गांव में नहीं बीता। गांव कभी कभार जाता था, पर उसकी कोई ऐसी याद नहीं है, कोई नोस्टाल्जिया नहीं है। हालांकि गांव से इतना दूर भी नहीं था, कस्बानुमा शहर लहेरियासराय-दरभंगा जहां मेरा बचपन बीता उसमें शहर की कोई ऐसी चमक नहीं थी कि गांव जाने पर कोई खास अंतर नजर आए। इसीलिए गांव मेरे अंदर कहीं बैठा रहा। हमारे चाल-चलन, आदतें और संस्कार गंवई ही बने रहे। यह पकड़ इतनी मजबूत थी कि जब मैं करीब 30 वर्षों बाद गांव फिर से गया तो ऐसा लगा जैसे हमेशा से यहीं रहता आया हूं। सन 2008 के बाद से गांव आना जाना काफी बढ़ गया और मैं बिलकुल सहजता से उसके अंदर समा गया। गांव के लोगों से घुल मिल गया।
गांव से जो पीढ़ी दर पीढ़ी का रिश्ता होता है, उसीमें यह खूबी होती है कि कोई यदि सौ साल बाद भी या कई पीढ़ियों के गुजर जाने के बाद भी अपने गांव आए तो उसे अपनापन महसूस होगा। कुछ न कुछ लोग उसे पहचान लेंगे और उसके दादा परदादा की कुछ ऐसी कहानी सुना देंगे जो उसे भी नहीं पता थी। गांव शायद एक भूगोल नहीं है, वह एक जीवन शैली है, एक दर्शन है, एक विश्व दृष्टिकोण है। इसीलिए गांव में नहीं रहते भी एक गांव हम सब के अंदर जिंदा रहता है। और जब वह अंदर का गांव मर जाएगा तो पारंपरिक भारत भी मर जाएगा। भारत एक जड़हीन, परंपरा विहीन उजड़ा हुआ महज एक भौगोलिक अवधारणा बनकर रह जाएगा। शायद गांव में रहने से ज्यादा अपने अंदर के गांव को बचा कर रखना जरूरी है।

मेरे अंदर गांव को जिंदा रखने में मेरे बाबा श्री देव कान्त चौधरी की बड़ी भूमिका थी। बचपन में जब भी हम उमस भरी गर्मी की रातों में थोड़ी सी हवा सिहकने के लिए बाहर बैठे रहते या सर्दी की रातों में आग के पास बैठते तो बाबा गांव की पुरानी कहानी सुनाते। उन कहानियों में तारीख नहीं होती सिर्फ घटनाओं का विवरण होता। ज़्यादातर कहानियों में जमींदारी मिलने और उस पर आए संकट से निबटने के किस्से होते। उन्होंने बताया कि हमारे पुरखों में से कोई एक ज्योतिषी थे जो गर्मी की भरी दुपहरी में पेड़ के नीचे बैठे कुछ गणना कर रहे थे। बगल से मुग़ल बादशाह हुमायूँ खुद गुजर रहा था और उसने पूछा कि पंडितजी आप क्या कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि चन्द्र ग्रहण का हिसाब लगा रहा हूं कि अगला कब होगा। हुमायूँ ने कहा कि यदि उनकी बात सच निकली तो उन्हें इनाम मिलेगा। बेचारे हुमायूँ को पता नहीं था कि भारतीय ज्योतिषों ने काफी पहले इस पर महारथ हासिल कर ली थी। चंद्रग्रहण उसी तिथि को हुआ और इनाम में उन्हें चौधरी की उपाधि मिली। बाबा ने न तो उनका नाम बताया न ही कोई तारीख।

बाद में जब मैंने बिहारी लाल ‘फितरत’ की ‘आईना-ए-तिरहुत’ पढ़ी तो पता चला कि “धनपत चौधरी को दिल्ली के सम्राट से ‘चौधराई’ की उपाधि मिली थी। धनपत चौधरी के बाद हुमायूँ चौधरी को शाही दरबार से परगना-पिंडारुच की चौधराई मिली थी”(पृ. 187)। लगता है हुमायूँ के हाथ से परगना मिलने के पीछे भी इस नाम की कोई भूमिका है। पर इतना जरूर है कि अकबर के शासन से पहले ही इस परिवार को जमींदारी की कमान मिल चुकी थी और इस अर्थ में यह दरभंगा महाराज को अकबर से मिली जमींदारी से भी पुरानी जमींदारी थी। मैंने अपने पिताजी को जब ‘एटलस ऑफ द मुग़ल एंपायर, (Pindaruj,10A, 26+85+)’ में पिंडरुच परगना का उल्लेख दिखाया तो वे बहुत खुश हुए।


बाबा एक किस्सा सुनाते थे कि अंग्रेजी राज में एक बार जमींदारी नीलामी का नोटिस आ गया था। कारण क्या था? शायद एक पैसा लगान की रकम में कम चला गया था। उस समय नियम यह था कि दी गई तारीख को लगान की रकम और विवरण एक कपड़े में सील बंद कर ट्रेजरी ऑफिस के अहाते में फेंक दिया जाता था। लगान जमा करने वाले लोग इतने ज्यादा होते थे कि उनको व्यक्तिगत रूप से रिसिव करना संभव नहीं था। बाद में उनकी गिनती होती थी और रसीद मिल जाता था। उसी पोटली में गलती से एक पैसा कम चला गया और नतीजा नीलामी का नोटिस निकल गया। पास के ही एक महाजन ने जमींदारी खरीद ली, लेकिन परिवार के कुछ सदस्य कलकत्ता हाई कोर्ट में अपील करने गए। जब रास्ते में जा रहे थे तो जंगल में उन्हें एक देवता ने स्वप्न दिया कि मैं कोयला महाराज हूं मुझे अपने साथ अपने गांव ले चलो और पूजा दो तो तुम्हारा कल्याण होगा। उन्होंने कहा कि यदि हम मुकदमा जीत गए तो आपको अपने साथ ले चलेंगे। वो मुकदमा जीत गए और कोयला महाराज जो एक पत्थर के रूप में वहां पड़े थे, उनको अपने साथ ले आए। कोयला महाराज अभी भी हमारे ग्राम देवता के रूप में प्रतिष्ठित हैं। ग्राम देवता के अध्ययन में मेरी रुचि इसी कहानी से पनपी। ये कैसा नाम है : कोयला महाराज ! पर बाद के अध्ययन से लगा कि यह कहानी भी विकृत होकर आगे बढ़ी है।
कोयला महाराज मल्लाह समुदाय के एक प्रमुख देवता हैं जो कमलादेवी के सहचर भी माने जाते हैं। मल्लाह लोग समुद्र यात्रा पर जाने से पहले कोयला महाराज को दूध का अर्घ्य और बलि देकर नाव के अग्र भाग की पूजा करते थे। हमारे गांव में कोयला महाराज के थान पर सूअर की बलि कुछ दशक पहले तक होता आया था। ऐसा लगता है कि पिंडारुच परगना की जमींदारी मिलने से पहले यह मूलतः मल्लाहों की बस्ती थी और यहां का कोयलास्थान काफी प्रसिद्ध था। मिथिला में कई कोयलास्थान अभी भी मौजूद हैं, इसलिए कोयला महाराज को जंगल से यहां लाने की कहानी में भ्रम ही दिखाई देता है।


इस गांव के लोग अंग्रेजी शिक्षा के प्रति काफी पहले ही आकर्षित हो चुके थे। शायद 1857 के बाद के बदले हुए सत्ता समीकरण को यहां के लोगों ने जल्दी समझ लिया। बक़ौल ‘आईना-ए–तिरहुत’ दरभंगा के कलक्टर ए. बी. मैकडोनाल्ड ने 1877 ई. में मित्र लाल चौधरी को ऑनररी मजिस्ट्रेट और म्युनिसिपल कमिश्नर बनाया और एक सनद दिया था। उससे भी एक पीढ़ी पहले श्री शिवलाल चौधरी ने इस इलाके में काफी प्रतिष्ठा अर्जित की थी। इन सबका असर हमारे गांव पर यह पड़ा और कई पढ़े-लिखे और नामी गिरामी लोग यहां से निकले। मेरे पितामह के बड़े भाई जस्टिस रति कांत चौधरी का नाम इनमें सबसे विख्यात रहा है।

कविवर चंदा झा (1831-1907) का जिक्र यहां बहुत जरूरी है, जो मैथिली रामायण (1892) के रचयिता और बहुत सम्मानित साहित्यकार माने जाते हैं। चंदा झा का जन्म इसी गांव में हुआ था लेकिन उनका परिवार इस गांव से खुश नहीं रहा। प्रायः उन्हें वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। उनकी पढ़ाई लिखाई अपनी नानी के घर हुई और परवर्ती जीवन ठाढ़ी गांव में बीता। शायद मालिकान और भगिनमान (बहन की संतान) का यह अंतर्द्वंद्व हमारे गांव को एक बड़े सम्मान से कुछ हद तक वंचित कर गया। आज भी इस तरह की बात कभी-कभी सुनाई देती है, लेकिन कई ऐसे बुद्धिमान व्यक्ति भी हैं जो इन संकीर्णताओं से ऊपर उठने के लिए प्रेरित करते हैं। हमारे गांवों में कैसे-कैसे फ़ाल्ट लाइन और दरारें होतीं हैं उसकी यह एक बानगी भर है।


अपने एक ग्रामीण सूर्य नारायण महाराज से गांव की एक कहानी जो सुनी है, उसने दाईवती के लिए मेरे मन में एक अलग स्थान बना दिया। अंग्रेजों के साथ नजदीकी के सवाल पर गांव में एक बार दो गुट बन गए, एक विलायती और एक देशी। एक गुट ने गुप्त बैठक की और तय किया कि जब दूसरे गुट के लोग गांव से बाहर रहें तो उनके घर को लूट कर आग लगा दी जाए। यह बात गोपिया चमार की लड़की दाईवती को पता चल गई। दाईवती 6 फीट लंबी एक साहसी महिला थी, जिसके न्यायपूर्ण विचार की तूती अगल-बगल के गांवों तक गूंजती थी। वह कई गांवों के पंचायती में आमंत्रित होती थी। जब उसे इस षडयंत्र का पता चला तो वह पुरुषों की तरह धोती, कुर्ता, पगड़ी पहन, लाठी लेकर तैयार हो गई और अपने साथ कपिलेश्वर राम नामक एक छोटे बच्चे को लेकर अन्य स्थानों पर मौजूद पहलवानों को सतर्क करने घुप्प अंधेरी रात में निकल गई। सुबह चार बजने से पहले अगल-बगल के गांवों से मदद पहुंच जाने के कारण गांव में एक भारी अग्निकांड घटित होने से बच गया। आने वाली पीढ़ियों को उस दाईवती का शुक्रगुजार होना चाहिए और साथ ही साथ आधुनिक विद्वानों को गांवों के अंदर के सामाजिक समीकरण और लिंगभेद संबंधी सिद्धांतों पर भी कुछ प्रश्नचिन्ह लगाना चाहिए।


हमारा गांव आज़ादी के आंदोलन का केंद्र तो नहीं था लेकिन यहां चरखा हर घर में मौजूद था। 1970 के दशक तक सूत कातकर महिलाएं कुछ न कुछ आय प्राप्त करती रही हैं। अब खादी ग्राम उद्योग का भवन खंडहर हो गया है और अपने जीर्णोद्धार के लिए नयी पीढ़ी की बाट जोह रहा है।
दरभंगा महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह ने 1874 में तिरहुत रेलवे की शुरुआत दरभंगा से समस्तीपुर तक भीषण अकाल के दौरान अनाज पहुंचाने के लिए की थी। दरभंगा से सीतामढ़ी के बीच रेललाइन की शुरुआत भी इसी तिरहुत रेलवे द्वारा 1890 ई. में की गई थी। हमारे पंचायत में ही मोहम्मदपुर रेलवे स्टेशन और बाज़ार है। इसलिए यह गांव काफी पहले यातायात की दृष्टि से बाहरी दुनिया के संपर्क के जुड़ चुका था।


पिंडारुच गांव अपनी सामुदायिक संस्थाओं के लिए काफी पहले से प्रसिद्ध रहा है। यहां का नाट्य परिषद बहुत लोकप्रिय था। पिंडारुच ड्रमैटिक सोसाइटी की स्थापना 1920 के दशक में हुई थी और प्रत्येक दुर्गा पूजा में नाटकों का मंचन इसके माध्यम से किया जाता था। इसके नाटक पूरे जिले में बहुत प्रसिद्ध थे जिसने गांव को एक अलग पहचान दी थी। पिंडारुच प्राइमरी, मिडिल और हाई स्कूल न जाने कितने विद्वानो और अधिकारियों का पहला शिक्षण संस्थान रहा होगा। बिहार में स्कूली शिक्षा के ध्वस्त हो जाने के बावजूद अभी भी इस विद्यालय के परिणाम जिला में अच्छे माने जाते हैं।
आजकल क्रिकेट की लोकप्रियता के समय में इस गांव ने भी क्रिकेट के खेल को भारी प्रोत्साहन दिया है। यहां कई बार जेनेरेटर से रोशनी कर डे एंड नाइट क्रिकेट का आयोजन हो चुका है। अब गांव में एक सामान्य सा स्टेडियम भी बन गया है और प्रतिवर्ष कई प्रकार के क्रिकेट मैच का आयोजन किया जाता है। गांव में ‘पांचजन्य पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट’ द्वारा जीएलए हेल्थ सेंटर का सफल संचालन हो रहा है, जिसमें रु.10 की फीस पर लोगों का इलाज किया जाता है। वैसे शहर से नजदीक होने के कारण लोग वहीं जाकर इलाज कराना पसंद करते हैं।


इस गांव के लोगों की मुख्य रुझान सरकारी नौकरी की तरफ रही है। यहां व्यवसाय या उद्यम कभी भी पल्लवित नहीं हुआ। आज भी इस पढ़े-लिखे गांव में भारी बेरोजगारी है। लोग नौकरी की खोज में भारत के विभिन्न शहरों तक जाते हैं। गांव ने कभी अपने यहां रोजगार पैदा करने की किसी योजना को गंभीरता से नहीं लिया। वैसे कुछ उद्यमी व्यक्तियों ने एक बार अगरबत्ती बनाने और बेचने की एक शुरुआत की थी और वह बड़ा लोकप्रिय भी हुआ था, परंतु वह भी आगे नहीं बढ़ सका। हाल में ही गांव के कुछ नौजवानों ने बांस के उत्पादों के निर्माण और बिक्री के लिए एक परियोजना पर काम करना शुरू किया है। देखना होगा यह कहां तक आगे बढ़ता है। क्योंकि गांवों की मुक्ति गांव के अंदर विभिन्न प्रकार के लघु और सूक्ष्म उद्योगों के विकास से ही संभव दिखाई देती है।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर रहे हैं।)

 

 

 

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