ललिता जोशी
‘भारत की आत्मा उसके गांव में रहती है- महात्मा गांधी का यह वक्तव्य आज भी सटीक हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार 121 करोड़ भारतीयों की आबादी में 37.7 करोड़ शहरों में और 83.3 करोड़ गांवों में रहती है। हमारे गांव हमारे देश की अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग रहे हैं, बावजूद इसके गांव बेहाल हैं। गांव ही शहरों को दूध, फल, सब्जियों और अनाज की आपूर्ति करते रहे हैं। लेकिन शहरों की प्रति व्यक्ति आय में जिस तेजी से वृद्धि होती है, वह तेजी गांवों में दृष्टिगोचर नहीं होती।
अभी हाल ही में मुझे अपने पैतृक गांव कोटद्वार जाने का अवसर प्राप्त हुआ। कोटद्वार उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल क्षेत्र में है। यह दिल्ली से 230 किलोमीटर दूर है जहां सड़क व रेल मार्ग से पहुंचा जा सकता है। कोटद्वार गढ़वाल का मुख्य द्वार होने के साथ-साथ व्यापारिक गतिविधियों का केन्द्र भी है।
कोटद्वार यानी गांव का दरवाजा पहाड़ों में जाने का यह दरवाजा आज का नही है महाभारत काल से इस का उल्लेख है ऋषि चरक व बहावीर कर्ण की तपोभूमि है कोटद्वार। उत्तराखंड को उत्तरप्रदेश से जोड़ने वाला कोटद्वार आज विकास की दौड़ में पिछड़ गया सा लगता है। मां दुर्गा देवी माँ शैलपुत्री की ओट में बैठा कोटद्वार सुंदर जगह है। प्रकृति की अनमोल छटा बिखेरती सुंदर पहाड़ियों को देख कर लगता है कि यह किसी पानी कंपनघट से कम नहीं। बल्ली डांड़ से यह नगर थाली की तरह लगता है ऐसे दिखता है जैसे थाली में कोई चावल बीन रहा हो। बावजूद इसके 21वीं सदी के भारत में कोटद्वार के आसपास के गांव आज भी बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और रोजगार के अवसरों से वंचित है। विज्ञान की प्रगति के बावजूद किसान फसलों की पैदावार के लिए मौसम पर निर्भर है। बारिश समय पर हो जाए तो किसान को अच्छी फसल मिल जाती है, अतिवृष्टि हो या फिर सूखा पड़ जाए तो किसान को बीज का पैसा भी नहीं मिल पाता। बुनियादी सुविधाओं के अभाव और घाटे का सौदा बन रही कृषि के कारण गांवों से पलायन हो रहा है। हमारे समाज में कृषि को उत्तम माना गया है। लेकिन लोग अपनी कृषि योग्य उपजाऊ जमीन को बेच रहे हैं और इन जमीनों पर हॉलिडे रिसोर्ट और विलेज टूरिज्म से संबंधित हब बन रहे हैं। इनके मालिक मोटा मुनाफा कमाते हैं, लेकिन किसान अपनी गुजर-बसर ही कर पाता है। अंधाधुंध भवन निर्माण के कारण गांवों का माहौल बदल रहा है।
विकास के नाम पर गांवों का अधकचरा, बेतरतीब, फूहड़ शहरीकरण हो रहा है। आज भी पहाड़ों के अधिकांश गांव जल के प्राकृतिक स्रोत और नदियों पर निर्भर हैं। लेकिन कुकरमुत्तों की तरह बन रहे हॉलीडे रिसोर्ट, होटलों के कारण जल का संकट उत्पन्न हो रहा है क्योंकि इन होटलों में नदियों से ही जल अवैध रूप से सप्लाई किया जाता है और गांव के लोगों के कृषि और दूसरे कामों के लिए पर्याप्त मात्रा में जल नहीं मिल पाता। दूसरा भयानक संकट कचरे के निपटान का है। पर्यटकों और होटलों के कारण कचरे के अंबार लग रहे हैं, जगह-जगह प्लास्टिक की ढ़ेर देखने को मिल जाएंगे, लेकिन इसका निपटान कैसे किया जाए इसके लिए कोई जागरूकता नहीं है। लगता है कि आठ-दस वर्षों में पहाड़ों पर गाजीपुर लैंडफिल की तरह कचरे के पहाड़ देखने को मिलेंगे।
दूसरी बुनियादी समस्या शिक्षा की है। यहां गांवों में अच्छे स्कूलों का अभाव है। छोटे-मोटे पब्लिक स्कूल पनपने लगे हैं। उनमें शिक्षा के स्तर के बारे में केवल अनुमान लगाया जा सकता है। कोटद्वार शहर में केवल एक सरकारी कॉलेज है जहां गढ़वाल के दूरदराज के विद्यार्थी पढ़ने आते हैं, लेकिन सभी गांव वाले अपने बच्चों को यह सुविधा प्रदान नहीं कर पाते। यहां कुछ अच्छे स्कूल और कॉलेज खुलने चाहिए जिनमें सभी विषयों की पढ़ाई उपलब्ध हो।
तीसरी बुनियादी समस्या स्वास्थ्य सेवाओं की है। गांवों में छोटे-मोटे प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र हैं जहां बुनियादी सेवाएं भी उपलब्ध नहीं होती। कई गांवों में तो प्राथमिक स्वास्थ्य कर्मी ही इन प्राथमिक केन्द्रों को चलाते हैं। कोई गंभीर स्वास्थ्य समस्या हो तो उन्हें कोटद्वार के सरकारी अस्पताल में आना पड़ता है या देश के अन्य शहरों में जाना पड़ता है जहां इलाज के लिए कभी कभी तो इन्हें अपनी जमीनों को बेचना पड़ता है। इस तरह गांव वाले पैसे और जमीन दोनों खो बैठते हैं और शहरों में छोटे-मोटे काम करने और तंग बस्तियों में रहने को मजबूर हो जाते हैं।
चौथी समस्या रोजगार की है। कृषि के अलावा किसान के पास आय का कोई दूसरा स्रोत नहीं है। ‘कोटद्वार‘ के गांवों में आम, कटहल, लीची और आंवला के मौसम में इनकी बम्पर पैदावार होती है लेकिन गांव वालों को फसल का उचित कीमत नहीं मिल पाता। यदि गांव के आसपास खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और कोल्ड स्टोरेज बन जाएं तो मौसमी फलों से कई प्रकार के उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं जिससे किसान को उनकी फसल का उचित मूल्य प्राप्त हो सकता है। उदाहरण के लिए आम से अमचूर, आम का जूस, आम पापड़, आम से बनी मिठाईयां, आम का अचार इत्यादि बनाकर बेचा जा सकता है। इसी प्रकार अन्य फसलों से भी उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। ग्रामीणों को भी इन कार्यों के लिए प्रशिक्षित कर उनके अतिरिक्त आय की व्यवस्था की जा सकती है।
गांव में रहने वालों के लिए मनोरंजन के साधन और अवसर नहीं हैं। गांव वाले सूचना और मनोरंजन के लिए टीवी और रेडियो पर निर्भर रहते हैं। गांवों में ऐसे सामुदायिक केन्द्रों या पंचायत घरों का निर्माण होना चाहिए जहां उन्हें पठन-पाठन और अन्य क्रियाकलाप जैसे स्थानीय लोक कलाओं और हथकरघा, हस्तशिल्प इत्यादि के लिए प्रशिक्षित किया जा सके। पर्वतीय क्षेत्र के गांवों में प्रचुर मात्रा में सूर्य की रोशानी उपलब्ध है, लेकिन गांव के लोग बिजली की सप्लाई के लिए राज्य विद्युत बोर्ड पर निर्भर हैं। गांवों में बिजली की आपूर्ति पांच से छः घंटे ही होती है। भारत सरकार ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्रोतों पर जोर दे रही है, लेकिन राज्य सरकारों द्वारा इस दिशा में कार्य की गति धीमी है। यदि राज्य सरकार चाहे तो सौर ऊर्जा से बिजली की समस्या को समाप्त कर सकती है और लोगों को इसके लिए जागरूक भी बना सकती है।
पहाड़ों में कई नदियों में केवल वर्षा के मौसम में ही जल रहता है। ये नदियां वर्ष के बाकी महीनों में सूखी पड़ी रहती है लेकिन इन नदियों में पत्थर और रेत बहुतायत में होता है। खनन माफिया इन नदियों से रेत और पत्थरों का अवैध खनन करता है जिससे बरसात के मौसम में नदियों में कटाव होता है और पानी गांवों में भर जाता है। वर्ष 2017 में कोटद्वार के गांव प्राकृतिक आपदा से त्रस्त रहे। वहां बादल फटने और जलभराव की घटनाएं हुईं। बिल्डर माफिया ने नालों को पाटकर पानी के निकास के रास्ते बंद कर वहां मकानों का अवैध निर्माण किया जिसका खामियाजा वहां रहने वाले लोगों ने ही उठाया।

कोटद्वार के पास सिगड्डी गांव में सरकार ने ग्रोथ सेंटर बनाया जिसके लिए किसानों की उपजाऊ जमीन को अधिग्रहीत किया गया। यदि सरकार बंजर पड़ी जमीनों पर ग्रोथ सेंटर बनाती तो इससे गांव वालों और उनके बच्चों की कृषि योग्य जमीन भी बची रहती और उन्हें रोजगार के अवसर भी प्राप्त होते। कोटद्वार की माटी उपजाऊ है और उस भूमि में आजकल कंक्रीट का जंगल उग रहा है। तेजी से हो रहे शहरीकरण का असर तो सीमित है मगर बेतरतीब विकास का परिणाम गाहे—बगाहे जगह—जगह दिखता है।।
गांधी जी के सपनों के भारत में कल्पना थी कि ‘हर गांव एक इकाई के रूप में विकसित हो ताकि वे अपनी जरूरतों को स्वयं पूरा कर सकें जिससे उन्हें शाहरों की तरफ रूख न करना पड़े। यदि हमारी सरकारें इस दिशा में सोचें और कार्य करें तो गांवों से पलायन भी रूकेगा और शहरों पर पड़ने वाला भार भी कम होगा।
(समाचार सेवा प्रभाग ,आकाशवाणी दिल्ली में सहायक निदेशक राजभाषा के पद पर कार्यरत )

