अपने टोले ही चलेंगे…जैसे लाखों लोग गए…जो होगा…देखा जाएगा

कुमार विनोद, वरिष्ठ टीवी पत्रकार

बाबा चले गए, मेरे लिए गांव का मतलब ही बदल गया. बैराग मेरे अंदर भी जागने लगा. मैं भी बाबा की तरह रक्त होकर भी विरक्त होने लगा. तब ये समझ नहीं आता था- ये कैसा अमोह है, जो मेरे अंदर उठ रहा है. क्यों गांव अब सूना लगने लगा है. इसका दायरा सीमित लगने लगा है. लगता था- यहां जीवन है क्या- पढ़ो लिखो, जवान हो, शादी करो, बच्चे पैदा करो. नौकरी तो मिलती नहीं. लड़कियां पढ़ती नहीं. पढ़ी लिखी लड़कियों से शादी होती नहीं. जो पढ़ी भी होती है, वो घर से पढ़ी होती हैं, बाहरी दुनिया या स्कूल से बाहर का कोई अनुभव नहीं. देखता था ऐसे पढ़े लिखे लोगों को, जो 40 की उम्र पार करते ही सब भूल जाया करते थे. खेती बाड़ी, बेटे बेटियों की शादी, विदाई और उसके बाद जीवन के अंत की शुरुआत. 50 का होते—होते जीवन का सारा मेला खत्म….
क्या जीवन इतने तक ही सीमित है? नहीं तो, सपने तमाम हो सकते हैं, उसके लिए बस संसाधन चाहिए. ये फिल्मों और दुनिया भर की किताबों से पता चलता था. इस तरह गांव को लेकर वैराग बढ़ता गया….


हालांकि इस वैराग के साथ मुझे 4 साल और गांव में एक बेरोजगार की तरह काटने पड़े. एमए करने के बाद पूरी तरह गांव में बस चुका था. यहीं से पढ़ाई लिखाई, खेती बाड़ी और प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी. ये आसान नहीं था एक किसान जीवन के लिए, मगर मेरे सामने एक मिसाल थे- बाबा
वो शख्स, जिसने अकेले ही पूरे परिवार की राह बदल दी थी. उस वक्त भी पूरा परिवार अलग होते हुए भी पूरे इलाके में अपनी शिक्षा, और नौकरी के लिए जाना जाता था. मेरे घर में कोई अनपढ़ नहीं था. और कोई भी बेरोजगार भी नहीं. दोनों चाचा के दो दो लड़के नौकरी में. लड़कियां बीए तक पढ़ चुकी थी. टीचर ट्रेनिंग की तैयारी कर रही थीं. इसके साथ गांव का पूरा माहौल बदल गया था. अब सुबह नौ बजते ही लड़कों के साथ लड़कियों का हुजूम भी स्कूल के लिए तैयार होता. करीब 15-20 लड़कियों का झुंड. हाई स्कूल की पढ़ाई संभव हो गई थी. हालांकि 1994-95 के साल भी दसवीं के बाद लड़कियों की पढ़ाई के लिए कॉलेज का इंतजाम नहीं था. था तो वही 6 कोस दूर, जितना बाबा के जमाने में 8 वीं के बाद का स्कूल था.
गांव में पढ़ाई अब भी किरासन के तेल के दीये या लालटेन से ही करनी पड़ती थी. बिजली बत्ती का नाम नहीं था. एक किलोमीटर दूर फतेहपुर बाजार से तो गुजरती बिजली, लेकिन आती थी सिर्फ नाम की. हमारे टोले पर आने का तो कोई नाम ही नहीं था.
ये सबकुछ तब हो रहा था- देश की अर्थव्यवस्था उदारीकरण के दौर से गुजर रही थी. घर में टीवी आ चुका था, जहां नहीं था, वहां रेडियो तो जरूर था. अखबार भी निकटतम बाजारों तक आने लगे थे. अखबारों में मंदिर-मस्जिद और आरक्षण को लेकर सुर्खियां छपने लगी थी. लोग जान गए थे, मंडल क्या होता है, कमंडल क्या होता है. किसके साथ कौन खड़ा हो रहा है ये भी सब खबर रहने लगी थी. लेकिन इसकी सीधी सियासत से दूर ही था हमारा गांव. कोई रैली रेला नहीं, कोई मीटिंग नहीं. देश में दंगे फसाद और आरक्षण के नाम पर आत्मदाह तक हुए, लेकिन हमारे टोले और पूरे गांव जवार में जो जैसे था, सब चलता रहा…
एक नरसंहार वाली घटना जो थी, हमारे आस पास के पूरे गांव जवार के लिए हृदय विदारक थी. खैर इसकी कहानी में क्या जाना, जो बीत चुका वो अच्छा हुआ. तब खौफ हुआ करता था. बाहर जाने पर बदनामी होती थी सो अलग. ये जानते ही कि कोई लौंडा भोजपुर जिले का है, तो या तो वो माले समर्थक होगा या रणवीर समर्थक. जबकि असलयित ये थी, कि हमारे जैसे तमाम नौजवान किसी गुट के नहीं हुआ करते थे. जो थोडे बहुत होते भी थे, उसमें से ज्यादतर हिंसा के विरोधी. नरसंहार उन्हें भी मंजूर नहीं था.

उन्हीं दिनों मैंने महात्मा गांधी की आत्मकथा- सत्य के साथ मेरे प्रयोग पढ़ी थी और बीसियो नौजवानों को पढ़ाया था. इस पर कई बार चर्चा भी हुई…

अपने गांव-जमीन से पलायन तो महात्मा गांधी को भी करना पड़ा था

अगर पोरबंदर ही रह गए होते, तो पूरी दुनिया सत्य और अहिंसा के सबसे पवित्र प्रतीक कैसे बने होगे.

तो मैं कह सकता हूं, उस उथल—पुथल भरे दौर में गांधी हम सबके अंदर मौजूद थे. बल्कि जितना अहिंसक दौर, गांधी की मौजूदगी उतनी ही पुख्ता. एक भरोसा, जब तक गांधी का विश्वास है, समाज हमारा बर्बर नहीं हो सकता. ये विश्वास तमाम नौजवानों में एक ईंधन का काम करता. मेरे जैसे किसानी करते हुए लोग भी बैंक, रेलवे, आर्मी, पुलिस, टीचर से आगे की नौकरी का सपना देखने लगे थे.


बघड़ा टोला अब वो बघड़ा टोला नहीं रह गया था.
जो टीले बघड़िए छोड़ गए थे, उस पर बाहर के लोग आकर मकान बनाने लगे थे. दूर दराज के कई गांवों से लोग अपने यहां की सामंती व्यवस्था से अलग बघ़ड़ा टोला के आजाद माहौल में रमने लगे थे. कई परिवारों ने अपनी पूरी जमीन बेचकर यहां अपना आशियाना बनाया. आज पांच परिवार का ये टोला कम से कम 100 परिवार का हो चुका है. एक हजार के करीब आबादी है.
लेकिन एक दर्द आज भी कायम है. नई पीढ़ी के बच्चे पढ़ाई तो कॉलेज तक की कर लेते हैं, लेकिन नौकरी? वो नहीं है. रोजगार के नाम पर दुकान है या फिर शहर में पलायन. मैं अगर अपने ही परिवार की बात करूं, तो मेरे परिवार में जो 7 बच्चे थे- वो अब गांव में नहीं रहते. शहर में ही नौकरी करते हैं. इतने बड़े घर में सिर्फ मां बाप बचे रह गए हैं, जो शहर में महीने दो महीने भर से ज्यादा नहीं टिकते…वो वापस चले जाते हैं…
पता नहीं टीले में क्या बात है. कैसा आकर्षण है, जो खींच ही लेता है. कई बार लगता है- वो नहीं बदला, तो अच्छा ही हुआ. उसे वैसे ही रहना चाहिए. जानता हूं इसमें एक तरह की निराशा भी मिली हुई है, क्योंकि मन ये कहीं न कहीं मान चुका है- गांव का विकास वोट की राजनीति और बिजनेस के लिए सत्ता की सियासत से नहीं होने वाला. अगर ऐसा होने को होता, तो हमारे जैसे टोलों पर भी हर घर में अपना शौचालय होता. अच्छा स्कूल होता, एक अस्पताल होता. खेती किसानी को सरकार का बेहतर सपोर्ट होता. नई फसलों के लिए योजना होती, उनके लिए मुनासिब दाम तय होते. खेती के साथ कुछ रोजगार के भी मौके होते. नौकरी कोई जरूरी नहीं. एक किसान को इतना ही मिल जाए, तो उससे खुशहाल मानव जीव पूरी धरती पर कोई नहीं….
किसानों की इसी खुशी के लिए महात्मा गांधी ने गुजरात से लेकर चंपारण तक दो—दो आंदोलन शुरु किए. उनका बुनियाद हक दिलाने के लिए अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी. और हक दिलाया भी. लेकिन इस बात के सौ बरस हो गए- किसानों की हालत बिगड़ी ही है. गांव में खेती किसानी आज भी मजबूरी या जीविका के आखिरी विकल्प की तरह देखा जाता है. तो फिर पैदावार कहां से होगी? पैदावर नहीं होगी, तो आमद कहां से होगी और आमद नहीं होगी, तो पलायन कैसे रुकेगा? शहरों महानगरों में लोग बढ़ेंगे. भीड़ होगी, वहां के वातावरण पर दबाव बढ़ेगा. बीमारी होगी, वायरस, बैक्टिरिया फैलेगा और एक दिन वहां भी जीना मुहाल हो जाएगा. शहर और प्रकृति का पूरा इको सिस्टम बिगड़ जाएगा…


आदमी न गांव का रह जाएगा, ना शहर का. फिर कहां जाएगा?
इस सवाल पर आज भी कई बार जवाब आता है- अपने टोले ही चलेंगे. और कहां जाएंगे. जैसे लाखों लोग गए. जो होगा वो देखा जाएगा.
एकरंगा की एक कविता इस कहानी के अंत को समर्पित करता हूं

मुझे वापस लौटना है
मुझे इतना भी दूर मत बहा ले जाओ नदी
काफी दूर आ चुका हूं तुम्हारी कोख में हिचकोले खाते
गाते गुनगुनाते, तुम्हारी तहों में गुम होते, उतराते
इतनी दूर तो आ चुका हूं तुम्हारे साथ गोते लगाते
अब तो पत्थर भी नहीं रहा मैं
घिसा हुआ बदलन कुछ और ही दिखता है
जैसे पावन तुम्हारा जल, वैसे पवित्र मेरा बदन
इससे पहले, कि हाथ लग जाऊं किसी के
और बना दिया जाऊं किसी मंदिर का देवता
न कुछ देख सकूंगा, न सुन सकूंगा
अपनी जगह पर जड़ होकर रह जाऊंगा
इससे पहले कि मैं निष्काम हो जाऊं
नदी, तुम मुझे विराम दे दो

मुझे वापस लौटना है अपने पाषाण रुप में

आखिरी कड़ी..समाप्त

https://panchayatkhabar.com/baghariaon-ka-tila-kumar…/
गांधी 150,देश के 150 गांव की कहानियों के कारवां में आज आपके लिए बिहार के बघड़ियों का टीला गांव की कहानी। इस एतिहासिक कहानी को कलमबद्ध किया है वरिष्ठ टीवी पत्रकार और वर्तमान में इंडिया टीवी में एसोसिएट एडिटर के रूप में कार्यरत कुमार विनोद ने…। कहानी काफी बड़ी है क्योंकि इस कहानी में गांव के कई सौ साल के इतिहास को समेटा गया तो आप पहली किस्त यहां से पढ़ सकते हैं।

https://panchayatkhabar.com/bagharion-ka-tila-part-2…/
गांधी 150,देश के 150 गांव की कहानियों के कारवां में आज आपके लिए बिहार के बघड़ियों का टीला गांव की कहानी। इस एतिहासिक कहानी को कलमबद्ध किया है वरिष्ठ टीवी पत्रकार और वर्तमान में इंडिया टीवी में एसोसिएट एडिटर के रूप में कार्यरत कुमार विनोद ने…। तो पेश है आज आपके लिए दूसरी किस्त।

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