कुटुंब को बचाना होगा…

0
1045

डॉ शांतेश कुमार सिंह
गांव ही भारत का वास्तविक स्वरूप दर्शाता है क्योंकि वहां हम सामूहिक जीवन जीते है। खेलकूद हो, सांस्कृतिक कार्यक्रम हो, महोत्सव हो या दूसरी गतिविधियां गांव में शहरों की अपेक्षा ज्यादा जिन्दादिली के साथ होती हैं। मैंने अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा गांव में ही बिताया है। जब से शहर में आया हूं तब से मुझे गांव का महत्व ज्यादा ही समझ में आता है।
गांधी महान व्यक्ति थे जिन्होंने गांव को बढ़ाने की बात की और गांव को आत्मनिर्भर बनाने की बात की क्योंकि उनको पता था कि गांव आत्मनिर्भर और सशक्त रहेंगे तो देश आगे बढ़ेगा। यदि शहरीकरण होगा तो लोग गांव को छोड़कर शहर की तरफ भागेंगे। देश का विकास इस दिशा में यदि हुआ तो उसका प्रभाव नकारात्मक ही होगा। जैसा आजकल हम देख रहे हैं। चाहे अपराध की बात करें, पर्यावरण की बिगड़ती दशा को देखें या रोजगार के क्षेत्र में ही देखें, यदि हम वास्तविक खुशहाली लाना चाहते हैं तो हमें गांव के विकास की ओर ज्यादा ध्यान देना होगा। वहां के इंफ्रास्ट्रक्चर, स्कूल, स्वास्थ्य की ओर ध्यान देना होगा, रोजगार के अवसर देने होंगे जो अभी नहीं है। यदि ऐसा किया जाएगा तो गांधी-दर्शन को व्यावहारिक जीवन में उतार पाएंगे।


गांव में निश्चित तौर पर पिछले कुछ वर्षों में बहुत बदलाव देखने को मिले हैं। अब वहां जाने पर पहले जैसी बच्चों की फौज नजर नहीं आती जो धमाचौकड़ी किया करती थी। अब वही जगह बच्चों के बिना वीरान-सी जान पड़ती है। गांव के बच्चे अब गांव में है ही नहीं। ज्यादातर को पास के शहरों में पढ़ने के लिए भेज दिया गया है। जवान रोजगार की तलाश में निकल गए हैं। इसके पीछे कहीं न कहीं पूंजीवादी ताकतें हैं। दूसरा कारण यह हो सकता है कि वहां के स्कूलों की व्यवस्था ठीक नहीं है। बच्चों को जौनपुर, इलाहाबाद, बनारस या किसी भी अन्य शहर में भेजा जा रहा है। उनसे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करायी जाती है ताकि वे अच्छे जीवन की तरफ बढ़ सके। उसका मैं समर्थन करता हूं लेकिन दुख की बात यह है कि इस प्रतिस्पद्र्धा में बहुत से बच्चे अवसाद के शिकार भी हो जाते हैं। बाहर जाने पर माहौल तो मिलता है, पढ़ते भी है बच्चे। परन्तु कुछ ऐसे बच्चे भी होते हैं जिनका पढ़ने में मन नहीं लगता। दबाव के चलते वे दाखिला लिए हुए है। ऐसे में अभिभावक का पैसा तो व्यर्थ होता ही है, बच्चे भी अपनी रूचि के अनुसार कार्य नहीं कर पाते। वे पढ़ाई के स्थान पर घूमना शुरू कर देते हैं। कहीं कोचिंग के नाम पर गलत रास्तों की ओर मुड़ जाते है। इस की ओर हमें ध्यान देना चाहिए।


पिछले कुछ वर्षों में गांवों में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के प्रभाव देखने को मिला है। जो बच्चे पढ़कर कभी-कभार गांव आते भी है वे गांव से जुड़ नहीं पाते है। कारण है कि उन्होंने कभी गांव को जिया ही नहीं। विदेशी बनकर आते हैं और एक विदेशी की नजर से ही देखकर यहां से चले जाते है। गांव में हमारे बचपन के समय जो माहौल था वह अब नहीं दिखता। चाहे किसी के घर भी कोई कार्यक्रम होता हो या किसी के घर कोई दुर्घटना हो, हम सभी बच्चे जाकर वहां खड़े होते थे। किसी एक के घर का कामकाज पूरे गांव का माना जाता था। हमें इन कामों के लिए बाहर के व्यक्ति की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। आज गांव में देखते हैं कि हर तरह के काम चाहेे शादी ब्याह हो या तेरहवीं ही हो बिलकुल व्यावसायिक तरीके से खाने-पीने की तैयारी की जाती है। जो मिलजुलकर रहने की प्रवृति थी वह विलुप्त होती जा रही है। आज जाने पर बेगाना-सा लगता है। लगता है कोई प्रतियोगिता छिड़ी हुई है जहां सब एक दूसरे के प्रतिद्वंदी ही है। पहले जैसे लोग आपस में प्रेम से मिलते थे, वह नहीं बचा।


गांधीजी हमेशा चाहते थे कि गांव की समस्याओं का समाधान लोग मिलजुल कर गांव में ही करें। गांव में भी लोगों को वह सभी सुविधाएं मिल सके जो शहरों में उपलब्ध है। गांव में अच्छी सड़के हो, शिक्षा व्यवस्था सुदृढ़ हो, गांव में मनोरंजन के साधन उपलब्ध हो, खेलकूल की भावना को बढ़ावा दिया जाए ताकि नौजवानों में एकता की भावना जागृत हो। तभी एकजुट होकर सभी सामूहिक विकास कर सकते हैं, तभी व्यक्तिगत जीवन की तरफ भी कदम बढा पायेंगे। इस ओर हमें ध्यान देने की आवष्यकता है। गांधीजी को यदि श्रद्धांजलि देना चाहते हैं, उनके आदर्शाें को जीवन में लागू करना चाहते हैं तो सबसे जरूरी है कि हमें अपने गांव को सशक्त करना पडे़ेगा।
तकनीक ने दूर के लोगों को तो आपस में जोड़ा है लेकिन पास के लोगों को बहुत दूर कर दिया है। यह नकारात्मक प्रभाव है। निश्चित तौर पर तकनीक मदद करती है। हम एक शहर से दूसरे शहर की तरफ जाते है, बात करना चाहते हैं, देखना चाहते हैं या कम्यूनिकेट करना चाहते हैं तो वह जरूरी हो जाता है। लेकिन पड़ोस में रह रहे व्यक्ति से हम दूर होते जा रहे हैं। लोगों में जो सामूहिकता की भावना थी वह खत्म हुई है।


मैं मूलतः जौनपुर के एक छोटे से गांव कल्याणपुर का रहने वाला हूं। वहां से दिल्ली आया अब मलेशिया में आकर रह आया हूं और भी तमाम देशों में घूमा हूं। अपना अनुभव यदि बताना चाहूं तो यही कहूंगा कि जो शहरीकरण की बात अपने देश में की जाती है, वह शहर और गांव के बीच जिस अंतर की बात की जाती है, वह अंतर है जरुर लेकिन हम दिल्ली को तमाम देशों से तुलना करके पाते हैं, दिल्ली खुद ही अपने आप में गांव जैसी ही है। यहां भीड तो जुट गई लेकिन व्यवस्थाएं नहीं है, सुविधाएं नहीं है। पर्यावरण दिन-प्रतिदिन बद से बदतर होता जा रहा है या फिर ट्रैफिक जैसी समस्या बढ़ती जा रही है।
गांव, दिल्ली और मलेशिया इन तीनों कड़ी को अगर जोड दूं तो देखता हूं कि गांव की जिन्दगी शहरों से बहुत अलग है। जब मैं पहली बार गांव से इलाहाबाद आया जो तब छोटा शहर कहा जा सकता था। दिल्ली, मुम्बई और अन्य बड़े शहरों से वह थोडा अलग था। वहां शहर और गांव का मिश्रण देखने को मिल सकता है। गांव से इलाहाबाद में मुझे बहुत अंतर नजर नहीं आया। गांव नजदीक होने के कारण प्रायः गांव आना-जाना लगा रहता था। जिससे गांव के वातावरण से जुड़ा रहा। लेकिन दिल्ली आने के बाद लंबे समय तक गांव से दूर रहा और लंबे अंतराल के बाद गांव जाता था। मुझे इस बीच बडे-बडे परिवर्तन देखने को मिले। कुछ ही सालों में वहां सडकें बनी, बिजली की व्यवस्था हुई। स्कूल में भी थोडा विकास हुआ। बचपन में जब हम स्कूल जाते तो आठ दस किलोमीटर की यात्रा करते थे। लेकिन अब पास में स्कूल है। अब हर एक-दो किलोमीटर पर इंटर कॉलेज दिख जायेंगे। क्वालिटी पर विवाद किया जा सकता है। तकनीक और ट्रांस्पोटेशन ने लोगों को नजदीक किया है।


दिल्ली मेट्रोपॉलिटन सिटी होने के कारण डेवलप और एडवांस है। गांव से बहुत अलग है। सामूहिकता की संस्कृति यहां नहीं थी। व्यक्ति केंद्रित समाज नजर आता है। अगर मैं दिल्ली से मलेशिया की बात करूं या अपने गांव से मलेशिया के गांव की तुलना करूं तो वह काफी डेवलप है। सुविधाएं शहर से एकदम कम नहीं है। अगर भारत के गांवों में भी शहर-सी सुविधाए आ जाएं तो शहर की तरफ पलायन रूक जाएगा। हम जनसंख्या विस्फोट से गुजर रहे है। शहरों और गांवों की उतनी क्षमता नहीं है कि इस विस्फोट को संभाल सके। गांव को मजबूत बनाने से जनसंख्या को भी नियंत्रित किया जा सकता है। रही बात रोजगार की तो अगर रोजगार की ट्रेनिंग दी जाए, जिस नेशनल स्किल डेवलपमेंट की बात चल रही है वह इंप्लीमंेट किया जाए तो मुझे लगता है कि गांव में रोजगार के अवसर भी आएंगे। गांधीजी कहते थे न कि वहीं उत्पादन करो, वहीं बेचो और वहीं खर्च करो। यह हम कर सकते हैं। छोटे-छोटे मार्किट और हब बनाकर यह किया जा सकता है। जब तक गांव मजबूत नहीं होगा, लोगों का पलायन नहीं रूकेगा और जबतक पलायन नहीं रूकेगा तबतक शहरों की स्थिति नहीं सुधरेगी।

शहर बढाने से गांव का विकास नहीं हो सकता है। गांव का पॉलूशन लेबल बहुत अलग है।वैश्विक रूप से यदि हम सशक्त और विकसित राष्ट्र बनना चाहते है तो कृषि पर ध्यान देना जरूरी है।
मैंने जो बचपन का समय बिताया है वह कभी वापस नहीं आ सकता। उस समय बहुत आत्मीयता होती थी। रात में कोई बारह बजे भी कहें कि चलो मूवी देखने चलते हैं तो चोरी छुपे एक झुंड में सभी बच्चे निकल पडते थे। बहुत ही सुरक्षा की भावना थी। डेवलप कंट्री में सब आत्मकेंदित थे। यह किसी भी तरह से ठीक नहीं माना जा सकता है। अगर हम वसुद्यैव कुटुम्बकम की बात करते है तो कुटुम्ब को बचाकर रखना जरूरी है। कुटुम्ब का मतलब अपना परिवार अपने बच्चे ही नहीं, इसका आशय वृहत समूह, समाज, संस्कृति, सभी को जोड़कर रखना है और इसी रास्ते पर आगे बढ़ते हुए विकास संभव है।
(एसोसिएट प्रोफेसर,राजनीति विज्ञान, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ हरियाणा। मलेशिया से पीडीएफ किया।)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here