Delhi University

बदल गया है सामुदायिक जीवन

डॉ अनामिका मेरा जन्म चीन से युद्ध के समय हुआ था। उस समय की घटनाएं याद नहीं हैं। एक-दो दृश्य याद हैं। भैया हमको कहते थे कि चाइनीज है। मेरी नाक चपटी थी, इसलिए चिढ़ाते थे। हमको याद है कि नेपाल के बॉर्डर से आती थी एक बूढ़ी औरत, स्मगलिंग की साड़ियां लेकर। कुछ दूसरे …

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पंचायत चुनावों ने भी चौपट किया गांव को

प्रो डॉ श्रीप्रकाश सिंह महात्मा गांधी का आदर्श निस्संदेह अनुकरणीय है, लेकिन आजादी के बाद से ही गांधी के आदर्शों को कमोबेश त्याग दिया गया। गांधी कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने के पक्षधर थे, मध्यम दर्जे का उद्योग लगाए जाने की बात करते थे। यह कोई नई बात नहीं थी। 17 वीं व 18 वीं …

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मेरा ‘गांव’-मेरा ‘देस’

डाॅ.सुधा सिंह कलकत्ता में रहनेवाले बिहार, उत्तरप्रदेश के प्रवासी मजदूर अपने गांव को ‘देस’ कहते हैं। मैंने अपने आरंभिक जीवन के 24 वर्ष इन मजदूरों के बीच बिताए हैं। उनके जीवन, रहन-सहन, सुख-दुख को करीब से देखा है। इनके बीच रहकर मैंने अपनी पढ़ाई-लिखाई पूरी की है, जीवन की पहली नौकरी की है। केशोराम कॉटन …

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‘फलाने कै लड़िकवा’ से ‘डॉ. ताराशंकर’ हो चुका हूं

डाॅ तारा शंकर गाँव विशुनपुर, जिला बस्ती, उत्तर प्रदेश। उम्र 34 साल 5 महीने। 19 साल से घर-गाँव से दूर शहर में रह रहा हूँ। घर से शहर बस्ती, बस्ती से इलाहाबाद और फिर 2007 से देश के दिल दिल्ली में। शायद बदलाव के सबसे तेज दौर वाली पैदाइश है हमारी जनरेशन। तकनीक बदली, संचार …

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गांव मेरी संवेदना का हिस्सा लेकिन समय का यथा​र्थ है नगर

प्रो डाॅ गोपेश्वर सिंह गांव हमारी भावनात्मक कमजोरी है। गांव हमारी भावनाओं, स्मृतियों में बसा है। चूंकि गांव में हमारा बचपन बीता है, हमारे संस्कार बने हैं, इसलिए हमें अच्छा लगता है गांव। हमारे शारीरिक और मानसिक निर्माण में गांव की बड़ी भूमिका है, इसलिए फुर्सत के क्षणों में वह हमें याद आता है। हम …

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