February 23, 2020

सांसद आदर्श ग्राम योजना के फलॉप होने का गवाह है जीरादेई

महात्मा भाई

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150 वीं वर्षगांठ के अवसर पर मुझे अपने गांव के बारे में कुछ लिखने का मौका मिला है तो मैं अपने को भाग्यशाली मानता हूं। देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद की जन्मभूमि होने से इस गांव को स्वाधीनता आंदोलन की गतिविधियों का साक्षी बनने का सौभाग्य मिला है। बापू कई बार यहां आए। सीमांत गांधी, जयप्रकाश नारायण, सुभाष चंद्र बोस, सरदार बल्लभ भाई पटेल जैसे स्वाधीनता आंदोलन अग्रणी नेता यहां आते रहे हैं। इस वर्ष पूरे देश में तरह-तरह के आयोजन हो रहे हैं, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन की एक प्रमुख कर्मस्थली जीरादेई में किसी आयोजन की चर्चा नहीं सुनी गई है।

जीरादेई के सपूत डाॅ राजेन्द्र प्रसाद की मेधा के बारे में कई कहावतें प्रचलित रही हैं। किसी परीक्षा में परीक्षक ने परीक्षार्थी को स्वयं से अधिक योग्य बताया तो किसी परीक्षा में उन्हें दोहरी प्रोन्नति दे दी गई। संविधान सभा के अध्यक्ष और देष के पहले राष्ट्रपति के रुप में उनकी प्रतिभा को देश और दुनिया ने देखा। इससे यह गांव और यहां के निवासी गौरवान्वित भर नहीं हुए, उनके विकास की उम्मीद भी जगी।
आरंभ में कुछ काम हुए भी। वैसे राजेन्द्र बाबू का परिवार पहले से अपने गांव के विकास के लिए सचेष्ट रहा है। उनके बडे भाई का बनवाया विद्यालय आज भी चल रहा है। पर बाद में विकास की धारा रुक गई। अब तो इस गांव में विकास की उल्टी धारा चल पड़ी है।

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति की जिम्मेवारी से निवृत होने के बाद राजेन्द्र बाबू पटना के सदाकत आश्रम में रहने लगे, जहां वे आजादी के पहले रहते थे। उन्होंने सरकारी आवास लेना या सरकारी तामझाम में रहना अस्वीकार कर दिया था। अपने पैतृक गांव जीरादेई में भी रहने नहीं गए। वहां उनके पूर्वजों द्वारा निर्मित भव्य मकान था जो आज भी है। राजेन्द्र बाबू के आखिरी समय में गांव में नहीं रहने से उनके निजी उपयोग की वस्तुएं वहां न होकर सदाकत आश्रम के राजेन्द्र दीर्घा में संरक्षित हैं। राष्ट्रपति के रुप में मिले उपहारों को तो उन्होंने पटना संग्रहालय को दे दिया था। उनके पैतृक निवास को पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने 3 दिसंबर 1990 को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करते हुए राष्ट्र को समर्पित किया। वह अब भारतीय पुरातत्व विभाग की देखरेख में है। वहां राजेन्द्र बाबू के बचपन की वस्तुएं हैं।

जीरादेई में राजेन्द्र बाबू के बड़े भाई महेन्द्र बाबू ने 1921-22 में एक मध्य विद्यालय की स्थापना की थी। वह विद्यालय अभी भी चलता है। 7 जुलाई 1947 में महेंद्र उच्च विद्यालय जीरादेई शिलान्यास किया गया। यह विद्यालय भी चालू हालत में है। उनकी धर्मपत्नी राजवंशी देवी ने 1957 में आयुर्वेदिक औषधालय का शिलान्यास किया था। उसका पुराना भवन गिर गया है, पर अस्पताल किराया के मकान में चलता है। गांव में उसी जमाने से 10 फीट चौड़ी पक्की सड़क है। उसका चौड़ीकरण नहीं हो सका है। डाकघर है, पर उसमें अति शीघ्र संवाद भेजने लिए टेलीग्राम करने और रजिस्ट्री करने की व्यवस्था नहीं है। पोस्टल आर्डर भी नहीं मिलता। अब तो कभी कभी डाकघर को यहां स्थानांतरित करने की बात भी होने लगी है। जीरादेई में 1957-58 के दौर में स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना हुई थी, उसे भी यहां से हटाने की बात हो रही है। यहां प्रखंड और अंचल कार्यालय तो खुल गए, लेकिन वे सामुदायिक भवन में चलते हैं।

बिहार सरकार ने 80 के दशक में यहां राज्य पर्यटक सूचना केंद्र खोला था, उसे यहां से हटा दिया गया है। गांव को राजधानी को जोड़ने के लिए बिहार राज्य परिवहन निगम की बस चलती थी, वह बंद हो गई है। देश के प्रमुख महानगरों को जोड़ने वाली रेल सेवा नहीं है। यहां आरंभ से ही खादी संस्था थी, वह मृत्यप्राय हो है। कोई लघु उद्योग नहीं है। स्वरोजगार की कोई व्यवस्था नहीं है। सरकारी नलकूप नहीं है।

जबकि जीरादेई के लोगों ने जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए 1974 के छात्र-आंदोलन में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। उन लोगों में मैं भी था। जेपी 19 दिसंबर 1974 को यहां आए और दो दिन रुके थे। बाद में 41 लोगों के साथ मेरी गिरफ्तारी हो गई। मैं 1 जून 1975 से 9 जनवरी 77 तक बिहार के विभिन्न जेलों में रहा। आज भी मैं जेपी के आदर्शों के अनुरुप दल-विहिन राजनीति में सक्रिय हूं। प्रधानमंत्री ने 11 अक्टूबर 2014 को जयप्रकाश जयंती पर यह घोषणा किया था कि हर सांसद अपने क्षेत्र के एक गांव को गोद लेकर उसे आदर्श गांव बनाने का प्रयास करेगा। उसी क्रम में स्थानीय सांसद ओम प्रकाश यादव ने जीरादेई को गोद लिया था। लेकिन उनका कार्यकाल बीत गया, गांव में कोई विकास कार्य नहीं हुआ। सांसद आदर्श ग्राम योजना किस तरह फ्लॉप रही, उसका गवाह यह गांव भी रहा।

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