बर्बाद गांव फिर हुआ आबाद…

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आशा शैली
गांव से मतलब वह क्षेत्र है जहां मेहनती लोग बसते हों, खेती हो, हरियाली हो, पेड़-पौधे हों, अन्न और फल हों। गाय-भैंस हों, दूध-घी हो। पक्षियों की चहचहाहट हो। खुले बहते झरने-नदियां हों। खुला आकाश हो, साफ हवा हो। जानवरों के लिए चारागाह हो। यानी मनुष्य ही नहीं, प्राणी मात्र के लिए जीने के साधन हों, जहां जाकर मन को आनन्द मिले वह स्थान गांव है। शहर तो बाद की बात हैं और प्रगति के प्रमाण हैं। परन्तु जीवित रहने के लिए हर एक शहर को इन्हीं गांवों पर निर्भर रहना होता है शायद इसीलिए गांवों को भारत की आत्मा कहा गया है। विदेशों का मुझे पता नहीं, पर अन्न और जल तो वहां भी खेतों से ही मिलता है, धरती से मिलता है। प्रत्येक जीव को उदरपूर्ति के लिए इन्हीं गांवों की ओर देखना पड़ता है, इस हिसाब से कहा जाए तो गांव सृष्टि के प्राण हैं। सभ्यता के आदिकाल से ही गांव नगरों की आवश्यकताओं की आपूर्ति करते रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के बालक ही पढ़-लिखकर नगरों की प्रगति में योगदान देते हैं। इसप्रकार दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं। जहां अन्न-दूध और दूसरी बहुत सी चीजें हम गांवों से लेते हैं वहीं मिलों और उद्योगों के लिए कच्चा माल देकर शहरों से वस्त्र और दूसरी बहुत-सी वस्तुएं लेते हैं। ऐसे में गांव को देश की आत्मा कहना कुछ भी गलत नहीं है।

मेरी तो आत्मा ही तो गांव में बसती है। गांव में पली-बढ़ी होने से गांव मुझे बचपन से ही बेहद पसन्द हैं। इसीलिए विवाह के बाद मेरी हठ के कारण मेरे पति को गांव में जमीन खरीदनी पड़ी, भले ही उनकी नौकरी के कारण मुझे जमीन की देखभाल के लिए अकेले गांव में रहना पड़ा। तब तक शिमला जिला नहीं बना था। उस समय यह जिला महासू कहलाता था। रामपुर बुशहर से साढ़े सोलह किलोमीटर की दूरी पर सड़क के किनारे इस क्षेत्र की जमीन बंजर और चट्टानी थी। गांव का नाम गौरा था। आने-जाने के साधन भी नहीं थे। एक खच्चर मार्ग अवश्य था। कहा जाता है कि महाराजा रणजीत सिंह के सैनिकों ने अपनी सुविधा के लिए उसे बनाया था। इसका नाम हिमाचल तिब्बत मार्ग था। इसी मार्ग से महापंडित राहुल सांकृतायन ने तीन बार तिब्बत तक की यात्रा की थी, जिसका वर्णन उनके यात्रा वृतांतों में मिलता है। मैंने उनके यात्रा विवरण में गौरा ग्राम का नाम और गांव में वे जिन लोगों से मिले उनके भी नाम पढ़े हैं। गांव के बुजुर्गों से सुना है कि विश्व विख्यात लवी मेला भी किसी समय इसी सड़क पर लगता था।

वर्तमान भारत-तिब्बत मार्ग का तो सूत्रपात 1953 के बाद हुआ है। मेरे पति ने बताया था कि वे भी कमर में रस्सी बांधकर छोटी कुदाली से पहाड़ पर उन स्थानों पर निशान लगाने जाते थे जहां पर खुदाई के निर्देश मिलते थे और मात्र पांव टिकाने भर का स्थान होता था। आवागमन का एकमात्र साधन होने से यह सड़क मार्ग बहुत महत्व रखता था और इसी सड़क के किनारे पर बसा था यह गौरा गांव, जहां हमने जमीन खरीदी थी। यह गांव बुशहर रियासत में आता है। गांव का नाम गौरा क्यों पड़ा, इसके पीछे कहानी बताई जाती है। कहा जाता है कि राजा वीरभद्र सिंह के पिता महाराजा पद्मसिंह के समय में एकबार इस इलाके में हैजा महामारी की तरह फैल गया और जब वह किसी तरह काबू में नहीं आया तो रियासत की रानी ने अपने मायके ‘मण्डी’ की आराध्या गौरा देवी की मूर्ति लाकर उसकी स्थापना की। कहा जाता है कि उसके बाद महामारी समाप्त हो गई, तभी से गांव का नाम गौरा पड़ गया। रियासतों का समय समाप्त हो गया। पर आज के दौर में भी किन्नौर के लोग भेड़-बकरी की रेवड़ लेकर शीतकाल में मैदानों की ओर जाते हैं। हालांकि अब उनकी संख्या कम होती हैं पर वे रात-दिन चलते हैं और रात को कहीं भी डेरा लगा लेते हैं। कभी-कभी सड़क की खुदाई में वहां कुछ पुराने बर्तन भी मिले हैं जो हो सकता है कि चट्टानें खिसकने से कोई डेरा दब गया हो और वह उसका दबा हुआ सामान हो।

पहाड़ में लोग बेघर नहीं होते, क्योंकि कुछ सुविधाएं सरकार की ओर से उन दिनों भी उपलब्ध थीं। मकान बनाने की लकड़ी सरकार बहुत कम कीमत पर जंगल से चील और रई-तूष के पेड़ देती थी। गरीब से गरीब किसान अपने खेत से या जंगल से पत्थर लेकर अपने आप चिनाई करके अपने रहने की व्यवस्था अवश्य कर लेता था। उन दिनों छत के लिए भी पत्थर-स्लेट का उपयोग किया जाता था जिस पर कोई पैसा नहीं लगता था। थोड़े-थोड़े पत्थर इकट्ठे करते हुए किसान अपने गुजारे लायक घर बना लेता था।

हिमाचल के गांव ही नहीं, किसी भी पहाड़ी प्रदेश में गांवों की कृषि व्यवस्था वर्षा पर निर्भर होती है। सिंचाई की व्यवस्था न होने के कारण पहाड़ों का खेतिहर अक्सर अभावों से जूझता है। कभी अति वर्षा के कारण फसलें नष्ट हो जाती हैं तो कभी अनावृष्टि और कभी ओलावृष्टि भी झेलनी पड़ जाती है। अन्न की पैदावार वर्षा पर निर्भर होने और अभावों में रहने के कारण मेरे गांव के किसान घीरे-धीरे बागवानी की ओर बढ़ रहे थे। लोगों ने विषम पथरीली जमीनों पर सेब, खुबानी, आड़ू, बादाम, नाशपाती, चेरी जैसे फलों के पेड़ लगाए। फल उत्पादन चूंकि अच्छा परिणाम दे रहा था। इसलिए कुछ ही समय में पूरा का पूरा क्षेत्र ही बागवानी पर आधारित हो गया और आत्मनिर्भर भी हो गया।
बागवानी ने चमत्कार किया था। थोड़ी-सी जगह होने पर भी लोगों ने जितने हो सके सेब के पेड़ लगाए। गरीब किसान को रोजगार के नए अवसर उपलब्ध हुए। इसने क्षेत्र का कायाकल्प कर दिया। सेब के बाग में बारहों महीने काम रहता है। पेड़ों की देख-भाल के लिए दक्ष मालियों की आवश्यकता, फल तोड़ने से लेकर पेटियों में बंद करने और फिर बाजार में भेजने तक ढेरों काम कोई बाग का मालिक अकेले नहीं कर सकता।

यहां की अर्थ व्यवस्था नेपाल तक जुड़ गई। मीलों तक फैले सेबों के बाग हिमाचल से नेपाल तक लोगों के पेट भर रहे थे। जिधर देखो गोरखा मजदूर दिखाई देते। यहां तक तो सब ठीक था। इस पट्टी का सेब अपने विशिष्ट स्वाद के कारण पहचाना जाने लगा था। गांव-गांव तक बिजली-पानी और सड़कें पहुंच गई थीं। तब तक परिवहन निगम की बसें भी चलने लग गई थीं और टेलीफोन की सुविधा से भी गांव जुड़ गया था। इसी समय यहां नाथपा-झाखड़ी जल-विद्युत परियोजना का पदार्पण हुआ और गांव की बरबादी का अध्याय लिखा जाने लगा।

बाद में यह परियोजना संजय विद्युत परियोजना नाम से विख्यात हुई परन्तु नाथपा गांव से प्रारम्भ करके झाखड़ी गांव में समाप्त होने के कारण इस योजना का नाम नाथपा-झाखड़ी परियोजना ही प्रचलित हुआ। यह योजना पूरी तरह पहाड़ को काटकर भीतर ही भीतर बनाई गई बरसों चलने वाली परियोजना थी। जाहिर था कि इस परियोजना के लिए रोड़ी-बजरी भी लगनी ही थी। कहा जाता था कि यह एशिया की सबसे बड़ी परियोजना है। भारी मात्रा निर्माण सामग्री की आवश्यकता थी। इसी निर्माण सामग्री की आपूर्ति के लिए गांव के ठीक सामने की एक निर्जन और पथरीली पहाड़ी खनन के लिए स्वीकृत हुई थी। उस पर भारी मात्रा में बारूदी विस्फोट होने लगे। यह बात सन 1980 के आस-पास की है। दिन भर पहाड़ के सीने में अनगिनत छिद्र बनाए जाते और ठीक शाम पांच बजे धमाके शुरू हो जाते। पता यह चला कि प्रतिदिन दस हजार रुपए मूल्य का बारूद इन धमाकों में काम में लाया जाता था। उस जमाने में दस हजार रुपए का क्या मूल्य होता था, यह तो आप जानते ही हैं। इतने अधिक बारूद के एक साथ विस्फोट के कारण पूरी घटी झूले की तरह हिलने लगती थी। पत्थर दूर-दूर तक उड़कर जाते।

हमारा गांव तोड़ी जाने वाली पहाड़ी के सबसे निकट था, परन्तु बात उसी गांव तक नहीं रही, बीसियों गांव चपेट में आ रहे थे। संध्या पांच बजते ही लगता जैसे भूकम्प आ गया हो। मेरी कई तस्वीरें झटके के कारण शैल्फ पर से गिरकर टूट गई थीं। धीरे-धीरे बारूद की धूल के कारण विषाक्त घास-पत्ती और पानी के प्रयोग से पशु-पक्षी मरने लगे। घरों में दरारें पड़ गईं जो हर शाम कुछ और गहरी हो जातीं। कुछ कमजोर घर टूट-बिखर भी गए। गरीब बेघर होने लगे। प्रदूषण के कारण वर्षा प्रभावित हुई और बहुत कम होने लगी तो सेब उद्योग पर भी इसका प्रभाव पड़ना अवश्यम्भावी था। प्रतिदिन के भूकम्प और अनावृष्टि से पेड़ सूखने लगे, सेब उद्योग, खेती और पशुपालन से जुड़े लोग बेरोजगार होने लगे। पूरे क्षेत्र में हाहाकार मच गया। जनता के प्रतिनिधि मण्डल सरकार पर दबाव बनाने लगे, लेकिन अरबों-खरबों की जल-विद्युत योजना बंद तो नहीं की जा सकती थी। इसलिए जनता को मुआवजा देने की बात होने लगी। संघर्ष लम्बा चला और अंततः जनता को बहलाने के लिए बहुत थोड़ी मात्रा में घनराशि सहायतार्थ दी गई। वह भी अधिकतर क्षेत्र के नेताओं और प्रभावशाली लोगों में वितरित हुई। बेघर निर्धन किसान को पांच-दस हजार लेकर संतोष करना पड़ा। ऐसे समय में हम या हमारे बच्चे गिरमिटिया नहीं बनते तो क्या करते? पलायन के अतिरिक्त हमारे पास क्या चारा था? सड़कें, बिजली और टैलीफोन हमें रोटी नहीं दे सकते थे।

उस समय खण्ड विकास कार्यालयों की बड़ी भूमिका रही। इन विकास खण्डों ने गांव के किसानों की महिला मण्डलों और युवक मण्डलों के माध्यम से बहुत सहायता की। मैं उन दिनों गौरा महिला मण्डल की अध्यक्ष थी। विकास खण्ड से हमें सब्जियों के बीज, खाद और कीटाणु नाशक बिना मूल्य के मिलते रहते थे जो महिलाओं में बांट दिए जाते। जिनसे कुछ सहारा तो अवश्य मिलता था लेकिन बिना पानी के सब्जियां भी कैसे उगाते, गांव के जलस्रोत भी सूखने लगे थे। धीरे-धीरे सारे बाग सूख गए और जल-विद्युत परियोजना पूरी हो गई। पहाड़ तोड़ना बंद हो गया है। अब न तो वहां धमाके हैं न भूकम्प। लोगों ने फिर से बाग लगाए, अब फिर वर्षा होने लगी है, बर्फ पड़ने लगी है, इलाका फिर हरा-भरा हो गया है।


मैं अब भी गिरमिटिया हूँ। पर खुश हूं कि मेरा गांव हरा-भरा है, सरकार क्या करेगी? वह तो नेताओं और गणमान्यों की जेब में पड़ी होती है। ऐसे में यदि आम किसान के काम कोई आता है तो वह स्वयंसेवी संस्थाए आती हैं या किसान का अपना विवेक, हिम्मत और श्रम। मेरा मानना है कि किसान इन तीन पर भरोसा करे तो उसे सरकारी अनुदान की आवश्यकता ही नहीं है।
जानी मानी लेखिका व संपादक, शैलसूत्र।

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