सुरेंद्र किशोर
मेरा गांव बदल रहा है, बल्कि बहुत कुछ बदल चुका है। बदलाव जारी है। अभी और भी बदलेगा। वैसे तो देश के अन्य गांव भी बदले हैं, पर मेरे गांव के बदलाव की गति थोड़ी तेज है। मुख्य कारण है कि मेरे गांव में एक बाजार उभर आया है। हालांकि गांव अभी ‘बाजारू’ नहीं बना है।
बिहार के सारण जिले के दरियापुर अंचल के भरहापुर गांव में अब एक देहाती बाजार भी है। बगल के खानपुर गांव की जमीन पर भी बाजार है। खानपुर और भरहापुर आपस में सटे हुए गांव हैं। दोनों गावों की जमीन पर बाजार बस रहा है। देखते-देखते बीस-तीस साल में बाजार बड़ा हो गया। अभी विस्तार जारी है। कोई इसे खानपुर बाजार कहता है तो कोई भरहापुर बाजार। दरअसल बाजार में भरहापुर के लोगों की जमीन अधिक लगी है, पर बाजार को विकसित करने में खानपुर के लोगों का योगदान अपेक्षाकृत अधिक है। दुकानें खानपुर के लोगों की अधिक हैं। खानपुर में हाई स्कूल भी है।
दिघवारा-भेल्दी सड़क पर स्थित खानपुर हाई स्कूल के कारण यह जगह पहले से चर्चित रही है। बाजार बस जाने के कारण इसका महत्व और भी बढ़ गया। बाजार ने गांव की आर्थिकी जरूर बदली है, पर ग्रामीण संस्कृति अब भी मौजूद है। लोगों का मुख्य पेशा अब भी खेती ही है। हालांकि खेती का स्वरूप भी बदला है। पहले लोग आमतौर मोटा अनाज बोते-काटते थे। अब कई तरह के अनाजों के साथ ही हरी सब्जी की भी खेती होने लगी है। अपने प्रयास से किसानों ने सिंचाई के लिए नलकूप लगाए हैं। मेरे गांव की हरी सब्जियां ट्रकों में लद कर दूर-दूर के शहरों में जाती हैं। जिनके घर में कोई नौकरी पेशा नहीं है, उनके यहां नकदी सब्जियों के कारण आती है।

मैंने बचपन में देखा था कि एक दियासलाई खरीदने के लिए छोटे बच्चों के हाथ मकई के दो-तीन ‘बाल’ दुकान पर भेज दिए जाते थे। चीनी या गुड़ की जरूरत हो तो एक-दो सेर अनाज भेजा जाता था। गरीब परिवार की महिलाएं पड़ोस से आग मांग कर अपने यहां चूल्हा जलाती थी। अब सबके पास दियासलाई खरीदने के लिए पैसे हैं। सबके पास नकदी है।
साठ के दशक में मेरे गांव के एक गरीब बाबूसाहब मुकदमा लड़ रहे थे। उनके पास छपरा कचहरी जाने के लिए ट्रेन किराया नहीं होता था। वे सुबह में पैदल ही छपरा के लिए चल देते थे। मेरे गांव से छपरा करीब 21 मील पर है। पर अब ऐसी गरीबी नहीं है। अब तो अनुसूचित जाति का व्यक्ति भी मुकदमे के खर्चे के लिए चिंता नहीं करता।
पहले मेरे छोटे गांव के दो-तीन लोग ही बाहर जाकर नौकरी करते थे। बाद के वर्षों में पहलेजा घाट के पास के कुछ कटाव पीड़ित परिवार मेरे गांव में आकर बस गए। उनमें पढ़े-लिखे लोग अधिक हैं। उनमें से एक संयुक्त परिवार के एक व्यक्ति कनाडा और दूसरे अमेरिका में बस गए। कुछ अन्य परिवारों ने भी समय के साथ शिक्षा के महत्व को समझा और उनके घरों के कई लोग अब अच्छी नौकरियों में हैं। अधिकतर लोगों के आर्थिक संकट काफी कम हुए हैं।
बरसाती नदी के किनारे बसा भरहापुर गांव आजादी से पूर्व देश के एक सामान्य गांव की तरह ही अविकसित था। आजादी के बाद के कुछ दशकों में कुछ नहीं बदला था। साठ के दशक में एक चुनाव से पहले राज्य सरकार ने बिजली के खम्भे जरूर गिराए थे, पर उन पर न तो तार डाले गये और न ही बिजली आई। मेरे गांव में बिजली तो नीतीश कुमार के शासन काल में ही पहुंच सकी। उससे पहले दिघवारा-भेल्दी कच्ची सड़क को पक्की बनाया जा चुका था, प्रधान मंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत। दो साल पहले उस सड़क को स्टेट हाईवे में परिणत कर दिया गया। इस चैड़ी सड़क ने मेरे गांव और बाजार का आकर्षण बढ़ा दिया है। आवागमन के साधन बढे़ हैं।
यह सुविधा मेरे छात्र जीवन में होती तो मैं आॅटो रिक्शा से पढ़ने के लिए दिघवारा जाया करता। पर तब तो पैदल ही एक तरफ से चार किलोमीटर की यात्रा होती थी। दोनों तरफ से आठ किलोमीटर। वह भी धूलभरी सड़क पर। बरसात में तो भारी दिक्कत। आजादी के समय मेरे गांव के अधिकतर लोग खेती पर निर्भर थे। इक्के-दुक्के लोग ही कलकत्ता जाकर नौकरी करते थे। पढ़े-लिखे भी इक्के-दुक्के ही थे। सिंचाई का कोई पक्का प्रबंध नहीं था। खेती वर्षा पर निर्भर थी। लोग सालों भर खाने लायक मोटा अन्न उपजा लेते थे। लोग बैलों से खेत जोतते थे। पर जब खेती का समय नहीं होता तो कुछ लोग अपनी बैल गाडियां भाड़े पर चलाते थे। उन बैल गाड़ियों पर लाद कर ‘साव जी’ गांव के लिए तिरहुत से चावल लाते थे। इससे कुछ नकदी मिल जाती थी।
बैलगाड़ी के मामले में खानपुर के एक व्यक्ति ने आगे की सोची। उन्होंने लकड़ी के चक्के की जगह टायर गाड़ी खरीदी। उस टायर गाड़ी को भाड़े के रूप में अधिक पैसे मिलते थे। यानी प्रति दिन 25 रुपए। इस तरह उस व्यक्ति की आय इलाके में सबसे अधिक हो गयी। उस समय 25 रुपए का बड़ा महत्व था। बाद में उसने आटा चक्की बैठा ली। वह बाजार बनाने की शुरूआत थी। उन्हीं दिनों एक होमियोपैथ डाक्टर भी आए, उन्हें भी इस बाजार का ‘आदि पुरूष’ कहा जा सकता है।
आटा चक्की बैठाने वाले व्यक्ति का व्यापार बढ़ता चला गया। यह उसकी मेहनत और विनम्रता के कारण हुआ। सब्जी मंडी लगवाने का श्रेय भी उसी व्यक्ति को है। धीरे-धीरे खानपुर सह भरहापुर बाजार में पक्के मकानों में दुकानें सजने लगीं। अब वह व्यक्ति इलाके के संपन्न लोगों में है। अब बाजार में भी दुकानों की संख्या करीब सौ है।
मेरे गांव और आसपास के अधिकतर लोग खेती के अलावा अन्य साधनों से भी कुछ पैसे कमा रहे हैं। वे उन पैसों में से कुछ पैसे खेती में भी लगाते हैं। जिन किसानों के पास अब भी अतिरिक्त आय के साधन नहीं हैं, उनकी खेती ठीक से नहीं हो पा रही है। खेती अब मुनाफे का सौदा तो है नहीं। एकाध लोग तो खाने-पीने भर ही खेती करते हैं। उनकी भी बाकी जमीन खाली ही रहती है क्योंकि अधिक खेती यानी अधिक घाटा। जिस व्यक्ति के परिवार में अतिरिक्त आय नहीं है, वह अपने बाल-बच्चों को खेती के काम से अलग करके व गांव से बाहर भेज कर उनसे कोई दूसरा काम करवाना चाहते हैं। करवा भी रहे हैं।
वैसे मेरे गांव के बाजार में दुकानें खोल कर कुछ पैसे कमा लेने की प्रवृत्ति अभी सभी जातियों में नहीं है। लगता है कि सवर्ण जातियों को व्यवसाय अपनाने में अभी थोड़ा और समय लगेगा। हालांकि बाजार की अधिकांश जमीन सवर्णों की ही रही है। यदि उनमें ऐसी झिझक नहीं होती तो हमारे गांव के बाजार का और भी तेजी से विकास होता। सवर्णों के अनेक नौजवान देश के बड़े शहरों में जाकर कुछ कमा रहे हैं और गांव स्थित परिवार को कुछ पैसे दे भी रहे हैं। कुछ अन्य लोग गांव में ही रह कर आॅटो, जीप आदि भाड़े पर चला कर कमा रहे हैं। पचास-साठ के दशक वाली स्थिति अब नहीं है। लोगों के पास पैसे आ रहे हैं। जिस गांव के लोग कभी साइकिल के लिए तरस रहे थे, वहां के अनेक नौजवानों के पास अब स्मार्ट फोन हैं। गैस के चूल्हे हैं। अनेक चैनलों के साथ टी.वी. तो घर-घर है।
अखबार पढ़ने की प्रवृत्ति बढ़ी है। लोग राजनीतिक गतिविधियों की सटीक व विस्तार से जानकारी रखते हैं। साठ के दशक तक मेरे गांव में कोई अखबार नहीं पढ़ता था। गांव में सत्तर के दशक में पढ़ने-लिखने वालों की संख्या बढ़ी तो वे चार किलोमीटर दूर स्थित मुख्य बाजार दिघवारा से अखबार खरीद कर लाने लगे थे। अब तो हाॅकर गांव के घर-घर अखबार पहुंचा देता है।
पटना के पास के दानापुर और दिघवारा के बीच गंगा नदी पर एक बड़ा पुल प्रस्तावित है। मंजूरी के लिए केंद्र सरकार के पास लंबित है। यदि उसका निर्माण संभव हो सका तब तो हमारे गांव को देर-सवेर पटना महानगर का हिस्सा बनने से कोई रोक नहीं सकता। अब तो मेरे गांव व आसपास के इलाके का कुछ और विकास हुआ है। मेरे गांव से गुजरने वाली सड़क अब नेशनल हाईवे मंजूर हो गई है। यह दिघवारा-रक्सौल एन एच सड़क होगी। यह सड़क पटना से प्रस्तावित 6 लेन शेरपुर-दिघवारा गंगा ब्रिज से जुड़ जाएगी। इस गंगा पुल के भी बन जाने के बाद हमारा इलाका ‘बिहार का नोयडा’ बन सकता है। इस इलाके के बारे में मुख्य मंत्री नीतीश कुमार भी कह चुके हैं कि दिघवारा से नया गांव का यह इलाका ‘न्यू पटना’ होगा। याद रहे कि बिहार में हाल के वर्षों में सड़क और बिजली के क्षेत्र में अच्छा काम हुआ है।
हां, दो बातों की कमी जरूर खलती है। गांव में पहले जैसा आपसी सद्भाव नहीं है। दूसरी बात यह भी है कि भले बिहार में अब ‘जंगल राज’ नहीं है, पर कानून-व्यवस्था को बेहतर करने की गुंजाइश बनी हुई है।
रोचक प्रसंग
पितृपक्ष में माता-पिता की याद
आप इसे मेरा अंध विश्वास मान सकते हैं।
पर,यह तो मेरे साथ घटित हुआ है !
जब तक मेरे परिवार ने गया में पिंडदान नहीं किया,तब तक मेरे बाबू जी अक्सर मेरे सपनों में आते थे। पिंडदान के बाद नहीं आते।
गया का बहुत महत्व है। बताते हैं कि राम-सीता ने अपने पूर्वज की आत्मा की शांति के लिए गंया में पिंडदान किया था।
खैर, इस अवसर पर कुछ दूसरी बातें भी।
मैंने इसके साथ लगे अपने माता-पिता के चित्र के साथ उस समय का अपना एक छोटा फोटो भी दिया है। यह तब का है जब मैंने प्रथम श्रेणी में मैट्रिक पास किया था। उस पर बाबू जी मुझसे बहुत खुश थे।
बाबू जी मुझे जूनियर इंजीनियर बनाना चाहते थे। पर मेरी लाइन अलग थी।इसलिए बाद में मुझसे निराश हुए।
उनकी इच्छा के अनुसार मेरे छोटे भाई नागेंद्र ने पटना विश्व विद्यालय के लाॅॅ कालेज से कानून की डिग्री ली।
बड़े भाई को मुजफ्फरपुर में पृथ्वीनाथ त्रिपाठी के घर रखकर पढ़ाने की कोशिश की,पर उनके लगातार अस्वस्थ रहने के कारण उनकी पढ़ाई अधूरी रह गई।
त्रिपाठी जी बहुत ही अच्छे शिक्षक थे। बी.बी.कालेजिएट स्कूल के प्राचार्य थे।
मेरे ही गांव के थे। मेरे बाबू जी के देास्त थे। यानी अपनी संतान को शिक्षित बनाने की एक किसान की तीव्र इच्छा देखिए। अपनी जमीन बेच कर शिक्षा पर खर्च किया। आने वाले जमाने का उन्हें पूर्वानुमान था। जमींदारी जा चुकी थी।समय बदल रहा था। आजाद भारत में शिक्षा का महत्व बढ़ा रहा था।

बाबू जी लंबे-चौड़े कसरती शरीर के स्वामी थे।बातचीत में दबंग थे। लघुत्तम जमींदार थे। एक बड़े जमींदार के तहसीलदार भी थे। उनका जन्म 1898 और निधन 1986 में हुआ। मेरे जन्म के समय बाबू जी 22 बीघा जमीन के मालिक थे। स्कूल में पढ़ने लगा तो देखा कि घर में दो नौकर,दो गाय,दो या तीन बैल ,एक भैंस रहते थे। सघन आबादी वाले सारण जिले में इतनी जमीन-जायदाद होने पर हमारे आसपास के गांवों के अन्य किसान संतुष्ट थे। खेत बेच कर अपने बच्चों को पढ़ाने के बारे में उन लोगों ने सोचा भी नहीं। उल्टे वे मेरे बाबू जी के इस काम को अदूरदर्शी मानते थे। पर,अब जब कभी गांव जाता हूं तो देखता हूं कि हमारे बराबर जमीन के मालिक की हम उम्र संतान आज भी किसानी करती है और अच्छी हालत में नहीं हैं।
एक बार मेरे एक स्कूल सहपाठी गया राय ने कहा कि तू लोग त पहले भी जमींदार थे और पढ़ाई -लिखाई के कारण अब भी जमींदार हो।
इस तुलनात्मक अध्ययन से लगता है कि मेरे बाबू जी कितने दूरदर्शी थे। यदि वैसा नहीं होते तो हम भी आज गांव में किसानी ही कर रहे होते। किसानी की हालत यह है कि हमारे सामूहिक परिवार का एक सदस्य यानी मेरा भतीजा जो गांव पर रहता है,वह सारी जमीन में खेती नहीं कर पाता।क्योंकि अधिक खेती यानी अधिक घाटा। अब भी हमारे संयुक्त परिवार के पास बेच-बाच कर दस-ग्यारह बीघा जमीन बची है। पर जो हैं,सब पक्की सड़क पर है। यानी बाबू जी की अन्य बातों के साथ-साथ शिक्षा के प्रति उनकी तीव्र लालसा की याद आती है।
इस कहानी का मोरल यह है कि अभिभावकों को चाहिए कि वे तकलीफ उठाकर भी अपने बच्चों को शिक्षित जरुर करें।
(वरिष्ठ पत्रकार, जनसत्ता, हिन्दुस्तान व अन्य, पटना।)