दिल्ली महानगर में गांव की अंर्तकथा

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सुशील कुमार
अरावली की गोद में डेरा गांव

दक्षिणी दिल्ली के आखिरी छोर पर तीन ओर से अरावली की पहाड़ियों से घिरा है डेरा गांव। भीड़-भाड़ से दूर, आलीशान महलों की चकाचौंध से बिल्कुल अलग-थलग और नीले आसमान तले खुली हवा में सांस लेते इस गांव के लोग आज भी पुरानी ग्रामीण संस्कृति से सरोकार रखते हैं। गांव में किसी के घर आप जाएं, पहले बेंत की बनी कुर्सी या रस्सी से बिने खाट पर बैठने का आग्रह होगा, फिर गिलास में घड़े का ठंडा पानी आएगा। उसके बाद नाम, पता-ठिकाना और काम की बात। बताते हैं कि पहाड़ और जंगल से घिरे इस गांव में कई ऋषियों ने अपना डेरा (आश्रम) बना रखा था। इसलिए इसे डेरा गांव कहते हैं।
गांव वाले बताते हैं कि पन्द्रहवीं शताब्दी में फतेहपुर बेरी से आकर अजीत तंवर यहां बसे थे और हमलोग उन्हीं की संतान हैं। गांव के पास तुगलक शासन के वजीर का बनवाया हौद और मंदिर आज भी है। हालांकि यह हौद अब सूखा रहता है। इस हौद को गांव वाले जीर का खोद या हौद भी कहते हैं। अब अधिकतर घरों में ट्यूबवेल है, इसलिए हौद की जरुरत नहीं रही।
दस से पन्द्रह हजार आबादी वाले इस गांव में गाय-भैंस पालने की संस्कृति आज भी है। 25 से 30 प्रतिशत घरों में आज भी घर के दलान पर गाय-भैंस रखना गर्व की बात समझी जाती है। गांव के अंदर मांस-मछली की कोई दुकान नहीं है। हुक्का खूब प्रचलित है। धोती पहने और पगड़ी बांधे गांव के बुजुर्ग उदाहरणों के साथ बताते हैं कि जिस हुक्का को डॉक्टर बुरा बताते हैं, उस हुक्का के अनेक फायदे हैं। गांव वालों के लिए हुक्का माथे के दर्द से लेकर कैंसर जैसे बड़ी बीमारी का भी इलाज है। यह गांव मूल तौर पर गुर्जर बहुल है, लेकिन हरिजनों की आबादी भी उल्लेखनीय है। गांव के प्रधान रहे संतराम तंवर बताते हैं कि गांव में तीन चौपाल गुर्जरों का है और एक चौपाल हरिजन का।

चौड़ी सड़कों के बीच करीब 50 एकड़ में फैले इस गांव में अमूमन पुरानी डिजायन के घर हैं। आसमान चूमती आलीशान महल एक भी नहीं, ज्यादातर घर एक तले के हैं। हालांकि दो तले वाले मकान भी बने है। आय का कोई बड़ा साधन नहीं है। बच्चे फार्म हाउस में खेती-बारी करते हैं। गांव में किराएदारों की कोई भीड़ नहीं। दो रुम का फ्लैट ज्यादा से ज्यादा दो हजार रुपए में आसानी से मिल जाता है। विकास के नाम पर इस गांव ने बारहवीं तक का सरकारी स्कूल, मिनी स्टेडियम, सरकारी बस का रुट नंबर 516 और पंजाब नेशनल बैंक की एक शाखा और एटीएम तक का सफर तय कर लिया है। नर्सरी एक बड़े कारोबार के तौर पर विकसित हो रहा है।
मिहिरावली से महरौली तक
दक्षिणी दिल्ली में कुतुबमीनार की चारदिवारी से सटे पश्चिमी छोर पर बसा गांव जिसने साढ़े ग्यारह सौ वर्ष पहले शक्तिशाली राजा मिहिरभोज के समय में मिहिरावली के नाम से अपनी यात्रा की शुरुआत की। आज भी ग्यारहवीं शताब्दी के लालकोट किला और तेरहवीं शताब्दी के कुतुब मीनार के बीच अपनी मध्ययुगीन पहचान को बचाए हुए है। भारतीय इस्लामिक शैली की वास्तुकला को दिल्ली के दूसरे गांवों की तुलना में मेहरौली में ज्यादा स्पष्ट तरीके से देखा जा सकता है। कहते हैं तेरहवीं शताब्दी में इल्तुतमिश के समय मध्य एशिया से आने वाले सूफी संत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के दरगाह के आसपास ही मेहरौली गांव आबाद हुआ था। गांव का केंद्रविंदु दरगाह ही रहा। मुस्लिम शासकों की अंतिम चाहत इस दरगाह के आस-पास दफन होने की होती थी। गांव वाले बताते हैं कि कुतुबमीनार भी इल्तुतमिश ने बाबा की याद में बनवाया था।
बताते हैं कि तोमर राजा अनंगपाल द्वितीय के समय इसका नाम योगिनीपुर रहा और तेरहवीं शताब्दी में सूफी-औलियाओं के आगमन के बाद मिहिरावली घिसकर मेहरौली बन गया और आज पूरी दुनिया इसी नाम से जानती है। इतिहास की परछांई पूरे महरौली में चप्पे-चप्पे पर मौजूद है। इतिहास के विभिन्न दौर में दरगाह, मीनार, मस्जिद, मकबरे, मंदिर, गुरुद्वारा सबने अपने-अपने हिसाब से जगह बनाई। लोग बताते हैं कि आज भले ही दरगाह, मीनार और मकबरों की भरमार है लेकिन शुरूआती दौर में हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म के 27 मंदिर यहां मौजूद थे और बाद में तुर्कों ने इन मंदिरों को तोड़कर मीनार और मकबरे बना डाले और इसी दौरान दिल्ली में पहली मस्जिद कुव्वत उल इस्लाम (जामी मस्जिद) का निर्माण हुआ। हालांकि तोमर राजा अनंगपाल द्वारा बनाया हुआ योगमाया मंदिर और बारहवीं शताब्दी के जैन संत मणिधारी जिनचंद्र सूरी की दादाबारी जैन मंदिर आज भी मौजूद है। आज का तथ्य यह भी है कि योगमाया मंदिर में मुसलमान पंखा झुलाते हैं और सूफी औलिया बख्तियार काकी की दरगाह पर हिंदू चादर चढ़ाते हैं ।

लगभग एक लाख की आबादी वाले इस गांव को शहर बनाने के लिए तरह-तरह से सरकारी प्रयास किए गए, लेकिन गांव की संस्कृति ने इन प्रयासों के बावजूद शहरों के आधुनिक तौर-तरीकों को स्वीकार नहीं किया। दिल्ली के अन्य गांवों में हाट-बाजार की ग्रामीण संस्कृति भले ही आधुनिकता के अंधे दौर में विलुप्त हो गई, लेकिन मेहरौली आज भी अपने मध्ययुगीन हाट-बाजार की ग्रामीण संस्कृति में जी रहा है। आधुनिक तरीके की आलीशान इमारतें, विभिन्न ब्रांडों के शोरुम, बड़े-बड़े मार्केट और माॅल की आधुनिक संस्कृति यहां नहीं आ सकी है और चौड़ी सड़क के नाम पर महज 10 से 12 फीट की सड़कें हैं। दक्षिणी दिल्ली का शायद ही कोई ऐसा गांव होगा, जहां के लोग अपनी जरूरतों के सामान खरीदने के लिए मेहरौली के हाट-बाजार में नहीं आते हों। गांव में दो से चार फीट की संकरी गलियों में दुकानें हैं। इन गलियों को दूध वाली गली, साड़ी वाली गली, चूड़ी वाली गली, मिठाई वाली गली, घोड़े वाली गली, चूने वाली गली के तौर पर पहचाना जाता है। इन गलियों में पत्थरों से बने ऐतिहासिक किलों और इमारतों के अंदर सजी छोटी-छोटी दुकानें मेहरौली की ग्रामीण संस्कृति की सुंदरता को बयां करती है।
दक्षिणी दिल्ली का सबसे बड़ा सब्जी हाट सुबह से शाम तक खुला रहता है। बताते हैं कि राजा मिहिरभोज ने इसी जगह को दिल्ली की राजधानी बनाया था और फिर राजा अनंगपाल ने इसी के आस-पास लालकोट शहर बसाया था और फिर पृथ्वीराज चौहान ने इस गांव को सामरिक लिहाज से अपना नीचला किला बना रखा था। यह गांव अपने आस-पास के इलाके के लिए व्यापारिक केंद्र बना रहा और आज के दौर में भी महरौली में ग्रामीण हाट-बाजार की रौनक बनी हुई है, जो शहर के आधुनिक बाजार से बिल्कुल जुदा है। जाहिर है महरौली शहर होते हुए आज भी गांव है।
दरगाह के पश्चिमी छोर पर स्थित जफर महल को मेहरौली के ऐतिहासिक विरासतों में अव्वल माना जा सकता है जिसे 19 वीं शताब्दी में मुगल शासक अकबरशाह द्वितीय ने बनवाया था और इस महल का प्रवेश द्वार (हाथी दरवाजा) बहादुर शाह जफर द्वितीय ने बनवाया था। मार्बल और लाल पत्थर से बना यह जफरमहल कमल के फूलों की बंगाली नक्काशी का नमूना है। महल के अंदर मेलजोल की संस्कृति को विकसित करने के लिहाज से दलान बनाए गए जहां से एक रास्ता अठारहवीं शताब्दी की मोती मस्जिद की तरफ जाता है। गांव वाले आज भी अपने घर बनाते हैं तो उनकी चाहत होती है कि उनका घर भी जफर महल जैसा दिखे। खासकर दरवाजा हाथी दरवाजे जैसा ही हो।

कुतुबमीनार से मेहरौली की ओर जाने वाली मुख्य सड़क पर 6 फीट उंचा अधम खान के गुंबद को 16 वीं शताब्दी में अकबर ने बनवाया था जिस पर लोधी स्टाइल की छाप साफ दिखाई देती है। अधम खान अकबर की फौज में सेनापति था और उसकी मां महम अंगा अकबर के दरबार में नर्स थी। मां और बेटे को इस गुंबद के अंदर दफनाया गया था। बाद में एक अंग्रेज अधिकारी मिस्टर बेक ने मां-बेटे के कब्र को हटाकर गुंबद को अपना आवास बना लिया था। गांव वाले इसे भूल-भूलैया कहते हैं।
मेहरौली बस डिपो और गंधक की बावली के बीच में एक दूसरा गुंबद चैमची (शम्सुद्दीन) खान का है। देखने में मुगल कम, लोदी कालीन ज्यादा प्रतीत होता है। इसके चारों ओर हर किनारे पर छतरीनुमा गुंबद खड़ा है। गांव वालों को इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। मेहरौली-पालम रोड पर तेरहवीं शताब्दी में निर्मित सुल्तान घरी (नसीरुद्दीन महमूद) का गुंबद है। सुल्तान घरी दिल्ली सल्तनत के दूसरे शासक इल्तुतमिश का बड़ा और सबसे चहेता बेटा था। किसी मान्यता के तहत आसपास के गांवों से लोग हर वृहस्पतिवार को यहां माथा टेकने आते हैं।
ग.पहलवानों का गांव: असोला-फतेहपुर बेरी
दक्षिण दिल्ली में छतरपुर के आसपास के गांवों में खेती और डेयरी का व्यवसाय स्थानीय संस्कृति का हिस्सा रहा है और आर्थिक आधार भी। लेकिन 1980-90 के दौर में अधिकांश लोगों ने अपनी खेती की जमीन फार्म हाउस डेवलपर के हाथों बेच दिया और अब इन गांवों में एक एकड़ जमीन की कीमत 15 करोड़ तक पहुंच गई है। इसतरह खेती-किसानी की संस्कृति लगभग समाप्त हो गई है। फार्म हाउस, पब, माल्स, पीवीआर मल्टीप्लेक्स, बड़े-बड़े शो रुम और सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल की अवधारणा वाले विकास ने ग्रामीण संस्कृति के मिजाज को बाउंसर कल्चर के नजदीक लाकर खड़ा कर दिया है।


पचास हजार की आबादी वाले दो गांवों-असोला और फतेहपुर बेरी में गुज्जर समुदाय की आबादी रहती है जो अपने नाम के आगे तंवर लगाते हैं। महिलाओं में पर्दा का चलन आज भी है। इन गांवों में कसरत की परंपरा प्राचीन काल से रही है। लेकिन अब पहलवानी संस्कृति बदले रूप में मजबूत हो रही है क्योंकि बाउंसर के रूप में रोजगार सहज ही उपलब्ध है। विजय पहलवान कहते हैं कि पंद्रह साल पहले जब मैं मिट्टी के अखाड़े में पहलवानी सीख रहा था, तभी एक पब मालिक ने मुझे दस हजार रुपए दिए और कहा कि कल हमारे यहां विवाह का कार्यक्रम है, वहां आकर तुम्हें सिर्फ खड़े रहना है ताकि आने वाले शरारती लोग डरे रहें। एक दिन के लिए इतनी रकम मिलने के बाद क्या कोई खेती या सरकारी नौकरी करेगा और फिर मैंने उसे ही अपना कैरियर बना लिया। नरेंद्र तंवर उर्फ एम्पल पहलवान कहते हैं कि विकास के इस दौर में जितनी मांग है, उतने पहलवान गांव में हैं नहीं। किसी भी पहलवान के महीने की आमदनी पचास हजार से कम नहीं है, बस शर्त होती है कि डियूटी के समय बैठना नहीं है।


चालीस वर्ष के अक्का पहलवान उर्फ विजय तंवर कहते है कि पूरे एनसीआर में हर बड़ा व्यवसायी हमारे पास आता है क्योंकि हमारे चुस्त-दुरुस्त रहने पर कोई संदेह नहीं और पुलिस पर भरोसा नहीं होता। अपने चुस्त-दुरुस्त शरीर को दिखाने के लिए यहां के नौजवान बड़ी-बड़ी गाड़ियों से ज्यादा बुलेट मोटरसाइकल की सवारी में रुचि लेते हैं। विजय तंवर बताते हैं कि गांव के बच्चे ज्यादा से ज्यादा 12 वीं तक की पढ़ाई कर पाते हैं और चूंकि बचपन से ही कसरत करने में माहिर होते हैं, इसलिए 12 वीं करते-करते एनसीआर में बाउंसर की नौकरी करने लग जाते हैं। रोजगार की कोई समस्या इस गांव में नहीं है। फतेहपुर बेरी के मात्र पचास पहलवान अपने परिवार के सैंकड़ों लोगों का जीवन को चला रहे हैं। इसीलिए पूरे एनसीआर में इन गांवों को पहलवानों का गांव कहते हैं। लेकिन कुलदीप तंवर को मलाल है कि हमारे बच्चे कुर्सी पर बैठने वाली नौकरी नहीं कर पाते।

लाहौर कोर्ट के फैसले से बसा गांव-मुनीरका
दक्षिणी दिल्ली में तीन से चार किमी के दायरे में फैला एक ऐसा गांव है जिसके पूर्वी छोर पर आईआईटी तो दक्षिणी छोर पर जवाहरलाल नेहरू युनिवर्सिटी है और पश्चिमी व उत्तरी छोर पर वसंत विहार और आरके पुरम जैसे पॉश इलाके हैं।
गांव के लोग बताते हैं कि तेरहवीं शताब्दी में इल्तुतमिश और रजिया सुल्तान के दौर में यहां एक सराय बनाया गया था। बाद में पन्द्रहवीं शताब्दी में लोदियों ने सराय सहित ज्वार-बाजरे की खेती वाले इस गांव को अपने एक मनसबदार मुनीर खान पठान को सौंप दिया। जिसे राजस्थान के बहरोड से आए रुद्र सिंह टोकस ने मुनीर खान द्वारा कर्ज न चुकाने पर लाहौर कोर्ट से मुकदमा जीतकर हासिल किया और फिर यह गांव बसता गया। ऐतिहासिक साक्ष्यों के नाम पर गुम्बद, पत्थरों से बनी मस्जिद जिसे स्थानीय लोग मुनीर खान का मस्जिद बताते हैं, यहां मौजूद हैं।
इस जाट बहुल गांव की आबादी अब लगभग दो लाख पहुंच गई है जबकि 1991 में मात्र 15 हजार थी। गांव वाले बताते हैं कि यह मूल रूप से टोकस और राठी गोत्र के जाटों का गांव है। हालांकि यहां किसी के बसने पर कोई पाबंदी नहीं रही। जब महरौली में मुस्लिम शासन के दौरान राठी जाटों पर अत्याचार हो रहे थे तो उन्हें यहां बुलाया और बसाया गया। हालांकि गांव में मुनीर खान का कोई वंशज तो नहीं है लेकिन मुसलमानों के 20 से 25 घर आज भी हैं। दूसरी जातियों के लोग भी यहां पर आकर बसे हुए हैं।


गांव के अंदर कई चौपाल हैं। बीतते वक्त के साथ फक्करवाड़ा चौपाल एक मोहल्ले के तौर पर विकसित हो गया। लोग बताते हैं कि यहां पर फकीरों का सराय होता था। आस-पास बसे लोगों ने इसे मोहल्ले के तौर पर विकसित कर लिया। खेतों में मकान बनने के कारण गांव की गलियां संकरी होती गई। लाल डोरा की कोई सीमा नहीं रही, हर दिन लोग अपनी सुविधा के हिसाब से मकान तोड़ते और नए आकार-प्रकार देते रहते हैं। गांव में आज भी चार-पांच पुराने कुएं मौजूद हैं जिन्हें आज की पीढ़ी ऐतिहासिक समझ सकती है। गांव वाले 1970 के आस-पास तक इन कुंओं के पानी का उपयोग पीने और दूसरे घरेलू कामों में करते रहे हैं। अब गांव वाले पानी की जरूरत पूरी करने के लिए पूरी तरह से बोरिंग और सप्लाई पर निर्भर रहते हैं। गर्मी के दिनों में पीने के लिए मिट्टी के घड़ों में पानी रखा जाता है। घूंघट, बिरादरी, भाईचारा जैसे शब्द इस गांव की संस्कृति में रचे-बसे हैं। बहुओं का घूंघट में रहना और बेटियों के यहां घी और गुड़ की भेली भेजना गांव की सांस्कृतिक पहचान है। घर के बड़े फैसले आज भी बुजुर्ग ही करते हैं। बाहर से आने वाले मेहमान का स्वागत गुड़-पानी और हुक्के के साथ करना मान-सम्मान समझा जाता है।


किराएदारों की भीड़ से गांव पूरे 24 घंटे जागता रहता है। गांव में एक ऐसा बाजार दिखता है जिसे न गांव का हाट कह सकते हैं और न ही आज के दौर का मार्केट कॉंम्पलेक्स। इसे जरुरत का बाजार जरुर कहा जा सकता है। गांव के अंदर किराएदारों की भीड़ में उतर-पूर्वी राज्यों से आए नवयुवक-नवयुवतियों को शक्ल से आसानी से पहचाना जा सकता है। हालांकि गांव वालों को इन किराएदारों के मांसाहारी खान-पान, पहनावे और खुलेपन को लेकर थोड़ी शिकायत जरूर रहती है, लेकिन आमतौर पर मकान मालिक और किराएदार के व्यावसायिक रिश्तों में सबकुछ सहज होते देर नहीं लगती। इस गांव को शहर बनाने वाले विकास में चैड़ी सड़कें, सरकारी स्कूल, प्राईवेट कोचिंग, आधुनिक सुविधाओं से लैस लाईब्रेरी और मेट्रो स्टेशन का नाम लिया जा सकता है।
वरिष्ठ टीवी पत्रकार, दिल्ली।

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