मैथलिशरण गुप्त ने साकेत में , सीता के मन में उनके वास्तविक घर कौन है इस संदर्भ में एक मार्मिक प्रसंग लिखा है । जिसमें वे सीता के मन के द्वंद्व को इस प्रकार लिखते है “ मिथिला मेरा मूल है, आयोध्य मेरा फूल। चित्रकूट को क्या कहूं रहती हूं मैं भूल। सीता जी की तरह ही कुछ ऐसी ही जीवन मेरा भी रहा है। मेरा जन्म तो मां सीता की जन्मस्थली से छह किलोमीटर दूर गांव रसलपुर में हुआ है। सीतामढ़ी जिले में डुमरा प्रखण्ड का एक छोटा-सा गांव रसलपुर एक विशेष स्थान रखता है। इसके पीछे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक कारण है। ऐसी मान्यता है कि किसी समय यहां पर दरभंगा महाराज का आम का बगीचा हुआ करता था। इसलिए इस जगह का नाम रसालपुर रखा गया। जो बाद में अपभ्रंश होकर रसलपुर हो गया है। मिथिला प्रदेश का हिस्सा होने के बावजूद हमारी बोली मैथिली न होकर बज्जिका है। बज्जिका को हम मैथिली की उपबोली कह सकते है क्योंकि इसके लगभग सत्तर प्रतिशत शब्द मैथिली के ही हैं। वैसे मेरा पैतृक गांव भासेपुर रतवारा, थाना बाजपट्टी, प्रखंड बाजपट्टी, विधानसभा बाजपट्टी में स्थित है।
बारहवीं कक्षा की पढ़ाई के बाद मैं दिल्ली आ गया। दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने और प्रतियोगी परीक्षा के तैयारी के दौरान 10-12 साल शैक्षणिक प्रवासी के रूप में दिल्ली में रहा। नौकरी के शुरूआती वर्षों में कुछेक वर्षों तक लखनऊ में भी रहा। सच कहूं तो लखनऊ भी अब अपने घर जैसा लगने लगा था तभी दिल्ली तबादला हो गया। जब अपने गांव की कहानी लिखने की सोचा तो बरबस मुझे दिल्ली और लखनऊ की याद आती रही परंतु जब गांव में बिताए पुराने यादों को संजोना शुरू किया तो कई बार गर्व से सीना चौड़ा हुआ तो कई बार भावुक भी हो गया। एक से पांच कक्षा तक की पढ़ाई एक छोटे से प्राइवेट स्कूल में हुई। दुर्भाग्य से स्कूल के प्रिंसिपल ने छठे क्लास में मेरा रॉल नंबर एक नहीं किया, इस कारण मैंने स्कूल ही छोड़ दिया। आगे की पढ़ाई बगल के सरकारी स्कूल से किया। जिसमें यह परंपरा थी कि छठवीं से सातवीं क्लास में जो प्रथम आता था, वही स्कूल में होने वाली सरस्वती पूजा पर बैठता था। रॉल नंबर एक लाने का जुनून था तो साथ ही सरस्वती पूजा पर बैठना भी अब लक्ष्य हो गया था। गर्व इस बात की है कि अगले वर्ष मैं ही सरस्वती पूजा पर बैठा। कुछ बातें ऐसी रही जो आज भी भावुक कर देती है। …..गांव रसलपुर
पढ़ी लिखी नहीं होने के बाद भी उनको काफी कहावतें- लोकोक्तियां याद थी। प्रसंगवश वे उसे कहती भी रहती थीं। मैं अपने एम.ए के समय से लगभग 450 बज्जिका और मैथिली में उनके द्वारा कहे कहावतें संग्रह करके रखे हुए हूं। आलस्य एवं समयाभाव के चलते उसे हिंदी अर्थ के साथ किताब के रूप में छपवा नहीं पाया हूं। मिथिला में खाने और खिलाने की एक अच्छी परंपरा है। मैं जब कभी किसी दोस्त,रिश्तेदार के घर से वापस लौटता था तो वे उस परिवार के बारे में न पूछकर सबसे पहले यह पूछती थी कि “मऊगी सब बतियाईते रहलऊ की कुछ खिओलको।“ ऐसे ही कई रोचक प्रसंग हैं जो मन को गुदगुदा देती है।
बाबा की तरह उन्हें बागवानी का बड़ा शौक था। घर के आसपास की जमीन जिसे घरारी कहा जाता है, उनमें विभिन्न प्रकार की सब्जियां लगवाती थी। जिसके कारण घर में सामान्य दिनों में भी चार-पांच तरह की सब्जियां बनाती थी। पिछले 70 सालों से घर पर एक, दो या कभी-कभी तो चार तक गाएं रही है। कई बार ऐसा भी हुआ कि उनके लिए खेत से चारा (मक्के की तरह चौड़े पत्तों वाला चारा) सूडान काटकर साइकिल पर रखकर लाया हूं। सबसे ज्यादा मजा गर्मी के दिनों में आम की रखवाली करने में आता था। बाबा ने एक ही जगह पर लगभग सौ आम का पेड़ लगवाए थे। जिसमें ऐसे आम थे जो मई महीने से पकने शुरू होते थे और अगस्त तक पेड़ पर रहते थे। एक आम अचार वाला था जो पकने के बाद भी खट्टा ही रहता था। उसे कोई खाता नहीं था। उसका मम्मी अमौट बनाती थी। अमौट भी चार-पांच चौकी पर एकसाथ बनता था। अमौट के चलते घर में पीली मधुमक्खी हजारों की संख्या में भटकती रहती थी। कितनी भी सावधानी बरतो आम के तीन महीनों में तीन-चार बार तो मधुमक्खी काटना तय था। शरीर के किसी हिस्से में काट ले तो आप छुपा भी सकते है, परंतु अगर चेहरे पर काट ले तो काफी मुश्किल हो जाती थी। बाएं कान पर मधुमक्खी के काटने के बाद हुए घाव का निशान अभी भी है। एक बार आंधी में चार-पांच पेड़ टूट गए थे, उस समय बड़े वाले जूट के बोरे से दस बोरे से ज्यादा कच्चा आम घर आया था। काफी तो गाछी में ही छोड़ दिया गया। …..गांव रसलपुर
दादी के समय तक कई रिश्तेदारों के यहां आचार आदि मेरे यहां से ही बनकर जाता था। मेरे यहां अभी भी आमिल (खटाई) बनकर बोरी में रखा जाता है। एक चौकी अमौट तो बनता ही है। पापा ने बाबा की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कई बार आम के पेड़ लगवाने की कोशिश की। जिसमें उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली तो अंत में हारकर पिछले साल आम का पेड़ लगा हुआ बगीचा ही खरीद लिया। जब पिछले साल दुर्गापूजा में घर गए थे तो अपने साथ ले जाकर बड़े उत्साह से बगीचा दिखाए। गांव में जहां हमारी पीढ़ी में किसी को रहना नहीं, वहां इतने पैसे लगाकर बगीचा खरीदना कुछ अखर सा रहा था, लेकिन पापा की खुशी अपरंपार थी। उन्होंने कहा कि तुम लोग आम खाने आओ या नहीं आओ जो आम खाएगा वह जरूर नाम लेगा। जीवन में काम ऐसे करके जाओ जिससे दुनिया याद रखें। …..गांव रसलपुर
अगर आप पिछले दो सौ साल का इतिहास उठाकर देखेंगे तो बिहार के गांवों का सामाजिक ताना-बाना काफी सौहार्दपूर्ण रहा है। गांव में लगभग सभी जाति के लोग हैं। परंतु आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि सीतामढ़ी जिला में जहां लगभग 17 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, पर इस गांव में एक परिवार भी मुस्लिम नहीं है। मां सीता के जन्मस्थली के समीप होने के कारण अधिकांश लोग धार्मिं प्रवृति के है। गांव में भी कई मंदिर हैं। नियमित अंतराल पर सामूहिक पूजा-पाठ होता रहता है। कपाली मठ पर रोज रामचरित मानस का पाठ होता है तो वही दुर्गापुजा जैसे सामूहिक पर्व बड़े आस्था एवं श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। आर्थिक रूप से हमारा गांव काफी संपन्न रहा है। गांव में कई जमींदार परिवार रहे हैं। दो-चार सौ बीघे जमीन से लेकर हजार बीघे जमीन के जमींदार परिवार रहे है। राम सकल सिंह के पास तीन हजार बीघे से अधिक जमीन थी। ऐसा कहा जाता है कि सीतामढ़ी जिले के प्रशासनिक कार्यालय डुमरा की अधिकांश जमीन उनकी ही थी। दो-दो कॉलेज, कोर्ट, हवाई अड्डा आदि उनकी दी हुई जमीन पर बने हैं। इनकी प्रसिद्धि पूरे बिहार में रही है । इनकी शादी राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की पोती से हुए थी । …..गांव रसलपुर
बिहार के अन्य गांवों की तरह लोग राजनीति में काफी रुचि लेते हैं। विधानसभा एवं लोकसभा चुनाव में गांव के अधिकांश लोग एक मत रहते हैं, परंतु पंचायत चुनाव में गांव कई फांक में बंट जाता है। वर्ष 2001 से पुनः शुरू हुए पंचायत चुनाव ने जाति एवं गुट के नाम पर समाज को कई गुटों में बाँट दिया है जिसके कारण चुनाव के समय काफी तनाव का माहौल बन जाता है। पंचायत चुनाव के लाभ अवश्य हैं परंतु इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिल रहा है जिसमें सबसे बड़ा सामाजिक समरसता में दरार आना है। पिछले एक दशक में गाँव में काफी बदलाव आया है। सड़कें अच्छी बन गयी है। एक जमाना था जब पटना से घर तक आने में पूरे दिन लग जाते थे। खासकर बाढ़ के समय एनएच 77 जलमग्न रहता था। आज चार घंटों में पटना पहुंच जाते हैंं। गांव के भीतर भी पक्की सड़कों का जाल बिछ गया है। बिजली की व्यवस्था अच्छी होने के कारण भौतिक सुख-सुविधा के साधन की पहुँच ज्यादातर घरों में हो गई है।

महानगर एवं बड़े शहरों के चकाचौंध से जब कभी ऊब जाता हूं तो घर चला जाता हूं। सरकारी नौकरी में आने के बाद खासकर बूढ़े लोग ज्यादा सम्मान करने लगे है। परिपक्व एवं गंभीर समझने लगे है। कुछ लोग तो कैरियर काउंसलर की तरह अपने बेटे-पोतों के लिए सुझाव भी मांगते रहते है। जब तक नौकरी में नहीं थे तब तक वही लोग चौक पर बैठकर चर्चा करते थे कि मास्टर साहब का पैसा लूटा रहा है। अभी भी सरकारी नौकरी को गांव के लोग अन्य व्यावसायिक कोर्स करके कमाने वाले से ज्यादा सम्मान की नजर से देखते हैं। इन अनुभवों के साथ बचपन की स्मृतियां भी जब जुड़ जाती है तब लगता है कि एक बार फिर घर घूम आएं। कई बार यह संभव नहीं होता, फिर भी दुर्गापूजा और दीपावली-छठ में अवश्य ही घर जाने का समय निकाल लेता हूं। यह जुड़ाव हमारी पीढ़ी तक तो है आने वाली पीढ़ी को भी गांव से जोड़ने की कोशिश रहेगी। …..गांव रसलपुर
(पंजाब एंड सिंध बैंक में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी)








