सोहवलिया-मेरा गांव मेरा देश

विद्युत प्रकाश मौर्य
सोहवलिया मतलब मेरा गांव मेरा देश। बिहार के रोहतास जिले के करगहर प्रखंड का एक गांव। वह गांव जिसमें मेरे बचपन के शुरुआती छह साल गुजरे। गांव से दूर हो गया हूं। दिल के एक कोने में हमेशा गांव की स्मृतियां जवां रहती हैं।                             …….मेरा गांव मेरा देश
मेरे गांव का नजदीकी रेलवे स्टेशन कुदरा है। कुदरा पंडित दीनदयाल जंक्शन से गया वाली रेलवे लाइन जो ग्रैंड कोर्ड कहलाती है, उस पर छोटा-सा स्टेशन है। पंडित दीनदयाल जंक्शन (मुगलसराय) से कुदरा सिर्फ 75 किलोमीटर है। जब से मैंने होश संभाला है यह रेलवे लाइन विद्युतीकृत है। अब माल ढुलाई की सुविधा के लिए तीसरी लाइन भी बिछ चुकी है। पर कुदरा से गांव जाने का सफर कभी काफी मुश्किलों भरा हुआ करता था। सत्तर के दशक में तो कुदरा से गांव तक पैदल जाना पड़ता था। 1973 के बाद बसही तक सड़क बन गई। फिर भी 4 किलोमीटर का रास्ता पैदल का तय करना पड़ता था, खेतों की मेड से होकर। बसही में कुदरा नदी का पुल काफी नीचे था। बारिश के दिनों में नदी उफान पर आती थी तो गांव जाने का रास्ता बंद हो जाता था। दूसरा रास्ता परसथुआ से है। वहां भी एक छोटी सी नदी उफान पर आ जाती थी। तो बारिश के चार महीने हमारे गांव में कहीं से भी पहुंचना मुश्किल काम था। बाकी के समय दिन भर में दो खटारा बसें, तांगा और मिलिट्री से नीलाम की गई जोंगा (जीप) चलती थी। …….मेरा गांव मेरा देश

सोहवलिया पुराना शाहाबाद जिले के एक अनाम सा गांव हुआ करता था। हमारे पुरखे इस गांव में 1930 में आए थे। मतलब मेरे परदादा जगदेव सिंह और उनके भाई। वे लोग भोजपुर जिले के पीरो के पास के नाढ़ी गांव से यहां पाही करके आए थे। पाही मतलब माइग्रेशन। यह माइग्रेशन क्यों। नाढ़ी में जमीन कम पड़ने लगी थी। तब इधर जमीन सस्ती मिली। सोहवलिया खुर्द मूल से रूप से राजपूत लोगों का गांव था। हमारे पुरखे आए तो सोहवलिया खुर्द का सोहवलिया टोला बसा। पिता जी बताते हैं कि पास के गोरी गांव के राजपूत जमींदार यमुना राय से जमीन सस्ते में खरीदी गई थी। वे बड़े सह्रदय जमींदार थे। अक्सर घोड़े पर सवार होकर हमारे दादा-परदादा का हाल-चाल पूछने आते थे। गोरी हमारे इलाके का ऐतिहासिक गांव है जहां एक पुराना मस्तूल (वाच टावर) बना हुआ है। सोहवलिया गांव में हमारा टोला आबाद हुआ नहर के पश्चिम की तरफ जबकि मूल गांव नहर के पूरब है। सोन नदी से ब्रिटिश काल में निकाली गई नहर की ब्रांच लाइन मेरे गांव से गुजरती है। हमारे गांव के सारे खेत नहर से सींचित हैं। खेती बारिश के भरोसे नहीं रहती। बचपन के दिनों में मैंने देखा था कि दादा जी धान की कई किस्मों के अलावा गेहूं, चना, मटर आदि की खेती करते थे। हमलोग गन्ना भी लगाते थे। गन्ने से गुड़ बनता था। गांव में कलुहाड़ी चलती थी। सब्जियों सिंचाई के लिए रंहट चलाते थे। खेती बैलों से होती थी। पर अब बैल नहीं रहे। रहंट और कलुहाड़ी भी अतीत की बात हो गई। लोग गन्ने की खेती भी नहीं करते। गांव के सुदर्शन चाचा कहते हैं कि नई पीढ़ी के बच्चे हल, बैल, हेंगा, जुआठ, दंवरी से जुड़े सैकड़ों शब्द अब नहीं जानते। ये शब्द भोजपुरी के शब्दकोश से भी विलुप्त हो जाएंगे। खेत जोतने और दंवरी के लिए बैलों का लेनदेन हुआ करता था। अब उसकी जरूरत नहीं रही। इसका असर सामाजिक समरसता पर भी पड़ा है।                      ………मेरा गांव मेरा देश

सन 1980 से पहले का गांव याद आता है। बिजली नहीं थी। हम सब लालटेन और ढिबरी में पढ़ाई करते थे। 1982 में गांव के आसपास बिजली के पोल लगे, पर बिजली आई सन 2000 के आसपास। बिजली आने से लालटेन युग खत्म हो गया। अब 20 घंटे तक बिजली रहती है। लोगों ने इनवर्टर भी लगा लिया है। गांव में फ्रिज भी पहुंच चुका है। सन 2000 के बाद प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना से काफी काम हुआ। आसपास के सारे गांव पक्की सड़कों से जुड़ गए हैं। नदियों पर ऊंचे पुल बन गए हैं तो अब हर मौसम में गांव पहुंच सकते हैं। इतना ही नहीं अब तो करगहर और मोहनिया की तरफ से भी सड़क मार्ग से गांव पहुंचा जा सकता है। अब तांगे यानी टमटम का युग खत्म हो गया है। गांव के हर घर में दोपहिया और चैपहिया वाहन है। शहर के निजी स्कूलों की बसें गांव तक पहुंचने लगी हैं। अब तो मेरे गांव से वाराणसी के लिए सीधी बस और जीपें चलने लगी हैं। हर गांव में कई एसयूवी और स्टेशन वैगन जैसी बड़ी गाड़ियां आ गई हैं। एक गांव से दूसरे गांव में जाने के लिए वाहन चलने लगे हैं। मुझे याद आता है मेरे दादा जी को हितई-गनई में पैदल जाना पड़ता था। मैं उनके साथ उंगली पकड़कर जाया करता था।                                                         —————–मेरा गांव मेरा देश

सोहवलिया के एक किलोमीटर आगे का गांव बकसड़ा अब गांव के बड़े बाजार में तब्दील हो चुका है। वहां अब सोना-चांदी छोड़कर हर चीज की दुकानें खुल गई हैं। आपको किसी भी तरह की खरीददारी करनी हो तो शहर जाए बिना भी काम चल सकता है। यूपीए-2 सरकार की निर्मल ग्राम योजना का असर भी दिखाई दिया। सन 2014 तक हर घर में शौचालय बन चुके थे। सभी मोबाइल कंपनियों के नेटवर्क शानदार मिल रहे हैं गांव में। अब थ्री जी में नेटसर्फिंग का मजा यहीं बैठे लिया जा सकता है। गांव में मेरे परदादा का बनवाया हुआ कुआं है। कभी इसका पाट नहीं हुआ करता था, पर अब सरकारी मदद से गांव के लोगों ने अब इसके चारों तरफ चैड़े पाट बनवा दिए हैं। अब बाग-बगीचे कम हो गए है। आम, अमरूद और कदम के दर्जनों पेड कट गए हैं। पर कागजी नीबू का पेड़ अभी भी गांव के लोगों को अपनी सेवाएं दे रहा है। कुछ पुराने पेड़ कटे हैं तो कई नए पेड़ लगे भी हैं। मेरी बंसवारी भी सही सलामत है, पर उसके पास सहजन का पेड़ नहीं रहा।                                                                                                                                          …….मेरा गांव मेरा देश     
पिछली तीन पीढ़ियों में कुछ अच्छे तो कुछ नकारात्मक बदलाव भी दिखाई दे रहे हैं। दादा जी से चलकर मेरी पीढ़ी में आने तक आबादी बढ़ने से परिवार के हिस्से में खेती कम हो गई है। लिहाजा कई जमींदार परिवार दो पीढ़ी बाद मजदूर बन गए हैं। कई लोग पंजाब में जाकर मजदूरी भी करने लगे हैं। पर ये दर्द सिर्फ मेरे गांव का ही नहीं बल्कि आसपास के कई गांवों का है।            …….मेरा गांव मेरा देश  
पत्रकार, मीडिया शिक्षक और ब्लॉगर।

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