परंपरागत कुओं को बिसरा.. हर घर नल जल तक सरपट दौड़ता बोधा छपरा,गोराईंपुर और पकौलिया गांव का जल ऑडिट

निरंजन कुमार सिंह

पूरूब के चंदरिया से निकल अंगरिया,
लेहू अईसन भईल आसमान
गांव के ईनारवा पर लड़िकन ​सब के टोलियां
गोल—गोईयां बांटी खेले गुल्ली, डंडा,गोलियां…
खैर अब गांव के ईनार यानी कुओं पर लड़कों की टोली नहीं दिखाई देती और न ही दिखाई देती हैं पर्व-त्योहार, शादी-ब्याह के मौके पर कुआं पूजती स्त्रियां।
उपरोक्त गीत के बोल दुहराते हुए बोधा छपरा गांव के रहवासी और नेपाल में भूगोल के प्रोफेसर रहे बिजेन्द्र सिंह कहते हैं कि चार दशक पहले तक ग्रामीण इलाकों में पानी का मुख्य स्रोत कुएं हुआ करते थे। पीने के साथ-साथ सिंचाई के लिए कुएं ही साधन हुआ करते थे। न सिर्फ पीने के पानी और सिंचाई के साधनों के लिए बल्कि हमारी सामाजिक संस्कृति और परंपराओं के उन्नयन में भी कुओं की बड़ी महत्ता थी। ज्यादातर मांगलिक कार्यक्रमों में भी कुएं के आस पास कई आयोजन हुआ करते थे। लेकिन समय के साथ नलकूप और अब हर घर नल के जल तक पहुंचे विकास के दौर में कुएं अंतिम सांस गिन रहे हैं।
यदि बोधा छपरा, गोराईंपुर और पकौलिया के कुओं के इतिहास और विकास क्रम को टटोलें तो ऐसा लगता है कि भले ही आबादी के लिहाज से छोटे गांव रहे हों लेकिन हरेक टोले में कुआं था। दो-चार-10 घर के बाद इन सभी गांवों में कुएं थे।

गांव के सबसे बुजुर्ग और भारतीय सेना से सेवा निवृत राम गोविंद सिंह (जन्म—1931)

बोधा छपरा गांव में कुआं
गांव के सबसे बुजुर्ग और भारतीय सेना से सेवा निवृत राम गोविंद सिंह (जन्म-1931) न सिर्फ ​कुओं के विकास क्रम पर रोशनी डालते हैं बल्कि गांव के विकास क्रम की कथा भी कहते हैं। कहते हैं पुरानी बोधा छपरा गांव की बसगित बी एन आर रेलवे लाईन से एक किलो मीटर दक्षिण में बसी थी। लेकिन 1930-34 में गंगा कटाव जोर से हुआ तथा पूरा नदी के पेट में चला आया। 1934 से हमारे पूर्वजों ने जो वर्तमान में बोधा छपरा गांव विद्यमान है वहां बसना शुरू कर दिया। 1942 के आस पास पूरा गांव रोड के उत्तर आ चुका था, जहां हमारी खेती थी और पूर्वजों ने बाग-बगीचा लगाने का काम शुरू किया था। कुओं के विकास क्रम को समझाते हुए रामगोविंद सिंह कहते हैं कि बस्ती इधर आने से पहले लगभग 1930 में बोधा छपरा से सटे पकौलिया गांव में भुलावन राय ने एक कुआं खोनवाया था। जो केशव राय के पूर्वज रहे होंगे। केशव राय बाहर से आकर पकौलिया में बसे हैं। इसी कुआं से हम लोग के बगीचों में पानी पटवन होता क्योंकि बस्ती के इधर आने के पहले ही बाग—बगीचा लगाने का काम शरू हो गया था और जब बस्ती इधर आई तो शुरूआत में लोग पीने के पानी का इंतजाम भी इसी कुएं से करते थे। लगभग इसी वक्त भौंरिया में भी पतरको दाई ने जो गुलेला बाबा के परिवार से थीं, खेतों के बीच एक कुआं खोनवाया। ये दोनों कुएं हाल के दशक तक विद्यमान थे। भौंरिया का कुआं खेतों के बीच था ओर बगीचा लगने के बाद भर दिया गया। लेकिन पकौलिया में केशव राय के घर के पास का कुआं अभी भी है भले ही जीर्ण शीर्ण अवस्था में हो।

यदि बोधा छपरा के बाकी कुओं के निर्माण और विकास क्रम को देखें तो द्वंद बहादुर सिंह जिसे लोग बोल चाल में दुन बहादुर बाबा कहते हैं,  शिव मंदिर के पास का कुआं 1938 में खोनवाया था। इसके बाद गांव में कई कुआं खोनवाया गया। गांव चार टोलों में बसा है। हर टोले में कुएं खोने गए। कौन सा कुआं किस वर्ष खोनवाया गया, वर्ष को लेकर पुख्ता तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन ज्यादातर कुएं 1942 के बाद और आजादी के शुरूआती दशकों में खुदवाये गये। हमारे टोले में द्वंद बहादुर सिंह के अलावा रामरेखा सिंह के दरवाजे पर कुआं खुदुवाया गया। रामरेखा सिंह के दरवाजे पर जो कुआं अभी भी विद्यमान है वो संभवत: 1965—66 का है। इसी तरह रामध्यान सिंह के टोले में उनके पिता रघुवंश नारायण सिंह ने अपने दरवाजे पर कुआं खुदवाया। सेवानिवृत बैंक प्रबंधक अरूण सिंह कहते हैं कि जब बाबा ने घर बनाया उसी वक्त कुंआ भी खुदवाया। वे ये भी बताते हैं कि उनके जमीन में एक और कुंआ खुदवाया गया जो चमटोली का कुआं कहा जाता था और इससे हरिजन बस्ती के लोगों को पीने का पानी मिलता। इस कुएं के निर्माण में भागीरथ सिंह का अहम योगदान रहा। हालाकि यह कुआं अब भर दिया गया है।
अब आगे बढ़ते हैं वर्तमान प्रखंड प्रमुख प्रतिनिधि ओर पूर्व मुखिया राकेश कुमार सिंह के घर वाले टोले की ओर। इस टोले पर भी दो कुएं खुदवाये गये थे। एक कुआं महादेव सिंह के दरवाजे पर था। जो संभवत: 1947-48 में खोनवाया गया था। हाल के दशक तक यह कुआं भले ही चालू स्थिती में न रहा हो लेकिन अस्तित्व दिखाई देता था। लेकिन अब यह जमीन समतल हो गई है, यानी कुआं भर दिया गया है। इसी तरह वर्तमान प्रखंड प्रमुख प्रतिनिधि ओर पूर्व मुखिया राकेश कुमार सिंह के दरवाजे पर भी कुआं है। इस कुएं को भी उनके बाबा कैलाशपति सिंह, प्राणपति सिंह ने खुदवाया था। यह कुआं भी 1947-48 में खोनवाया गया था।
यदि भौंरिया की ओर चलें तो भौंरिया में दो कुएं हैं। एक कुआं स्वर्गीय राजेश्वर सिंह के दरवाजे पर है। वहीं दूसरा कुआं स्वर्गीय रामेश्वर सिंह, शिवपूजन सिंह के दरवाजे पर है। राजेश्वर सिंह के दरवाजे पर कुआं अभी भी है जो 1965 में खुदवाया गया था। वहीं शिवपूजन सिंह के दरवाजे पर जो कुआं है वह अब अस्तित्व में नहीं है। नये घर के अंदर ले लिया गया है।

गोराईं पुर में कुंआ
धन-धान्य,संसाधनों से संपन्न छोटा सा गांव गोराईंपुर। कह सकते हैं लगभग हर दरवाजे पर समृद्धी की कहानी कहता पक्के कुएं का मुंडेर। या यह तो कहा ही जा सकता है कि हरेक दो तीन घरों पर कुआं। तो इस गांव के प्राचीन जल स्रोत यानी कुएं के विकास क्रम पर नजर डाली जाए जो तस्वीर उभरती है वो ये है। बुजुर्ग शंभुदयाल सिंह कहते हैं कि उनके घर के पीछे जो कुआं अभी भी विद्यमान है वो गांव के सबसे प्राचीन कुओं में से है। यह 1930 में खोनवाया गया था जो उनके पिता सकल सिंह ने खुदवाया था। बुजुर्ग राम गोविंद सिंह बताते हैं कि भुलावन राय, भौंरिया का कुआं और गोराईंपुर में यदु​नंदन सिंह के घर के पास का कुआं सबसे प्राचीन कुओं में से यानी 1930 का है।
इसके अलावां जो गोराईं पुर में कुएं दिखाई देते हैं वो हैं गोराईंपुर हाई स्कूल का कुआं, शिवमंदिर पर का कुआं, स्व.राम बहादुर सिंह के दरवाजे पर कुआं, स्व. लखराम सिंह के दरवाजे पर, स्व. कमला सिंह के दरवाजे पर कुआं और स्व. पंचदेव सिंह के दरवाजे पर का कुआं। बड़ी बात ये है कि ये सभी कुएं अभी भी हैं। इनके उंचे मुंडेर अभी भी दरवाजे की शोभा बढ़ा रहे हैं। हालाकि ज्यादातर कुएं चालू स्थिती में नहीं हैं। रामबहादुर सिंह के दरवाजे पर स्थित कुआं अभी भी चालू स्थिती में है। केवल यही कुआं क्यों इन तीनों गांव के कुअें 1990 के दशक तक पूरी तरह से चालू स्थिती में थे। लोग बाल्टी से पानी निकालते, स्नान करते देखे जा सकते थे।

पकौलिया गांव के कुएं
बोधाछपरा, गोराईंपुर पुराने पंचायत की मजबूत कड़ी रहे ग्राम पकौलिया की कुआं कथा सुनाते हुए ग्रामीण हरिहर प्रसाद राय कहते हैं कि अन्य गांवों की तरह ही हमारे गांव में भी कई कुएं थे। उनमें सबसे प्राचीन कुओं में शामिल रहा है भुलावन राय द्वारा खोनवाया गया कुआं। लेकिन इसके अलावा भी कई कुएं हैं जो भले ही पेयजल आर्पूर्ती के लिए काम में न लाए जा रहे हों लेकिन इनका समृद्ध इतिहास रहा है। ये कुएं गांव के बीच भी हैं और गांव के बाहर खेतों के बीच भी। हरिहर राय कहते हैं मेरे परिवार का दो कुआं है। एक अभी भी मेरे दरवाजे पर है और दूसरा खेतों के बीच है। इसी तरह जयगोविंद राय के दरवाजे पर का कुआं काफी पुराना है। नथूनी राय के परिवार में भी कुआं हैं। हरिहर राय कहते हैं हमारे कुएं के साथ ही भिखारी राय, नवल राय, नागेश्वर राय, वकील राय के दरवाजे पर कुआं है।
यदि इन सभी कुओं की बात समग्रता में की जाए तो तस्वीर बनती है या ज्यादातर कुओं की तस्वीर को देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है चाहे बोधा छपरा का कुआं हो, गोराईंपुर का कुआं हो या फिर पकौलिया का भले ही उड़ाही के अभाव में या फिर पेय जल के लिए अन्य वै​क्लिपक साधनों के उपलब्ध होने के बाद विशेष रूप से नल कूल व हैंड पंप के घर-घर लग जाने के बाद ये कुएं मात्र शोभा की वस्तु बन कर रह गये हैं। अब तो विकास के क्रम में गांव ने हर घर नल का जल तक का सफर तय कर लिया है और जगह-जगह जल मीनार और बनाये गये पानी टंकी प्राचीन जल स्रोतों के दुरावस्था की चुगली करती नजर आती हैं। दरवाजे पर टपकते नल के आगे कुओं के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। गांव के  कुएं भले ही पूर्वजों की निशानी के तौर पर आज भी बने हुए हैं, लेकिन ज्यादातर कुएं उपर से ढंक दिए गये हैं और आज नहीं तो कल इन्हें समाप्त होना ही है।  इसी के साथ समाप्त हो जाएगी पूर्वजों की स्मृति, जल संग्रह और संचयन को लेकर उनके द्वारा किए गये प्रयासों की पूर्णाहुति।
हालांकि कुएं से लेकर हर घर नल के जल के इस विकास कथा में भी कम झोल नहीं है। जिस तरह कुओं के उड़ाही और खनन पर मुखिया और पंचायती राज का ग्रहण हमेशा से लगता दिखाई देता रहा है और खोने गये कुएं और उड़ाही किए गये तालाब,पोखर बार-बार खुनवाये और उड़ाही कराये जाते रहे हैं। यही कहानी कमोबेश हर घर नल के जल योजना की भी है, जिसे भ्रष्टाचार के दीमक ने इस कदर खोखला कर दिया है कि मोटर से पानी टंकी में जाते ही पूरी व्यवस्था भरभरा के गिरती-पड़ती दिखाई देती है। यह किसी एक गांव की कहानी नहीं बल्कि पूरे बिहार कहानी बनती दिखाई ​दे रही है। ये आलम तब है जब राज्य के मुखिया की नजर इन योजनाओं के बेहतर संचालन,कार्यान्यवन और ऑडिट पर है।

 

 

 

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