गुण्डा कुंवर-कितना बदला मेरा गांव…

अरविंद कुमार सिंह
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक

मेजर परिहार सर ने फौजी कड़क भरी आवाज में मुझसे पूछा- कहां के रहने वाले हो ?
मैने कहा- बस्ती जिला सर
और गांव, उन्होंने पूछा ?
मैने कहा- गुण्डा कुंवर
अब उनके चेहरे का भाव बदल सा गया था। उन्होंने कहा ‘ दिखने में तो तुम शरीफ लगते हो। लेकिन तुम्हारे गांव का नाम भ्रम पैदा करता है। देखो तुम्हारे साथ ‘फर्जी मार्कशीट’ का मामला जुड़ा हुआ है। पता है तुम जेल जा सकते हो।‘
जिस अधिकारी के साथ मेरा यह संवाद हो रहा था, वे मेजर परिहार साहब हमारे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर थे। मैं 1980 में बीए में दाखिला लेने के कुछ समय बाद विचित्र संकट में फंस गया। मेरा नाम दूसरे उन कई नामों के साथ विश्वविद्यालय ने बाकायदा विज्ञापन देकर अखबार में छाप दिया था, जिनके मार्कशीट को लेकर संदेह था। कई सीनियर और सहपाठी मेरे भविष्य को लेकर चिंतित थे। अखबार में लिखा था मैं अमुक तारीख को अपनी मार्कशीट के साथ प्रॉक्टर से मिलूं।

इस मौके पर शिक्षा विभाग में अधिकारी रहे अपने पिताजी को मैने बहुत याद किया। लेकिन सोचा कि उनको कुछ बताने से पहले यह तो समझ लूं कि माजरा क्या है? मेजर साहब बहुत सख्त अधिकारी थे। छात्र नेता रहे अपने बेटे को भी उन्होंने नहीं बख्शा था। परिसर में उनका दबदबा था। वे एक छोटी छड़ी लेकर चलते थे। मैं उनके दफ्तर गया तो थोड़ा इंतजार करना पड़ा। लेकिन उनका स्टाफ हमें ऐसे देख रहे थे जैसे कोई कत्ल करके आये हों। पहले डर लगा, फिर सोचा कि जब कुछ गलत किया नहीं है तो डरना क्या। मेजर साहब ने बुला कर मेरे कागजात लिए और मुझसे यह पड़ताल करने की कोशिश की कि मैने 12वीं की अपनी मार्कशीट किस गिरोह से बनवायी थी। मैने उनको बताया कि हाईस्कूल अपने बस्ती जिले से और इंटरमीडियट बाराबंकी से प्रथम श्रेणी में पास किया है। किसी गिरोह से मार्कशीट बनवाने की हम सोच नहीं सकते। उन्होंने कुछ सवाल मेरे पिताजी और परिवार के बारे में भी किए। 15 मिनट की यह पूछ ताछ वैसे चली जैसे कोई दारोगा किसी अपराधी से करता हो। फर्क इतना था कि उनके स्वभाव में वह कड़ाई नहीं थी,जिसके लिए वे मशहूर थे। आखिर में फिर मेरी ओरीजनल मार्कशीट उन्होंने ले ली और एक लिफाफे में रखवा कर अपने पीए से उस पर मेरा नाम लिखवाया। फिर मुझसे कहा कि मैं अब अपने रोल नंबर की इंटरमीडियट की डुप्लीकेट मार्कशीट निकलवा कर जितना जल्दी हो सके लाऊं।
वहां से निकला तो बहुत चिंतित था। सीधे कटरा पोस्ट आफिस गया और पिताजी को तीन चार पेज की एक चिट्ठी में सारी व्यथा लिखी। फिर पिताजी के मित्र औऱ शिक्षा विभाग उत्तर प्रदेश में उप निदेशक श्री रामायण सिंह से मिलने गया। वे कहीं दौरे पर थे लिहाजा खुद माध्यमिक शिक्षा परिषद मुख्यालय का एक चक्कर लगा आया जहां कचहरियों की तरह भारी भीड़ थी। तमाम दलाल भी थे। वहां जाकर यह समझ गया कि डुप्लीकेट मार्कशीट निकलवाना सरल काम नहीं है। प्रक्रिया से आऊंगा तो एक पखवारा लग जाएगा। अगर किसी अधिकारी से बात हो जाये तो जल्दी हो सकता है। मुझे लगा कि अनुग्रह भाई साहब (श्री अनुग्रह नारायण सिंह, अध्यक्ष छात्र संघ) की मदद मैं ले सकता हूं। उनके पास गया तो उन्होंने माध्यम शिक्षा परिषद के एक अधिकारी को फोन किया। औपचारिकताओं के साथ उन्होने तीसरे दिन बुलाया। मैं माध्यमिक शिक्षा परिषद की दफ्तर में पहुंचा तो सहायक सचिव श्रीवास्तव जी ने मेरी मदद की।
एक बाबू को बुला कर उन्होंने कहा कि यह मार्कशीट आज ही बननी है। मुझे उनके साथ जिस कमरे में भेजा वहां मोटे मोटे और बहुत बड़े रजिस्टरों का ढेर था। मैने अपना रोल नंबर खोजने में उनकी मदद की। मेरी डुप्लीकेट मार्कशीट बनी लेकिन तब तक जिस अधिकारी के पास साइन होना था वे निकल चुके थे। बाबू मुझे चाय पिलाने ले गया जहां ताजा समोसे बन रहे थे। बाबुओं के पेट में समोसे ही समोसे समाते जा रहे थे। हमने भी समोसा खाया। अगले दिन यानि 26 नवंबर 1980 को मेरी डुप्लीकेट मार्कशीट मिल गयी। सारे नंबर और विवरण ओरिजिनल मार्कशीट जैसे ही थे। इसे लेकर मैं उसी दिन प्रॉक्टर साहब से मिला तो उन्होंने मुझे हैरानी से देखा। उनको मैने पूरी कहानी बता दी। फिर उन्होंने कागजात देख कर बताया कि वेरीफिकेशन में उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद ने मेरी मार्कशीट के लिए यह लिख कर भेजा था कि मेरे रोल नंबर 191458 पर कोई नरसिंह नारायण सिंह बैठे थे। मैने उनको बताया कि यह नाम तो मेरे रोल नंबर के ठीक था। क्योंकि मूल रजिस्टर तो मैने खुद चेक किया था। उन्होंने तत्काल माध्यमिक शिक्षा परिषद के सचिव को फोन लगा कर बात की। उनसे कहा कि वे इस बात की जांच कराएं कि गलती किसकी थी, और उसे दंडित किया जाये। आप लोगों की गलती के कारण हमारे छात्रों को कितना कुछ भोगना पड़ा है। इस बीच अगले ही रोज मेरे पिताजी श्री ठाकुर शरण सिंह बाराबंकी से मेरा चरित्र प्रमाण पत्र और बहुत से कागजात लेकर पहुंच गए। लेकिन अब उसकी जरूरत नहीं थी। मैने सारी घटना उनको बतायी तो उन्होंने संतोष की सांस ली और उसी दिन वापस लौट गए।

अपने गांव की कहानी की शुरुआत मैने इस घटना से इस नाते की कि मेरे जीवन की यह पहली घटना थी, जिसमें अपने गांव के नाम को लेकर मुझे शर्मिंदगी महसूस हुई। मुझे लगा कि यह भी कैसा नाम रखा है हमारे पुरखों ने। उसके पहले कभी ऐसा कुछ महसूस किया नहीं था। बंधु संतोषजी ने अपने संपादन में निकलने वाली पुस्तक में 150 गांवों की कहानियों के साथ मेरे गांव गुण्डा कुंवर को भी शामिल कर उस पर लिखने को कहा तो मुझे हैरानी हुई। राज्यसभा के उप सभापति हरिवंशजी समेत तमाम क्षेत्रों के दिग्गजों के गांवों की कहानी इसमें शामिल है। मैने सोचा कि मेरा गांव तो भारत के करीब सात लाख गांवों और बसावटों में शामिल एक आम गांव जैसा ही है। भले ही मैं गांव देहात पर लिखने पढ़ने वाला पत्रकार हूं और देश के तमाम हिस्सों के हजारों गांवों को मैं देख चुका हूं। लेकिन मेरा गांव न तो प्रयोग भूमि हैं और न ऐसा गांव जो जन सहयोग से चमक गया हो। नेताजी मुलायम सिंह के गांव सैफई या मायावतीजी के गांव बादलपुर जैसे कई नेताओं के गांव जैसा भी नहीं जहां सरकारी पैसे से चमक दिख रही हो। मेरे गांव में सरकारी पैसा और पंचायत राज की चमक भी फीकी है।
मैने काफी समय लगाया इस विषय पर सोचने में। गांव का एक व्हाट्सअप ग्रुप भी है जिसमें कई बार मैने इस बाबत लिखा। लेकिन ठाकुर साहबों को लगा कि गांव पर लिखना शायद मेरा निजी प्रयोजन होगा। यह भी हो सकता है कि उनको कुछ पता भी न हो। हां मेरे चचेरे भाई राजेंद्र सिंहजी जो मेरठ में रहते हैं, उन्होने अपनी अयोध्या की यात्रा से गांव जाकर तस्वीरें खींच कर मुझे जरूर भेजा। इस क्रम में मैं यह तो समझ गया कि अपने गांव पर लिखना शायद सबसे कठिन काम है।
क्षत्रियों के गांव में जितनी अच्छाइयां या बुराइयां हो सकती हैं, वे सब हमारे गांव में है। हालांकि बचपन से अब तक गांव में काफी बदलाव आया है। सांप्रदायिकता की बयार भी बहती दिख रही है। लेकिन अधिकतर लोगों पर इसका खास असर नहीं है। गांव की अकड़ जरूर कायम है लेकिन अब समाज के बाकी हिस्से जाग गए हैं इस नाते वह पहले जैसी नहीं है।

कथा की शुरुआत मैने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से की, जो हमारे यहां से काफी दूर है। हमारे जीवन की सारी जरुरतें सामान्यता पड़ोस के छावनी बाजार और अयोध्या से पूरी होती हैं। इलाहाबाद में ही गांव के नाम को लेकर मुझे पहला झटका लगा था। इस नाते गांव और आसपास के इतिहास में मेरी दिलचस्पी बढ़ी और वह आज भी कायम है। बचपन में मैं इस बात पर खुश होता था कि गांव का नाम लेने भर से हमारा बहुत सा काम जल्दी हो जाता है। पोस्ट आफिस हो या फिर कस्बे के बनिया लोग, वे हमे इसलिए विशेष तवज्जो देते थे कि हम गुण्डा गांव के हैं।

1965 में मेरे जन्म के साल मेरे पिता श्री ठाकुर शरण सिंह प्रादेशिक शिक्षा सेवा के अधिकारी बन गए थे। उसके पहले उन्होंने हमारे इलाके में परशुरामपुर में एक माध्यमिक विद्यालय स्थानीय विधायक जंग बहादुर सिंहजी के सहयोग से स्थापित कराया था। वे प्रधानाचार्य थे और उनके चुने गए शिक्षक बाद में हमारे तहसील में स्थापित कई विद्यालयों के लिए बड़ी शक्ति बने। प्राइमरी में दो साल तक गांव के जिस स्कूल में पढ़ा वह खपरैल और बेतरतीब था। लेकिन यह स्कूल अब बदल गया है और इसका अच्छा भवन है। गांव में दो मंदिरों के अलावा यही एकमात्र देखने लायक जगह है। वोट भी यहीं पड़ता है और सामुदायिक कामों में भी आता है। बचपन में स्कूल में मेरा दबदबा था। एक बार वहां के शिक्षक ने मुझे डांट दिया तो हमारी फुआजी शिक्षक को मारने पहुंच गयी। मैने उप विद्यालय निरीक्षक के निरीक्षण की पूर्व संध्या पर किसी बात पर गुस्सा होकर वहां काफी तोड़ फोड़ कर दी थी और पौधे उखाड़ दिए। लेकिन जब वे अधिकारी आए तो उन्होंने सबसे पहले शिक्षकों से मेरे पिताजी के बारे में पूछा। शिक्षक ने मेरा जिक्र किया तो वे मुझसे बहुत प्रेम से मिले और मेरे घर भी गए। लेकिन और खास याद नहीं क्योकि बाद में मैं पिताजी के साथ बाराबंकी और वहां से सुल्तानपुर चला गया। मैनेजमेंट और स्कूल के झगड़े में पिताजी को काफी मुकदमेबाजी झेलनी प़ड़ी और हमारे हथियार भी शासन ने जमा करा दिए। जीवन को खतरा देख पिताजी ने नवीं और दसवीं की पढ़ाई के लिए मुझे फिर गांव भेज दिया। यहां के अशोक विद्यालय के हमारे प्रिंसिपल श्री राम शंकर सिंह पिताजी के भक्तों में थे। उनकी पहली नियुक्ति पिताजी ने ही की थी। वहां से पढ़ने के बाद बाराबंकी गया जहां से इंटर किया। फिर प्रशासनिक अधिकारी बनने के लिए मैं इलाहाबाद भेज दिया गया। लेकिन मैं वहां साहित्यिक जमावड़े में उलझ कर पत्रकार औऱ लेखक बन गया। महादेवी वर्माजी, इलाकांत जोशीजी, अमरकांतजी, शैलेश मटियानीजी औऱ मार्कण्डेयजी से लेकर लक्ष्मीकांत वर्मा से लेकर उस दौर के दिग्गज पत्रकार एसके दुबे और गोपाल रंजन तथा सुभाष राय जैसे तमाम दिग्गजों की सोहबत में यही बनना लिखा था शायद।

बहुत सी कथाए हैं लेकिन संक्षेप में यह कि लगातार बाहर रहने के बाद भी गांव से हमारा संबंध कायम है। मेरे परिवार में छोटे भाई धर्मेद्र कुमार सिंह और बहन रंजना सिंह पिताजी के पास रहे, जबकि मां और दादा जी गांव में रहते थे। बाद में छोटे भाई भी मेरे पास इलाहाबाद आ गए। लेकिन छुट्टी या कोई भी मौका होता तो अनिवार्य रूप से सब गांव पहुंचते। तब गांव में सामूहिकता का एक भाव था। शादी विवाह या शोक में गांव एकजुट रहता था। होली-दीवाली की रौनक देखते बनती थी। गरमियो में नियमित पिताजी आल्हा का आयोजन कराते। कोल्हू भी चलता था जिसमें रात भर बैलों की घंटियां गूंजती रहती थी औऱ गुड़ की महक दूर तक फैल जाती। गुड़ बनने के बाद मौजूद लोगों में बांटा जाता। गुड़ का वैसा स्वाद फिर याद नहीं। कोल्हू तो आज भी हमारे घर में किसी कोने में पड़ा है। लेकिन गन्ने का रस, आलू मटर और दही का गांव का स्वाद कभी भूल नहीं पाया। अयोध्या से लेकर पचवस औऱ रामरेखा का मेला भी छोड़ा नहीं। और वहां भिनभिनाती मक्खियों के बीच छनती जलेबियों का स्वाद आज भी जुबान पर कायम है।
मेरे दादाजी का जोर था कि मैं कृषि से संबंधित काम में उलझने की जगह केवल पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान दूं। लेकिन किसान परिवार में पैदा होने पर कुछ न कुछ तो करता ही था। और नहीं तो आम के सीजन में बाग में ही चारपाई डाल कर पड़ा रहता। इमरजेंसी के दिनों में हमारे बाग के बीच से निकलने वाले रास्ते से जो लोग बाजार जाते दिखते, हमारी मित्र मंडली उनको यह बता कर लौटा देती कि वहां जबरदस्ती नसबंदी हो रही है। बहुत सी शरारतें अब भूल गया हूं। गांव में आपस में भले लड़ाई झगड़े हों लेकिन बाहर के लिए गजब की एकता थी। चुनावों में सजी धजी बैलगाड़ी पर गांव की औरतें गाते हुए वोट डालने जाती थीं तो हम भी कौतूहल से साथ जाते। 26 जनवरी को पूरे गांव की प्रभातफेरी होती थी। गीत गौनई और नौटंकी की भी धूम रहती। सुल्ताना डाकू पर नौटंकी काफी लोकप्रिय थी और बिरहा भी। कोई मंडली आती तो भारी भीड़ जुटती थी। हमारे इलाके में एक दौर में डाकुओं का काफी आतंक रहा। बहुत अराजकता की स्थिति भी रही तो भी डाकू दलों ने हमारे गांव पर हमला नहीं किया क्योंकि यहां के लोगो की बहादुरी और एकता से वे आतंकित रहते थे। एक हमले में तो गांव वालों ने डाकुओं को भगा दिया था और एक को पकड़ लिया था। एक और हमला हुआ था जिसमें एक हथियारबंद डाकू को मेरी मां श्रीमती प्रेम कुमारी सिंह के साहस के नाते भाग खड़ा होना पड़ा था।

खैर आप लोगों ने गावों के बहुत से नाम सुने होंगे। विचित्र नाम भी सुने होंगे। लेकिन किसी गांव का नाम गुण्डा शायद पहली बार सुना हो। सरयू नदी ( घाघरा) के करीब बसा बस्ती जिले के दायरे में आने वाला हमारा गांव गुण्डा कुंवर दरअसल अयोध्या के पड़ोस में है। सूर्यवंशी राजपूतों का गांव है तो जीवन मरण के हर काम में अयोध्या जाना ही है। हम अयोध्या को अयोध्याजी और घाघरा नदी को सरयूजी के नाम से ही संबोधित करते हैं।

हमारे गांव को गुण्डा नाम 1857 के पहले स्वाधीनता संग्राम में अतिशय वीरता दिखाने के कारण अंग्रेजों से उपहार में मिला। पहले यह शाहजहांपुर नाम से जाना जाता था। आजादी मिली तो किसी को नाम बदलने की फुरसत नही मिली। हालांकि मेरे पिताजी ने कई बार ज्ञापन दिए। 1996 में अपने निधन तक वे हमेशा लिखते रहे। उनके निधन के बाद मैने उनकी सर्विस बुक और कुछ दूसरे कागजात देखे जिसमें गांव का नाम उन्होंने गोंडा कुंवर लिखा था। शायद मेरी जैसी स्थिति का सामना उनको शिक्षा जगत में करते रहना पड़ा होगा।
अब तो हमारे यहां बाढ़ की दिक्कत नहीं है। लेकिन बचपन में सरयू यानि घाघरा की बाढ़ की विकराल समस्या को हमने देखा। एक रात चारपाई से नीचे पांव रखा तो देखा कि पानी ही पानी है। इस तरह अचानक दबे पांव पूरा इलाका पानी ही पानी हो जाता था। बाढ के दौरान एक बार डूबते डूबते बचा तो ऐसी तैराकी सीखी की गंगा को भी पार करने लगा। नदी और नौकाओं के प्रति मेरे मन में आकर्षण तभी पैदा हुआ और मल्लाहों के जीवन को लेकर भी।
हमारा गांव बस्ती जिले के ब्लॉक विक्रमजोत के 97 गांवों में एक है। इसकी कुल आबादी 2177 है जिसमें 1227 राजपूत हैं,जिनके पास ही गांव की अधिकतर जमीनें हैं। यहां दलित आबादी 352 है और ओबीसी 565 है। गांव पंचायत की सीट 1995 और 2015 में महिला थी, जबकि 2000, 2005 और अब 2021 में अनारक्षित। 2010 में एक बार अनुसूचित जाति के लिए भी यह आरक्षित रही। गांव की राजनीति पर राजपूतों का ही दबदबा है। 2021 में पंचायत की सीट ओबीसी के लिए आरक्षित करने की प्रशासन ने पहल की थी लेकिन नेताओं की मदद से इसे फिर से अनारक्षित करा दिया गया।

हमारे गांव के आसपास बहुत सी कहानियां बिखरी हैं। राम और सीता से जुड़ी कहानी भी। गांव के पड़ोस से ही राम जानकी मार्ग है जो जनकपुर तक जाता है। गांव के पास ही रामरेखा नदी है जिसके बारे में कहा जाता है कि भगवान राम ने इस नदी को अपने बाण से प्रकट किया था। यहां एक मंदिर है जहां मेला भी लगता है। एक बड़ा मंदिर भी बन गया है जहां भंडारा वगैरह चलता रहता है। लेकिन आबादी का दबाव हर तरफ दिखता है। हमारे इलाके पर सीताजी का एक श्राप चने की खेती को लेकर अभी भी कायम है। डर के मारे कोई चना नहीं बोता है। पुराने लोग कहते थे कि एक बार सीताजी हमारे इलाके से गुजरीं तो उनके पांव में चने की खूंटी चुभ गयी। गुस्से में उन्होंने श्राप दे दिया कि जो चना बोएगा उसका खानदान नष्ट हो जाएगा। आज भी इसका असर मनोरमा और सरयू नदी के बीच के लंबे इलाके में देखा जा सकता है। पड़ोसी गोंडा जिले की हमारी रिश्तेदारियों से बचपन में जब चना आता था तो वो हमारे लिए वह काजू या किशमिश से कम नहीं होता था। गन्ने की खेती में तो हमारा इलाका कई दशको से अग्रणी रहा है। बाकी सारी फसलें होती ही हैं।

कौशल सिंह कृषि वैज्ञानिकों द्वारा सम्मानित होते हुए

हमारे गांव में खेती बाड़ी पुराने तरीके से ही हो रही है। कई घरों के पास अब ट्रैक्टर है और बैल तो अब दिखने ही बंद हो गए हैं। पशु भी कम घरों में ही बचे हैं। हमारे सहपाठी रहे श्री कौशल कुमार सिंह ने वैज्ञानिक खेती में जिले में ख्याति पायी है। केले और अनार की खेती में उनका काफी नाम है। जिले के वे ऐसे पहले किसान हैं जिन्होने बिना पोली हाउस के स्ट्राबेरी की खेती भी की। खेती की लागत को घटाने के कई प्रयोग भी किए हैं। कृषि विज्ञान केंद्र और कई संस्थाओं से वे पुरस्कार भी वे हासिल कर चुके हैं। पूर्वाचल के विख्यात कृषि पत्रकार बृहस्तपति पांडेय ने भी उनके कामकाज पर काफी कुछ लिखा है। कई और प्रगतिशील किसान गांव में हैं जिसमें गया प्रसाद सिंह का उल्लेख किया जा सकता है।

गांव में विकास के मैने थोड़ी दिलचस्पी उस दौरान ली जब श्री देवशरण सिह यादव बस्ती में 1995 में जिलाधिकारी बन कर आए। हालांकि उनका विचार था कि ऐसे कामों से यश की जगह विवाद ही पैदा होता है। वे हमारे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सीनियर थे और उन्होंने गांव की सड़क मंजूर की। फिर राम बिलास पासवान ने अपने संचार मंत्री काल के दौरान मंत्री कोटे से एक फोन लगवा दिया जो मेरी मां के उपयोग के साथ कई गांव वालों के काम आया। संचार क्रांति के पहले की यह बात है। बिजली भी हमारी बहन की शादी के दौरान गांव में 1988 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन ऊर्जा मंत्री श्री प्रमोद तिवारी की मदद से पहुंच गयी थी। पढाई के दिनों से ही उनका मेरे प्रति स्नेह बना हुआ था। एक फोन पर ही यह काम हो गया लेकिन ग्रामीण विद्युतीकरण में मेरे गांव का नाम एक दशक बाद आया, तब तक लोगों को बिजली का बिल नहीं देना प़ड़ा। हालांकि इन कामों में भी काफी श्रेय की राजनीति हुई और कई तरह की बयानबाजी। हमारे गांव की राजनीति भी विचित्र ही है। जब महिला सीट रही तो भी पुरुषों ने आभास नहीं होने दिया कि सत्ता महिलाओं की है। दलित प्रधान रहा तो भी ऐसा आभास मजबूत लोगो ने होने नहीं दिया। एक तबका हमेशा से गांव की राजनीति पर हावी है। लेकिन गांव क्या हमारे इलाके में सांप्रदायिक उन्माद या तनाव कभी नहीं रहा। अयोध्या से इतना करीब होने के बाद भी छावनी में मुसलिम परिवार ही नेतृत्वकारी भूमिका में रहा। उस परिवार से जुड़े इंजीनियर फारुक अहमद और गुलाम गौस मेरे पुराने साथी हैं। पूरे इलाके में घर घर में इनका सम्मान है। मेरे गांव में एक ही परिवार दर्जी का काम करने वाला मुसलमान था। बहुत सालों से मुझे उनके बारे में पता नहीं। लेकिन जब ताजिया निकलती थी तो हर घर से होते हुए उसके सेराने तक हम लोग साथ रहते थे।

गांव का काली चौरा

हमारे गांव के बीच से ‘सरयू नहर’ गुजर रही है। दशकों पहले सिंचाई और बाढ़ समस्या से निजात दिलाने के लिए इसकी खुदाई हुई थी। नहर में अब पेड़ पौधे उग आए हैं लेकिन पानी कभी आया नहीं। 2020-21 के बजट में योगी सरकार ने सरयू नहर परियोजना के लिए 1554 करोड़ रुपए का प्रावधान कर दावा किया था कि चार दशकों से अधिक से लंबित इस परियोजना को जल्दी पूरा किया जाएगा। यूपीए सरकार में इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया था लेकिन मोदी सरकार ने इसे प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना का हिस्सा बना दिया।

 

सरयू नहर जो बनने के पहले ही खंडहर है
सरयू-नहर-जिसमें-कभी-पानी-नहीं-आया

1978 में आरंभ हुई इस परियोजना में 9349 किमी नहरों के जरिए कई जिलों के किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाने के साथ घाघरा और राप्ती से हर साल आने वाली बाढ़ से भी निजात शामिल था। 2010 में इस परियोजना की लागत 7270 करोड़ रुपये और 2018 में 9802 करोड़ हो गयी। परियोजना 20वीं सदी में बननी थी लेकिन 21वीं सदी के 20 साल बाद भी पूरी नहीं हुई।

हमारे गांव की कहानी दरअसल अमोढ़ा राज से आरंभ होती है जिसके खंडहर भी अब आखिरी सांस ले रहे हैं। वर्ष 915 ई के पहले अमोढ़ा में भरों का राज था, जिसे पराजित कर सूर्यवंशी राजा कंशनारायण सिंह ने शासन किया। उनके पांच पुत्र थे जिसमें सबसे बड़े कुंवर सिंह ने अपना किला पखेरवा में स्थापित किया। कहते हैं कि अमोढ़ा के किले और राजमहल के नीचे से पखेरवा तक चार किलोमीटर लंबी सुरंग थी। कुंवर सिंह के वंशज अमोढा के इर्द गिर्द के 42 गांवों में हैं। इन गावों के आगे कुंवर लगाया जाता है। जैसे महेबा कुंवर, हुडऱा कुंवर, बसदेवा कुंवर, गुंडा कुँवर, पसवस कुंवर आदि। ये सभी काफी क्रांतिकारी गांव माने जाते हैं।

 

मेरे गांव के ही निवासी और मेरे पिताजी के सबसे प्रिय मित्रों में रहे श्री हाकिम सिंह का इलाके में काफी सम्मान रहा है। कुछ साल पहले उनका निधन हुआ। लेकिन उन्होंने इलाके के इतिहास पर बेहतरीन काम किया। मेरे पिताजी इलाके में सबसे पढ़े लिखे लोगों में थे और बहुत से लोगों को शिक्षा विभाग में नौकरी पर लगाया। इलाके में वे डिप्टी साहब के नाम से जाने जाते थे। वहीं हाकिम सिंह जी आदर्श जूनियर हाई स्कूल छावनी के प्राचार्य रहे और 1987 में राष्ट्रपति पुरस्कार भी हासिल किया। खेती के तमाम नए तरीके वे खोजते थे। अपने विद्यालय के कृषि फार्म में भी उन्होंने अनूठा काम करके दिखाया था। अमोढ़ा राज और 1857 के तमाम तथ्यों को जुटाने में हाकिम सिंह जी का बड़ा योगदान था। उन्होंने अमोढ़ा के सूर्यवंशी राजाओ की 27 पीढ़ी का पूरा विवरण तथ्यों के साथ निकाला। अमोढ़ा राज्य से लोहा लेने के लिए अंग्रेजों ने बस्ती अयोध्या राजमार्ग पर छावनी में सेना का एक शिविर स्थापित किया था। तभी से यह जगह छावनी के नाम से ही जानी गयी। अनेक अंग्रेजों के स्मारक भी यहां हैं।

छावनी शहीद स्मारक
अमोढ़ा में स्मारक और ध्वंश.

छावनी अयोध्या और बस्ती के मध्य गोरखपुर-लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग पर पड़ता है। छावनी में 1858 में अंग्रेजों ने 500 लोगों को फांसी पर लटका दिया था। यहां से एक किलोमीटर दूर है अमोढ़ा। बस्ती जिले में केवल नगर तथा अमोढ़ा के राजाओं ने ही अंग्रेजों के खिलाफ मोरचा खोला था और बाकी रियासतें अंग्रेजों की मदद कर रही थीं। कालांतर में अमोढ़ा क्रांति और क्रांतिकारियों का मजबूत केंद्र बन गया था। बाबू राजेन्द्र प्रसाद के पूर्वज मूलरूप से कुआंगांव, अमोढ़ा के ही निवासी थे। बाद में वे बलिया और वहां से बिहार में सीवान के गांव जीरादेई में बसे। इसी अमोढ़ा की वीरांगना रानी तलाश कुवंरि ने 10 महीनों तक अंग्रेजों को खुली चुनौती दी थी। 2 मार्च, 1858 तक अंग्रेजों से उनकी जंग जारी रही। 1857 की क्रांति के बाद उन्होंने हमारे गांव गुण्डा कुंवर के ही अपने भरोसेमंद सरदारों के साथ बैठक कर उन्होंने अंग्रेजों से आखिरी सांस तक लड़ने का संकल्प लिया था। हालांकि हमारे इलाके की रानी झांसी यानि तलाश कुंवरि की वीरता को इतिहास की पुस्तकों में जगह नहीं मिली। लेकिन वे आज भी लोगों के दिलों में सम्मान के साथ राज करते हुए लोकजीवन में विद्यमान हैं। दिलचस्प बात यह है कि प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 140 सालों तक वे गुमनाम ही रहीं। उनकी बलिदानी भूमिका की तलाश 1997 में बस्ती मंडल के तत्कालीन आयुक्त विनोद शंकर चौबे ने सरकारी कागजों से की। शुक्लजी हिंदी के महान आचार्य रामचंद्र शुक्ल के परिवार के हैं। उनके प्रयास से जिला महिला चिकित्सालय बस्ती का नामकरण वीरांगना रानी तलाश कुंवरि की स्मृति में किया गया। चिकित्सालय की पर्चियों ने इलाके को बताना शुरू किया कि रानी अमोढ़ा का असली नाम क्या था।

रानी तलाश कुंवरि ने 1853 में अपने पति राजा जंगबहादुर सिंह की मौत के बाद सत्ता संभाली थी और अपने शहादत के दिन यानि 2 मार्च 1858 तक शासन उनके हाथ में रहा था। उनकी व्यूह रचना के नाते ही क्रांति की ज्वाला लंबे समय तक जलती रही। हालत यह हो गयी थी कि यहां की गंभीरता को भांप कर कर्नल रोक्राफ्ट ने तटीय इलाकों से निपटने के लिए नौसेना की मदद ली थी। नौसेना का जहाज एचएमएस जमुना यहां तोपों से लैस होकर आया था। लेकिन 2 मार्च 1858 को जब रानी चौतरफा अंग्रेजों की घेराबंदी में फंस गयीं तो जंग करते हुए खुद अपनी कटार से अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। ग्रामीणों ने उनके शव को अमोढा राज्य की कुलदेवी समय भवानी का चौरा के पास दफनाया। 1858 से 1980 से उस जगह को रानी चौरा के नाम से जाना जाता था और लोग देवी की तरह ही उनकी भी पूजा करते थे। लेकिन 1980 में एक श्रद्धालु ने समय भवानी का बड़ा मंदिर बनवाने का बीड़ा उठाया तो ऐतिहासिक तथ्यों की अज्ञानता के कारण मंदिर विस्तार अभियान में रानी चौरा को भी शामिल कर लिया। रानी की शहादत के बाद यह इलाका जब्त कर पुरस्कार स्वरूप बस्ती के राजा शीतला बख्श सिंह की दादी रानी दिगंबरि कुंअरि को दे दिया गया। लेकिन यह इलाका बाद में भी क्रांति का केंद्र बना रहा। 18 जून 1858 को एक सरकारी टेलीग्राम में कहा गया था कि ‘नगर तथा अमोढ़ा को छोड़ कर बाकी शांति है……घाघरा के तटीय इलाके में बड़ी संख्या में बागियों की मौजूदगी है..।
छावनी में जिस पेड़ पर 500 लोगों को फांसी दी गयी उसमें हमारे गांव के सेनानी भी शामिल थे। 1858 से 1972 तक यह शहीद स्थल उपेक्षित पड़ा था। 1972 में हाकिम सिंहजी ने शिक्षा विभाग के अधिकारी जंग बहादुर सिह और स्थानीय अध्यापकों के प्रयास से एक स्मारक बनाने का प्रयास किया। कई गांवों से शहीदों के नामों को जुटाया और उनको शिलालेख पर अंकित कराया। इसमें हमारे गांव के क्रांतिकारी सुग्रीव सिंह का नाम भी शामिल था। उनके प्रयास से ही 30 जनवरी को हर साल शहीद दिवस पर यहां एक छोटा मेला भी लगता है।

क्रमश: जारी…

 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *