‘डर के आगे जीत है’…यूनिसेफ के साथ मिलकर टीकाकरण ​की राह आसान बना रही हैं नवली गरासिया

माउंट आबू से लौटकर संतोष कुमार सिंह

सिरोही/नयी दिल्ली: बहना चेत, चेत सखी रे… टीके का दिन आयो रे
गांव गांव भाईयों बहनो कोविड टीका लेके आयो रे
टीको लेके आयो बहनों वैक्सिन लगा लो
देह की दूरी रखो टीका लेके आयो रे…
गांव-गांव भाईयों-बहनों टीको लेके आयो रे…
कोरोना बीमारी… टीका लेके आयो रे
हर काम छोड़ दियो टीको लेके आयो रे..
परंपरागत लिबास से सजी राजस्थान के सिरोही जिले के आबू तहसील की लोक कलाकार 30 वर्षीय, नवली गरासिया। लोक कलाकार यानी लोक से ही लेना और लोक को ही देना। नवली की कला पूरी तरह लोक को समर्पित है। पांव की थिरकन हो या फिर थिरकने और गाने के बीच चेहरे की भाव भंगिमा। सबकुछ लोक को समर्पित क्योंकि लोक यानी जनता पर कोरोना जैसी महामारी की विपदा आन पड़ी थी। ऐसे में भला नवली गरासिया जैसी लोक कलाकार निकल पड़ीं लोक को जगाने और माध्यम चुना आवाज और भावभंगिमा के जरिए लोगों को सजग करने। गीत के बोल भी कोई फिल्मी नहीं है बल्कि कोरोना,वैक्सिन,मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग और उद्देश्य है बहनों, भाईयों व सखियों को चेताना,जगाना और टीका लेने के लिए आह्वाण करना। नवली को पता है कि कोरोना जैसी महामारी की खबर फैलने और सरकार द्वारा इस बीमारी से बचाव के लिए एक मात्र रामबाण टीकाकरण है जरूरी, दो गज की रखें दूरी जैसे मंत्र को बताये जाने और इस दिशा में सबका साथ, सबका प्रयास की कवायद शुरू कर महामारी से लड़ने का संकल्प लेने के बाद से शायद की कोई दिन ऐसा गुजरा हो जब उनके मुंह से टीकाकरण गीत के बोल न फूटे हों और इस गीत पर लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए नवली के पांव न थिरके हों।

लोक कलाकार नवली कुमारी गरासिया

नवली गरासिया द्वारा गाया जाने वाला टीकाकरण गीत वैसे तो कोविड 19 से बचाव के लिए और अधिक से अधिक लोग टीका लगवायें उन्हें प्रेरित करने के वर्ष 2021 सूचना अभियान का हिस्सा है जिसके जरिए लोगों से टीका लगाने का आग्रह किया गया है। लेकिन कोई भी गीत,कोई भी संगीत और कोई भी नृत्य का प्रभाव तभी होता है जब उसे परफार्म वाला कलाकार उसमें डूब गया हो। उसके महत्व को समझता हो और नवली को कोरोना की भयावहता और टीकाकरण के जरिए ही इस बीमारी से बचाव हो सकता है यह बात समझायी यूनिसेफ जैसी संस्था ने और यूनिसेफ से जुड़कर स्थानीय स्तर पर लोगों को कोरोना से बचाव और टीकाकरण के महत्व को समझाने बताने में अहम भूमिका निभा रही जन चेतना संस्थान और उसकी अध्यक्षा ने।

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चाहे कोविड टीकाकरण हो या फिर मिशन इंद्रधनुष के जरिए नियमित टीकाकरण और सरकार के स्वच्छता अभियान से जुड़े जागरूकता गीत, लोक कलाकार नवली गरासिया के पास इन सब अभियानों के लिए गीत तैयार है और उन्हें इससे जोड़ने में यूनिसेफ के साथ मिलकर जमीन पर काम कर रही है जन चेतना संस्थान और उसकी अध्यक्षा रीचा ने नवली का साथ लेकर ईलाके के लोगों को जागरूक करने की दिशा में लगातार काम किया है। कोविड 19 टीकाकरण अभियान की यदि बात करें तो नवली ने तो जैसे ठान लिया हो तब तक गाते रहना है,यानी लोगों को जागरूक करते रहना है जबतक इस बीमारी का प्रकोप न्यूनतम स्तर पर पहुंचे। और यह तभी संभव हो पायेगा जब हरेक व्यक्ति मास्क लगाये और संपूर्ण टीकाकरण हो। यानी हरेक व्यक्ति को टीके का दोनो डोज न लग जाये। कोरोना के फैलाव के शुरूआती दिनों से लेकर अब तक लवली गरासिया आस पास के लगभग 30 गांव के लोगों को खुद के द्वारा तैयार किये गये टीकाकरण गीत से टीका लगवाने को प्रेरित कर रही हैं और उनके संकल्पों की ही जीत है आज लगभग गांवों में टीके का दोनो डोज ग्रामीणों ने ले लिया है।

नवली गरासिया लोकगीत तो गाती ही हैं साथ ही वे खुद भी अपने गांव की वार्ड पंच रही हैं और लंबे समय से सरकार के ज्यादातर अभियानों से जुड़कर आसपास के गांवों में अपने गीत व नृत्य के जरिए जागरूकता अभियान का हिस्सा बनती आई हैं। इस क्षेत्र में उनके काम ने उन्हें एक सम्मेलन के लिए ऑस्ट्रेलिया सहित अन्य जगहों पर भी गई है। भले ही उन्होंने 10 वीं तक शिक्षा हासिल किया हो लेकिन शिक्षा के प्रसार के लिए सदा ही संघर्षरत रही हैं। नवली गरासिया बताती हैं कि “मुझे पता है कि शिक्षित होना कितना महत्वपूर्ण है, खासकर लड़कियों के लिए।” वे अपने गांव का अकेला स्कूल जो बंद कर दिया था, को खोलने के पीछे प्रेरक शक्ति रही है। उनके पिता एक सरकारी कर्मचारी थे और उन्होंने अपनी युवावस्था का एक हिस्सा अलग-अलग शहरों में बिताया था। लेकिन लोक की बोली और लोक की हमजोली बन जागरूकता अ​भियान से जुड़ने वाली नवली गरासिया भी कोविड टीकाकरण के लिए सहज रूप से तैयार हो गई हों ऐसा भी नहीं है। इस महामारी के डर से नवली देवी गरासिया भी अछूती नहीं थी। साथ ही टीकाकरण को लेकर जो भ्रामक वातावरण और नकारात्मक खबरें फैलाईं जा रही थी उसका प्रभाव नवली पर भी हुआ था। लेकिन यूनिसेफ और उसके साथ जुड़कर काम कर रही जन चेतना संस्थान की अध्यक्ष रीचा से मिलने और कोरोना के संबंध में व्यापक जानकारी और जागरूकता ही बचाव है के मूल मंत्र को समझ नवली गरासिया जब लोगों को समझाने के लिए गांव—गांव जाने लगीं तो उनके कदम उसके बाद से शायद ही डगमगायें हों। जन चेतना संस्थान के जरिए नवली बाई जैसी लोक कलाकार को जागरूकता अभियान से जोड़ने वाली रीचा कहती हैं आदिवासी समुदाय के मन में चाहे कोविड टीकाकरण हो या​ फिर नियमित टीकाकरण हमेशा से संदेह रहा है और पारंपरिक चिकित्सा पद्धती पर अधिकाधिक भरोसे ने टीकाकरण की राह में हमेंशा ही मुश्किलें खड़ी की है। इसके पीछे विश्वास भी है और पुरखे से चली आ रही परंपरा भी।

वे कहती है कि, “समुदाय के अधिकांश बुजुर्गों को कभी कोई टीका नहीं लगा थी। आज भी, जब गर्भवती महिलाएं, या कोई जच्चा अपने बच्चे के साथ टीकाकरण के लिए आती हैं तो उन्हें समझाना आसान नहीं होता। टीकाकरण के प्रभाव से बच्चें एक या दो दिन के लिए बीमार पड़ जाते हैं। इस दौरान घर के बड़ों की प्रतिक्रिया होती है ये सब टीकाकरण के कारण हुआ है और टीके को लेकर बातें कही जाती हैं। कोविड टीकाकरण को लेकर भी ऐसा ही माहौल बना। लोग टीकाकरण के दुष्प्रभाव संबंधी खबरों और इसके स्वरूप बुखार,शरीर में दर्द और दूसरे लहर के दौरान जगह—जगह से आ रही मौत की खबरों ने लोगों का विश्वास कमजोर किया। बावजूद इसके न सिर्फ केद्र व राज्य सरकार इस दिशा में सतत रूप से प्रयास करती रहीं बल्कि यूनिसेफ जैसी संस्थाओं ने लोगों के भ्रम को दूर करने और टीकाकरण की जरूरत पर अधिक से अधिक फोकस कर विभिन्न एनजीओ के जरिए उल्लेखनीय काम किया गया। नवली गरासिया जैसे लोक कलाकारों ने हमारे साथ मिलकर गांवों में लोगों के भय को दूर करने और कोविड 19 के दौरान बचाव और टीकाकरण से जुड़े फायदे को लोगों तक पहुंचाने के हमारे प्रयास को समझा और लोगों को समझाने में अहम भूमिका निभाई,यही कारण है कि लोग हमारी बात समझने लगे हैं और टीकाकरण की रफ्तार तेज हुई।

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यदि इस ईलाके के जनांकिकी पर बात की जाए तो आबू रोड में, जो अनुसूचित क्षेत्र में आता है, लगभग 63 प्रतिशत ग्रामीण आबादी आदिवासी हैं (सिरोही में लगभग 29 प्रतिशत आदिवासी आबादी है), जिनमें से 90 प्रतिशत गरासिया हैं। सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो जो तस्वीर उभरकर सामने आती है उसके अनुसार आदिवासियों में टीकाकरण लक्ष्य के 75 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो हस्तक्षेप से पहले लगभग 69 प्रतिशत था।

जन चेतना संस्थान से जुड़े होने के कारण करीबन गांव में टीकाकरण के प्रचार-प्रसार में सक्रिय रही है, लेकिन यहां तक ​​कि नवली गरासिया भी टीका लेने से भी हिचकिचा रही थी। हालांकि उन्होंने अब दोनों डोज ले लिया है और डर पर जीत पा लिया है। तभी तो कहा गया है,’डर के आगे जीत है।’ और अब न सिर्फ लक्ष्य कोरोना को हराने का रह गया है बल्कि नियमित टीकाकरण अभियान ने भी पूरी गती पकड़ ली है और न सिर्फ महामारी भागेगा बल्कि नियमित टीकाकरण अभियान के सुचारू रूप से संचालन के जरिए बच्चों को भी सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी।

 

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