तरक्की की राह। प्रवासी मजदूरों के घर वापसी के बाद, क्या हो आगे का रोड मैप। पंचायत खबर संभावनाओं और उम्मीदों की कड़ी दर कड़ी आपके सामने लाएगा। पढते रहिए, पढाते रहिए। प्रवासी मजदूरी बोझ नहीं हमारी तरक्की के देवदूत हैं। इस कड़ी में पढ़िए पंचायत खबर के रोविंग एडिटर कमलेश कुमार सिंह की ये रिपोर्ट…
स्टे एट होम! ’घर’ में/पर रहें! बिहार में ’घर’ का मतलब- अपन घर। किराये का नहीं। कोरोना वायरस काल में यह परहेज का आम नारा/तुकबंदी है। लेकिन हमारे समाज के कमजोर तबके यानी प्रवासी मजदूरों के लिए यह नारा या परहेज का अमल करना व्यावहारिक रुप से असंभव है। इतना ही नहीं देश के सामने मौजूदा समय में यह सबसे बड़ी चुनौती भी है। 25, मार्च को जब देश में लाॅकडाउन की घोषणा की गई, उसके चंद घंटों के बाद ही सड़कों पर प्रवासी मजदूरों का हुजूम पैदल ही अपने घर की ओर चलता दिखा। हजारो किलोमीटर दूर का सफर। पाॅकेट में गिनती के कुछ पैसे। जरुरत की मोटरी माथे पर। महिलाओं के गोद में बच्चे। कैसे पहंुचेगे घर? क्या होगा? कुछ भी पता नहीं। इनमें से कुछ तो तमाम दुश्वारियां झेलते सकुशल अपने घर पहंुच भी गए। कुछ ने सड़कों पर ही दम तोड़ दिया। कुछ दुर्घटना के शिकार हो गए। कुछ को जहां-तहां रोक लिया गया। क्वारंटीन कर दिया गया। इन लोगों ने जीवन में जो कुछ न कभी देखा, वह सबकुछ उनके साथ हुआ/ हो रहा है।
ऐसे ही प्रवासी मजदूर में से एक हाजीपुर के कौशल कहते हैं, साहब रात के आठ बजे लाॅकडाउन का आदेश हो गया। कि आधी रात से लाॅकडाउन। यानी चार घंटे में हजार किलोमीटर की दूरी। समझ रहे हैं। दिमाग के सामने सब कुछ अंधेरा। पैदल निकलने के अलावा कोई चारा नहीं। कई जगह लाठियो खाए। खाना कोई नहीं खिलाया। क्वारंटीन सेंटर में इंतजाम था। खाना-पीने का। ज्यादा दिक्कत नहीं हुआ। अब घर वाली बात तो नहीं होगा ना। इस बीच कुछ राज्यों ने प्रवासी मजदूरों के लिए बसों का इंतजाम किया। लेकिन भीड़। बसों को रोक दिया गया। केंद्र ने राज्यों को अपनी-अपनी सीमाएं सील करने का आदेश जारी कर दिया। लोेग जहां-तहां फंस गए। सरकारें नगदी, खाने-पीने की मदद की बातें की और की भी। लेकिन यह उंट के मंुह में जीरा के फोरन के सामन था। भारत की आर्थिक तरक्की में गांवों के किफायती प्रवासी मजदूरों को सबसे बड़ी भूमिका है। दिहाड़ी इतनी कि न्यूनतम मजदूरी की दर केवल कागज तक ही सीमटा हो। खैर, प्रवासी मजदूरों की संख्या बताने में दोनों राज्य सरकारें जहां के ये हैं व जहां पर हैं, ने अपना मुंह छिपाती नजर आईं। इससे देश की नीतियां व इसे बनाने वालों की कलई खुल गई। बिचैलियों के कारण भी मजदूर वर्ग ज्यादा प्रभावित हुआ। यह तो मूलभूत सिद्धांत है कि कोई भी भूखा ना रहे।
कोरोना की महामारी ने छोटी सी जगह में ठूंसे पड़े रहने वाले इन मजदूरों की स्थिति तबाह कर दी। भूख की बेहाली के बीच स्वास्थ्य व सुरक्षा के क्या मायने हैं। कई जगहों पर तो सड़कों पर चल रहे प्रवासी मजदूरों को एक साथ बिठाकर किड़े मारने वाली दवा का छिड़काव करवा दिया गया। कौशल के एक मित्र ने कहा, काम इंतजार कर लेगा, बीमारी इंतजार कर लेगी, लेकिन साहब भूख् कितना इंतजार करेगा। आनन-फानन में शिक्षकों और स्थानीय स्वास्थ्य कर्मियों को लौट रहे मजदूरों की जांच-पड़ताल में लगा दिया गया। प्रशिक्षण की बात तो छोड़िए जांच करने वाले लोगों को सुरक्ष कवच के नाम पर कुछ भी नहीं दिया गया। अफवाहों का बाजार अलग से इन लोगों को बेजाड़ किया। अब आते हैं मुख्य मुद्दे पर। बिहार में घर वापसी के लिए लगभग 28 लाख प्रवासी मजदूरों ने आवेदन किया है। निश्चित तौर पर इतनी बड़ी संख्या को सकुशल लाना बहुत बड़ी चुनौती है। इस मसले पर हो रही सियासत पर हम नहीं जाते और ना ही पलायन की समस्या पर। तीन प्रमुख सवाल हैं। पहला, इतने मजदूरों की वापसी कैसे संभव की जा सकेगी?
दूसरा, पहले से ही क्वारंटीन जूझ रहे फिर से क्वारंटीन की इतनी बड़ी व्यवस्था? तीसरा, इसके बाद परिस्थितियां समान्य होने तक इनके रोजी-रोजगार यानी भूख का क्या होगा? जब प्यास लगे तो कुंआ खोदो। यानी समस्या आने के बाद उसके निदान की कोशिश। ऐसा कब तक? सरकार फिलहाल तमाम टाल-मटोल के बाद लाने को तो तैयार हो गई। ट्रेनों से आने का सिलसिला भी शुरु हो गया। एक ट्रेन में हजार से 1200 मजदूर आएंगे। यानी लगभग 2800 फेरे। इसके बाद भगवान ना करे कि महामारी का प्रकोप बढ जाए तो क्या होगा। पहले से ही घिसिटिया रही स्वास्थ्य सेवाएं तो दम ही तोड़ देंगी। जान-माल को जो होगा, सो होगा। और भूख का? सरकार के पास कोई रोड मैप है? लेकिन, इन अंधियारे में रौशनी की छोटी सी किरण भी दिख रही है। हमारा गांव खुशहाल होगा। तरक्की करेगा। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के दम पर देश इस आपदा से बाहर निकल सकेगा। यही वक्त है सरकार और लोगों के लिए कि पलायन की समस्या को समाप्त करने का। इस बार नहीं चेते तो अब आगे शायद ही मौका मिले। महामारी मौत लेकर तो आई है, लेकिन तरक्की की राह भी तैयार की है। मौका विपदा विलाप करने का नहीं है। कोरोना आज है, कल नहीं रहेगा। जैसे मौत सत्य है, वैसे यह भी सत्य है। शारीरिक दूरी अपनाकर, बचते-बचाते तरक्की की राह पर चल पड़ना है…



