…और अच्छी पंचायतों का इंतजार

वेंकैया नायडू

उप-राष्ट्रपति

आज जब देश राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस मना रहा है, तब यह देखना जरूरी है कि स्थानीय स्तर तक सक्षम स्वशासी संस्थाएं स्थापित करने का उद्देश्य कहां तक पूरा हुआ है? क्या स्थानीय पंचायती राज संस्थाओं को वित्तीय, कार्मिक और कार्यक्षेत्र संबंधी पर्याप्त स्वायत्तता प्रदान की गई है? आज पंचायती राज को संस्थागत रूप से स्थापित हुए 27 वर्ष हो गए, तब भी ये प्रश्न प्रासंगिक हैं। निस्संदेह, देश की लगभग 2.5 लाख पंचायतें, जो स्थानीय स्तर पर हमारे विकेंद्रीकृत प्रशासनिक ढांचे की नींव हैं, देश में लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभा रही हैं। हालांकि हमारा अनुभव बताता है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जिस स्वायत्त ग्राम-स्वराज का स्वप्न देखा था, उस स्तर तक पहुंचने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है।

पंचायती राज संस्थाओं का विकास प्रक्रिया में सक्रिय योगदान सुनिश्चित करने के लिए 73वें संविधान संशोधन के सभी प्रावधानों को अक्षरश: लागू करना जरूरी है। कुछ राज्यों ने स्थानीय निकायों को अधिकार दिए हैं, पर अन्य राज्यों में इस प्रक्रिया को पूरा किया जाना अभी शेष है। अन्यथा इस महत्वपूर्ण कानून का उद्देश्य ही पूरा नहीं होगा।
मैं ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की सराहना करता हूं, जिन्होंने कोविड-19 संक्रमण के विरुद्ध अभियान में गांव के सरपंच की केंद्रीय भूमिका को पहचाना और उन्हें अपने-अपने क्षेत्र में कलेक्टर के अधिकार प्रदान किए। मुझे विश्वास है कि देश के अन्य भागों में भी पंचायती राज निकायों के जन-प्रतिनिधि अपने क्षेत्र में इस संक्रमण के विरुद्ध अभियान में लगे होंगे तथा जरूरतमंदों को सहायता पहुंचा रहे होंगे। यह स्मरण रहना चाहिए कि प्राचीन काल से ही स्थानीय स्वशासी निकाय भारतीय समाज का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। महाभारत, कौटिल्य-अर्थशास्त्र, जातक कथाओं से ज्ञात होता है कि ग्राम सभाओं को अनेक अधिकार प्राप्त थे और वे ग्रामीण जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। वे भारत की सामाजिक-आर्थिक संरचना का महत्वपूर्ण स्तंभ थीं।
अपनी वर्तमान संरचना और स्वरूप में पंचायतें तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव के कार्यकाल में अस्तित्व में आईं। आज ही के दिन 27 वर्ष पूर्व पंचायती राज प्रणाली को ग्राम, मध्यवर्ती और जिला पंचायतों के माध्यम से संस्थागत रूप में स्थापित किया गया था। पंचायती राज संस्थाएं भारत के विकेंद्रीकृत विकास और नियोजन के लिए आवश्यक माध्यम साबित हुई हैं, फिर भी स्थानीय लोकतांत्रिक संस्था के रूप में उनके सामने अभी भी कई चुनौतियां हैं।


73वें संविधान संशोधन ने स्थानीय स्वशासी संस्थाओं के लिए सिर्फ एक ढांचा तैयार किया है। उन्हें अधिकार व शक्ति प्रदान करने का दायित्व राज्यों पर छोड़ दिया गया। राज्यों के लिए यह अनिवार्य है कि वे राज्य वित्त आयोग का गठन करें तथा एक स्वतंत्र राज्य चुनाव आयोग के माध्यम से हर पांच वर्ष पर पंचायतों के चुनाव कराएं। हालांकि अन्य प्रावधान जैसे पंचायतों को वित्तीय अधिकार देना या पिछडे़ वर्गों के लिए सीटों में आरक्षण आदि राज्यों के क्षेत्राधिकार में आते हैं। स्थानीय निकायों को योजनाओं के क्रियान्वयन को जांचने और निरीक्षण करने का भी अधिकार होना चाहिए। स्थानीय निकायों के लिए आवंटित धन पंचायतों, नगरपालिकाओं तथा निगमों के खाते में जाना चाहिए। इस धन को निकायों द्वारा पारित प्रस्ताव के अनुसार ही खर्च किया जाना चाहिए, न कि किसी अन्य संस्था या राज्य की विकास एजेंसी द्वारा।
पंचायतों के अधिकारों तथा कर्तव्यों को और स्पष्टता से परिभाषित किया जाना चाहिए। उदाहरण के तौर पर, 11वीं अनुसूची के अनुसार कृषि को पंचायतों को दिए गए 29 विषयों में सम्मिलित किया गया है। कृषि अपने आप में एक व्यापक विषय है। यदि हम यह स्पष्ट कर सकें कि कृषि के कौन से आयाम या पक्ष पंचायतों का दायित्व हैं, तो उन्हें कृषि क्षेत्र में अहम भूमिका निभाने में सहायता मिलेगी। दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा यह देखना है कि पंचायती प्रणाली सरपंच केंद्रित बनकर न रह जाए। गांधीजी के अनुसार, एक आदर्श शासन प्रणाली को उत्तरदायी, जन-के्रंदित, न्यायपूर्ण और प्रजापालक होना चाहिए, जैसी भगवान राम के राज्य में थी। राम-राज्य की अवधारणा में ही ग्राम राज्य या ग्राम-स्वराज्य की अवधारणा निहित है।


ग्राम पंचायतों में समितियों को महत्व देना जरूरी है। इससे उनकी कार्य-कुशलता बढ़ेगी। ग्राम सभा के सदस्यों को पंचायत की विभिन्न समितियों, जैसे शिक्षा या स्वच्छता के लिए समिति में शामिल करने से इन निकायों की कार्य-प्रणाली में पारदर्शिता आएगी। यद्यपि कानून में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटों के आरक्षण का प्रावधान है, पर कुछ राज्यों में इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया है, जो स्वागतयोग्य है। यह अपेक्षित है कि महिला सशक्तीकरण के माध्यम से सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन हो सकेगा। हालांकि कुछ उदाहरण ऐसे भी हैं, जिनमें महिला सरपंच सिर्फ रबड़-स्टांप बनकर रह गईं, जबकि उनके परिवार के पुरुष सदस्य असल सरपंच बन बैठे। यह कुरीति स्वीकार्य नहीं हो सकती। महिलाओं को उनके अधिकारों के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए और आरक्षण के माध्यम से उनका सशक्तीकरण होना चाहिए।


हर स्तर के पंचायत कर्मियों को विभिन्न विषयों पर प्रशिक्षित किया जाना जरूरी है। इससे उन्हें वित्तीय, प्रशासनिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं को समझने में आसानी होगी तथा पंचायती राज संस्थाओं को और भी प्रभावी बनाया जा सकेगा। देश भर से अच्छी प्रक्रियाओं और उदाहरणों को संकलित कर स्थानीय भाषा में पंचायती राजकर्मियों को उपलब्ध कराने से उन्हें मदद मिलेगी।
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने 14वें वित्त आयोग की सभी सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है। आयोग ने स्थानीय निकायों पर विशेष ध्यान दिया और 2015-20 की अवधि के लिए रु 200,292.2 करोड़ सीधे ग्राम पंचायतों को प्रदान किए, जो 13वें वित्त आयोग द्वारा दी गई अनुदान राशि के तिगुने से भी अधिक है। जहां पहले अनुदान जिला और ब्लॉक पंचायत सहित तीनों स्तरों के निकायों के लिए होता था, 14वें वित्त आयोग का अनुदान सिर्फ ग्राम पंचायतों के लिए है। पर्याप्त वित्तीय संसाधनों से पंचायतें विभिन्न क्षेत्रों में स्वावलंबन प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती हैं। इससे बेहतर आजीविका की तलाश में गांवों से शहरों के लिए पलायन कर रहे ग्रामीणों का प्रतिस्थापन रुकेगा। स्थानीय स्तर पर एक सक्षम स्वशासन, ग्राम राज्य के माध्यम से राम राज्य प्राप्त करने का साधन बन सकेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं..हिन्दुस्तान से साभार।

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