नयी डगर…नया सफर

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दीपक कुमार
रात भर बस का सफर तय करके सुबह रांची पहुंचा। रात भर सो न पाया था, सो नींद तो आ रही थी लेकिन मन में एक रोमांच भी था। थकान की जगह उत्साह था। बस स्टैंड के सार्वजनिक शौचालय में फारिग होकर अगले सफर के लिए तैयार हुआ। अगला पड़ाव था ‘जलडेगा’। झारखंड के सिमडेगा जिला में एक गांव है जलडेगा जो अपनी बसावट के लिहाज से मुझे आकर्षित करता है। यहां से उड़ीसा की सीमा काफी नजदीक है। इस सफर में मेरे साथी थे अनुज भैया और अर्चना दीदी। जलडेगा अनुज भैया का ही गांव है। पहले भी एक बार अनुज भैया के गांव जा चुका था उनकी शादी के मौके पर लेकिन उस समय कुछ अधूरा छूट गया था जिसे पूरा करना था।

बहरहाल, रांची स्टेशन से बानो के लिए सफर शुरू हुआ। पैसेंजर ट्रेन थी, जनरल डब्बे में किसी तरह धक्का-मुक्की करके चढ़ गए हमलोग। भीड़ इतनी थी कि लगा खड़े-खड़े ही जाना पड़ेगा। ट्रेन में जनरल बोगी में सफर करने का भी अपना ही मजा है। बहुत कुछ मिलता है देखने और सुनने को और जब दो दोस्त साथ हों तो फिर बातों का सिलसिला खत्म थोड़े ही होता है। मैं और अनुज भाई तो अपनी बातों में ही लगे हुए थे। साढ़े तीन घंटे का सफर तय करने के बाद हम बानो पहुँच गए। ‘बानो’ एक छोटा सा स्टेशन है। वहां से हमने छोटी टेम्पो ली और चल पड़े गाँव की ओर।

बानों से जलडेगा का छोटा-सा सफर भी बहुत कुछ समेटे हुए है। जाना तो हमें गांव था लेकिन पहुंचे कोलेबिरा। रास्ते में अनुज भैया की एक दीदी मिल गयीं। उनकी गाड़ी से ही हम कोलेबिरा आए थे। यहां रथयात्रा का मेला लगा हुआ था। अब तो मेला नाम सुनते ही ऐसा लगता है जैसे कोई प्रागैतिहासिक चीज हो। पिछली बार कब मेले में गया था याद भी नहीं है। मेला में भीड़ इतनी थी कि पैदल चलना भी मुश्किल था। हम सबके बीच सबसे ज्यादा उत्सुक अगर कोई था तो अर्चना दीदी। उनके चेहरे पर एक बच्चे की उत्सुकता थी। लगभग आधे घंटे पैदल चलने के बाद हमलोग मेले में पहुंचे। वहां इतनी भीड़ थी कि दम ही घुट जाए। फिर भी जैसे तैसे करके बचते-बचाते हमलोग आगे बढ़ते रहे। मेला अपने पूरे रंग में था। कहीं नागिन और जिन्न वाला शो चल रहा था तो कहीं मौत का कुआं था। मेले की पारंपरिक चीजों के साथ कुछ आधुनिक खेल भी नजर आ रहे थे जो गांवों में बाजार के बढ़ते कदम की झांकी पेश कर रहे थे। गांवों में भी अब टोरा-टोरा, नेक-ब्रेक जैसे झूले आ चुके हैं। एक तरफ पारंपरिक खेलों के काउंटर खाली नजर आ रहे थे वहीं नए खेलों के काउंटर पर बेतहाशा भीड़।

उसी भीड़ में धक्का-मुक्की करके टिकट खरीदा गया नेक-ब्रेक का। जितनी मशक्कत टिकट खरीदने में हुई उससे दुगनी मशक्कत झूले पर चढ़ने में हुई। पांच मिनट के चक्कर के लिए हमलोग एक घंटे से धक्का-मुक्की का खेल खेल रहे थे जो भी हो मजा खूब आया। इसलिए नहीं कि मेला बहुत मजेदार था बल्कि इसलिए कि अरसे बाद बचपन फिर से जिन्दा हो गया था। मेले में गया तो था एक गंभीरता लिए हुए लेकिन जब लौटा तो बचपना साथ लेता आया। मेले में घुमते-घुमते भूख लग गयी थी। बाहर निकलते ही मेरी नजरें खाना ढूंढ रही थीं। जब कुछ नहीं मिला तो पानी पूरी से ही पेट भर लिया। उसके बाद हमलोग निकले गाँव की ओर।

गांव की सीमा में जब दाखिल हुए तब तक अंधेरा घिर आया था। फिर भी गांव की झलक मिल रही थी। इस गांव में अधिकतर घर कच्चे ही हैं। बहुत कम ही घर हैं जो पक्के हैं। चूंकि पहले आ चुका था तो कुछ अपरिचित-सा था नहीं। घर पहुंचे तो मां-बाबूजी से मिलने के बाद दोनों भाई चल दिए कुंए पर नहाने। पूरे 20 साल बाद मैं कुंए पर नहाने गया था। खेतों की मेड़ों पर चलते हुए पहुंचे कुंए पर। गांव में भी फुटबॉल का क्रेज कम नहीं है। बाबूजी ने फुटबॉल विश्व कप देखने के लिए हौंडा जेनरेटर भी खरीद लिया था। उस दिन तो क्रोएशिया और इंग्लैंड के बीच वल्र्ड कप सेमी फाइनल मैच होने वाला था। मैच भी इस सफर की तरह ही रोमांचक था। मैच खत्म होने के बाद हमलोगों ने खाना खाया और सो गए। दो दिन और एक रात के बाद बिस्तर नसीब हुआ। गिरते ही कब नींद आई पता ही न चला।

सुबह काफी देर से नींद खुली। नित्य कर्म के बाद जंगल जाने का प्लान था। सो हमलोग तैयार होकर निकल पड़े जंगल की ओर। साथ में खाने की कुछ चीजें और पीने का पानी। अब जंगल जा रहे थे तो धनुष और तीर भी हमारे साथ थे। गांव में मैं कभी चप्पल या जूता नहीं पहनता। खाली पैर चलना ज्यादा सहज लगता है। इसलिए मैं नंगे पैर ही था। जब हम लोग जंगल में दाखिल हुए तो जंगल की हवाओं ने हमारा इस्तकबाल किया। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते गए जंगल हमारे बीच खुलता जा रहा था किसी पुराने साम्राज्य की तरह। वैसे गए तो थे हम खुखड़ी (कुकुरमुत्ते को ही खुखड़ी कहते हैं) चुनने के लिए लेकिन कमान पर तीर चढ़ा था। अब तक तो सिर्फ यही जानता था कि कुकुरमुत्ता या तो सफेद होता है या फिर भूरा। वहां तो जैसे उनका बाग ही था। गुलाबी, पीला, हरा, सफेद, भूरा और न जाने कितने ही रंग के मशरूम थे। बरसात के मौसम में इनकी पैदावार ज्यादा होती है। यही वजह है कि जंगल के आसपास के गांववाले यहां खुखड़ी बीनने आते हैं। यहां कोई रोकटोक नहीं है जिसे जितना चाहिए उतना ले जाए। बीच-बीच में छोटे-छोटे खेत भी नजर आ रहे थे। ये खेत जंगल को साफ करके बनाए गए थे। इस जंगल में अधिकतर पेड़ सखुआ के थे जिसके पत्ते भी हमें तोड़ने थे। सखुआ के पत्तों से दोना बनता है जिसका इस्तेमाल दैनिक जीवन में घर में होता है। इसे बाजार में बेचा भी जाता है जिससे कुछ आमदनी हो जाती है।

अगले दिन धान की रोपनी होनी थी। सुबह से ही सबलोग लगे थे बिया उखाड़ने में। मैं आदतन देर से सो कर उठा। उठते ही खेतों की ओर गया जहां सभी काम कर रहे थे। एक तरफ खेतों से बीज उखाड़े जा रहे थे तो दूसरी ओर खाना पक रहा था। यहां एक बात मुझे बहुत अच्छी लगी कि गांव के सभी लोग एक-दूसरे के खेतों में काम करते हैं और जिस दिन जिसके खेत में काम होता है उस दिन वही सबके लिए खाना बनाता है। वहां कुछ लड़कियां भी काम कर रही थीं। हंसी-ठिठोली करती हुई धान के हरे-हरे पौधों को किसी मशीन की तेजी से निकाल रही थीं। सारी लड़कियां कॉलेज में पढ़ती हैं और अपना खर्चा खुद ही वहन करती हैं। इन्हें देखकर मुझे उन लड़कियों का ध्यान आया जिन्हें सब कुछ मिलता है लेकिन फिर भी उनमें ललक नहीं होती है जो इनमें थी। इन्हें खेतों में काम करने से भी कोई परहेज न था और न ही चैक पर जाकर हंड़िया बेचने से। अगर कोई बात मायने रखती है इनके लिए तो वह है अपनी पढाई का खर्च निकालना।

पथरीली जमीन पर ऊंचे-नीचे खेतों से होते हुए हम वहां पहुंचे जहां रोपनी होनी थी। वहां एक अनुष्ठान होना था। यह अनुष्ठान रोपनी से पहले किया जाता है। सबसे पहले खेत की गीली मिटटी से चार वेदियां बनायीं गई, फिर उसके चारों ओर अनाज के दाने डाले गए और फिर कुछ मन्त्र पढ़े गए। मन्त्र तो मुझे समझ में नहीं आए क्योंकि वे मुंडारी में थे। फिर भी अच्छा लग रहा था। इसी बीच हमारा एक मुर्गा भाग निकला जो बलि के लिए लाया गया था। उसे पकड़ने के लिए मैं और वो बुजुर्ग भी दौड़े जो साथ आए थे। पत्थरों के बीच झाड़ियों में मुर्गा जाकर छिप गया था। काफी मशक्कत के बाद पकड़ कर लाए। फिर उनकी बलि दी गई और उनके कुछ पंख वहां वेदी पर रखे गए। फिर सखुआ के पत्ते से बने दोने में हंड़िया भरकर चढ़ाया गया। इसतरह यह अनुष्ठान संपन्न हुआ। फिर प्रसाद के रूप में हमें हंड़िया दिया गया जो बहुत ही मीठा था। मुझे याद है जब अपने गांव में सुबह की ताड़ी जब पीते थे तो जैसा मीठापन उसमें होता था कुछ वैसा ही मीठापन इसमें भी था।

अनुष्ठान खत्म होने के बाद रोपनी का काम शुरू हुआ। मैंने भी अपने हाथ आजमाए। वैसे बचपन में यह काम किया था लेकिन वर्षों से नहीं किया था इसलिए हाथ थोड़ा धीमे चल रहे थे। बाकियों के हाथ तो किसी मशीन की तरह काम कर रहे थे। मशीनों में भी समझ होती तो वे भी इष्र्या से भर उठते। मैं और अनुज भैया ने एक ओर से रोपना शुरू किया। आधे-एक घंटे तक रोपने के बाद हमलोग बाहर आ गये। तब तक बाकी लोग काम करने के लिए आ गए थे। फिर हम घर की तरफ चल पड़े। बीच में चुएं पर हाथ-पैर धोए और थोड़ी देर वहीं सुस्ताए फिर घर आये। चुएं का पानी ठंडा होता है सारी थकान एकछिन में गायब हो गयी। घर आए तो दादा लोग मुर्गा साफ कर रहे थे। कटाई-छंटाई के बाद मैंने उसमें से थोड़ा-सा मांस निकाला देसी स्टाइल में बनाने के लिए। मांस को सखुआ के पत्तों में लपेट कर बांध दिया और उसपर गाढ़ी मिटटी का लेप लगा दिया। मिटटी लगाने से पत्तों के जलने का खतरा नहीं होता। फिर उसे आग में डाल कर हंड़िया पीने बैठे। आधे घंटे बाद उसे निकाला। आग में पड़ने से मिटटी सख्त हो गयी थी उसे फोड़ कर साफ किया, फिर गरमागरम मांस खाने के लिए तैयार था। सखुआ के पत्तों के रस से सिक्त और मिटटी की सोंधी गंध में पका मांस। याद करते ही मुंह में पानी आ जाता है।

गांव कहीं का भी हो, अंततः होता तो गांव ही है। उसकी अपनी संस्कृति होती है, अपनी ही दिनचर्या। यहां किसी तरह की कोई हड़बड़ाहट नहीं। सबकुछ अपनी गति से होता चला जाता है। मैं आया था इस गांव में एक मेहमान की तरह लेकिन किस क्षण यह गांव मेरा अपना हो गया पता भी न चला। अब जैसे लगता है यह मेरा ही गांव है और इसके लोग मेरे अपने लोग हैं।
(प्राध्यापक,हिंदी विभाग,गोरूबथान गवर्नमेंट कॉलेज, कलिम्पोंग, पश्चिम बंगाल।)

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