हंसब ठठाइ फुलाउब गालू।

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डॉ बुद्धिनाथ मिश्र

जिस दिन देश आजाद हुआ था, मैं मां के पेट में था। जब जनमा, तब ज्योतिषी पिताजी ने अपनी कापी में जिसमें देवधा गांव ही नहीं, पूरे परोपट्टा के बाबू साहबों की जन्मतिथि दर्ज थी, मेरा भी जन्मदिन टीप दिया गया था-आश्विन कृष्ण चतुर्थी शनि को पंडित भोला मिश्र की स्वभार्या से द्वितीय पुत्र का जन्म हुआ, जिसका राशिनाम वसुदेव होगा। उस समय घर पर पिताजी नहीं थे। नवजात शिशु के जन्म के समय का निर्धारण पलटनिया चमाइन ने किया था। वही शिशु की नाल काटती थी और बाद में लगभग एक मास तक प्रसूता की जमकर मालिश करती थी। बलिष्ठ ऐसी कि बड़े-बड़े पहलवान भी उससे डरते थे कि कहीं गट्टा पकड़ लिया तो हनुमान जी भी आकर नहीं छुड़ा सकेंगे।

अंग्रेज लाख सर पटककर चले गए, लेकिन गांव की दिनचर्या पंचांग की तिथियों पर ही चलती थी। तिथियां भी दो तरह से गिनी जाती थीं। एक चंद्रमा के घटने-बढ़ने से और दूसरा सूर्य की गति के अनुसार। चांद्रमास की तिथियां पंडित जी अपना पंचांग देखकर और घर के बूढ़े-बूढ़ियां चंद्रमा के उगने के समय और उसके आकार को देखकर बता देते थे। यह गुर बच्चों को भी सिखाया जाता था। इसीलिए हमलोग रात में चंद्रमा को देखकर बड़ी आसानी से तिथि बता सकते हैं। दूसरा विकल्प सूर्य का था, जिसकी गणना अधिक वैज्ञानिक मानी जाती थी। इसीलिए सौरमास की संक्रांति के अनुसार ही सारे मासिक धर्म-कर्म किये जाते थे। जैसे सिमरिया धाम में कार्तिक मास का स्नान संक्रांति से संक्रांति तक ही किया जाता था।

रही बात शिशु के जन्म के समय के निर्धारण की, तो उसकी एकमात्र अथारिटी पलटनिया ही थी ,जो पंडित जी को इतने पहर और इतने पल का अनुमान लगाकर बोलती थी और पंडित जी को वही मानना पड़ता था। यह शास्त्र पर लोक के प्रभुत्व का प्रमाण था। यह भूमिका बाद में स्कूल के मास्टर जी निभाने लगे। बच्चे का जन्मदिन कोई हो, मास्टर जी ने अपनी रजिस्टर में जो तारीख लिख दी, उस ब्रह्मलेख के आगे पंडित जी की जन्मपत्री फेल। मजे की बात यह कि मास्टरजी की रजिस्टर में पूरे क्लास भरके बच्चों की जन्म-तारीख एक ही लिखी होती थी। जैसे मेरे क्लास के सभी छात्र पहली मई, 1949 को पैदा हुए थे।

मेरी जन्मपत्री में पिताजी ने जो डेट आफ बर्थ लिखा, वह बहुत बाद में उस साल का पंचांग देखकर मालूम हुआ-4 अक्तूबर, 1947 यानी गांधी जी के जन्मदिन के दो दिन बाद। पलटनिया चमइन का गांव में यह रुतबा था कि जब हमारे घर आती तो हम बच्चे पांव छूकर प्रणाम करते और आशीर्वाद के लिए वह पीठ पर ऐसी धौल जमाती कि हम गिरते-गिरते बचते। लेकिन जीवन की यात्रा में पलटन वाली असली तारीख नहीं चली। मास्टर जी वाली तारीख ही चली। मेरी शिक्षा-दीक्षा, नौकरी, पासपोर्ट, रिटायरमेंट सब में मास्टर जी वाली जन्मतिथि ही दौड़ती रही। यह द्विजत्व यानी दो बार जन्म लेने का रिवाज हमारी पीढ़ी के सभी शिक्षित लोगों को झेलना पड़ा।

मेरा परिवार आंशिक रूप से पौरोहित्य और आंशिक रूप से छोटी जोत की खेती पर निर्भर था। गांव के यजमान हर फसल को काटकर घर लाने के बाद उससे अगों (विष्णु का अंश) निकाल कर अपने पुरोहित के लिए रख देते थे। इसी प्रकार वे एकादशी व्रत का पारण करते समय अपने पुरोहित के एक संध्या भोजन के लायक चावल, दाल, नमक और आलू दान में रख देते थे, जिसे सिदहा कहा जाता था। बचपन में अगों और सिदहा यजमानों के घर से लाने का काम मेरा था, क्योंकि बड़े भाई साहब संस्कृत पढ़ने काशी चले गए थे और छोटा भाई इस काम के लिए बहुत छोटा था। इस काम में मेरा मन भी लगता था क्योंकि उतनी देर के लिए मुझे अमरकोश के श्लोक और अष्टाध्यायी के सूत्र घोखने से छुटकारा मिल जाता। हमारी सारी प्रारंभिक पढ़ाई इन्हीं दो पोथियों पर केंद्रित थी। इसके अलावा दुखरन देवान की खानगी थी, जिसमें मुख्यतया गरहां-हुट्ठा तक का पहाड़ा मौखिक रूप में और जोड़-घटाव-गुणा-भाग स्लेट-पेंसिल पर सिखाया जाता था। गरहां हुआ साढ़े तीन का पहाड़ा। हुट्ठा कितने का होता था, यह याद नहीं। शायद साढ़े चार का होता था, एक हुट्ठे साढ़े चार, दो हुट्ठे नौ, तीन हुट्ठे साढ़े तेरह, आदि। इन पहाड़ों को याद करनेवाले हमारी पीढ़ी के लोग कैलकुलेटर से जल्दी गणना कर लेते हैं। कभी अपने सब्जीवाले को हिसाब जोड़ते देखिए।

गांव भर में कुल डेढ़ स्कूल थे। एक पुरनकी पोखर पर प्राथमिक पाठशाला थी, जिसके वनमैन आर्मी थे बंगरहटा गांव वाले पंडित जी। एक मिडिल स्कूल भी था-गीता स्मारक माध्यमिक विद्यालय, जिसे हम डोमवा स्कूल इसलिए कहते थे कि वह गांव के सीवान पर डोमों के टोले से सटा हुआ था। बाबू गीता सिंह ऐसे एकबाली हुए कि आज भी इस गांव का पोस्टल नाम गीता देवधा ही है। यह मिडिल स्कूल उनके पुत्र बाबू जगन्नाथ प्रसाद द्वारा अपने प्रतापी पिता की स्मृति में दान की हुई भूमि पर बना है। सुना है, गांव के लोग अब स्कूल के साइन बोर्ड से गीता बाबू का नाम हटा देना चाहते हैं। कुछ न करनेवाली जमात की एक मंशा यह भी होती है कि मैं नाकारा साबित होऊं तो दूसरे भी इसी कोटि में रहें।

इसी जमात ने गांव में हाई स्कूल नहीं खुलने दिया कि सोलकन (पिछड़ी जाति के लोग) पढ़ लेंगे तो यहां काम कौन करेगा! हालांकि, वे उन्हें रोक नहीं पाए। क्या सोलकन और क्या बाभन(सवर्ण), सभी अपने गांव के खेतों में काम करना छोड़ कर पंजाब जाने लगे, जहां उन्हें भरपेट भोजन के अलावा नकदी भी मिलती थी। मेरे गांव में खेत चार भाइयों में बंटकर इतने छोटे-छोटे हो गए थे कि उनसे गिरहथ के परिवार का ही पेट भरना मुश्किल था। उन्हें खेत की फसल से पुरोहित के लिए अगों निकालने या नाऊ-माली-कुम्हार आदि का अंश निकालने में दिक्कत होने लगी। फलतः पुरोहित सहित सभी जातियों के लड़के बाहर के स्कूलों में पढ़कर नौकरी तलाशने शहर भागने लगे।

अपने जातिगत पेशे को लात मारकर शहरों में जाकर रिक्शा चलाने या ठेले लगाकर गुजारा करने का सिलसिला ऐसा बढ़ा कि आज मेरे गांव में युवा वर्ग गायब हो गया है। या तो बूढ़े लोग मिलेंगे या उन थोड़े-से घरों के बच्चे, जो शहर जानेवालों की वेटिंग लिस्ट में हैं।

श्राद्ध-विवाह में न्योता खानेवाले लोग नहीं मिलते। हमारे बचपन में सामाजिक भोज सचमुच सामाजिक होते थे। खाना बनाने से लेकर दही परोसने वाले तक सुनिश्चित थे। वे सभी अपना काम छोड़कर इसमें लगते थे। पूरा भोजन अमनिया बनता था, प्रसाद की तरह पवित्र और स्वादिष्ट। लहसुन-प्याज का नाम लेना भी वर्जित। जमीन पर पुआल की पतली-सी बीड़ी पर बैठकर, केले या पुरइन (कमल) के पत्ते पर चूड़े की मेड़ बांधकर दही सुरकने में या भात की सफेद सेज पर गमकती अरहर की दाल पर छलकते घी का सुरभित स्वाद आज भी याद कर सुख मिलता है। मुख्य भोज के बाद प्रत्येक निमंत्रित घर के स्त्रीगण के लिए गिनकर और अंजुरी से नापकर परोसा भेजा जाता था। ब्राह्मण भोजन में अंत में पैसा-सुपारी और भोजनी दी जाती थी। अब श्राद्ध-विवाह में बाहर से कैटरर आकर सारा खाना बनाता है, जिसमें न वह स्वाद है न वह पवित्र गंध। भोज में युवा पीढ़ी की अनुपस्थिति से भी बहुत फर्क पड़ा है।

मेरे गांव के बीच में करेह नदी की एक अनाम धारा बहती थी, जो बाढ़ के दिनों में लबालब भर जाती थी और गर्मी के दिनों को छोड़कर, बाकी सभी महीनों में स्वच्छ जल से भरी रहती थी। सभी टोलों की लड़कियां सामा-चकेबा का भसान इसी जलधारा में करती थीं। सबसे बड़ा छठ पर्व भी इसी के घाटों पर होता था। चूंकि बहुत-से व्रती अपनी मनौती के अनुसार घर से घाट तक दंडप्रणाम करते थे, इसलिए एक सप्ताह पहले से ही रास्तों और घाटों को साफ कर दिया जाता था। सबसे लोकप्रिय था बड़तर घाट जहां छठपूजा की शाम और सुबह कमर भर पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ देनेवाले स्त्री-पुरुषों को देखना पुण्य का काम था। बड़तर घाट इसलिए कि वहां बरगद का इतना विशाल पेड़ था कि उसपर सैकड़ों पक्षियों का वास तो था ही, तमाम लोग उसकी छाया में बैठकर गांव के समाचारों को फेंटते रहते थे।

उसी महावृक्ष के समानांतर एक पीपल का पेड़ था, जिसकी जड़ में एक पक्का घर था, जिसका नाम स्याम सिंह थान था। बाद में मालूम हुआ कि स्याम सिंह देश भर के डोमों के देवता हैं। डोम लोग आज भी न जाने कहां-कहां से आकर यहां सूअर की बलि देते हैं। एक बड़ा सूअर और एक छोटा। बड़ा स्याम सिंह के लिए, छोटा उसके बेटे के लिए। स्याम सिंह हिरनी गांव का क्षत्रिय था। उसने डोमिन लड़की से शादी कर ली, जिससे एक बेटा हुआ। गांव से निकाल दिए जाने पर वह देवधा आकर बस गया था। बाप-बेटा दोनों पहलवान। कोई पंजा नहीं लड़ा पाता। एक रात सोते समय बाप-बेटे को किसी पापी ने काट दिया। तबसे बाप-बेटे के लिए डोम जाति के लोग अलग-अलग बलि देते हैं। करेह नदी पर बांध पड़ जाने के बाद गांव की यह धार सूखती गयी और लोग इस पर कब्जा कर डेरा डालते गए। आज उस धार की केवल पनीली यादें रह गयी हैं!

देवधा गांव का नाम अकेला नहीं लिया जाता है। जब भी बोलेंगे तो देवधा-पटसा। पटसा मैथिल ब्राह्मण का गांव और देवधा भूमिहार ब्राह्मण का। हमारे पुरखे भी पटसा से ही आए थे। आए नहीं, बुलाए गए थे। जमींदारों के गांव में विद्वानों को बसाने के लिए जमीन-जायदाद दिए गए थे। हमारी भैयारी पटसा में ज्यादा थी, इसलिए भैयारी भोज खाने हमलोग एक कोस दूर पटसा जाते थे और वे भी आते थे। पटसा में बहुत से भूमिहार थे, जो नाम के साथ राय न लगाकर झा लगाते थे। उन्हीं में हुए आचार्य रामेश्वर झा, जो कश्मीर और काशी से लेकर मिथिला तक में शैव दर्शन के अप्रतिम विद्वान थे। वे आधा समय कश्मीर में और आधा समय काशी में रहते थे। वे भाई साहब के गुरुजी और पिताजी के मित्र थे। ध्यानावस्था में उनके मुंह से निकले श्लोकों को भाई साहब ने ही संकलित किया, जो पूर्णता प्रत्यभिज्ञा शीर्षक से तारा यंत्रालय , काशी से छपा था। वे जब गांव आते तो उनसे मिलने दूर-दूर से विद्वतजन आते थे।

अपनी विद्वत्ता के लिए प्रसिद्ध मैथिल ब्राह्मण पूरे देश की रियासतों के दरबार की शोभा थे। मेरे बाबा पं लक्ष्मीकांत मिश्र व्याकरण शास्त्र में काशिराज से स्वर्ण पदक प्राप्त थे। गांव में संस्कृत शिक्षा का ऐसा वर्चस्व था कि कुछ दशक पहले तक अंग्रेजी पढ़ा-लिखा युवक विद्वान नहीं माना जाता था। केवल संस्कृत शिक्षा प्राप्त युवक ही विद्वान गिना जाता था। मेरे बाबा ने अपने घर पर रखकर जिन छात्रों को पढ़ाया, वे बाद में जीवन-पर्यंत उनकी कीर्ति पताका फहराते रहे। मैथिल ब्राह्मण में गोत्र के अलावा मूल भी होता है। हमारे परिवार का गोत्र काश्यप और मूल है दरिहराय डीह। देवधा-पटसा के सभी मैथिल ब्राह्मणों का यही मूल-गोत्र है। लगभग चार सदी से यहां पंजी प्रथा है, जिसमें पंजियार प्रतिवर्ष गांव-गांव जाकर ब्राह्मण परिवार में जन्मे नए शिशुओं का नाम नोटकर उसके वंश-वृक्ष में जोड़ देता था। इससे पिता की ओर से सात पुश्त और माता की ओर से पांच पुश्त में शादी-ब्याह से परहेज हो।

देवधा गांव मूलतः जमींदारों का गांव था। हमने बचपन में देवनन्दन बाबू की नफासत देखी है। रात में पेशाब करने निकलते तो नौकर छाता लगा देता था कि कहीं मालिक को ओस न लग जाए। रामनारायण बाबू के प्रपंच से सभी बबुआन डरते थे। साहित्य-संगीत-कला में जगन्नाथ बाबू की खास रुचि थी। यह उनका ही रसूख था कि मुख्यमंत्री तक देवधा गांव आते थे। इसलिए, यहां खेतों की सिंचाई के लिए ट्यूब वेल और उसे चलाने के लिए बिजली का तार 1955 के आसपास ही आ गया था, जब अन्य गांवों के लोग इसका सपना भी नहीं देखते थे। यह दूसरी बात है कि गांव वालों के स्वार्थ-केन्द्रित आचार-विचार के कारण देवधा उसका पूरा लाभ नहीं उठा सका।

समय के साथ पुरानी हवेलियां ढहती गयीं और बाहर में कमाने वालों का नया महल उठता गया। मनरेगा ने गरीब परिवारों को आर्थिक सहायता तो दी, मगर गांव में खेतिहर मजदूरों का अकाल पड़ गया है। किसानों ने बैलों का साथ तो कभी का छोड़ दिया। अब निराई कटाई आदि के लिए भी किराए पर मशीन ले आते हैं। इस सबका एक अशुभ परिणाम यह निकला है कि शारीरिक ऊर्जा के लिए लोकप्रिय जातियां संघर्ष-रहित जीवन जीते-जीते अपाहिज होती जा रही है! कभी पौरुष का धनी मेरा देवधा गांव नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव से और युवा प्रतिभा के अभाव से अकिंचन, निर्धन होता जा रहा है। गरीब पहले भी था, गरीब आज भी है। पहले भौतिक दृष्टि से, आज आध्यात्मिक दृष्टि से। बरबस बाबा तुलसी याद आते हैं-
दुहुं न होइ एक संग भुआलू। हंसब ठठाइ फुलाउब गालू।

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार, हिन्दी और मैथिली में अनेक काव्य संग्रह, अनेक पुरस्कारों से सम्मानित, कई संस्थानों में राजभाषा अधिकारी और पत्रकार रहे।)

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