परिवर्तन की पहल पर नाट्यसंस्था रंगश्री द्वारा ग्राम नरेंद्रपुर में हुआ भोजपुरी नाटकों का मंचन

संतोष कुमार सिंह
सीवान: इस वर्ष भोजपुरी नाट्य महोत्सव- 2021 दिल्ली में नहीं बल्कि दिल्ली से दूर बिहार के सीवान जिले के ​नरेंद्रपुर गांव में 20 मार्च से 25 मार्च तक आयोजित किया गया। दिल्ली की जानी-मानी नाट्य संस्था ‘रंगश्री’ की ओर से सातवें भोजपुरी नाट्य महोत्सव का आयोजन भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय एवं सीवान की संस्था परिवर्तन की विशेष भागीदारी के जरिए ग्राम नरेंद्रपुर में नाट्य श्रृंखला का आयोजन किया गया।
रंगश्री के निर्देशक महेन्द्र प्रसाद सिंह कहते हैं कि भोजपुरी नाट्य महोत्सव में पांच नाटकों की सात प्रस्तुतियां रंगश्री के कलाकारों ने पेश किया। स्व. नरेन्द्र रस्तोगी मशरक कृत नाटक ‘मास्टर गनेसी राम’ से महोत्सव का शुभारंभ 20 मार्च को मुक्ताकाश मंच, परिवर्तन परिसर, नरेन्द्रपुर, सीवान, बिहार में हुआ।

मुक्ताकाश मंच में 21 मार्च को परिवर्तन रंगमंडली ‘अश्लीलता, कोरोना आ लॉकडाउन’ प्रस्तुत करेगी, जिसके निर्देशक हैं आशुतोष मिश्रा थे। वहीं 22 मार्च को पद्मश्री दया प्रकाश सिन्हा कृत नाटक ‘अपने अपने दाव’ का मंचन किया गया। कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए 23 और 24 मार्च को महेंद्र प्रसाद सिंह लिखित दो नाटकों- ‘बिरजू के बिआह’ और ‘खुदा ना खास्ते’ का मंचन हुआ।

कार्यक्रम की झलकियां
पहला दिन
नाटक का शीर्षक स्व. नरेन्द्र रस्तोगी मशरक कृत नाटक मास्टर गनेसी राम..निर्देशक महेंद्र प्रसाद सिंह
सरकारी विद्यालयों की कार्य प्रणाली पर जबर्दस्त चोट करने वाला यह नाटक शिक्षा व्यवस्था की पोल खोल कर रख देता कि कैसे एक ईमानदार शिक्षिका का चरित्र हनन किया जाता है और उसे विद्यालय से निष्कासित करने का षड्यंत्र किया जाता है। यह नाटक शिक्षा और शिक्षा विभाग से जुड़े सभी लोगों के लिए आत्म विश्लेषण को प्रेरित करता है। मास्टर गनेसी राम की भूमिका में महेंद्र प्रसाद सिंह, ईमानदार शिक्षिका मिस लाली की भूमिका में किरण अरोड़ा, पुरूष शि​क्षकों की भूमिका में अखिलेश कुमार पांडेय, डिप्टी साहब की भूमिका में गौरव प्रकाश आदि शामिल रहे।
….

दूसरा दिन
नाटक का शीर्षक “अश्लीलता, कोरोना और लौकडाउन”
निर्देशक—आशुतोष मिश्रा
भोजपुरी लोक शैली में यूं तो कई संस्थाओं ने स्व भिखारी ठाकुर के नाटकों का मंचन बार बार किया है पर वो बात नहीं आई जो भिखारी ठाकुर या उनके समकालीन मंडली वालों के नाटकों में होती थी। इस नाटक को , हमारे लुप्त हो रहे उस शैली में अपनी बातों को, गांव के कलाकारों ने जिस तरह प्रस्तुत किया वह बरबस 1960 के दशक की याद दिला देता है।
इस नाटक के दो मुख्य पहलू हैं जिसमें पहला है दिन प्रतिदिन लुप्त होते जा रहे लोक संगीत और उसकी जगह लेता अश्लील गीत संगीत ; तो वहीं दूसरा है लाक डाउन के दौरान मजदूर भाइयों ने किन किन समस्याओं का सामना किया । आम जनता और सरकार की क्या भूमिका रही? इन सभी समस्याओं को संगीत, नृत्य और अभिनय के माध्यम से दर्शकों के संवेदनाओं को जगाने का बखूबी काम किया इस नाटक ने। हंसते हंसते दर्द की टीस से रो पड़े दर्शक। हास्य, व्यंग्य और करुणा का मिश्रित रूप है यह अनोखा नाटक।
परिवर्तन रंग मंडली के निर्देशक आशुतोष मिश्रा जी, देश के सर्वश्रेष्ठ रंग मंडली (NSD Repertory) के अभिनेता रह चुके हैं तथा भारत के नामचीन निर्देशकों के साथ काम कर चुके हैं| अभी परिवर्तन रंगमंडली के ग्रामीण इलाके के युवाओं को नाट्य कला में निपुण बना रहे हैं।
इस नाटक में भाग लेने वाले कलाकारों में सूत्रधार/ग्रामीण के रूप में पंकज कुमार राम, ग्रामीण/कलाकार की भूमिका में फिरोज आलम, अजित कुमार साह, आकाश कुमार यादव, विवेक कुमार सिंह एवं रोजाद्दीन आलम, ग्रामीण/कोरोंटाइन सेंटर गार्ड की भूमिका में सचिन कुमार, ग्रामीण/कम्पाउंडर की भुमिका में नितेश कुमार, ग्रामीण/कलाकार की भूमिका में डोमा राम, सिपाही/नेता/डाक्टर की भूमिका में अनूप कुमार एवं महिला पात्रों में नीलम कुमारी, अंशु कुमारी, प्रतिमा कुमारी और कविता कुमारी ने दर्शकों को खूब हंसाया तो वहीं अपने गीतों और ठुमकों पर दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया।


तीसरा दिन
पद्मश्री दया प्रकाश सिन्हा कृत मूल हिन्दी नाटक “अपने अपने दांव” का भोजपुरी अनुवाद…आपन_आपन_दाव
पद्मश्री दया प्रकाश सिन्हा कृत मूल हिन्दी नाटक ”अपने-अपने दावं“ का भोजपुरी अनुवाद ”आपन-आपन दाव” का जोरदार मंचन परिवर्तन के मुक्ताकाश मंच पर हुआ। नम्रता सिंह द्वारा अनुदित इस नाटक में एक परिवार के सभी सदस्य, जिसमें बाबूजी (अखिलेश पांडेय), मां (मीना राय),शादी-शुदा बेटी ( कल्पना मिश्रा), दामाद सौमित्र वर्मा) बेटा, रूस्तम कुमार (काके) शामिल रहे। अपनी बूढ़ी बुआ की (वीणा वादिनी चौबे) की सेवा में, तत्पर हैं । सबको उम्मीद है कि बुआ उन्हें अपना धन या उसका कुछ हिस्सा देंगी। पर उन्हें क्या पता कि बुआ ने तो कुछ और ही सोच रखा था।
धन की लालच मां-बेटी, बाप-बेटे को एक दूसरे का शत्रु बना देता है। दो घंटे के इस नाटक में दर्शक आखिर तक समझ नहीं पाते कि बुआ का धन किसे मिलेगा। सभी अपने अपने दांव में थे। दांव-पेंच का खेल देख दर्शक हंसते हंसते लोट पोट हो रहे थे। पर “लालच बुरी बला है” इस कथन को सत्य करता है यह नाटक।
इस नाटक में प्रत्यक्ष रूप से सभी अपनी सेवा भावना को प्रदर्शित करने में कोई कमी नही रखते पर हक़ीकत में सभी बूढ़ी बुआ के धन पाने की लालच से प्रेरित होकर उन्हें ये विश्वास दिलाने का प्रयास कर रहे हैं कि उन्हें कोई धन का लोभ नहीं है बल्कि वो बुआ की सेवा प्रेमवश कर रहे हैं। इसके चलते एक दूसरे के बीच कटुता बढ़ते जा रही है। जब बूढ़ी बुआ के मरने का वक्त नजदीक आ जाता है तब सभी उनके बक्से की चाबी को हथियाने की होड़ में लग जाते हैं। अंत मेें जब बुआ मरती है और उनके बक्से का ताला खोला जाता है जिसमें पुराने कपड़े और जूते निकलते हैं। नकली डाक्टर की भूमिका में मुन्ना कुमार एवं शहशाह की भूमिका में श्री गौरव प्रकाश सूद सहित सभी पात्रों ने अपने-अपने अभिनय से दर्शकों को हँसा-हँसा के लोट पोट कर दिया।
इस नाटक में प्रकाश व्यवस्था शुभम तिवारी एवं म्यूजिक दिया रामा गनेश श्याम ने। मंच सज्जा किया अनूप प्रसाद ने।

चौथा दिन
भोजपुरी हास्य व्यंग्य नाटक ‘‘खुदा ना खास्ते”
लेखक व निर्देशक— महेंद्र प्रसाद सिंह
जेण्डर (सामाजिक लिंग) संबंधित भेदभाव हमारे समाज में इतनी गहराई से अपना जड़ जमा चुका है कि पुरुष प्रधान समाज को इसका एहसास भी नहीं हो पाता है। घरेलू हिंसा का आयाम भी इतना विस्तृत है किस-किस व्यवहार को उसके दायरे में रखा जाय इसकी फेहरिस्त बनाना मुश्किल है। इस नाटक के द्वारा हमने ये कोशिश की है कि पुरुष अपने आपको स्त्री की भूमिका में डालकर देखें कि एक स्त्री की तरह जीना कितना दुष्कर है। इसके लिए सपने का सहारा लिया गया है। जिसमें स्थिति बिल्कुल विपरीत हो जाती है। आज जिन परिस्थतियों में स्त्री जीने को मजबूर है उसमें पुरुष अपने को पाकर छटपटा उठता है और मुक्ति का मार्ग तलाशने में कोई कसर नहीं छोड़ता।
नाटक में मुख्य किरदार
मनोज की भूमिका में सौमित्र वर्मा, हाफिज की भूमिका में अखिलेश कुमार पाण्डेय, मकान मालिक एवं बिहारी बाबा की भूमिका में महेन्द्र प्रसाद सिंह, रामू एवं बंगाली बाबा की भूमिका में रूस्तम कुमार, पहलवान एवं डाॅक्टर की भूमिका में गौरव प्रकाश सूद, रजनी की भूमिका में कल्पना मिश्रा, रजिया की भूमिका में किरण अरोड़ा नेे अपने-अपने अभिनय से दर्शकों को खूब हंसाया और प्रभावित किया। मंच सज्जा की जिम्मेवारी निभाई अनूप प्रसाद ने और प्रकाश की व्यवस्था किया शुभम् तिवारी की रही जबकी महोत्सव के समन्वयक की भूमिका आर जी श्याम ने निभाई।

पांचवा दिन
शीर्षक—भोजपुरी हास्य व्यंग्य नाटक “बिरजू के बिआह”
निर्देशक व लेखक— महेंद्र प्रसाद सिंह
भोजपुरी नाट्य महोत्सव के पांचवें दिन परिवर्तन के प्रांगण में महेंद्र प्रसाद सिंह द्वारा लिखित एवं निर्देशित सुप्रसिद्ध भोजपुरी हास्य व्यंग्य नाटक “बिरजू के बिआह” का जोरदार मंचन हुआ। हास्य और बहुमुखी व्यंग्य वाले इस नाटक ने एक ओर अनियंत्रित संतानोत्पत्ति पर प्रहार किया तो दूसरी ओर तिलक और दहेज का बहिष्कार करने के लिए युवाओं को पहल करने के लिए प्रछन्न संदेश भी दिया|
नाटक का कथानक 14 बच्चों का बाप राम धरोहर (महेंद्र प्रसाद सिंह) के इर्दगिर्द घूमता है। राम धरोहर अपने एक मात्र पढ़े लिखे बेटे बिरजू (गौरव प्रकाश सूद)) का ब्याह के लिए दहेज की मांग करता है और अपनी झूठी शानों शौकत दिखाने के लिए बाह्य आडम्बर का सहारा लेता है| आदर्शवादी पंडित (आर जी श्याम) ने अगुआ (शुभम् शांडिल् ) और राम धरोहर को कानून के कटघरे में खड़ा कर देता है। इस क्रम में वह अपने साथ पुलिस इंस्पेक्टर (सौमित्र वर्मा) को साथ लेकर आ जाता है। पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार, दहेज निरोधक कानून की कमजोरी को उजागर करता इस नाटक का अंत बिरजू द्वारा प्रेम विवाह कर लाई गई पत्नी के परिछावन गीत से होता है। फूलपातो की भूमिका में मीना राय, धूर्त पंडित की भूमिका में अखिलेश कुमार पाण्डेय, बबुनी काकी की भूमिका में वीणा वादिणी चौबे, हजाम और भोला की भूमिका में क्रमश: घसेटू और फेकन की भूमिका में क्रमशः मुन्ना कुमार एवं सौमित्र वर्मा ने दर्शकों को खूब हंसाया| चुन्नू की भूमिका में परंतप और लता की भूमिका में किरण अरोड़ा खूब जंचे।
नाटक में संस्कार गीतों को परिवर्तन रंगमंडली की महिला कलाकारों ने प्रस्तुत किया जिसे सुनकर दर्शक झूम उठे। मंच सज्जा की जिम्मेवारी अनुप प्रसाद ने और ग्रामीण की भूमिका में कल्पना मिश्रा और रंजीत कुमार सिंह राजपूत ने अपनी अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया।
इस नाट्य महोत्सव की खासियत यह रही कि सुदूर देहात के गांव में आयोजित होने के बावजदू रोजाना १५० से ऊपर लोगों को वापस लौटाना पड़ा। परिवर्तन रंगमंडली और वहां के अन्य कर्मचारियों की भूमिका इस आयोजन में अहम रही जिसके कारण ​दिल्ली से गये नाट्य दल सुकून से नाटक करते रहे और दर्शकों की प्रतिक्रिया से आह्लादित होते रहे।

परिवर्तन का सफर

परिवर्तन (नरेंद्रपुर , जीरादेई, सिवान) समेकित ग्रामीण सामुदायिक विकास के लिए तक्षशिला की एक पहल है। उसी पहल में शामिल रंगकर्म भी है। परिवर्तन रंगमण्डली उसी का स्वरूप है।
तक्षशिला के संस्थापक संजीव कुमार परिवर्तन के माध्यम से प्राकृतिक व सांस्कृतिक संपदाओं के प्रति समर्पित, उत्तरदाई, क्षमतावान, कुशल एवं समाज का पोषण एवं निर्माण करने के सपनों को साकार करते दिख रहे हैं। परिवर्तन के इस सपने को जमीन पर उताड़ने में अहम भूमिका निभा रही हैं उनकी पुत्री व परिवर्तन की अधिशासी निदेशक सेतिका सिंह।
रंगश्री के महेंद्र प्रसाद सिंह कहते हैं कि जिस तरह से नरेंद्र पुर में आयोजित इस नाट्य कार्यक्रमों में दर्शकों की भीड़ जुटी और देर से आने वाले सैकड़ों लोगों को लौटना भी पड़ा। वे इस पूरे आयोजन के लिए तक्षशिला शैक्षणिक संस्थान द्वारा स्थापित परिवर्तन संस्था का हार्दिक आभार व्यक्त करते हुए कहते हैं कि परिवर्तन के अधिकारी और कर्मचारी/कलाकार जिस मेहनत से मंच सज्जा, प्रकाश व्यवस्था, अभिमंचन प्रबंध में हमारी मदद की उसी का परिणाम है हमारा सफल मंचन। इसके अलावे दर्शकों की उमड़ती भीड़ को नियंत्रित करने, उन्हें समझा बुझा कर वापस लौटाने में जो उन्हे मशक्कत करनी पड़ रही है वह असाधारण है। वे कहते हैं कि काश हम परिवर्तन, जो बिहार ही नहीं देश के लिए एक गौरवपूर्ण पहल है, को भी अपने साथ लेकर जाते , अपने- अपने गांवों में।
आगे के कार्यक्रम के विषय में महेंद्र सिंह ने बताया कि नाटक की प्रस्तुति 25 मार्च को चैनपुर-चरिहारा, मशरक के अवध सिंह उच्च विद्यालय में की जाएगी।इस महोत्सव का समापन 25 मार्च, 2021 को कालीदास रंगालय, पटना में नाटक ‘बिरजू के बिआह’ मंचन के साथ संपन्न होगा।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *