प्रेमचंद का गांव….”लमही” ढूंढ़े नहीं मिलते होरी.. धनिया.. घिसू और माधव

चंद्रबिंद सिंह

था सम्राट प्रेमचंद का गांव अर्थात ‘गोदान’ में चित्रित होरी का गांव। यदि किसी व्यक्ति की हिन्दी कथा-साहित्य में थोड़ी भी रुचि होगी तो वह कम से कम प्रेमचंद के कथा साहित्य से परिचित होगा और प्रेमचंद के कथा – संसार के लगभग पात्र ग्रामीण परिवेश से आते हैं। मेरी उन पात्रों के भौगोलिक एवं सामाजिक परिवेश को देखने और समझने की बहुत पुरानी इच्छा थी इसलिए यह तय हुआ कि इस बार लमही चला जाए।

 

मेरी लमही की यात्रा दशाश्वमेध घाट से प्रारंभ हुई। लगभग दस किलोमीटर चलने के बाद हम सारनाथ पहुंचे जहां भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद पहला उपदेश दिया था। वहां से आगे दो किलोमीटर रिंग रोड पर चलने के बाद एक मोड़ मिला जहां पूछने पर यह पता चला कि इस मोड़ से और आधा किलोमीटर आगे जाना है फिर हम लमही पहुंचेंगे। हम आगे बढ़ते गए , हमें फिर किसी से पूछने की जरूरत नहीं पड़ी। प्रेमचंद के दोनों बैल हीरा और मोती उनके गांव के मुख्य द्वार पर हमारे स्वागत में खड़े थे। द्वार पर लिखा था कथा सम्राट प्रेमचंद के गांव में आपका स्वागत है। मुख्य द्वार से थोड़ी दूरी पर ही उनका घर है | उनके घर तक पक्की सड़क बनी हुई है। वर्तमान में उनका पुराना घर नहीं बचा है परंतु वहीं पर सरकार द्वारा एक प्रेमचंद स्मारक बनवा दिया गया है। एक अच्छी बात यह है कि स्मारक का रख- रखाव काफी अच्छा है। बताता चलूं कि अब आपको वहां वैसा कुछ भी नहीं मिलेगा जैसा प्रेमचंद के कथा साहित्य में चित्रित है। आज की तारीख में लमही बनारस का एक हिस्सा है। पक्की सड़कें हैं। महंगी जमीन है। मेरी निगाहें ढूढ़ती रही होरी महतो और धनिया को, घिसू और माधव को, हीरा और मोती को पर मुझे मिला सिर्फ एक शहर बनारस। अब वहां वह सब कुछ है जो शहरों में होता है। वहां वैसा कुछ भी नहीं है जो गांवों में होता है।

वहीं मेरी मुलाकात सुरेश चंद्र दूबे से हुई जो कि प्रेमचंद स्मारक न्यास के अध्यक्ष हैं। उनसे बस मिलने भर की देर है आपके सामने प्रेमचंद के समय का लमही एक टापू की तरह निकल आएगा। उनकी वर्णन शैली अद्भुत है। फिर आप एक-एक कर प्रेमचंद से जुड़ी ढेर सारी वस्तुओं से रु -ब -रु होते चले जाएंगे। दूबे जी आपको दिखाएंगे प्रेमचंद का प्रिय हुक्का (यहां यह जानना जरूरी है कि प्रेमचंद का निधन टीबी जैसी बीमारी से हुआ था और मेरे ख्याल से उस बीमारी का एक बड़ा कारण हुक्का ही रहा होगा),उनकी प्रिय पिचकारी जिससे वे होली खेला करते थे ,उनका चरखा जिसका इस्तेमाल वे सूत कातने के लिए करते थे, सवा सेर गेहूं कहानी में इस्तेमाल किए जाने वाले बटखरे। दूबे जी आपको यह भी बताएंगे कि उनके नाम के पहले मुंशी इसलिए लगा है क्योंकि उनके पिता जी डाक मुंशी थे। फिर वे आपको एक एक कर दिखाएंगे कई तस्वीरें जो उनकी कहानियों में चित्रित पात्रों के संभावित परिवार वालों की होगी जो कि उसी गाँव से हैं या फिर बगल वाले गांव से। विशेषकर भाई राम महतो की तस्वीर जिनके परिवार और बैलों को केंद्र में रखकर ‘दो बैलों की कथा’ कहानी लिखी गई है। फिर वे दिखाने लगते हैं दालमंडी बनारस का वह स्थान जहां कभी हुस्न का बाजार लगता था, जिसको केंद्र में रखकर प्रेमचंद ने ‘बाजार- ए- हुस्न’ नामक उपन्यास लिखा था और उसी का हिंदी रूपांतरण ‘सेवा सदन’ है। वहां आप देख सकते हैं बुद्धू गड़ेरिया के गांव और पिसन हारी के कुएं की तस्वीर।

दूबे जी का प्रेमचंद के प्रति समर्पण अद्भुत है। उन्होंने प्रेमचंद के जीवन से जुड़े बहुत सारे दस्तावेज एकत्रित कर रखे हैं जैसे उनकी नौकरी का नियुक्ति-पत्र। यह वही नियुक्ति पत्र है जब उन्हें 10 जून 1909 को हमीरपुर के शिक्षा विभाग में सब डिप्टी निरीक्षक के पद पर नियुक्त किया गया था। परंतु यह नौकरी उन्हें रास नहीं आई थी। उन्होंने 16 फरवरी 1921 को शिक्षा विभाग की इस नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। यह सब कुछ 8 फरवरी को गोरखपुर में गांधी जी का भाषण सुनने के बाद हुआ था जिसका जिक्र शिवरानी देवी ने अपनी किताब ‘प्रेमचंद घर में’ किया है। इसके साथ साथ हम वहां देख सकते हैं प्रेमचंद की शैक्षणिक योग्यता से जुड़े और कई प्रमाण -पत्र जो हमें कुछ क्षणों के लिए प्रेमचंद के पास ले जाते हैं। स्मारक के ठीक बगल में ही प्रेमचंद का एक और नया मकान है जिसमें ताला लगा हुआ था। उनके परिवार वाले अब वहां नहीं रहते पर घर अब भी है।
(स्नातकोत्तर शिक्षक (हिन्दी) केन्द्रीय विद्यालय, खगौल)

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