खेमेबंदी में खड़ा गांव

मनीष अग्रहरि

मेरा गांव परियावां है। यह गांव जनपद, प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) के कालाकांकर प्रखंड के अंतर्गत आ़ता है। भौगोलिक रूप से गांव की बसावट ऐसी है कि रेलवे, हाइवे जैसी कुछ खास सुविधायें आजादी के पूर्व से ही मौजूद है। स्मृतियों में झांकता हूं, तो पाता हूं कि लगभग ढ़ाई दशको में गांव में बहुत कुछ बदला है, तो बहुत कुछ यथावत भी है। इस सकारात्मकता और नकारात्मकता का आधार लोकतंत्र है, और दूसरा देश में आई उदारीकरण की व्यवस्था है। गांव की अर्थव्यस्था बिगड़ी, पलायन बढ़ा, आपसी सौहार्द घटा, दकियानूसी घटी, लोकतंत्र का दम घुटा, आधारभूत ढांचा बिगड़ा, अलबत्ता सामुदायिक उत्सवधर्मिता बढ़ी, बस यही लब्बोलुआब है।


परियावां लगभग 5 हजार की आबादी वाला कस्बाई तासीर का गांव है, जिसमें सर्वाधिक जनसंख्या बुनकर मुस्लिमों की है। जिनके हांथो से हैण्डलूम का “परियावां टेरीकाट” कई जिलों में पहली पसन्द बना, मगर उचित सरकारी सुविधायें और संरक्षण के अभाव में और बेहतर बाजार न मिलने और बाजार के अनुरूप कपड़ो में फैशन का रंग न भर पाने के कारण आउट हो चुका है। जिससे आजीविका का संकट खड़ा हो गया, नतीजतन लोग महाराष्ट्र और खाड़ी देशों की ओर पलायन करने लगे। दूसरी बड़ी संख्या गांव में खेतिहर मौर्यों की है जो नकदी फसलो को पहले से ज्यादा उगा कर के ज्यादा धन अर्जित कर रहे है, मगर आधुनिक व हाईटेक खेती से मुंह मोड़े हुये है। तीसरी बड़ी जमात बनिया, ब्राहम्णों की है, जिनकी मुख्य आजीविका परियावां बाजार में व्यापार है। यह बाजार 15-20 किलोमीटर के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता था, मगर अब खस्ताहाल संपर्क मार्ग के चलते लोग इस बाजार-हाट से लगभग मुंह मोड़ चुके है। बाजार के कुछ उद्यमियों को बिजली व्यवस्था सुचारू रूप से न मिल पाने के कारण लघु एवं कुटीर उद्योग धंधे घाटे का सौदा साबित हो रहा है, जिससे लोगो के सामने निवाले का संकट आ चुका है। स्वाभाविक है निवाले का संकट से दो चार होते गांव में पलायन बढ़ा है। हालांकि पलायन की यह प्रवृति सभी वर्गो में एक समान है।

इन बीते ढ़ाई दशको में तमाम सरकारें आईं और गईं मगर गांव की बुनियादी और आर्थिक सूरत नही बदली, इसके पीछे यहां का अतीत और वर्तमान लोकतांत्रिक परिदृश्य है, ऐसा परिद्रश्य जिसमें एक प्रभावशाली “राजा” का स्थायी राज है, जिसमें कहा जाता है कि प्रधान से लेकर सांसद तक उनके दरबारी होते है। हालांकि पिछले दो संसदीय चुनावो में बाजी पलट हुई दिख रही है।


खस्ताहाल सड़क, खराब बिजली व्यवस्था और उखड़ते उद्योग, धंधो के बीच कुछ सुनहरी तस्वीर भी है। गांव में कई मोहल्लो में आरसीसी0 सड़क, अच्छा खड़ंजा और अच्छा ग्राम सचिवालय मौजूद है। लोगो में पुरातन दकियानूसी परंपराएं पहले की तुलना में कम हुई हैं। वर्गीय और सामुदायिक सौहार्द बेहतर हुआ है। देश में जब भी साम्प्रदायिक लपटें उठी, परियावा के ग्रामीणों के समझदारी से गांव इस तरह के झंझावतों से महफूज रहा है। दोनों सम्प्रदाय के लोग अपने-अपने त्योहार दूसरे सम्प्रदाय के साथ मनाते है। उल्लेखनीय यह है कि नव वर्ष का हर्ष, दुर्गा पूजा एवं समय पर होने वाले क्रिकेट टूर्नामेंट में सामुदायिक उत्सवधर्मिता बढ़ी है। गांव की वैवाहिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों, खान-पान में काफी बदलाव आया है, जो सम्भवतः वैश्वीकरण और उदारीकरण की परिणति है।


एक और खास बात का जिक्र करना चाहूंगा कि जब से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी (मनरेगा )अधिनियम प्रभाव में आया और इसके अलावा ग्राम विकास की अन्य योजनायें आई है, इससे प्रधानी का चुनाव लड़ने में लोगो की दिलचस्पी बढ़ी है। नतीजतन हारे और जीते हुये सर्मथकों के बीच गजब की गोलबंदी हो गई है। हालात यहां तक हो गई है कि बचपन में एक साथ पढ़े, लिखे और साथ में खेले हुये लोगो में विशेष तौर पर चुनाव की बेला में गजब की खेमेबंदी दिखती है और इसी खेमेबंदी के साथ आज गांव खड़ा है। गांव के कुछेक प्रवासी लोग राजनीति,कारोबार, राजकीय सेवा, साहित्य और पत्रकारिता जगत जैसे विभिन्न क्षेत्रो में गांव का मस्तक गर्व से ऊंचा किये हुए हैं। खुशी की बात है कि आज भी वे लोग गांव की माटी को नही भूले हैं। अंत में कविता के कीर्तिस्तंभ डाॅ रामकुमार वर्मा जी की पंक्तियां और बात खत्म-

झोपड़ी झुकाकर तुम अपनी
ऊंची करते हो राज-द्वार! हे ग्राम देवता! नमस्कार!

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