वामपंथी शिकंजों में फंसा किसान आंदोलन..नहीं सूझ रही आगे की राह

पंचायत खबर टोली

नयी दिल्ली: दिसंबर समाप्त होने वाला है। नये साल का आगाज है लेकिन किसान आंदोलन पर घमासान कम होने का नाम नहीं ले रहा है। एक तरफ कृषि बिल का विरोध करने वाले किसान आंदोलनकारी किसान बोर्डर पर जमे हुए हैं तो दूसरी तरफ कृषि बिल के समर्थन में खड़े किसान चौपाल सजाकर इस बिल का सर्मथन कर रहे हैं। कृषि बिल का विरोध करने वाले किसान कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के पत्र के जवाब में कहते हैं सर​कार आग से खेल रही है, उन्हें हर हाल में कृषि बिल को वापस लेना ही होगा। हालांकि ​वे बातचीत करने को तैयार हैं लेकिन कहा जा रहा है ठोस प्रस्ताव आये। ऐसे में ये समझना मुश्किल हो गया है कि आखिर वो कौन सा ठोस प्रस्ताव है जिसके इंतजार में किसान बोर्डर पर जमे हुए हैं। जबकी साफ तौर पर इन किसानों का कहना है कि कृषि बिल के वापसी से कम उन्हें कुछ भी मंजूर नहीं। ऐसे में निकट भविष्य में किसानों का आंदोलन खत्म होगा इसकी कोई राह बनती नहीं दिखती।
इस तथ्य से किसी को इंकार नही है कि नरेंद्र मोदी के तीन कृषि कानून में खामियां होंगी, हैं। लेकिन कानून पूरी तरह से गलत ही है ऐसा भी नहीं माना जा सकता। तीन कृषि कानून के वापसी की मांग किसी कीमत पर स्वीकार्य नहीं। सवाल सरकार के साख का है। संसद के संप्रभुता का है। खुद कृषि मंत्री ने भी कहा है कि खामियां हैं, और संशोधन को तैयार हैं। ऐसे में किसान आंदोलन की ये मांग की कानून वापस लो उचित नहीं लगता।
सरकार शुरू से ही ये कहती रही है कि किसान आंदोलन को वामपंथियों ने हाईजैक कर लिया है और वो नहीं चाहते कि किसान और सरकार के बीच सौहार्दपूर्ण माहौल में बात हो। किसान अपनी आशंकायें सामने रखें और सरकार अपना पक्ष और ऐसा रास्ता निकाला जाये जिससे किसान का हित सुरक्षित रहे और देश कृषि के क्षेत्र में नये निवेश को बढ़ावा देते हुए खेती किसानी को लाभप्रद बनाया जा सके।
ऐसा भी नहीं है कि किसान आंदोलन को वामपंथियों के हाथों में चले जाने का भाजपा का आरोप बेबुनियाद है। किसान आंदोलन का चेहरा बने कुछेक नेताओं के इतिहास को खंगालेगे तो साफ दिखता है कि इनका न सिर्फ वामपंथी जुड़ाव रहा है बल्कि ये प्रमुख पदों पर भी रहे हैं।
​किसान आंदोलन के ये वामपंथी चेहरे


दर्शन पाल— दर्शन पाल एक माओवादी नेता भी हैं। वह पीपल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ इंडिया (PDFI) के संस्थापक सदस्य हैं। यह संगठन उस माओवादी क्रांति का ही अनुगामी था जिसके तहत देश के विभिन्न हिस्सों में बर्बरतापूर्ण हिंसक कार्रवाइयों को अंजाम दिया जाता है। पीडीएफआई के कार्यकारी समिति के 51 सदस्य होते थे। दर्शन पाल के अलावा वरवरा राव, कल्याण राव, मेधा पाटेकर, नंदिता हक्सर, एसएआर गीलानी, बीडी शर्मा आदि भी पीडीएफआई के संस्थापक सदस्य रहे हैं।


योगेंद्र यादव—वैसे तो प्रो योगेंद्र यादव चुनाव विश्लेषक हैं लेकिन किसी भी फटे में टांग अड़ाना इनकी काबीलियत है। वामपंथियों से लेकर माओवादियों तक से इनका गहरा नाता है हालाकि चेले किशन पटनायक के बताये जाते हैं।


कुलवंत सिंह संधु – सीपीएम के छात्र विंग एसएफआई से अपनी राजनीति शुरू करने वाले 65 साल के संधु का सीपीएम से गहरा नाता रहा है।
निर्भय सिंह दूधिके– 70 साल के निर्भय सिंह कीर्ति किसान यूनियन के नेता हैं। आपातकाल के दौरान 19 महीने जेल में रहे. इसके बाद उन्होंने 1980 में सीपीएम ज्वाइन कर लिया।
हन्नन मोल्लाह- ऑल इंडिया किसान सभा के 74 वर्षीय मोल्लाह सीपीएम से जुड़े हुए हैं। 16 साल की उम्र में सीपीएम ज्वाइन किया और पोलित ब्यूरो तक पहुंचे।


सुरजीत सिंह फूल- भारतीय किसान यूनियन (क्रांतिकारी) के 75 वर्षीय नेता फूल इस आंदोलन के सबसे चर्चित चेहरा हैं। उन्हें 2009 में पंजाब सरकार ने माओवादियों से संबंध के आरोप में यूएपीए लगा दिया था और कड़ी पूछताछ की थी।
वामपंथी षड्यंत्र पर सवाल खड़ा करते हुए सूत्र अब यह भी ये किसान आंदोलन उस वक्त रचा गया है जब चाईना हमारे बोर्डर पर बैठा हुआ था। चीन के गोद में बैठे इन वामपंथियों ने ऐसा कुचक्र रचा कि हमारे अन्नदाता राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के सभी बोर्डर पर आकर बैठ गये। सरकार को बातचीत की पहल बनाये रखने के साथ इन्हें ससम्मान रामलीला मैदान में आने की अनुमती देनी चाहिए, ताकी बोर्डर खाली हो सके, और किसान से सौहार्द पूर्ण माहौल में बातचीत हो सके। लेकिन आंदोलन को बातचीत के रास्ते से भटकाने वाले इन वामपंथी नेताओं से किसान आंदोलन से जुड़े किसान हितैषी प्रतिनिधियों को बच कर रहने की जरूरत है ताकी आंदोलन की साख बनी रहे और किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके।

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