अपने-अपने खूंटे को थाम कर बैठे हैं अन्नदाता व रहनुमा..नतीजा वार्ता बेनतीजा

मंगरूआ

नयी दिल्ली: वैसे तो किसान आंदोलन में पंजाबी और हरियाणवी गीतों ने समां बाधा हुआ है लेकिन आज एक भोजपुरी कहावत के जरिए किसान आंदोलन में चल रही गतिविधियों को आप बखूबी समझ सकते हैं।
भोजपुरी में एक कहावत है बाकी सब तो ठीक बा,लेकिन खूंटा उहंई गड़ाई। लगभग 59 दिन से ज्यादा वक्त से दिल्ली के बोर्डर पर किसान खूंटा गाड़ के बैठे हैं। सरकार और किसान के बीच अब तक ग्यारह बार बैठक हो चुकी है। हर वार्ता के पहले विज्ञान भवन गुलजार होता है, लंच की थाली सजती है और जब वहां से किसान निकलते हैं तो सुर में तल्खी होती है।


यानी कानी बिना रहलो न जाये, कानी के देख के अंखियो पेराए। बड़े उत्साह से किसान सरकार द्वारा सजायी गई मेज पर वार्ता के लिए बैठते हैं लेकिन जैसे ही वहां से निकलते हैं तकरार दिखाई देती है। उसके बाद जब बोर्डर पहुंचते हैं तो शुरू हो जाता है बैठकों का दौर, बयानबाजी का दौर ठीक उसी तर्ज पर बईठल बनिया का करे, एह कोठी के धान ओह कोठी धरे। कोई काम ही नहीं है। सर्द रात है, कंपाती हुई सुबह है,कभी कभार तो सूर्य के दर्शन भी नहीं होते और इंद्रदेव का प्रकोप सहना पड़ता है सो अलग। लंगर का भोजन और भीड़ का साथ। दिन गुजरते ही जा रहे हैं। हौसला बना हुआ है। उम्मीद है कि सरकार को झुकना ही होगा और तीन कृषि कानून को वापस लेना ही होगा।

हालांकि हर वार्ता के बाद किसानों के साथ हुई बातचीत को सकारात्मक बताने वाले सरकार प्रमुख वार्ताकार कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के सुर आज ग्यारहवीं दौर के बातचीत के बाद बदला हुआ दिखा और उनकी बातों में किसानों को लेकर चिंता तो थी लेकिन किसान संगठन के नेताओं को लेकर तल्खी साफ दिखाई दे रही थी। यानी दोनों पक्ष के बीच ग्यारहवें दौर की वार्ता भी बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गई है और ऐसा माना जा सकता है कि वार्ता को पूर्णविराम लग गया है हालांकि दोनों पक्ष भले ही खुल के कुछ न कहें लेकिन वो इसे अल्प विराम ही मान रहे हैं क्योंकि लोकतंत्र में विवादों को सुलझाने का एक ही रास्ता है बातचीत। देश 71 वें गणतंत्र दिवस के मुहाने पर खड़ा है। ऐसे में सरकार को इस पर्व को हर्षोल्लास से मनाने के लिए सुरक्षा से जुड़े तमाम व्यवस्था करनी है और हजारों की संख्या में किसान गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर मार्च निकालने पर आमादा हैं। उन्हें कृषि कानून की वापसी से कम कुछ भी मंजूर नहीं है। उधर सरकार भी बार—बार ये दुहराती रही है कि कृषि कानून वापस नहीं लिया जा सकता भले किसान द्वारा सुझाए गये संशोधन सरकार को स्वीकार्य हो।

क्या हुआ आज की बातचीत में
अन्य दिनों की तरह आज भी किसान नेता तयशुदा वक्त पर विज्ञान भवन पहुंचे। मंत्रियों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हुआ। बैठक में केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और सोमप्रकाश शामिल हुए। लगभग 1 बजे सरकार और किसानों के बीच वार्ता शुरू हुई। सरकार ने पिछली बातचीत में तीनों कृषि कानूनों पर स्टे लगाने का प्रस्ताव दिया था। कहा गया था कि सरकार अगले डेढ़ वर्ष के लिए तीन कृषि कानून को वापस लेने को तैयार है। किसान संगठनों को धरना समाप्त कर बातचीत के जरिए अपनी आपत्ती ​सामने रखना चाहिए। लेकिन किसान संगठन के नेताओं ने मीटिंग से पहले साफ कह दिया था कि वो अपना आंदोलन तब तक खत्म नहीं करेंगे, जब तक सरकार तीनों कानून वापस नहीं ले लेती।
किसान मजदूर संघर्ष कमेटी के महासचिव श्रवण सिंह पंढेर ने कहा, सभी ने शाम को ये फैसला लिया कि हम सरकार के प्रस्ताव को खारिज करते हैं। अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव हन्नान मोल्लाह ने कहा कि सरकार ने जो प्रस्ताव दिया था उसमें पुराने प्रस्ताव से थोड़ा फर्क था इसीलिए वह प्रस्ताव हम आमसभा में ले गए थे। चर्चा के बाद उन लोगों ने उसे मानने से इनकार कर दिया। किसान नेता प्रेम सिंह भंगू कहा कि किसानों ने सरकार का प्रस्ताव खारिज कर दिया है। कानून रद्द करने से कम उन्हें कुछ भी मंजूर नहीं है।
सवाल उठता है कि जब किसान संगठन पहले ही ये तय कर चुके कि बाकी सब ठीक बा खूंटा उहईं गड़ाई तो फिर बातचीत में जाने का मतलब क्या था? इन मंसूबों के साथ बातचीत में जाने का मतलब ही था कि कोई नतीजा नहीं निकलना है। बावजूद इसके वार्ता हुई।
बैठक की शुरुआत में केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने इस बात पर नाराजगी जताई कि सरकार के प्रस्ताव पर किसान संगठनों ने अपने फैसले की जानकारी बैठक से पहले ही मीडिया के साथ साझा कर दी। हालांकि नरेंद्र सिंह तोमर ने किसान संगठनों से कहा कि वे डेढ़ साल की रोक के प्रस्ताव पर पुनर्विचार करने को कहा। जिसके बाद सरकार और किसान संगठन ने अलग-अलग बैठक की। 15 मिनट बाद फिर केंद्र सरकार को कहा वो कृषि क़ानूनों को रद्द करवाना चाहते हैं केवल रोक लगाकर कमेटी बनाना काफ़ी नहीं। इस तरह से दोनों पक्षों के आज साढ़े चार घंटे तक बैठक चली लेकिन दोनों पक्ष 15-20 मिनट के लिए ही आमने सामने हुए।


बैठक के बाद तल्ख दिखे किसान और सरकार
बैठक समाप्त होने के बाद किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा, “सरकार की तरफ से कहा गया कि 1.5 साल की जगह 2 साल तक कृषि क़ानूनों को स्थगित करके चर्चा की जा सकती है। उन्होंने कहा अगर इस प्रस्ताव पर किसान तैयार हैं तो कल फिर से बात की जा सकती है, कोई अन्य प्रस्ताव सरकार ने नहीं दिया।”
वहीं अन्य किसान नेता भी इसी तरह की बात कहते दिखे। उन्होंने कहा कि “सरकार द्वारा जो प्रस्ताव दिया गया था वो हमने स्वीकार नहीं किया। कृषि क़ानूनों को वापस लेने की बात को सरकार ने स्वीकार नहीं की। अगली बैठक के लिए अभी कोई तारीख तय नहीं हुई है। “
क्या कहा नरेंद्र तोमर ने
केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा, “भारत सरकार पीएम मोदी के नेतृत्व में किसानों और गरीबों के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध है और रहेगी। विशेष रूप से पंजाब के किसान और कुछ राज्यों के किसान कृषि क़ानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। इस आंदोलन के दौरान लगातार ये कोशिश हुई कि जनता के बीच और किसानों के बीच गलतफहमियां फैलें। इसका फायदा उठाकर कुछ लोग जो हर अच्छे काम का विरोध करने के आदि हो चुके हैं, वे किसानों के कंधे का इस्तेमाल अपने राजनीतिक फायदे के लिए कर सकें।”
\]यहां तक गणतंत्र के पर्व को यादगार बनाने के लिए सैनिकों का पूर्वाभ्यास जोड़ों पर है। रिहर्सल अंतिम चरण में हैं। देश की सभ्यता संस्कृति को प्रदर्शित करने के लिए झांकियां सज—धज कर तैयार है और शौर्य का प्रदर्शन करने के लिए सेना और टैंक। लेकिन किसान भी अपने ट्रैक्टर के साथ तैयार हैं जिद है गणतंत्र के पर्व में भागीदारी करेंगे और राजपथ पर टैंक और ट्रैक्टर साथ—साथ चलेगी। हालांकि इस टकराव को टालने के लिए पुलिस बलों के साथ किसानों की बातचीत चल रही है और इस मसले पर भी दोनो पक्ष अपना—अपना खूंटा गाड़कर बैठे हुए हैं।

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