जाने माने शिक्षाविद, साहित्यकार और अंगचंपा के संपादक, हिन्दी विभाग, तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर व अंगिका भाषा के विभागाध्यक्ष डॉक्टर प्रेम प्रभाकर का देहांत शुक्रवार को सुबह दिल का दौरा पड़ने हो गया। वे 63 वर्ष के थे। इस रचनाधर्मी के आकस्मिक निधन से मर्माहत उनसे जुड़े हुए लोगों को समझ नहीं आ रहा कि आखिर ऐसा कैसे हो गया।
डॉ प्रेम प्रभाकर के सहपाठी रवी शंकर सिंह ने लिखा है कि आज 7 नवंबर ’20 को प्रेम प्रभाकर के पार्थिव शरीर को प्रोफेसर कालोनी लाल बाग,
( भागलपुर ) से बरारी घाट ले जाया गया।

वही बरारी घाट जहां हम दोनों ने साथ साथ मिलकर अपने पुरखों का अग्नि संस्कार किया था। आज अपनी विदाई की बेला में वह अकेला है। जाओ साथी ! जाते-जाते अपने दोस्तों का सलाम तो लेते जाओ।
तुम्हारे संघर्षमय जीवन को सलाम साथी !!!
प्रेम प्रभाकर– जो मन से हीरामन था। अब कभी लौट कर नहीं आएगा इस आशियाने में। इस माटी का जर्रा जर्रा क्या कभी उसके स्नेहिल स्पर्श, मृदुल व्यवहार को भुला पाएगा ?
वह हम सब की शिकायतों को दूर करके चला गया।
वही प्रेम प्रभाकर जो साहित्य को जीता था, उसे ओढ़ता-बिछाता था, जो अपने जीवन काल के तिरेसठ वर्षों तक कभी चैन की नींद नहीं सो सका, आज वह गहरी नींद में सो रहा है, फिर से नहीं जागने के लिए।
बहुत झेला उसने अपने जीवन में। निराला के शब्दों में कहें तो, ” सबकी सुनता था, सहता था, देता था सबको दांव बन्धु ! “
कितनी शालीन और मीठी झलकी देता था वह, ” तुम लोग मेरी ही गोदी में बैठकर मेरी दाढ़ी खुजलाते हो ! “
” परिवार के लोग बताते हैं, मैंने सामान्य बच्चों की तरह समय पर बोलना नहीं सीखा था। थोड़ी देर हो गयी थी बोलने में। मेरे परिवार और पड़ोस के लोग तो वही नाम कहते जो शास्त्रीय नाम परिवार वालों ने रखा था, किन्तु सरल लोग वैसा नहीं करते। तब मेरे टोले में चाचा के एक यादव दोस्त हुआ करते थे। उनकी पत्नी को हम लोग काकी कहते थे, वे हमलोगों को बहुत प्यार करती थीं। मैं भाई-बहन में सबसे छोटा था, सो वे मुझे कुछ ज्यादा ही लाड़-प्यार करती थीं। वे मुझे दुलार से बोंगी (गूंगा) कहती थीं। मैं बहुत खुश होता था। यूं माताजी हम भाई-बहनोंं को बहुत अनुशासन में रखती थीं। मेरे गांव में, और खासकर मेरे टोले में तब शिक्षा का घोर अभाव था। टोले के बच्चों की संगति में हम भाई-बहन कहीं बिगड़ न जाएं, इसलिए मां हमें नियंत्रण में रखतीं। किन्तु हमलोग यदा-कदा अनुशासन का बांध तोड़ देते और खूब खुश भी होते थे। हालांकि इस कारण डांट-फटकार और पिटाई भी हो जाती। कभी-कभी सोचता हूंं कि यादव काकी द्वारा मुझे बोंगी कहा जाना कितना अर्थपूर्ण था। ” – प्रेम प्रभाकर
तुम्हारा नाम बहुत अर्थ पूर्ण था दोस्त। तुम सचमुच के गूंगे बने रहे। हम सबकी सुनते रहे , सहते रहे , कभी किसी को पलट कर जवाब नहीं दिया। हम बहुत खुश थे कि प्रभाकर किसी की बात को दिल पर नहीं लेता है, लेकिन यह हम लोगों की कितनी बड़ी भूल थी। तुमने तो दुनिया भर की बातों को इस कदर दिल पर लिया कि हमसब को तन्हा कर दिया। इससे तो बेहतर होता कि तुम खुलकर हमसब सब के खिलाफ बोल लेते !!!
आज प्रभाकर के किस परिवार को सांत्वना देने के लिए जाऊं ? वह परिवार जो हम लोगों के बाद उसके जीवन में आया ? क्या प्रभाकर का परिवार इतना सीमित और संकुचित था ?

प्रो पवन कुमार सिंह ने कहा है कि असहनीय पीड़ा है। पिछली मुलाकात 12 अक्टूबर 2020 को हुई थी, जब हम स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग में लिपटकर मिले थे। दोनों के मुँह से एक साथ निकला था, “आबो एकटा फोटो होय जाय।” शिष्यों ने ताबड़तोड़ क्लिक करके हमें तस्वीरें भेजी थीं।
अगली रात मेरी माई हमें छोड़ कर चली गयीं। वह घाव अभी ताजा ही है कि यह वज्रपात! बर्दाश्त करने की भी सीमा होती है भाई!

सहपाठी गीता कुमारी लिखती हैं, प्रभाकर जी, मुझे नहीं पता था पुणे में यह आखिरी मुलाकात है। इतनी जल्दी क्यों ? आपने थोड़ा-थोड़ा हम सब को भी मार डाला मित्र!
वहीं गंगा मुक्ति आंदोलन के आधार स्तंभ अनिल प्रकाश लिखते हैं हमारे अनमोल साथी प्रो. प्रेम प्रभाकर नहीं रहे। दिल के दौरे ने अस्पताल में उनकी जान ले ली। हमसब ने बहुत कुछ खो दिया है। आंसुओं को रोकना मुश्किल है. प्रेम प्रभाकर! आप हमसब की यादों में सदा जीवित रहेंगे।
बहुत कम समय मिला आपको।

घुमंतू पत्रकार पुष्य मित्र लिखते हैं कि कल खबर मिली कि प्रेम प्रभाकर सर नहीं रहे। वे भागलपुर विवि में पढ़ाते थे और भागलपुर की उस क्रिएटिव सर्किल के महत्वपूर्ण सदस्य थे जिसने सिल्क सिटी के नाम से मशहूर उस शहर में रचनात्मकता और वैचारिकता को जिन्दा रखा है।
अगर बीच के एक दो साल छोड़ दिये जायें तो 2005 से 2011 तक कमोबेस मुझे भागलपुर में रहने का मौका मिला और मुझे इस सर्किल के डा योगेन्द्र, रंजन और प्रेम प्रभाकर सर का भरपूर स्नेह मिला। इनमें से पहला परिचय प्रेम प्रभाकर सर से ही हुआ, तब वे पत्रकारिता विभाग से सम्बंधित थे, मैं अपने कैरियर की शुरुआत ही कर रहा था।
उन्हें न जाने मुझमें ऐसा क्या दिखा कि उन्होने मुझे अपने विभाग में पढ़ाने का अवसर दे दिया, अतिथि व्याख्याता के रूप में। उस वक़्त मैं खुद भी विद्यार्थी ही लगता था, जब कक्षा में घुसता तो घबराहट होती, मगर धीरे-धीरे सब ठीक हो गया।
उनकी वजह से मुझमें आत्मविश्वास भी आया। वे बहुत सहृदय थे, गम्भीर थे मगर जब बोलते थे तो उनकी मुस्कुराहट मन को मोह लेती थी। विचारों की स्पष्टता तो थी ही, रचनाकार भी आला दर्जे के थे। कल पता चला कि वे भागलपुर के गंगा मुक्ति आन्दोलन से भी जुड़े रहे, जो जेपी आन्दोलन के बाद बिहार का सबसे महत्वपूर्ण आन्दोलन रहा है।
भागलपुर से लौट आया तब भी फेसबुक के जरिये उनसे रिश्ता बना हुआ था। कल अचानक उनके जाने की खबर सुनी तो सन्न रह गया। अभी उनके जाने की उम्र कतई नहीं थी। भागलपुर शहर में उनका होना विचार, रचना और प्रेम के जिन्दा रहने जैसा था। उनके मित्र कल से बहुत दुखी हैं। कहलगांव से पवन जी लिखते हैं, आपके साथ थोड़ा मैं भी मर गया, डा योगेन्द्र आखिरी वक़्त में उनके साथ जूझते रहे। रंजन जी उदास हैं, गंगा मुक्ति आंदोलन के अगुआ राम शरण जी कह रहे हैं मुझमे कोरोना के लक्षण आ गये हैं, मैं आखिरी वक़्त में उन्हें देख भी नहीं पा रहा।
नई पीढ़ी भी उतनी ही उदास है, जिनमें मैं भी हूं। यह सब उस विचार की ताकत की गवाहियाँ हैं, जो इंसान ताउम्र बंटता रहता है। आखिर में वही प्रेम बनकर बरसता है और पीछे छूट गये परिवार का संबल बनता है। अन्तिम विदा प्रेम प्रभाकर सर।
