
नयी दिल्ली: किसान और सरकार के नुमाईंदो के बीच 11 दौर की लगभग 45 घंटे की बैठक। नतीजा सिफर।
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। इस पड़ाव पर याद आती है धूमिल की वो कविता
एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ–
‘यह तीसरा आदमी कौन है ?’
मेरे देश की संसद मौन है।
लेकिन यहां तो भले ही संसद का सत्र न चल रहा हो लेकिन सरकार बोल रही है,किसान भी बोल रहे हैं लेकिन सुन कोई नहीं रहा है। वो न रोटी बेल रहा है, न रोटी खा रहा है वो सिर्फ रोटी से खेल रहा है। यानी यही वो तीसरा आदमी है जो किसी भी कीमत पर ये दाव लगाने को तैयार है कि सरकार और किसानों के बीच वार्ता सफल न हो और आंदोलन चलता ही जाये। सरकार इसे बिचौलिया बता रही है। सरकार के मंत्री इसे आंदोलन को अपवित्र करने वाली ताकत बता रहे हैं वहीं विपक्ष को इन ताकतों में अपना भविष्य नजर आ रहा है हालांकि फिक्र किसानों के हित की बताई जा रही है।

आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। इसका जवाब देते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि तीन कृषि कानूनों का क्रियान्वयन 12-18 महीनों तक स्थगित रखने और तब तक चर्चा के जरिए समाधान निकालने के लिए समिति बनाए जाने संबंधी केंद्र का किसान संगठनों के समक्ष रखा गया प्रस्ताव बेहतर और देश व किसानों के हित में है।
किसान संगठनों द्वारा सरकार के इस प्रस्ताव को खारिज किए जाने पर तोमर ने दुख जताया और उनसे इस पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, ‘हमने उनसे कहा कि आज वार्ता को पूरा करते हैं। आप अगर निर्णय पर पहुंच जाते हैं तो कल अपना मत बताइए। हम कहीं भी इकटठा हो सकते हैं, इसकी घोषणा के लिए।’
तोमर ने कहा कि कुछ ‘ताकतें’ हैं जो अपने निजी और राजनीतिक हितों के चलते आंदोलन को जारी रखना चाहती हैं।
उन्होंने कहा कि अगर किसान का हित सर्वोपरि नहीं है और दूसरे हित सर्वोपरि हो जाएंगे तो किसान के हित में निर्णय नहीं हो पाएगा।
उन्होंने कहा, ‘भारत सरकार ने किसानों के प्रति हमेशा संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाया। उनकी भी प्रतिष्ठा बढ़े। इसलिए भारत सरकार की कोशिश थी कि वह सही रास्ते पर विचार करे. इसके लिए 11 दौर की बैठक की गई। सरकार ने एक के बाद एक अनेक प्रस्ताव दिए लेकिन जब आंदोलन की पवित्रता नष्ट हो जाती है तो निर्णय नहीं होता।’
यह पूछे जाने पर कि क्या उन्हें लगता है कि किसान संगठन सरकार के प्रस्ताव को स्वीकार करेंगे, उन्होंने कहा, ‘मैं कोई अनुमान नहीं लगाता लेकिन लेकिन मैं आशावान हूं। मुझे उम्मीद है कि किसान संगठन हमारे प्रस्ताव पर सकारात्मक विचार करेंगे।’
तोमर ने कहा कि किसानों के हित में विचार करने वाले लोग सरकार के प्रस्ताव पर जरूर विचार करेंगे।
किसानों का पक्ष
किसान नेता शिवकुमार कक्का— चर्चा में कोई प्रगति नहीं हुई और सरकार ने अपने प्रस्ताव पर यूनियनों से पुन: विचार करने को कहा।
किसान नेता दर्शनपाल— ‘हमने सरकार से कहा कि हम कानूनों को निरस्त करने के अलावा किसी और चीज के लिए सहमत नहीं होंगे। लेकिन मंत्री ने हमें अलग से चर्चा करने और मामले पर फिर से विचार कर फैसला बताने को कहा।’
भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के नेता राकेश टिकैत— ‘हमने अपनी स्थिति सरकार को स्पष्ट रूप से बता दी कि हम कानूनों को निरस्त कराना चाहते हैं, न कि स्थगित करना। मंत्रियों ने हमें अपने फैसले पर पुनर्विचार करने को कहा।’
भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष हरपाल सिंह— ‘अगर हम सरकार की पेशकश को स्वीकार भी कर लेते हैं, तो भी दिल्ली की सीमाओं पर बैठे हमारे साथी भाई कानूनों को रद्द करने के अलावा कुछ भी स्वीकार नहीं करेंगे। वे हमें नहीं बख्शेंगे। हम उन्हें क्या उपलब्धि दिखाएंगे?’
उन्होंने सरकार की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि यह विश्वास करना मुश्किल है कि वह 18 महीने तक कानूनों के क्रियान्वयन को स्थगित रखकर अपनी बात पर कायम रहेगी।
हरपाल सिंह ने साफ तौर पर कहा कि, ‘हम यहां मर जाएंगे, लेकिन कानूनों को रद्द कराए बिना वापस नहीं लौटेंगे।’
किसानों के सवाल पर कांग्रेस
आज अध्यक्ष के चुनाव को लेकर कांग्रेस कार्य समिति की बैठक हुई लेकिन मुद्दा किसानों का ही छाया रहा। मोर्चा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने संभाला। उन्होंने कहा की सरकार ने किसान संगठनों के साथ बातचीत के नाम पर हैरान करने वाली असंवेदनशीलता और अहंकार दिखाया है।
केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन का उल्लेख करते हुए उन्होंने आरोप लगाया, ‘ किसानों का आंदोलन जारी है और सरकार ने बातचीत के नाम पर हैरान करने वाली असंवेदनशीलता और अहंकार दिखाया है।’
कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि, ‘यह स्पष्ट है कि कानून जल्दबाजी में बनाए गए और संसद को इनके प्रभावों का आकलन करने का अवसर नहीं दिया गया। हम इन कानूनों को खारिज करते हैं क्योंकि ये खाद्य सुरक्षा की बुनियादों को ध्वस्त कर देंगे।’ उन्होंने अर्थव्यवस्था की स्थिति को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा और कहा कि सरकार निजीकरण को लेकर हड़बड़ी में है।
उन्होंने कहा कि , ‘एक सप्ताह में संसद सत्र आरंभ होने जा रहा है। यह बजट सत्र है, लेकिन जनहित के कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर पूरी तरह चर्चा किए जाने की जरूरत है। क्या सरकार इस पर सहमत होती है, यह देखना होगा।’
साफ है किसान आंदोलन ने कई मोर्चा खोल दिया है। सरकार अपनी कह रही है किसान अपना पक्ष रख रहे हैं। इधर विपक्ष भी किसानों के आंदोलन में अपना सियासी फायदा देख रहा है। नतीजा साफ है न तो किसान पीछे हटने को तैयार हैं और न ही सरकार। इस बीच दिल्ली के बोर्डर पिछले लगभग दो माह से घिरे हुए हैं। देश गणतंत्र के पर्व के मुहाने पर खड़ा है। किसान ट्रैक्टर मार्च निकालने की तैयारी में हैं। पुलिस कानून व्यवस्था के मद्देनजर उन्हें समझा रही है। आगे क्या होगा ये तय नहीं है।




