पंचायतों में लोकतंत्र की नीलामी,निर्विरोध निर्वाचन पर प्रशासन की कड़ी नजर

अमरनाथ झा

पंचायत चुनावों में पदों की नीलामी हो रही है। सबसे अधिक बोली लगाने वाला निर्विरोध निर्वाचित हो रहा है। मामला किसी तथाकथित पिछड़े प्रदेश का नहीं, महाराष्ट्र का है जिसे राजनीतिक रूप से काफी जागरुक माना जाता है। महाराष्ट्र में भी दूरदराज के पिछड़े इलाके में नहीं, बल्कि शिक्षित और संपन्न शहर पुणे के आसपास के कई जिलों से ऐसे मामले उजागर हुए हैं। एक-दो विच्छिन्न मामले नहीं, सैकड़ों मामले सामने आए हैं। हालांकि अभी विस्तृत जांच नहीं हुई है और केवल दो पंचायतों के चुनाव रद्द हुए हैं पर जितने मामले मीडिया के प्रयास से सामने आए हैं, उनसे लोकतंत्र के जमीनी स्तर की हकीकत का पता चलता है।


महाराष्ट्र में ग्राम पंचायत के चुनाव 15 जनवरी को हो रहे हैं। इस बीच पदों की नीलामी का मामला उजागर हुए हैं। राज्य चुनाव आयोग के निर्देश पर कुछ पंचायतों के चुनाव रद्द भी हुए हैं। पर मामला चुनाव रद्द होने भर का नहीं है। इस तरह का प्रचलन चौंकाने वाला है और इसपर राजनीतिक पंडितों को गंभीरता से सोचने की जरूरत है। पदों की नीलामी होने की खबर इंडियन एक्सप्रेस में छपी। फिर निर्वाचन आयोग को इसके विडियो भी मिले। निर्वाचन आयोग ने 13 जनवरी को दो ग्राम-पंचायतों के चुनाव को रद्द कर दिया, बाकी शिकायत कों की जांच करने के निर्देश संबंधित जिलाधिकारियों को दिया है। शिकायतें सैकड़ों पंचायतों से आई हैं। जिन पंचायतों के निर्वाचन रद्द हुए हैं, वे नासिक जिले का उमरेन पंचायत और नंदुरबार जिले का कोंडामाली पंचायत है। बताया जाता है कि इन पंचायतों के प्रधान का पद दो करोड़ और 42 लाख में बिके थे।
इस खबर के मिलने पर इंडियन एक्सप्रेस के संवाददाता ने पुणे जिला के खेद तालुका में तीन पंचायतों-मोई,कुरुल और कुडे भद्रुक का दौरा किया। उन सभी पंचायतों में निर्विरोध निर्वाचन हो गया था। पंचायतों में आमतौर पर नौ से 18 सदस्य होते हैं जो पंचायत के आकार पर निर्भर करता है। तीनों पंचायतों में ग्रामीणों ने बताया कि सर्वसम्मत चुनाव करने की कोशिश की जाती है। पदों की नीलामी का मामला इसी से पैदा होती है। मोई गांव में निर्विरोध निर्वाचित होने वाले एक उम्मीदवार किरन गवारे ने कहा कि सघन जन-संपर्क के माध्यम से हम निर्विरोध निर्वाचित होते हैं। हमें लगता है कि चुनाव प्रचार और मतदान के दिन जो पैसे खर्च होंगे, उन्हें निर्विरोध निर्वाचित होने का प्रयास करने में ही खर्च किया जाए। इस पैसे से गांव में मंदिर आदि बनाई जा सकती है जिसे सरकारी योजनाओं के अंतर्गत नहीं कराया जा सकता। पर इतनी रकम आई कहां से या इस रकम का भुगतान किसने किया, जैसे प्रश्नों का जबाब उन्होंने नहीं दिया।


मोई गांव की यही कहानी दूसरे गांवों में भी दुहराई जाती है। उम्मीदवारों की जिलावार सूची से पता चलता है कि निर्विरोध निर्वाचन का दायरा कितना बड़ा है। पुणे जिला में 746 ग्राम-पंचायतों में से 81 पंचायतों में केवल एक उम्मीदवार मैदान में रहा अर्थात सभी में निर्विरोध निर्वाचन तय है। नंदुरबार जिला के 87 पंचायतों में से 22 में सभी पंचायत सदस्य निर्वाचित होने जा रहे हैं। बीड जिले में 129 ग्राम पंचायतों में से 18 में निर्वाचित होने वाले उम्मीदवार तय हो चुके हैं। कोल्हापुर के 433 पंचायतों में से 47 पंचायतों में निर्विरोध निर्दाचन तय है। लातूर जिला के 401 पंचायतों में से 25 में निर्विरोध चुनाव तय हो चुका है।
सरेआम चर्चा है कि इन निर्विरोध निर्वाचनों के लिए पैसों की लेन-देन हुई है। इस बारे में शिकायतें और विडियो आने पर राज्य निर्वाचन आयुक्त यूपीएस मदन ने 4 जनवरी को जांच के आदेश दिए। उनके सामने इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबरें भी थी। उन्होंने इन घटनाओं के लोकतंत्र की भावनाओं के पूरी तरह खिलाफ बताते हुए जिलाधिकारियों को जांच करने के आदेश दिए। जिलाधिकारी से मिली रिपोर्ट के आधार पर दो ग्राम-पंचायतों के घोषित चुनाव को रद्द कर दिया। दूसरे जिलों से रिपोर्ट आने का इंतजार है। जिलाधिकारियों को इन मामलों में जरूरी कानूनी कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।


परन्तु इन निलामियों के असली खिलाडियों को पकड़ पाना इतना आसान नहीं होगा। एक तो पूरा खेल दबे-छिपे होता है। नादुर्बार के जिलाधिकारी राजेन्द्र भारुद की जांच में पता चला कि नीलामी में हिस्सा लेने वाले लोग स्वयं उम्मीदवार नहीं थे, बल्कि उम्मीदवार उनके रिश्तेदार या दूसरे लोग थे जो निर्वाचित होने के बाद पीछे मौजूद व्यक्ति के कहने पर काम करने वाले थे। इसीतरह की रिपोर्ट नादेड के जिलाधिकारी ने भी दी है। इतना ही नहीं, अधिकतर नीलामी में कोई कागजी कार्रवाई नहीं होती, ऐसी स्थिति में प्रशासन के लिए कोई कार्रवाई करना बहुत ही कठिन है। इनके काम का तरीका एकदम सरल है। गांव के प्रभावशाली लोग उम्मीदवारी के इच्छुक व्यक्ति को बुलाते हैं और उससे किसी सार्वजनिक काम अर्थात मंदिर बनाने या स्कूल के विस्तार जैसे काम के लिए पैसे मांगते हैं। आमतौर पर ऐसे काम के लिए पैसे मांगे जाते हैं जो किसी सरकारी योजना के तहत नहीं कराए जा सकते। इसमें जो सर्वाधिक पैसा देने के लिए तैयार हो जाता है, उसके निर्विरोध निर्वाचित होने का रास्ता साफ हो जाता है। चुनाव लड़ने के इच्छुक दूसरे लोगों को जैसे-तैसे मना लिया जाता है। नांदेड जिला के शिवसेना नेता प्रहलाद इंगोले ने बताया कि वे स्वयं चुनाव लड़ना चाहते थे, पर पैसे की व्यवस्था नहीं कर सके। इसलिए उन्हें मैदान से हट जाना पड़ा।
पंचायत चुनावों का महत्व वित्त आयोग की सिफारिश के अनुसार अधिक आवंटन होने से बढ़ गया है। पहले जिला परिषदों को अधिक रकम मिला करती थी। पर अब जिला परिषद या पंचायत समिति को मिलने वाली रकम से अधिक पंचायतों को मिलने लगा है। पंचायतों का बजट करोड़ो का हेने लगा है। संविधान के 74 वें संशोधन के बाद स्थानीय विकास के अधिकतर काम पंचायती राज संस्थानों के माध्यम से ही कराया जाना है।

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