वामपंथी नेताओं के कुचक्र में फंसा किसान आंदोलन, प्रभावी संतों के जरिए सुलह के रास्ते तलाश रही है सरकार

मंगरूआ

नयी दिल्ली: किसान आंदोलन में जिस तरह से सरकार और किसान प्रतिनिधियों के बीच गांठ पड़ी हुई है वैसे में दिल्ली के बोर्डर से लगभग 45 दिन से जमे किसान कैसे हटेगें किसी को समझ नहीं आ रहा। किसान चाहते हैं कृषि कानून वापस हो और सरकार चाहती है कि कृ​षि कानून वापसी के मसले को छोड़कर बाकी सभी मुद्दों पर सरकार आगे बढ़ने को तैयार है। भले ही जितने भी संशोधन कृषि बिल में करने पड़ें। जबकी दूसरी तरफ किसान संगठनों का कहना है कि कृषि बिल के वापसी से कम कुछ भी मंजूर नहीं। किसान संगठनों ने कहा कि वे 26 जनवरी को गणतंत्र के अवसर पर ट्रैक्टर मार्च निकालेंगे। 8 जनवरी को हुई वार्ता के एक दिन पहले किसानों दिल्ली के सभी बोर्डरों पर ट्रैक्टर मार्च निकाल कर शक्ति प्रदर्शन भी किया था।
न तो किसान सरकार की बात मानने को तैयार हैं और न ही सरकार। सरकार का कहना है कि ये कृषि कानून पूरे देश के खेती किसानी को ध्यान में रखकर बनाया गया है और वो किसान कृषि बिल के समर्थन में हैं ऐसे में इसे वापस नहीं लिया जा सकता। विपक्ष किसानों के साथ खड़ा होकर सरकार की मुश्किलें बढ़ा रहा है। ऐसे में सुलह का रास्ता कैसे निकलेगा इसको लेकर असमंजस की स्थिती है। व​ह रास्ता संत समाज से होकर गुजरता है क्योंकि हरियाणा और पंजाब के ग्रामीण समाज व खेतिहर किसान में डेरा और गुरूद्वारा का काफी प्रभाव है। ऐसे ही एक संत लक्खा बाबा ने पिछले दिनों कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से मुलाकात कर रास्ता निकालने का प्रयास किया था। हालांकि नरेंद्र तोमर ने इसे व्यक्तिगत मुलाकात करार दिया,फिर भी इसके संकेत मिले हैं कि कहीं न कहीं सुलह का प्रयास चल रहा है।


कौन है बाबा लक्खा सिंह
बाबा लक्खा सिंह नानकसर गुरुद्वारे के प्रमुख हैं। जैसा की ज्ञात है कि पंजाब, हरियाणा सहित तमाम राज्यों में नानकसर गुरुद्वारे हैं। बाबा लक्खा इन सभी नानकसर गुरुद्वारों की प्रबंधक कमेटी के प्रमुख हैं। स्वाभाविक है गुरुद्वारे नानकसर की सिखों की गहरी आस्था है और इस गुरुद्वारे के प्रमुख होने के नाते बाबा लक्खा सिंह की विश्वसनियता के सिख समुदाय में काफी है और यह समाज उनकी बातों पर भरोसा करता है।
ऐसे में जब 7 जनवरी को किसान ट्रैक्टर मार्च निकाल रहे थे और अगले ही दिन यानी 8 जनवरी को किसानों और सरकार के बीच वार्ता होनी थी तो बाबा लक्खा सिंह ने केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने इनसे मुलाकात की। इसके बाद यह कयास लगा कि क्या सरकार बाबा लक्खा के जरिये किसान आंदोलन खत्म कराने के विकल्प खोज रही है। ये भी खबरें आईं कि बाबा लक्खा सिंह अपना एक फॉर्मूला सामने रख सकते हैं, जिस पर सरकार और किसानों के बीच सहमति बन सकती है। हालांकि जब नरेंद्र तोमर सामने आये तो उन्होंने कहा कि वो सब लोगों से मिल रहे हैं। संत भी उसमें शामिल हैं। 7 जनवरी को कृषि मंत्री से मुलाकात के बाद बाबा ने कहा–

“बच्चे, बुज़ुर्ग, महिलाएं सड़क पर बैठे है. लोग जान गंवा रहे हैं। ये असहनीय है. मेरा मानना है कि किसी तरह इसका हल निकलना चाहिए. इसीलिए कृषि मंत्री से वार्ता की, जो अच्छी रही। जल्द ही इस पर प्रस्ताव आएगा और हल निकलेगा।”
बाबा लक्खा सिंह के फार्मूले के विषय में यह कहा गया कि वे दोनों पक्षों में समझौता कराने के लिए प्रयासरत हैं। इसके लिए उन्होंने सरकार के समक्ष ये प्रस्ताव दिया है कि केंद्र सरकार को कृषि कानून लागू करने की ताकत राज्य सरकारों के हाथ में देनी चाहिए। वैसे भी कृषि का मसला राज्य का ही मामला है।

लेकिन अगले ही दिन जब केंद्र सरकार और किसान संगठनों के प्रतिनिधी विज्ञान भवन में वार्ता की टेबल पर बैठे तो किसानों ने एक बार फिर साफ किया कि उन्हें कृषि बिल की वापसी से कम कुछ भी मंजूर नहीं। सरकार की तरफ से कहा गया कि कृषि बिल वापसी के अलावा सभी मुद्दों पर बात हो सकती है। साफ है लक्खा बाबा ने यदि किसी समझौते का प्रयास किया था उसका नतीजा वार्ता में नहीं दिखा और अगली तारीख 15 जनवरी की रखी गई।
ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या प्रभावशाली संतों और डेरा प्रमुखों की मध्यस्थता के बाद समाधान का कोई रास्ता निकल सकता है। इसका जवाब किसान नेता गुरुनाम सिंह के जवाब में टटोला जा सकता है। जिन्होंने साफ कहा किसान आंदोलन से जुड़ा कोई भी फैसला संगठन और उसके नेता ही लेंगे। अन्य व्यक्तियों को निर्णय लेने का अधिकार नहीं है। लोगों को इसमें हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए। हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया लेकिन उनका इशारा साफ था कि वे बाबा लक्खा सिंह की बात कर रहे हैं।


पहले से भी यह बातें बार-बार सामने आ रही है कि पूरे किसान आंदोलन पर वामपंथी संगठनों का व्यापक प्रभाव है। भारतीय किसान यूनियन के हरियाणा अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी ने बड़ी तादाद में हरियाणा के किसानों को एकजुट करने का काम किया है। अब इन पर हत्या के प्रयास समेत 8 धाराओं में केस दर्ज हो गया है। एफआईआर में जनसमूह के साथ उपद्रव मचाने और वाहन चढ़ाकर हत्या करने की कोशिश करने व संक्रमण का खतरा फैलाने की धाराएं भी लगाई हैं। किसान नेता
दर्शन पाल, योगेंद्र यादव,कुलवंत सिंह संधु,हन्नन मोल्लाह, निर्भय सिंह दूधिके, सुरजीत सिंह फूल
इन सभी नेताओं का वामपंथी संगठनों के साथ गहरा जुड़ाव रहा है। ये नेता नहीं चाहते कि सरकार और किसानों के बीच कोई सहमती बने। इसीलिए वार्ता के मंच पर भी यही नेता हावी रहे हैं जिनका एक सूत्री एजेंडा है कृषि बिल वापस हो।
बावजूद इसके हरियाणा और पंजाब ग्रामीण कृ​षक समाज पर गुरुद्वारे और डेरे का व्यापक प्रभाव है। यदि मध्यस्थता का कोई सूत्र टटोला जा सकता है वो इन्हीं के जरिए टटोला जा सकता है। ऐसे में बाबा लक्खा सिंह जैसे अन्य संत भी सरकार और किसानों के बीच मध्यस्थता का तार जोड़ने का प्रयास करते हैं तो निश्चित रूप से इसका नतीजा निकलेगा और किसान बोर्डर पर जमे किसान और सरकार के बीच सुलह का कोई रास्ता तैयार होगा। बाबा लक्खा सिंह के प्रयास को इसी पृष्टभूमी में देखा,समझा जा सकता है और सरकार इस दिशा में आगे बढ़ रही है।
किसान आंदोलन में तबलीगी और मरकज सरीखे कोरोना फैलने के खतरे को लेकर पूछे गये सुप्रीम कोर्ट के सवाल पर भी केंद्र और दिल्ली सरकार को जवाब दाखिल करना है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने किसानों से जुड़े सभी मसलों पर 11 जनवरी को सुनवाई करने की बात कही है,ऐसे में ये उम्मीद बंध रही है कि किसान आंदोलन का कुछ सकारात्मक हल निकले।

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