दिल्ली.. के बासिंदो के भाग्य में भुनभुनाना ही बदा है,ये तो अभी झांकी है,गणतंत्र बाकी है

मंगरूआ

दावा था उनका लगा देंगे दिल्ली को चार चांद…
हर प्रवेश द्वार पर आके बैठ गये हैं किसान
जहां देखो वहीं है ट्रैक्टरों का शोर
गणतंत्र के मेले का बनेगा रेला ये आशंका है चहुं ओर
हुक्मरानों का वादा था कि दिल्ली को बना देंगे लंदन
ऐसी खुली पोल की चंदन घिसते रह गये रघुनंदन

ऐसे में कौन फिक्र करे दिल्ली और उसके बासिंदो का। दिल्ली उस कमजोर की लुगाई की तरह हो गई है जिसे जब मन करता है, चौखटे पर आकर डेरा डाल देता है,खिड़की से आकर ताक-झांक कर लेता है। उधर दिल्ली के रहनुमा यूं बल्लियों उछल रहे हैं मानो..
दौलत-ए-हुस्न पे दरबान बिठा रक्खा है।
रहनुमा मस्त हैं,मदमस्त हैं.. दिल्ली वाले पस्त है।
अब एक दिन की बात हो तो समझ में भी आये। पहली बार हो तो स्वीकार भी कर लिया जाये। कभी हजरत निजामुद्दीन औलिया ने कहा था ‘हुनूज दिल्ली दूर अस्त।’ अजी कभी होती होगी दिल्ली दूर।
अब तो ये आलम है…जो जा न सका दिल्ली, उसकी उड़ेगी खिल्ली। अब अपनी खिल्ली भला कौन उड़वाये। जिसको देखो वहीं मुंह उठाये चलाया आता है, बीच सड़क पर तंबू तान लेता है और हो जाता है दिल्ली के बासिंदो का जीना दूभर। दिल्ली वालों के सहनशीलता का आलम ये है कि अपनी इस दुरावस्था पर मुंह भी नहीं खोलते, चूं चपर करना तो दूर की बात रही। अब मुंह खोलें भी तो कैसे दिल्ली किसी एक की तो है नहीं। दिल्ली सबकी है। दिल वालों की भी और बाहर वालों की भी।


कितने आये कितने गए कोई गिनती नहीं
लाख लूटा उजाड़ा, क़ायम बुलंद है दिल्ली।

अजी खाक बुलंद है। लूटे पिटे बासिंदो की लुटी पिटी दिल्ली। पहले कोरोना से परेशान,अ​ब किसानों ने किया जीना हराम।
” हर तरफ तकरारों का शोर
बोर्डर पर बैठे हैं किसान चहुंओर

अदालत पूछ्यो कहीं बढ़ तो नहीं रहा कोरोना का खतरा
तबलीगी को मरकज,मरकज को तबलीगी का आसरा।।”

वैसे भी इस देश में वेल्ले कोई कमी है नहीं। वेल्ले रहकर जो उन्नति और तरक्की की जा सकती है….वैसी और कहां संभव है। रबी का मौसम है। चिड़ियों के जगने से पहले खेत छोड़ उठ जाने वाला किसान दिल्ली के सभी बोर्डर पर बना मेहमान है।

कैसा मेहमान। ये बिन बुलाए आएं हैं। अजी मुसीबत भी तो बिन बुलाए आती है। अ​ब किसको पता था कि आएं हैं तो जम ही जाएंगे। ठीक उसी तरह जैसे चंगेज और हलाकू आये। बाबर और औरंगजेब आए। इन्हें कौन सा पंडित जी ने पतरा देख के दिन समय बताया था।


उनकी बात और थी। ये तो हमारे अन्नदाता हैं। तो दिल्ली के बासिंदों का कौन सा पेट भरा हुआ है। लॉक डाउन में देखा नहीं क्या केजरीवाल ने खिलाया कम..मुफ्त में बांटने का ढ़िढ़ोरा ज्यादा पीटा। तभी तो दिल्ली को अपना मान दिल्ली को सींचने,संवारने, सजाने वाले प्रवासी पैदल ही घर को निकल लिये।
लेकिन किसान तो दिल्ली में सरकार से बातचीत करने आयें हैं। अब सरकार बहादुर तो दिल्ली में ही रह्वै हैं। गांव तो चुनाव के वक्त ही नजर आवे हैं। खाक बातचीत हो रही है परिणाम तो नील बट्टा सन्नाटा है। हमें तो नतीजा निकले का कोई आसार नहीं दिख रहा।
मतलब कि किसान घेरे ही रहेंगे दिल्ली को।
बी पॉजिटिव, समस्या है तो ​समाधान भी होगा। ये बात सही है कि आंदोलन-आंदोलन का खेल खेलते किसान किसी के लिए प्रॉब्लम हैं तो किसी के लिए तो सॉल्यूशन भी हैं। देख नहीं रहो है कि किसानों के आंदोलन ने विपक्षियों में कुर्सी की आस जगा दी है।
मसला टेढ़ा जान पड्यो है। नो अनार फिर क्यों बीमार। अभी साल से थोड़ा ही तो ज्यादा बीतयो है जब आम चुनाव हुआ था और मोदी दुबारा गद्दी पर बैठ गयो। यानी एक अनार, सौ बीमार की कहावत पुरानी ही गई है। अब अनार देखकर बीमार ना पड़ते। अनार ना भी हो, तो कोरोना से बीमार पड़ने के लिए मारकाट हो जाती है। मास्क भी मानो विलासिता का सामान हो गयो है।
लेकिन किसान तो कहे हैं कि उनका विपक्षियों से कोई लेना देना नहीं। किसानों की भलाई चह्वे हैं।

यहीं तो मसला उलझ गयो। विपक्ष किसानों के पीठ पर बैठ कर सत्ता की मलाई भी खाना चाहे हैं और साथ भी न दिखना, अलग भी न दिखना। हमें तो जो समझ आयो है कि लिव इन वाला मामला है। घोषित तौर पर उनकी ब्याहता नहीं दिखना, पर अलग सेपरेट सा भी न दिखना। दस बातें तो बनाएंगे ही लोग।



छोड़ों इन बातों को। किसान की सरकार जाने और विपक्ष इसे मौका माने। ऐसे में परेशानी तो दिल्ली के बासिंदों की ही है। वो भी तो न बोलते कछु। किसान आंदोलन से परेशान तो हैं। कहना भी चाहे हैं लेकिन डर भी लग रहा है। ऐसे मे बंदे के पास एक ही रास्ता है भुनभुनाते रहो। और दिल्ली वाले आजकल गाहे बेगाहे भुनभुनाने में लगे हैं।
ऐसे तो बात नहीं बनेगी। क्योंकि अन्नदाताओं को आजकल नेताओं वाली बीमारी लग गई है और विपक्ष तो साथ है ही। अब नेता और मक्खी में कोई ज्यादा अंतर तो होये न है। नेता कई मामलों में मक्खी सा ही होता है, कित्ता भी उड़ाओ, पर टलता नहीं है, सत्ता के गुड़ पर भिनभिनाता ही रहता है। अन्ना आंदोलन के समय यह बात साबित भी होई गयी है। आये थे व्यवस्था परिवर्तन करने और सत्ता का ऐसा चस्का लग्यो कि दिल्ली पर कुंडली मार के ही बैठ गये। सब कुंडली योग है। जिसके भाग्य में जो बदा है वो होके रहेगा।

दिल्ली वालों के भाग्य में भुनभुनाना लिख्यो है तो भुनभुनाते रहें, इससे उनकी समस्या न हल होने वाली। अब दिल्ली वालों के लिए ये पहली और आखिरी समस्या तो है नहीं। आंदोलन के दौरान बाईक वाले, मर्सेडीज और साइकिल-सवार यहां एक ही तरह से ट्रैफिक-जाम का शिकार हुआ करते हैं। तुर्रा ये कि खेतो में चले वास्ते सरकारी सब्सिडी से ली गयी ट्रैक्टर हाईवे पर बिना रोक—टोक फर्राटा भर रही है। मजाल कि कोई कोई पुलिस वाला आंख तरेर ले। सब नत मस्तक हैं ​जी..शाषण भी और प्रशासन भी..अपने केजू भाई भले दिल्ली के गली मोहल्लों में फ्री वाई फाई न दे रहे हों लेकिन वहां के वास्ते सब फ्री।


बावजूद इसके क्रांति के नारों से गूंजती आबो-हवा ही दिल्ली की असल रिवायत है। सब की कुछ लगनेवाली रिश्तेदार है दिल्ली। हर आनेवाले की पक्की यार है दिल्ली। कहीं उजड़ती, तो कहीं गुलजार है दिल्ली।

साल ही तो बीता है। देखा नहीं था कैसे सीएए और एनआरसी के नाम पर दिल्ली के शाहीन बाग में 100 दिनों तक धरना चला और भारत तेरे टुकड़े-इंशा अल्लाह..इंशा अल्लाह की आवाज गूंजती रही। परेशान कौन दिल्ली वाले ही न। इस दौरान नोएडा-गुड़गांव जाने वालों को कितने मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। तीन महीने तक लोग घंटों ट्रैफिक में फंसते रहे और ऑफिस से घर और घर से ऑफिस जाने के दौरान घंटों रास्ते में लटकते रहे। कहीं से कोई आवाज आई। नहीं न। ये वो लोग हैं जो ईमानदारी से टैक्स भरते हैं। लेकिन, सहूलियत की बजाय उन्हें आंदोलन और धरना के नाम पर यातना झेलनी पड़ती है। बदले में कर भी क्या सकते हैं सिर्फ भुनभुनाना। भुनभुना के चुप हो जावे हैं।


शाहीन बाग की बात छोड़ भी दें और किसान आंदोलन की ही बात करते हुए फलैश बैक में चलें तो याद आता है कि आज से करीब 32 साल पहले 25 अक्टूबर 1988 को किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसानों ने दिल्ली के बोट क्लब पर हल्ला बोल कर दिल्ली को ठप कर दिया था। उनको दिल्ली के लोनी बॉर्डर पर पुलिस प्रशासन के द्वारा बल पूर्वक रोकने की कोशिश की गई। किसान नहीं रुके पुलिस ने लोनी बॉर्डर पर फायरिंग की और दो किसानों की जान चली गई। पुलिस की गोली लगने से कुटबी के राजेंद्र सिंह और टिटौली के भूप सिंह की मौत हो गई थी। इसके बावजूद किसान दिल्ली पहुंचे थे। उसके बाद तो मानो लुटियन की दिल्ली की शामत आ गई हो। इंडिया गेट, विजय चौक और बोट क्लब पर किसान ही किसान नजर आ रहे थे। किसानों ने अपनी बैल गाड़ियां और ट्रेक्टरों को बोट क्लब पर खड़ा कर दिया। सप्ताह भर से ज्यादा तक किसानों ने राजपथ को अपने कब्जे में रखा था। आखिरकार सरकार को किसानों के आगे नतमस्तक होना पड़ा।


इस बार तो शुक्र है किसान दिल्ली के बोर्डर पर जमे हुए हैं। ठंढ़ से ठिठुरते हुए दिल्ली के सभी बोर्डरों पर तंबू तान सड़क पर अड़े हुए हैं। इससे दिल्ली वालों को ही तो परेशानी हो रही है। हुक्मरान तो चैन में है। उधर किसान भी भांगड़ा पाते हुए,रागिनी गाते हुए बुलावे के इंतजार में हैं। वापस लो,वापस लो के नारे कभी-कभार सुनाई दे जाते हैं। क्या वापस लेना है,​क्यों वापस लेना है शायद ही किसी-किसी को पता हो? कहीं किनारे से खालिस्तान जिंदा बाद के नारे और शर्जिल के इमान को आसमानी किताब मानते पोस्टर भी कभी कभार दिख जावे है। बाकी सब ठीक ठाक है। किसानों की मंशा पर शक नहीं कर सकते। पराली के धुएं से धुआं-धुआं होती इस दमघोटू दिल्ली में जहां देखो वहीं ट्रैक्टर का शोर..लेके रहेंगे आजादी,कराके रहेंगे बिल वापसी..देखो कैसे ट्रैक्टर सरपर दौड़ रही है..ये तो अभी झांकी गणतंत्र का जश्न बाकी है। ऐसे में भला उंची से उच्ची अदालत को भी आशंका होने लगी है कि ई टेंट में बसी दिल्ली कहीं कोरोना बम पर तो नहीं बैठी। उदाहरण तो एक ही उ तबलीगी वाले मौलाना साद..भाईजान ने ऐसा मजलिस सजाया कि सब तरफ से कोरोना फैलाया..कोरोना फैलाया कि आवाज गूंजने लगी। खैर,इससे दिल्ली को ​क्या दिल वाले की ठहरी…और डर भी कैसा जब पहले न डरे तो अब क्या डरेंगे..टीका आया..टीका आया शोर तो मच्यो है..लेकिन उ का कहते हैं..
आपन चाल जीव के साथ
रहर दाल घी के साथ


इसलिए दिल्ली वालों का न पहले कुछ हुआ था, न आगे कुछ होगा। दिल्ली वालों की बेचारगी यह है कि यहां बसनेवाले जब भी अपनी उलझनों से छूटने बालकनी में आते हैं, जैसे ही चाय का प्याला हाथ में लिये अखबार पलटना शुरू करते हैं तो उन्हें इस आशंका से दोचार होना पड़ता है कि पता नहीं आज कहां आंदोलन और प्रदर्शन का तमाशा चल रहा हो और इनसे जूझते हुए, भीड़ के रेलमपेल में शामिल हो दफ्तर के लिया निकलना पड़े। इस तरह जूझते-झूलते थके-हारे नौकरीपेशा लोग यहां अपने मुर्दा-ख्वाब ढोते रोज नजर आयेंगे और उसी ख्वाब की तासीर लिये शाम ढ़ले अपने घर वापस आएंगे।
तुर्रा ये कि दिल्ली की सियासत संभाल रहे हुक्मरान का दावा होता है कि हम दिल्ली में चार चांद लगा देंगे और उसे एक साल में लंदन जैसा बना देंगे। ​और दिल्ली वाले वादा तेरा वादा, वादे पे तेरे मारा गया बंदा ये सीधा सादा गाने की तर्ज पर अहले सुबह का इंतजार करते हुए रात गुजारते हैं कि सचमुच दिल्ली कहीं लंदन न बन गई हो।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *