आज फिर सजेगा उम्मीदों का गोलमेज, परोसी जायेगी लंगर की थाली..नहीं निकलेगा समाधान,जारी रहेगा घमासान

​संतोष कुमार सिंह

नयी दिल्ली: आज किसान संगठनों का ट्रैक्टर मार्च संपन्न हुआ। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी भी आई। तबलीगी जमात और कोरोना के फैलाव का खतरा जताते हुए इंतजामात के सवाल उठाए गये। कल सरकार और किसान के बीच पूर्व निर्धारित वार्ता भी होगी। लेकिन मूल सवाल वही बना हुआ है क्या वार्ता सफल होगी? क्या सरकार किसानों के कहे मुताबिक तीन कानूनों के वापसी को तैयार होगी? क्या किसान तीन कानून के वापसी से कम पर तैयार होंगे? इन सब सवालों का जवाब ना है। क्योंकि न किसान झुकने को तैयार हैं और न ही सरकार। वार्ता सिर्फ वार्ता के लिए हो रही है और कवायद की जा रही है कोई तो ऐसा सूत्र मिले जिससे वार्ता सफल हो।
इस क्रम में सरकार की तरफ से मुख्य वार्ताकार केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने एक बार फिर साफ कर दिया कि सरकार तीन नए कृषि कानूनों को वापस लेने के अलावा किसी भी प्रस्ताव पर विचार करने को तैयार है। वहीं ट्रैक्टर मार्च की सफलता के गदगद भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने कहा कि आज की रैली काफी अच्छी रही। आज हमारे किसानों ने ट्रैक्टर रैली निकालकर ट्रेनिंग ली है ताकि 26 जनवरी के दिन ट्रैक्टर रैली की परेड निकाली जा सके। 26 जनवरी के दिन ट्रैक्टर और टैंक एक साथ चलेंगे। इतना ही नहीं राकेश टिकैत तो यहां तक कह गये कि हम मई 2024 तक प्रदर्शन करने को तैयार है। हम कहीं नहीं जा रहे। उसके बाद तो सरकार मानेगी।


इन सब के बीच पंजाब के नानकसर गुरुद्वारा के प्रमुख बाबा लखा ने नरेंद्र सिंह तोमर से मुलाकात की तो यह कयास लगाया गया कि शायद भीतर खाने धार्मिक संत के जरिए सरकार और किसान के बीच कुछ बातचीत चल रही हो और संत मध्यस्थता को तैयार हैं। हालां​कि इन सभी अटकलों को तोमर ने यह कहते हुए विराम दे दिया ​की ‘‘मैं उनसे (बाबा लखा से) बात करना जारी रखूंगा। वह आज दिल्ली आए हैं, यह खबर बन गई। मेरा उनसे पुराना संबंध है।’’ यह पूछे जाने पर कि गतिरोध को समाप्त करने के लिए प्रदर्शनकारी किसानों और सरकार के बीच मध्यस्थता कर सकने वाले पंजाब के किसी अन्य धार्मिक नेता से क्या वह मिलेंगे, तोमर ने कहा, ‘‘मैं उनसे मिलूंगा–चाहे वे किसान हों या नेता।’ सरकार ने कहा है कि वह इन कानूनों को वापस लेने की मांग के अलावा किसी भी प्रस्ताव पर विचार करेगी। यह पूछे जाने पर कि क्या प्रस्तावों में राज्यों को नये केंद्रीय कानून लागू करने की छूट दी गई है, उन्होंने कहा , ‘‘नहीं।’’


क्या सरकार ने नानकसर गुरुद्वारा प्रमुख के साथ एक प्रस्ताव पर बातचीत की है, मंत्री ने कहा, ‘‘ सरकार ने ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं दिया है। बातचीत की सफलता पर तोमर ने कहा ​की, ‘मैं अभी कुछ नहीं कह सकता. असल में, यह इस बात पर निर्भर करता है कि बैठक में चर्चा के लिए क्या मुद्दा उठता है।’ हालांकि लखा बाबा जब तोमर के यहां से निकले तो उन्होंने कहा कि लोग जान गंवा रहे हैं, बच्चे,बुजुर्ग, महिलाएं सड़क पर बैठी हैं। ये दुख असहनीय है। मुझे लगा कि इसका हल निकलना चाहिए इसलिए कृषि मंत्री से मुलाकात की। वार्ता अच्छी थी, हमने समाधान खोजने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि हमारे पास एक नया प्रस्ताव आयेगा, और इस मामले का हल खोजा जाएगा।
इस बीच सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने तबलीगी से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या किसान कोरोना से बचाव के जरूरी उपाय अपना रहे हैं? सरकार के इन्कार करने पर भारत के चीफ जस्टिस शरद अरविंद बोबडे ने कहा कि अगर उपाय नहीं किए गए तो भीड़ से संक्रमण फैल सकता है। कोर्ट ने सरकार से भीड़ पर रोक के लिए दिशा-निर्देश जारी करने को कहा। इतना ही नहीं मुख्य न्ययाधीश ने कहा कि हम इसको लेकर चिंतित हैं, क्योंकि अगर उपाय नहीं किए गए, तो निजामुद्दीन तबलीगी जमात जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने इसके बाद केंद्र को कोरोना को फैलने से रोकने के लिए अब तक उठाए गए कदमों पर एक रिपोर्ट देने के लिए कहा। किसानों से जुड़े सभी मामलों में सुप्रीम कोर्ट में 11 जनवरी को सुनवाई होगी। उधर, पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने भी कृषि कानूनों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है।


साफ है ऐसा कोई संकेत नहीं ​है की वार्ता सफल होगी। किसान यूनियनें समाधान नहीं चाहती और इसको लेकर उनकी कुछ और ही योजना है। क्योंकि अभी भी वैसा कोई सूत्र नहीं मिला है जिससे यह आशा बंधे। इन सब के बीच प्रमुख किसान नेताओं के पृष्टभूमि को समझने की जरूरत है जो सरकार से बातचीत कर रहे हें।
दर्शन पाल: दर्शन पाल एक माओवादी नेता भी हैं। वह पीपल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ इंडिया (PDFI) के संस्थापक सदस्य हैं। यह संगठन उस माओवादी क्रांति का ही अनुगामी था जिसके तहत देश के विभिन्न हिस्सों में बर्बरतापूर्ण हिंसक कार्रवाइयों को अंजाम दिया जाता है। पीडीएफआई के कार्यकारी समिति के 51 सदस्य होते थे। दर्शन पाल के अलावा वरवरा राव, कल्याण राव, मेधा पाटेकर, नंदिता हक्सर, एसएआर गीलानी, बीडी शर्मा आदि भी पीडीएफआई के संस्थापक सदस्य रहे हैं।
योगेंद्र यादव: वैसे तो प्रो योगेंद्र यादव चुनाव विश्लेषक हैं लेकिन किसी भी फटे में टांग अड़ाना इनकी काबीलियत है। वामपंथियों से लेकर माओवादियों तक से इनका गहरा नाता है हालाकि चेले किशन पटनायक के बताये जाते हैं।
कुलवंत सिंह संधु : सीपीएम के छात्र विंग एसएफआई से अपनी राजनीति शुरू करने वाले 65 साल के संधु का सीपीएम से गहरा नाता रहा है।
निर्भय सिंह दूधिके: 70 साल के निर्भय सिंह कीर्ति किसान यूनियन के नेता हैं। आपातकाल के दौरान 19 महीने जेल में रहे। इसके बाद उन्होंने 1980 में सीपीएम ज्वाइन कर लिया।


हन्नन मोल्लाह- ऑल इंडिया किसान सभा के 74 वर्षीय मोल्लाह सीपीएम से जुड़े हुए हैं। 16 साल की उम्र में सीपीएम ज्वाइन किया और पोलित ब्यूरो तक पहुंचे।
सुरजीत सिंह फूल: भारतीय किसान यूनियन (क्रांतिकारी) के 75 वर्षीय नेता फूल इस आंदोलन के सबसे चर्चित चेहरा हैं। उन्हें 2009 में पंजाब सरकार ने माओवादियों से संबंध के आरोप में यूएपीए लगा दिया था और कड़ी पूछताछ की थी।
राकेश टिकैत: भारतीय किसान यूनियन के नेता रहे स्वर्गीय महेंद्र सिंह टिकैत के पुत्र राकेश टिकैत पहले दिल्ली पुलिस में सब इंस्पेक्टर थे। राकेश टिकैत ने दो बार राजनीति में भी आने की कोशिश की है। पहली बार 2007 मे उन्होंने मुजफ्फरनगर की खतौली विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा था। उसके बाद राकेश टिकैत ने 2014 में अमरोहा जनपद से राष्ट्रीय लोक दल पार्टी से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा था। लेकिन दोनों ही चुनाव में इनको हार का सामना करना पड़ा था।
बलबीर सिंह राजेवाल: पंजाब की प्रमुख किसान यूनियन भारतीय किसान यूनियन (राजेवाल) के प्रमुख बलवीर सिंह राजेवाल संयुक्त किसान मोर्चे के सात सदस्यीय कोर कमेटी के सदस्य भी हैं। राजेवाल सिर्फ इतना चाहते हैं कि तीनों कृषि कानून वापस लिए जाएं। न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानून बनाया जाए और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाए।
जोगिंदर सिंह उगराहां: 75 साल के जोगिंदर पंजाब के सबसे बड़े किसान संगठन ‘भारतीय किसान यूनियन उगराहां’ के अध्यक्ष हैं। जोगिंदर सिंह भारतीय सेना में भी रह चुके हैं। संगरूर में एक जगह हैं उगराहां, वहीं के रहने वाले हैं। जोगिंदर ने साल 2002 में भारतीय किसान यूनियन उगराहां की स्थापना की। ये भारतीय किसान यूनियन (BKU) से अलग संगठन है। खास बात ये है कि इस यूनियन में बड़ी तादाद में महिलाएं भी शामिल हैं।
सरवन सिंह पंधेर: ये पंजाब के माझा क्षेत्र के एक प्रमुख युवा किसान नेता हैं। 3 नए कृषि कानून के पास होने के बाद किसान मजदूर संघर्ष समिति पंजाब के महासचिव सरवन सिंह पंढेर ने 24 से 26 सितंबर तक ‘रेल रोको’ आंदोलन करने का फैसला किया था।
जगजीत सिंह डल्लेवाल: भारतीय किसान यूनियन (एकता-सिद्धूपुर) के अध्यक्ष जगजीत सिंह डल्लेवाल पंजाब के फरीदकोट जिले के डल्लेवाल गांव से हैं। माना जाता है कि भारतीय किसान यूनियन-उग्राहां के बाद जगजीत सिंह का संगठन पंजाब का दूसरा सबसे बड़ा किसान संगठन है। पंजाब के 14 जिलों में इनके संगठन का काम है और इन्होंने अपने संगठन को गैर राजनैतिक संगठन बनाए रखा है।
वीएम सिंह: राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के अध्यक्ष सरदार वीएम सिंह किसानों की आवाज को प्रमुखता से उठाते रहे हैं। वीएम सिंह का मानना है कि हाल ही में बनाए गए तीनों कृषि कानून किसानों को बर्बाद कर देंगे। यदि स्वामीनाथन आयोग की संस्तुतियों को लागू कर दिया जाए तो किसानों के बच्चों को प्राइवेट नौकरी के लिए भटकना नहीं पडे़गा।
गुरनाम सिंह चढूनी: भारतीय किसान यूनियन के हरियाणा अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी ने बड़ी तादाद में हरियाणा के किसानों को एकजुट करने का काम किया है। अब इन पर हत्या के प्रयास समेत 8 धाराओं में केस दर्ज हो गया है। एफआईआर में जनसमूह के साथ उपद्रव मचाने और वाहन चढ़ाकर हत्या करने की कोशिश करने व संक्रमण का खतरा फैलाने की धाराएं भी लगाई हैं।
उल्लेखनीय है की किसानों और सरकार के बीच 4 जनवरी की मीटिंग बेनतीजा रही और अगली तारीख 8 जनवरी तय हुई। यह 9वें दौर की बैठक होगी। साफ है ऐसा कोई संकेत नहीं ​है की वार्ता सफल होगी। किसान यूनियनें समाधान नहीं चाहती और इसको लेकर उनकी कुछ और ही योजना है। क्योंकि अभी भी वैसा कोई सूत्र नहीं मिला है जिससे यह आशा बंधे।

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