ग्रामीण भारत को जानने की भक्ति से भरी साधना थी चंद्रशेखर की भारत यात्रा

मंगरूआ

नयी दिल्ली: अकेला हूं तो क्या, आबाद कर देता हूं वीराना।
याद करेगी शामे तन्हाई, मेरे जाने के बाद।।

यदि जाने माने कृषि वैज्ञानिक गौहर रजा की शब्दों में कहूं तो
जुनूं के रंग कई हैं, जुनूं के रूप कई
आजाद भारत की सियासत के जुनूं (जुनून) का नाम ही चंद्रशेखर है।
आज युवा तुर्क चंद्रशेखर के भारत यात्रा की 38 वर्षगांठ है। चंद्रशेखर ने 6 जनवरी, 1983 से 25 जून, 1983 तक देशवासियों से मिलने एवं उनकी महत्वपूर्ण समस्याओं को समझने के लिए की गई अपने वक्त की बहुचर्चित ‘भारत यात्रा’ की थी। उनके इस पदयात्रा का एकमात्र लक्ष्य था – लोगों से मिलना एवं उनकी महत्वपूर्ण समस्याओं को समझना। इस दौरान उन्होंने केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा सहित देश के विभिन्न भागों में लगभग पंद्रह भारत यात्रा केंद्रों की स्थापना की गई थी।

चंद्रशेखर के भारत यात्रा में साथ रहे बीबीसी के पत्रकार मार्कटली से जब एक बार मंगरूआ की बात हुई तो उन्होंने कहा कि भारत यात्रा के दौरान लोगों का उत्साह देखते हुए मैंने कहा था कि यदि चंद्रशेखर राजनीति छोड़ केवल समाज के ही काम में लगे रहते तो देश उनको किसी और रूप में याद कर रहा होता और वे ज्यादा सफल होते।
चंद्रशेखर के व्यक्तित्व की चर्चा करते हुए राज्यसभा सांसद व उपसभापति और चंद्रशेखर के करीबी रहे ​हरिवंश ने मंगरूआ से अनौपचारिक बातचीत में कहा था कि राजनीति चंद्रशेखर के पूरे व्यक्तित्व का एक छोटा सा हिस्सा था। बातचीत के क्रम में हरिवंश जी ये भी कहते हैं कि जब ये भारत यात्रा केंद्र बनाये जा रहे थे तो चंद्रशेखर पर यह आरोप लगाया कहा गया कि इन केंद्रों का मकसद जमीन ​हथियाना है। लेकिन आज स्थिती ये है कि किसी भी केंद्र पर चंद्रशेखर के परिवार के किसी भी सदस्य का किसी भी हस्तक्षेप नहीं है और जो ​केंद्र चंद्रशेखर ने बनाये थे उन सभी केंद्रो पर उन्हीं लोगों की देखरेख में काम हो रहा है जो उस जमाने में नियुक्त किये गये थे।

जबकी गांव की कहानियों के कारवां में शामिल जेपी विश्वविद्यालय, छपरा, बिहार के कुलपति रहे डॉ हरिकेश सिंह ने अपने गांव की कहानी में लिखा है कि मैं चन्द्रशेखर जी की भारत यात्रा से जुड़ा था। वह यात्रा लगभग 15 हजार किलोमीटर चली थी। सुदूर दक्षिण से लेकर और सिक्किम तक। उन्होंने सात बिन्दुओं को उजागर किया था। स्वच्छ पानी, शौचालय, विद्यालय, गांव की पंचायत आदि। कटनी, मध्यप्रदेश में जिस पानी को लोग पीते थे, वह इतना गंदा था कि लोगों को पेट में कीड़ा होता था। उसके बाद पेट में सड़न होती थी, फिर पैर के नीचले हिस्से से कीड़े निकलते थे। उसेे भी उन्होंने देखा। उनकी भारत यात्रा बहुत ही महत्वपूर्ण थी। जगह-जगह पर उन्होंने ग्रामदान कराया। वे चाहते थे कि भारत का जो ग्राम-लोक है वह आपस में संवाद करे। इसके लिए उन्होंने जगह जगह भारत यात्रा केन्द्र बनाए थे। उन केन्द्रों को वे विकास केन्द्र का रूप देना चाहते थे। वे ऐसे विकास केन्द्र होंगे जो बिना किसी सरकारी अमले के लोक भाषा में, लोक जीवन के लिए, लोक विकास की बात करेंगे। पर उसमें भटकाव आया। जो उनके साथ भारत यात्री थे, वे भी उस चीज को नहीं समझ पाए। प्रयास असफल रहा। यात्रा खत्म होते ही उनके सहयोगी डा. सुब्रमण्यम स्वामी ने प्रश्न उठा दिया था कि यह तो पद के लिए यात्रा है। उन्होंने यह भी कह दिया कि यात्रा में जो धन आया, जमीन ली गयी, गांव लिया गया उसका हिसाब नहीं दिया गया। जब सह-यात्री संदेह करने लगता है तो व्यापक लक्ष्य नहीं पाया जा सकता है।
यद्यपि चंद्रशेखर का कार्य बहुत ही प्रशंसनीय था। हरियाणा के तीन गांवों के लोगों ने भोंडसी में जमीन दिया तो उसे भुवनेश्वरी आश्रम के रूप में विकसित किया गया। और वहां जो लोग जाते थे, वे एक वृक्ष लगाते थे। परन्तु उस पर विराम लग गया। मेरा मानना है कि सभी सामाजिक दायित्व वाले व्यक्ति को गांव में जाना चाहिए। और मैं इस मायने में चन्द्रशेखर जी और नानाजी देशमुख दोनों का बहुत आदर करता हूं। गांव के लिए, गांव के नाम पर विदेशी चंदा या सरकारी पैसा ले लेना बहुत होता है। पर वे लोग गांव को नहीं जानते।

अपनी भारत यात्रा के विषय में खुद चंद्रशेखर कहते हैं कि रात का समय था। पहाड़ी रास्ता था जो जंगल से होकर गुजर रहा था। एक बूढ़ी महिला अपनी झोपड़ी के आगे लालटेन लेकर खड़ी थी। यात्रा चाहे केरल से निकली या तमिलनाडु से या कर्नाटक या महाराष्ट्र से, कोई गांव, कोई शहर या कस्बा ऐसा नहीं मिला जहां भाषा ने रूकावट डाली हो। भाषा,धर्म,जाति, क्षेत्र और ऐसी पहचानें भारत यात्रा में मददगार ही बनी। यात्रा भारत को जानने की भक्ति से भरी साधना थी। भारत को जानने का सीधा सा मतलब उन लोगों को जानना है जो यहां रहते हैं, जो रोज ब रोज जीवन की हकीकतों से जूझते हैं। इसी ग्रामीण भारत को जानने की भक्ति से भरी साधना में चंद्रशेखर ने अपनी भारत यात्रा में इन पांच मुद्दों को तवज्जो दी और उसे ही अपनी भारत यात्रा का उद्देश्य के रूप में सामने रखा।
ये मुद्दे थे:
जल संरक्षण,
पोषण युक्त अहार
प्राथमिक शिक्षा,
दलित-आदिवासी समाज का उत्थान
समाजिक समरसता।

चंद्रशेखर भारत यात्रा के दौरान वे कई जगहों पर ठहरे और उनमें से कुछ को ​भारत यात्रा केंद्र के नाम से विचारों का केंद्र बनाया। इनमें से ही एक है लगभग 600 एकड़ में फैला भोंडसी स्थित भारत यात्रा केंद्र। बाद के वर्षों में सियासत का केंद्र बनने की वजह से भोंडसी आश्रम तो याद रहा, लेकिन वह यात्रा जेहन से मिटा दी गई।

बीते साल एक किताब आई थी- चंद्रशेखर द लास्ट आइकन ऑफ आइडियोलॉजिकल पॉलिटिक्स (The Last Icon of Ideological Politics)। हरिवंश की लिखी इस किताब का विमोचन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। इस दौरान भारत यात्रा को भुलाए जाने की टीस उन्होंने जाहिर की थी।
स्पष्ट है चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री बनने से कहीं ज्यादा महत्व उनकी उस लंबी राजनीतिक यात्रा का है, जिसमें तमाम ऊंचे-नीचे व ऊबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरने और परिस्थितियों के एकदम अनुकूल न रह जाने पर सीमाओं में बंधते जाने के बावजूद वे समाजवादी विचारधारा से पल भर को भी अलग नहीं हुए नेता के तौर पर अपनी जनता को सच्चा नेतृत्व देने के लिए उन्होंने लोकप्रियतावादी कदमों से परे जाकर अलोकप्रिय होने के खतरे तो उठाये ही, अपने समूचे राजनीतिक जीवन में अपनी ही हथेलियों पर कांटे चुभो-चुभोकर गुलाब उकेरते रहे। यह चंद्रशेखर ही थे जो इतने विषम पथ का राही होने के बावजूद उन्होंने कभी राजनीतिक रिश्ते इस आधार पर नहीं बनाये कि कौन कितनी दूर तक उनके साथ चला।


आज जब कोरोना जैसी वैश्विक महामारी ने इस कदर पूरी व्यवस्था को जकड़ लिया है कि लोग फिर से गांव को याद करने लगे हैं। ऐसे समय इस कोरोना संकट के समय जिस तरह से शहर में लोग लॉक डाउन पीरियड को काटने के लिए गांव लौटने की आपाधापी मचाये हुए थे उससे यही लगता है कि गांव का पुर्नजीवन का रास्ता नये सिरे से सोचे जाने की कवायद शुरू हो गई है और उसका सूत्र वाक्य चंद्रशेखर ने भारत यात्रा के दौरान जिन सात बिंदुओं को प्रमुखता से रखा था उसी में गांव की तरक्की का राज छुपा हुआ है।

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