कन्हैया भेलारी
गांव के सबसे बुजुर्ग 90 वर्षीय जय किशोर सिंह भी यह बताने में असमर्थ हैं कि गांव का नाम भेलारी क्यों रखा गया। नामकरण के पीछे कोई ठोस कारण तो जरूर रहा होगा। हालांकि दो किलोमीटर के रेडियस में तीन भेलारी है। पूर्वी भेलारी, बिचली भेलारी तथा पश्चिमी भेलारी। पर आजकल तीनों गांव के नागरिक पूछने पर यही कहते हैं कि ‘हमार गांव भेलारी है’। यानी लिखंत में पूर्वी, बिचली, पछेयारी है लेकिन बोलंत में एकदम गायब। यहां हम बात करेंगे पूर्वी भेलारी की जो मेरी जन्मस्थली है। कागजी सबूत के अनुसार 10 जनवरी 1957 की रात मैं इसी गांव में राजमुना कुवंर की कोख से पैदा हुआ। मेरे पिता जगदीश राय लगातार तीन टर्म भेलारी पंचायत के मुखिया भी थे। अस्सी के दशक में मैंने गांव को बहुत हद तक बाय-बाय करके सासाराम और फिर पटना में अपना बसेरा बनाया। लिखने की शुरुआत डेहरी ऑन सोन से प्रकाशित सोनमाटी से हुई, फिर टाइम्स ऑफ इंडिया, ऑनलूकर, सन्डे ऑब्जर्वर से होते हुए 22 वर्ष तक दी वीक में चलते रहा। फिर दस महीने तक राज्यमंत्री का ओहदा लिए बिहार नागरिक परिषद का महासचिव रहा। मन उचट गया। अनुभव मिला कि चोर बनना हो तो नेतागिरी करो। वापस अपने घर यानी पत्रकारिता। गर्वनेंन्स नाउ, फिर तहलका और फिर लाइव बिहार,एवं फस्ट्पोस्ट। अब न्यूज हाट के प्रबंध संपादक के रूप में पत्रकारिता चल रही है।

बहरहाल, पूर्वी भेलारी रोहतास जिला के दिनारा प्रखंड में 200 घरों की बस्ती है। करीब 900 मतदाता हैं। कामेश्वर सिंह अधिवक्ता बताते हैं कि ‘पहले अपने गांव का नाम हरसेन भेलारी था। कालांतर में पुरवारी भेलारी और अब पूर्वी भेलारी हो गया। 500 वर्ष पहले यहां के 90 प्रतिशत निवासी करहंसी गांव से विस्थापित होकर बसे थे। लगभग सभी परिवार पेशे से किसान और मजदूर हैं। गांव का कुल रकबा 175 हेक्टर है। सत्तर और अस्सी के दशक में मेरे जैसे कुछ लोग आर्थिक एवं शैक्षणिक बेहतरी के लिए गांव से पलायन कर गए लेकिन भावनात्मक सम्बन्ध को कभी नहीं तोड़ा बल्कि हमेशा बनाए रखा। भारत के किसी भी स्थान पर नौकरी या व्यवसाय करने वाले ग्रामीण होली, दीवाली, छठ और दशहरा में गांव आते रहते हैं। पिछले साल से गांव में दशहरा पर्व बहुत ही धूम-धाम से बनाया जाता है।
गांव में कक्षा आठ तक सरकारी स्कूल है जिसका नाम है राजकीय माध्यमिक विद्यालय, भेलारी। इस विद्यालय की स्थापना 1938 में हुई थी। हम कह सकते हैं कि यह स्कूल जिला के सबसे पुराने विद्यालयों में एक है। इसके अलावे गांव में आंगनवाड़ी केन्द्र, मवेशी अस्पताल तथा सरकारी आईटीआई भी है। धर्मोपासना के लिए एक कालीमाई मंदिर, शिवाला, ठाकुरबाड़ी और विश्वकर्मा मंदिर है। राजपूत बहुल इस गांव में कायस्थ, अनुसूचित जाति, रजवार, लोहार, नाई, तेली, यादव, कहार जाति के लोग हैं जो आपस में मिलजुल कर रहते हैं। छोटे-मोटे झगड़ों को आपस में सलटा लेते हैं।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 20 मार्च 2010 को इस गांव में स्वर्गीय जगदीश राय मुखिया खेल कूद प्रतियोगिता का उदघाटन करने आए थे। उस अवसर पर मुख्यमंत्री ने आईटीआई देने की घोषणा की थी। 2012 से यह टेक्नीकल इंस्टीच्युट किराए के मकान में कार्यरत है। लेकिन जनवरी 2020 से अपने मकान में चला जाएगा क्योंकि 16 करोड़ की लागत से संस्थान के लिए भव्य भवन का निर्माण कार्य जोरशोर से चल रहा है।

पूर्वी भेलारी गांव में प्रवेश करने पर आगंतुकों को शहर का फिलिंग होता है। सारी गलियों का पक्कीकरण स्थानीय विधायक और बिहार सरकार में उद्योग मंत्री जय कुमार सिंह द्वारा करवा दिया गया है। गांव में बिजली पहुंच जाने और बिजली के 20 घंटे तक ठहराव के कारण ग्रामीणों का रहन सहन काफी बदल गया है। लगभग सभी परिवार के पास मनोरंजन के लिए टेलीविजन हो गया है तथा 60 प्रतिशत परिवार अपने घर में फ्रीज रखकर गर्मी में ठंढा पानी पी रहे हैं। ग्रामीणों ने अपने सहयोग से बिजली के प्रत्येक पोल पर एलईडी बल्ब लटका दिया है। गांव के सरोज सिंह बताते हैं कि ‘पिछले साल दशहरा पर्व के समय हमलोगों ने 80 एलईडी बल्ब खरीदकर पूरे गांव को रौशन कर दिया’। अब रात में भी दिन का अहसास होता है।
गांव में दो बार नीतीश कुमार का दौरा हो चुका है। पहली बार 2001 में बतौर रेलवे मंत्री आए थे। उस समय भेलारी पहुंचने के लिए कोई सड़क नहीं थी। वचन निभाने के लिए नीतीश कुमार किसी प्रकार गिरते-भहराते आए थे। बहुत ही छोटी सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने मुझ पर मजाकिया टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘भेलारी जी ने अपने ससुराल के लिए मुझसे रेलवे स्टेशन ले लिया लेकिन अपने जन्मस्थान के लिए अबतक कुछ नहीं मांगा’। थोड़ा रूककर रेलवे मंत्री के कहा ‘मैं वचन देता हूं कि सीएम बनने के बाद इस गांव को चारों तरफ से पक्की सड़क से जोड़ दूंगा’। नीतीश कुमार ने 2007 में अपने दिए हुए वचन को पूरा कर दिया। उसके पहले तक हमारे इलाके के लोग नौ किलोमीटर पैदल चलकर नोखा, नटवार या दिनारा बाजार करने जाते थे। पूर्वी भेलारी गांव के चार लोग विदेश में अच्छे पदों पर हैं जबकि आधा दर्जन लड़कों के अलावा दो लडकियां भी बैंकों में बतौर अधिकारी बिहार और अन्य राज्यों में नौकरी कर रही हैं। मनीष श्रीवास्तव अमेरिकन टावर कॉरपोरेशन में काफी उंचे पद पर हैं। दो लोग एमबीबीएस डाक्टर हैं। एक दर्जन इंजीनियर हैं। राकेश भेलारी जेनपैक्ट में बड़े पद पर हैं। अमित सिंह सेना में कर्नल हैं। अमित भेलारी दी टेलीग्राफ अखबार पटना में प्रधान संवाददाता हैं। शुभम कुमार आईआईटी रूढ़की में पढ़ाई कर रहे हैं। कमलेश राय रांची में दारोगा हैं तथा चार जन रेलवे में हैं। नरेन्द्र राय विधान परिषद में बड़ा बाबू हैं। इनके अलावा आर्थिक दृष्टि से कमजोर करीब 20-25 लोग देश के विभिन्न महानगरों में रोजी-रोटी के लिए कार्यरत हैं।
उद्योग मंत्री जय कुमार सिंह की पहल पर पूर्वी भेलारी में रिंग रोड बनाने की योजना पर काम चल रहा है। किसानों ने स्वेच्छा से अपनी जमीन को रिंग रोड के लिए दे दिया है। संबंधित प्रखंड पदाधिकारी ने कागजी कार्रवाई कर दी है। रोड बनाने का काम अगले साल की शुरूआत में पूरा हो जाएगा। मंत्री महोदय ने गांव में एक पुस्तकालय खुलवाने का भी वचन दिया है। बक्सर लोकसभा क्षेत्र के पूर्व सांसद जगदानंद सिंह ने भी गांव के विकास में बहुत सहयोग किया है।

पूर्वी भेलारी की गवंई राजनीति के तीन धूरी हैं-सत घरवा, पंच घरवा और कंट घरवा। इन तीनों को सताह, पचाह और कटाह नाम से भी जाना जाता है। सताह पेट की बात अपने कुनबे के अलावे दूसरे से शेयर नहीं करते हैं। बात पचाते हैं। सहनशील और घुलनशील स्वभाव के हैं। मार खा लेंगे पर मारपीट से अपने को बचाए रखेंगे। जबकि पचाह कोई बात पचा ही नहीं सकते। पेट की बात खटाक से जुबान पर आ जाती है। खांटी राजपूती मिजाज वाले है। गलती नहीं करेंगे, पर कोई छेड़ेगा तो छोड़ेंगे नहीं। किसी का साथ देते हैं तो खुलकर-तन, मन और धन से। कटाह कुनबे की उपज हाल-फिलहाल की है। इसके सदस्य मूलतः हापट स्वभाव के हैं। कहीं भी ढाही मारते रहते हैं। लेकिन इस कुनबे के लोग पचाह से कभी उलझने का प्रयास नहीं करते।

बुजुर्ग बताते हैं कि गांव के अस्तित्व में आने के कुछ वर्ष के बाद से ही जमींदारी, दबंगता और वर्चस्व को लेकर सताह और पचाह के बीच शीतयुद्ध जारी हो गया था। जमींदारी काल में भेलारी गांव मध्यप्रदेश के बिलोखर स्टेट के अधीन था। बिलोखर स्टेट गांव की जमींदारी का चौदह आना परसा के रीजाजुल हक और दू आना पचाह ने ले लिया था। पचाह परिवार में रामाधार राय जिला जज के जूरी थे। इनके पुत्र लक्ष्मी राय कम्युनिस्ट पार्टी के दबंग नेता थे। उषा मार्टिन रेलवे कर्मचारी यूनियन के सेक्रेटरी भी थे। बतौर रेडिकल पार्टी उम्मीदवार तत्कालीन शाहाबाद डिस्ट्रीक्ट बोर्ड के मेंबर के लिए चुनाव लड़े थे। पचाह परिवार के लोग आज भी आरोप लगाते हैं कि ‘सताह लोग खरवत बूथ पर बैठकर एक वोट से उनको चुनाव हरवा दिया था। सताह कुनबे में रामकवल राय चलती वाले नेता थे। एक बार शाहाबाद जिला परिषद में सदस्य भी रहे। उनके प्रयास से ही नोखा-भलूनी कच्ची सड़क बनी जिसका नीतीश सरकार ने पक्कीकरण करवाया। वे 1952 का पहला विधानसभा का चुनाव भी स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर लड़े थे। कांग्रेस के उम्मीदवार से हार गए थे। गांव में स्कूल उन्हीं की देन है। दोनों कुनबे आज भी पुरानी बातों को भूलने की कोशिश नहीं करते हैं। हालांकि भूतकाल के उन मसलों को धारदार बनाकर कभी लड़ते नहीं हैं, ‘जो बीत गई, वो बात गई’ वाली स्थिति में रहना पसंद करते हैं।
वरिष्ठ पत्रकार, पटना।