गांव तो अब भी है लेकिन वो घर नितांत अकेला है

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डाॅ योगेन्द्र
मैं हूं तो गांव का और मेरे अंग—अंग में वह प्यारा गांव बसा है। लेकिन वह गांव नहीं है जो आज है। पर्व-त्योहार में गांव जाता हूं तो मन में बसा गांव ढूंढता हूं,जहां के कादो कीचड़ भी चंदन है। मेरे गांव का नाम है-महसोनी। बिहार के लखीसराय जिले में है। मेरे गांव को चीरती हुई रेल की पटरियां गुजरती हैं। तीन चौथाई गांव उत्तर की तरफ और एक चौथाई दक्षिण की तरफ। गांव के पूरब में तडबन्ना था, अभी भी है। शाम के समय पासी ताड़ी उतारता था और पियांक लोग जमकर ताडी पीते थे। पश्चिम में खेत ,पुराना आहर और बडका बगीचा था। खेत है, पुराना आहर भी है, लेकिन अब उथला हो गया है। पुराना आहर पर कुछ आम के पेड हैं, एक पुराना पीपल है और बबूल के पेड हैं। मैं जब-जब फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी रसप्रिया पढता हूं तो पुराना आहर पर लगे पीपल और आम के वृक्ष याद आते हैं। लगता है कि मिरदंगिया और मोहना छौडा की बातचीत यहीं हुई है।

धान कटने के बाद या आषाढ माह में गाय चराने यहां जाता था तो हम चरवाहे एक खेल खेलते थे-गोबर के रस रस। कभी बारिश में भींगते हुए,तो कभी उतरती ठंड में यह खेल हमें आनंद से भर देता था, लेकिन अब यह खेल गांव से लुप्त हो गया है। पश्चिम में एक बगीचा था और उसका नाम था बडका बगीचा। वह सचमुच बडा था। पचासों आम के वृक्ष थे और थे पीपल और गूलर के पेड़। अब वे नहीं हैं। धीरे धीरे कटते गये। हां, पुरना आहार के अंतिम छोर पर जखराज बाबा थान था जो अभी है। दक्षिण में राजमहल की पहाडियों की श्रृंखलाएं हैं। जाडे़ के दिनों में पचासों बच्चे स्कूल से भाग कर इन पहाडियों में समा जाते थे और खाते थे पके कनौले, डटोहरी और खीरी के फल। अब इन पहाड़ियो में नक्सलियों के अड्डे हैं। सामान्य रूप से लोग उधर जाना पसंद नहीं करते। उत्तर में खैरा आहार है।

कभी गंगा आती थी, अब नहीं आती। सूरजगढा के पास एक बांध बना दिया गया है। मेरी समझ से यह गलत हुआ है। गंगा आती थी तो उपजाऊ मिट्टी भी लाती थी और गांव अपने को भरा-पूरा महसूस करता था। गंगा के आने से थोड़ी हानि भी होती थी। गांव के निचले हिस्से में जो धान रोपे जाते थे, वे गल जाते थे। लेकिन गंगा के निकलते ही सडे़ हुए धान की गौंछी अद्भुत ढंग से पनकी फेंकती थी। पिता कहते थे कि जरल जंडा और सड़ल धान में अगर पानी पड़ जाए तो उसकी तासीर का कोई जोड़ा नहीं है।
पहले खूब बारिश होती थी। इस वर्ष भी अच्छी बारिश हुई। सत्तर के दशक में ऐसी बारिश का होना सामान्य बात था। कनिया- हथिया नक्षत्र में यह होता ही था।सात सात दिन तक बारिश होती थी। लगता था कि सरंग में छेद हो गया हो। गाय बैल किल्ला खूट्टा में बंधे डांय डांय करते। अहरा पोखर सब भर जाते। खेत पानी से लबालब भरे रहते। हां,बच्चों की अजब कहानी होती।वे बारिश में छपाछप करते। अमरूद चुराने की कथा लिखी जाती। आरी दुहारी पर कीच्चड कादो किचाहिन। गायें मिट्टी,गोबर और मूत्र में खड़ी रहतीं रहती। हराही गायें किल्ला के चारों ओर चौफेर मारती। लेरू ढकेरता। मां उसकी फनफनाती। भुसकारी से भूसा निकालने जब घर के लोग पहुंचते तो दांत किटकिटाते। सात दिनों की बारिश में गांव थय—थय हो जाता। तब भी किसान चिंतित नहीं होते। बल्कि आनंद से विभोर रहते।

गांव की चौहद्दी से आपका परिचय हुआ, अब लोगों से परिचय कर लीजिए। लोग कोई संपूर्ण इकाई तो हैं नहीं। वे या तो जातियों में बंटे होते हैं या संप्रदायों में। संप्रदाय का असर कम है। जब मैं गांव में था तो एक घर ही मुसलमान था। पिता कहते हैं कि जब देश का विभाजन हुआ और हिन्दू मुसलमान के दंगे हुए तो गांव के मुसलमान पाकिस्तान चले गए। साथ ही वे दंगों की वीभत्सता और मुसलमानों को बचाने की कथा कहते। मैंने जब जब अज्ञेय की कहानी- शरणदाता- पढी है, यह स्थल याद आया है। रह गयी जातियां तो मेरे गांव में कुशवाहा, बरैय, दुसाध ,धानुक, चमार, भूमिहार और नाई है। एक दो घर कानू भी है और एक घर राजपूत है। कानू उस वक्त कंसार लगाता था जिसमें शाम के समय भूंजा भूंजा जाता था। कंसार अब नहीं है।

अब जातियों की शक्ति में अंतर आ गया है। पहले भूमिहार बहुत दबंग था, पंचायत में उसकी तूती बोलती थी। बाद में दूसरी जातियों का राजनैतिक उभार हुआ, पढाई का भी असर पड़ा और समीकरण बदल गए। धानुक और दुसाध की ताकत बढी है। वैसे कुशवाहों की संख्या सबसे ज्यादा है, लेकिन उनका वर्चस्व नहीं है। वे लोग मुख्यतया खेती में लगे रहते हैं और आपस में लड़ते रहते हैं। गांव में एक कहावत प्रचलित था-कोइरी और केतारी एक ही जलावन से जलता है। केतारी यानी ईख। कोलसार में गुड़ तैयार करने के लिए ईख के सूखे पत्ते का इस्तेमाल होता है। जातियों में प्रतिस्पर्द्धा तो नहीं है, लेकिन रिश्ते भी बहुत अच्छे नहीं है। पंचायत की रवायत खत्म हो चुकी है। गांव में मुखिया होता है, प्रतिनिधि भी होता है, लेकिन ये प्रतिनिधि खाने, खोरने के लिए है। अंचल में लगे रहते हैं और विकास की लूट का लाभ उन्हें भी मिल जाता है। जब मैं गांव में था तो पंचायत की बहुत महत्ता थी। ज्यादातर मामले पंचायत में ही सुलट जाते थे। वैसे उस समय भी लोग कोर्ट जाते थे, लेकिन दुरूह मामले में। बात-बात में मारपीट नहीं करते थे और आनन-फानन में कोर्ट नहीं जाता थे।
गांव में दो तरह के लोग हैं- बहुसंख्या खेतीबाड़ी पर निर्भर है, लेकिन एक अच्छी संख्या नौकरी पेशेवालों की है। पहले जमालपुर रेल कारखाने में काम करनेवालों के लिए कुलिया गाड़ी चलती थी, पिछले वर्ष से बंद हो गयी है। कारखाना भी उतार पर है और नौकरियां आटोमेशन के कारण घट गयी हैं। मशीनें सचमुच मशीन पर ही निर्भर हो चली है। पिता कहते थे कि जब जमालपुर रेल कारखाना बनने लगा तो अफसर गांव आए और कहने लगे कि कौन-कौन रेल कारखाना में नौकरी करेगा? हमलोग तैयार नहीं हुए। किसान भला नौकरी करे- उत्तम खेती, मध्यम बान, निरघिन सेवा, भीख निदान। सबसे उत्तम खेती है, मध्यम काम व्यापार है और सबसे गया बीता काम नौकरी है। किसान रेल कारखाना नहीं गए। गरीब निर्धन लोग नौकरी में गए। वक्त ने करवट बदली। खेती घाटे का शिकार हुई और नौकरी तो नौकरी, सब उसके लिए तरसने लगे। फिलहाल जो खेती कर रहे हैं, वे मजबूरी में कर रहे हैं। कहा जाता था कि खेत बेचना और बेटी बेचना बराबर है। कोई किसान खेत बेचने के बारे में लाख बार सोचता था, लेकिन अब खेत बेचना आसान है। किसान को संभावना लगे कि खेत बेचने के बाद उसके बेटे की नौकरी लग जाएगी तो वह तुरंत खेत बेच देगा। गांव में खेती की बहुत महत्ता थी। धान, गेहूं, मसूर, बूंट, खेसारी, तीसी, सरसों, प्याज, आलू ,कैराओ आदि फसलें होती थीं। धान के दिनों में खेतों में मछलियां बहुत होती थीं। मेढकों का तो कहना क्या? ऊपर से केंकडे ,घोंघे ,चेंडे और सांप। अब कीटनाशकों के कारण ये जीव-जंतु कम ही मिलते हैं।

मेरे गांव में पहले एक प्राथमिक स्कूल था जो अब भी है, लेकिन उन्नत होकर मिडिल हो गया है। गांव की पूरब दिशा में स्थित इस स्कूल की बिल्डिंग अच्छी हुई है, लेकिन शिक्षक अप्रतिबद्ध हुए हैं। मैंने इसी स्कूल से प्राथमिक कक्षाएं पास की हैं। मुझे तो पढने में मन लगता नहीं था तो पंडी जी खूब पीटते थे। पंडी जी यानी मास्टर जी। क्या चलती थी मास्टर जी की। वे जो कह दें ,वह होता था ब्रह्म वाक्य। सभी गार्जियन उनको देवता की तरह पूजते थे। लेकिन वे सिनुआर या खजूर की छडी से देह पर जो बमरा उखाड़ते तो क्या मजाल कि उसे छात्र जन्म-जन्मांतर तक भूल जाए। मार-मार कर हकीम बनाने की दक्षता उन्हें प्राप्त थी। दस बजे से साढे तीन तक क्लास पर क्लास। साढे तीन के बाद गेम टीचर की सीटी बजती। फुटबाल मैच शुरू हो जाता। उस समय बच्चे दोल-पत्ता, सेल-कबड्डी ,गुल्ली-डंडा खेलते और अब वे स्मार्ट फोन पर स्मार्ट हो रहे हैं। जो उन्हें नहीं देखना था, देख रहे हैं। नतीजा है कि लगभग घर बेचैन है। बच्चे बचपन गुजार नहीं पाते। वे समय के पूर्व बडे हो रहे हैं।
गांव जो पीछे छूट गया और शहर जो अमेरिका व इंग्लैंड से बहुत पीछे है। अगर आगे आना है तो गांव व शहर को स्वाभाविक रूप से विकसित होने दीजिए। जैसे बच्चे अचानक बडों की आदतें सीख कर बडे हो रहे हैं, वैसे ही गांव व शहर को अमेरिका की तर्ज पर बडे होने मत दीजिए। गांव की खूबसूरती इसमें है कि वह गांव रहे। गांव को जबर्दस्ती शहर की आदतों के शिकार मत होने दें।
(प्रोफेसर, हिन्दी विभाग,टी एन बी कालेज,भागलपुर।)

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