rural development

याद किए गये रामसेवक बाबू

आलोक रंजन गया: लोकजीवन की ये कहावत आपने भी अक्सर सुनी होगी, बाढ़ै पूत पिता के धर्मे। खेती उपजै अपने कर्मे। अर्थात पुत्र पिता के धर्म से फलता-फूलता है और खेती अपने कर्म से अच्छी होती है। कुल मिला के ऐसी ही कहानी बनती है पूर्व प्रधानाचार्य रामसेवक सिंह की याद में मनाये जा रहे …

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मनरेगा को पुनर्जीवित किए जाने के साथ ही व्यापक सुधार की है दरकार

प्रो डॉ अश्विनी कुमार ‘कांग्रेस सरकार की विफलता का तथाकथित जीवित स्मारक’ बताया जाने वाला प्रतीक कोरोना संक्रमण के दौरान हुए राष्ट्रीय लॉक डाउन से प्रभावित लाखों प्रवासियों की दुर्दशा को कम करने और इससे प्रभावित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नया आयाम देने के लिहाज से एक बार फिर अपने उदात्त स्वरूप में बिना किसी भेदभाव …

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आओ बनाएं…‘सबका भारत’

शिवाजी सिंह 16 अगस्त, 1947 लाल किला का लाहौरी गेट प्रचीर। स्वतंत्र भारत का तिरंगा झंडा खुले गगन में लहराने के लिए उद्वेलित हो रहा था। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जैसे ही तिरंगा लहराया, तोपों की सलामी के बीच ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष चारों दिशा में गुंजयमान होने …

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गांव अभी पढ़ने बैठा है…

मिथिलेश कुमार राय उस दिन अखिलेश सदा बाजार में मिला था तो चिंहुक रहा था। बोला-तार और बलब खरीदने आए हैं। टोले में कल से बिजली आने लगी है। सुनकर मेरे होंठों पर भी हंसी आ गई। मैंने उन्हें मुबारकबाद दी और कहा कि चलो, एक लंबे इंतजार का अंत हो गया। बिजली के आने …

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आरण गांव में मोर का दर्शन

मुख्तार आलम कई महीनों से आरण जाने के लिए सोच रहा था। दूर-दराज से लोग आरण आए घूमकर चले गए, किन्तु समयाभाव के कारण नजदीक में रहते हुए भी मैं नहीं जा सका। आज ईद के दिन आरण घूमने की अभिलाषा पूरी हुई। साथ मिला प्रिय मित्र इफ्तेखार का। प्रकृति के अद्वितीय सौंदर्य के बीच …

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बदलाव के बावजूद गांव के गांव होने पर संदेह की नहीं है गुंजाईश

डॉ आरकेे नीरद सावन का महीना उतार पर है। इस साल मॉनसून देर से आया है। बड़ी मिन्नत के बाद आए बादल बरसे, मगर इतना भी नहीं कि खेतों की प्यास पूरी-पूरी बुझ सके। खेतों की प्यास के न बुझने का सीधा मतलब है खेती पर संकट के बादल, किसानों की बेचैनी और गांव की …

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पीछे छूटती यादों में अपनी ही गति से आगे बढ़ता गांव

कंचना कुमारी सिंह मैं ज्यों-ज्यों अपने गांव कसबा के नजदीक पहुंच रही थी, उत्साह से भरी जा रही थी। पहले सड़कें किरनपुर के बाद नहीं बनी थी। हमलोग पैदल ही जाते थे। रास्ते में अंधरी नदी मिलती थी जो बरसात में लबालब भरी होती थी, हमलोग मुश्किल से पार करते थे। एकबार तो मैं बहते-बहते …

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अधकचरा शहरीकरण, मीठे खेतों में जहर की राख

रविशंकर रवि जब भी गांव की चर्चा होती है तो मेरी स्मृति में अपना ननिहाल महेशामुंडा सजीव हो उठता है। महेशामुंडा बिहार के भागलपुर जिले में कहलगांव के निकट एक बड़ा गांव है। जहां मैंने गांव को जीया है, मधुर स्मृतियां, कई तरह के अनुभव मिले। इसलिए वह गांव मुझे हमेशा खींचता था। लेकिन कुछ …

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खुशहाल गांव, जाने पर या तो कुछ बच्चे मिलते हैं या बूढ़े

विजय शंकर सिंह कहते हैं, चंदौली जिला के रामगढ़ गांव में अकबर सिंह के घर में एक संत जन्में जो बाद में बाबा कीनाराम नाम से विख्यात हुए। बाबा कीनाराम की एक चाची थीं जो विधवा थीं और उनको एक पुत्र था। परिवार में उस चाची का सम्मान कम था। बाबा कीनाराम को यह देख …

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‘फलाने कै लड़िकवा’ से ‘डॉ. ताराशंकर’ हो चुका हूं

डाॅ तारा शंकर गाँव विशुनपुर, जिला बस्ती, उत्तर प्रदेश। उम्र 34 साल 5 महीने। 19 साल से घर-गाँव से दूर शहर में रह रहा हूँ। घर से शहर बस्ती, बस्ती से इलाहाबाद और फिर 2007 से देश के दिल दिल्ली में। शायद बदलाव के सबसे तेज दौर वाली पैदाइश है हमारी जनरेशन। तकनीक बदली, संचार …

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