डाॅ आर सी प्रधान
गांधी जी सौराष्ट्र में पोरबंदर के थे। वह कमोबेश गांव ही था। गांधी 1888 में इंगलैंड गए और वहां से अफ्रीका होकर लौटे, इस अंतराल में बहुत सी चीजें बदल गई। पश्चिम में दो धारा चल रही थी। औद्योगिक क्रांति आ चुकी थी। स्टीम इंजन, टेलीफोन आदि आ चुके थे। लोगों को लगता था कि उन्हें अलाद्दीन का चिराग मिल गया है जिससे मनुष्य की सारी समस्याएं सुलझ जाएगी। इसी दौर में एक दूसरी धारा चल रही थी। गांव से लाखों की संख्या में लोग शहर आ रहे थे। जहां न उनके पीने के पानी की व्यवस्था थी न शौचालय की व्यवस्था थी। महिलाओं को कम वेतन पर रखा जा रहा था। यह तबका ऐसी सोच रखता था कि औद्योगिक क्रांति से काफी नुकसान हो गया, यह ग्रामीण व्यवस्था का पक्षधर तबका था। दूसरा तबका औद्योगिक क्रांति के फायदे गिनाता था। गांधी दोनों को करीब से समझते हैं लेकिन खुद को ग्रामीण व्यवस्था के पक्षधर लोगों के करीब पाते हैं। इसका उनके चिंतन पर असर होता है।

औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप हिंदुस्तान की तात्कालीन व्यवस्था में भी बड़े पैमाने पर बदलाव दृष्टिगोचर होता है। मुर्शीदाबाद,शाहाबाद की सिल्क, पटना का चावल और बंगाल का मसलीन ये सभी थोड़े दिन पहले ही बर्बाद हुए थे। उस समय घर-घर चरखा हुआ करता था। ग्रामीण अर्थव्यवस्था थी। उसका भी प्रभाव गांधी के चिंतन पर रहा होगा। इसलिए गांधी की पूरी चेतना में गांव की सोच को समझना होगा। वे पूरी तरह से एक वैकल्पिक व्यवस्था चाहते हैं। इस वैकिल्पक व्यवस्था को समझे बिना गांव की व्यवस्था नहीं समझी जा सकती। प्रजातंत्र में आज भी यह बहस जारी है कि आम आदमी को केंद्र में लाना है, उनके हाथ में सत्ता की डोरी देनी है। गांधी उस दौरान यह देख रहे हैं कि आम आदमी के नाम पर बातें तो हो रही हैं, लेकिन आम आदमी सत्ता से हजारों कोस दूर खड़ा है। हिंद स्वराज में गांधी कहते हैं कि, ‘‘ ब्रिटिश संसद एक बांझ औरत है, वेश्या है।’’ इस स्थिति में गांधी चिंतन कर रहे हैं कि क्या कोई ऐसी व्यवस्था हो सकती है जिसमें सत्ता की डोर आम आदमी के पास आए। टाॅप टू बाॅटम या बाॅटम टू टाॅप व्यवस्था का संचार हो। इसलिए गांधी ने राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था की रचना का एक ढांचा दिया।
हम आज सर्व शिक्षा अभियान की बात कर रहे हैं, लेकिन गांधी उसी समय सर्व शिक्षा अभियान चलाने की बात करते थे। गांधी बुनियादी शिक्षा के साथ ही गांव की जरूरत के मुताबिक बुनियादी हुनर की शिक्षा दिए जाने के पक्षधर थे। उन्होंने बुनियादी जरूरतों को गांव के स्तर पर ही पूरा करने पर बल दिया। इसीलिए उन्होंने गांव गणतंत्र की बात की। गांधी ने चाहत और जरूरत में फर्क किया। वे कम से कम जरूरत के आधार पर काम करने लेकिन बुनियादी जरूरत पूरा हो, इस बात के पक्षधर थे। उनकी परिकल्पना थी कि गांव, प्रखंड को चुनेगा और प्रखंड जिले को। वे यंत्र पर आधारित उत्पादन व्यवस्था के बजाय जन पर आधारित उत्पादन के पक्षधर थे। गांव की जरूरत की चीज गांव में तैयार हो। इसके जरिए शैक्षणिक, राजनीतिक, आर्थिक व्यवस्था में गरीबों की भागीदारी बढ़े। कैसे आम आदमी के हाथ में सत्ता आएं, गांधी ने उसका ढ़ांचा-खांचा प्रस्तुत किया। इसी संदर्भ में गांधी के ग्राम स्वराज के परिकल्पना को देखे जाने की जरूरत है।
गांधी एक वैकल्पिक व्यवस्था बनाना चाहते हैं। इसलिए वर्तमान व्यवस्था के अंदर गांधी को देखेंगे तो वे हवाई किला लगेंगे। महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू के बीच हुए पत्राचार में गांधी की ग्राम दृष्टि की झलक मिलती है। मेरा मानना है कि गांधी के ग्राम स्वराज का जो सपना था उसके पीछे एक पूरी, एक नयी सभ्यता की सोच थी। जिसमें आम आदमी के हाथ में हर तरह की सत्ता चाहे आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक व्यवस्था को सौंपने की बात थी, लेकिन वह पूरी व्यवस्था चाहत और जरूरत को अलग-अलग देखने की दृष्टि से ही संभव हो सकती थी। मनुष्य के चाहत की जगह पर उसकी जरूरत को प्रतिष्ठित करने की सोच को बढ़ाना होगा। लेकिन आज समस्त मानव जाति, गांव हो या शहर सतत बढ़ती चाहत के चंगुल में फंस चुकी है और उससे निकल पाना असंभव दिखता है। इस संदर्भ में गांधी के सपनों का ग्राम व्यवस्था बनाने की बात निरा कोरी कल्पना लगती है। विशेषकर तीसरी दुनिया के संदर्भ में। जहां बढ़ती आबादी, गरीबी, गैर बराबरी, न सिर्फ बड़ी समस्या है बल्कि फैलती जा रही है। लेकिन इतिहास हमें यह भी बताता है कि सभ्यताओं का नाश होता रहा है और संकट के समय मनुष्य कोई न कोई रास्ता ढूढ़ लेता है। मेरा मानना है कि वर्तमान व्यवस्था एक ऐसे संकट के दौर से गुजर रही है कि इसका नाश होना तय है। इसलिए मनुष्य शायद इसके स्थान पर एक नयी व्यवस्था की तलाश कर रहा है, और उसी सोच और तलाश के क्रम में विश्व स्तर पर 1990 के बाद गांधी और गांधी विचार की ओर देख रही है।
आज जब हम गांधी की 150 वीं जयंती वर्ष मना रहे हैं तो हम उम्मीद करते हैं कि मानव जाति कि वैकल्पिक व्यवस्था की तलाश अपने अंतिम दौर में पहुंच रही है। इस तलाश में गांधी विचार सबसे प्रासंगिक दिखता है। ऐसा भी नहीं है कि हमारी सरकार या राजनीतिक व्यवस्था गांधी के बताए रास्ते या उनके विचार को नहीं अपना रही है। सरकार की ज्यादातर योजनाएं मसलन सर्वशिक्षा अभियान, स्वच्छ भारत, खाद्य सुरक्षा, पंचायती राज-सब गांधी विचार से ही प्रभावित हैं। हम उनकी बातों को टुकड़ों में अपने राजनीतिक नफा-नुकसान को देखते हुए अपना रहे हैं जबकि जरूरत इस बात की थी कि इसे समग्रता में देखा जाए क्योंकि गांधी के हिंद स्वराज से पूर्ण स्वराज तक का गांधी के चिंतन में इस देश के गांव की आत्मनिर्भरता का रहस्य छुपा हुआ है।
मेरा गांव ढ़काईच
मेरा जन्म बक्सर जिले के सिमरी प्रखंड के ढ़काईच गांव में हुआ। लगभग 20 हजार की आबादी वाला यह गांव भूमिहार बहुल हैं, अन्य जातियों के लोग भी हैं जैसे-मुसहर, चमार, बढ़ई, कुम्हार, लोहार और तुरहा आदि। मुझे 1950 के दशक का वह गांव याद आ रहा है जब बरगद के एक बड़े पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर गांव में लोग बैठते थे और तरह-तरह के वाद्य यंत्र बजाते थे। कोई ढ़ोल बजा रहा है तो कोई सितार तो कोई रामायण पाठ कर रहा है। हमारे चाचा को रामायण की सारी चैपाईयां कंठस्थ थीं। गांव में समरसता थी। बड़े-छोटों का लिहाज था। आज समाज बिखर रहा है। सामाजिक व्यवस्थाएं टूट रही है।

जमीन को लेकर गांव में इक्का-दुक्का मुकद्में भी होते थे, लेकिन बावजूद इसके आपस में प्रेम था। कोई बच्चा घर से दूर कहीं दिख गया या फिर कुंए पर खेलता दिखा तो लोग अपने मतभेद भुलाकर सबसे पहले उस बच्चे का ख्याल करते थे और सकुषल घर पहुंचाते थे। भले ही आपके बेटे की शादी में बिना बुलाए न जाएं लेकिन बेटी की शादी होने पर बुलावे का इंतजार नहीं करेंगे और आपके दरवाजे पर हाजिर हो जाएंगे। मुझे याद आती है गांव की वह उंचे कद काठी वाली मोटी चमईन जिसने गांव के लगभग सभी प्रसूति महिलाओं को बच्चा जनने में सहयोग किया। मुसहर लोग हल चलाते थे, खेती में मदद करते थे। भले ही उस पीढी़ में ज्यादा पढ़े-लिखे लोग नहीं थे लेकिन उनकी सामाजिक समझ बहुत व्यापक थी। हालांकि महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक के प्रभाव में गणेश पूजा शुरू होने से जिस सांस्कृतिक चेतना का विकास हुआ, उस तरह का सांस्कृतिक परिवेश व चेतना उत्तर भारत में नहीं दिखती।

आज सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षणिक रूप से गांव में काफी गिरावट आई है। आज गांव में अपंग, बूढ़े व औरतें रह गए हैं। हमारे देखते-देखते कई घरों में तालाबंदी हो गई। अब उस घर में कोई नहीं रहता। गांव आज पलायन का दंश झेल रहा है। आज के विकास माॅडल में गांव में बदलाव होगा, ऐसा संभव नहीं दिखता। तो फिर यह सवाल जेहन में उठता है कि क्या गांधी की कल्पना कपोल कल्पित, आकाशी या मृगतृष्णा थी। वास्तव में ऐसा नहीं है। हमें यह देखने की जरूरत है कि गांधी के गांव की परिकल्पना के स्रोत क्या थे।
(प्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक व दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर)
