खुले मन से दुराग्रह,पूर्वाग्रह के साथ जारी वार्ता में एक जैसे जायके लिए सजी लंगर वाली थाली…

मंगरूआ

नयी दिल्ली: किसान संगठनों और सरकार के बीच पूर्व की भांति विज्ञान भवन में वार्ता चल रही है। बातचीत से पहले कहा गया था कि वार्ता खुले मन से होगी। लेकिन कैसा खुला मन है, ये कैसी बैठक है जहां न तो किसान आंदोलनकारी सरकार का खाना खाने को तैयार हैं और न ही चाय पीने को। दो बजे से बातचीत शुरू हुई थी। दो घंटे से ज्यादा की बातचीत हो चुकी है और अब लंच ब्रेक हुआ है। लेकिन थालियां अलग-अलग सजी है। वहीं किसान प्रतिनिधि गुरूद्वारे से आयी लंगर वाली थाली पर जमे हुए थे तो मंत्रीगण भी सरकारी थाली छोड़ किसानों के साथ लंगर वाले भोजन का स्वाद लेने के लिए लाईन में खड़े दिखे यानी केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल,सोमप्रकाश और नरेंद्र सिंह तोमर ने विज्ञान भवन में दोपहर के भोजन के दौरान किसान नेताओं के साथ लंगर खाया। स्वाभाविक है जायका एक जैसी होने के बाद शायद मन मिलने की उम्मीद हो। नमक का असर तो होता ही है। लंच के बाद भी बातचीत होगी।


हालांकि बातचीत से क्या निकलता है उसको लेकर वार्ता के समाप्ति का इंतजार करना होगा, जो दृश्य दिख रहा है वो सकारात्मक तो नहीं ही कहा जा सकता। जब सरकारी थाली का जायका ही अन्नदाताओं को पसंद नहीं है तो बातचीत कितनी सफल होगी इसको लेकर आशंका स्वाभाविक है। इस बीच पूर्व सांसद और वरिष्ठ भाजपा नेता हुकुमदेव नारायण यादव ने कहा है कि जो लोग सरकार के साथ मीटिंग में बैठे हैं वे दुराग्रह,पूर्वाग्रह से प्रेरित है। अपनी जिद के आगे किसी की बात सुनने को तैयार नहीं है किसान। ऐसे में कैसे बनेगी बातचीत। सरकार लोकतांत्रिक प्रक्रिया का निर्वाह कर रही है। उन्हें बार-बार वार्ता के लिए आमंत्रित कर रही है। लेकिन जिनलोगों ने ये मान लिया है कि हमें किसानों के नाम पर बनाये गये कृषि बिल बिल का विरोध अंतिम समय तक करना है, वे कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है। नरेंद्र मोदी की सत्ता को हटाने की कामना लिये बैठे है जब तक नरेंद्र मोदी की सरकार को हटायेंगे नहीं, तबतक रूकेंगे नहीं।

यानी हुकुमदेव नारायण यादव ने अप्रत्यक्ष तौर पर यही कहा कि किसान हित तो बहाना है, नरेंद्र मोदी पर निशाना है। उन्होंने कहा कि इसमें देश के अंदर की ताकत भी है, और बाहर की ताकत भी हैं। इसमें राष्ट्रीय कारण भी है और अंतरर्राष्टीय कारण भी। देश के लोग भी लगे हुए हैं और बाहर के लोग भी। सरकार के पास सारी जानकारी है। सरकार के जांच एजेंसियों की इस पर नजर होगी। समय आने पर सरकार इसका जांच करेगी। इसके पीछे किसका हाथ समय आने पर खुलासा होगा।
स्वा​भाविक है बातचीत भी हो रही है, थाली भी सजी है लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में सरकार और किसान संगठनों में आपसी विश्वास की कमी है जिसके कारण न तो आंदोलन खत्म हो पा रहा है और न ही समझौते की कोई उम्मीद बंध पा रही है।

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