सर्द मौसम में जान गंवाते किसानों पर अश्रु गैस के गोले..सोनिया ने बताया अहंकारी सरकार, राहुल को याद आया चंपारण सत्याग्रह

संतोष कुमार सिंह

नयी दिल्ली: हमारा अन्नदाता ​यानी जो हमारे लिए अन्न उगाता है। वैसे तो अन्नदाताओं को एक—ए​क दिन भारी पर रहा है। लेकिन कहते हैं न कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। इसी कुछ पाने की उम्मीद में महीनों से हमारा अन्नदाता दिल्ली बोर्डर पर हजारों की संख्या में महीनों से जमा हुआ है। हुक्मरान कभी लट्ठ बजाते हैं तो कभी इंद्र देव के कोप का सामना करना पड़ता है। कुछ यही आलम शनिवार-रविवार को किसान आंदोलन में दिखाई दिया। किसानों के इस भीड़ में बुजुर्ग भी हैं, बुजुर्ग भी,अधेड़ भी, युवा भी। शनिवार को पूरी रात जारी रही बारिश और कड़ाके की ठंड से ठिठुरते किसान जब सुबह जगे तो न तो ठांव सलामत थी और न ही कहीं छांव बचा था क्योंकि रात भर रूक-रूक कर हुई बारिश और हाड़ कंपाती ठंढ़ में सिर्फ अलाव का सहारा। लेकिन अलाव जले कैसे लकड़ियां गिली हो चुकी थीं और बिस्तर भी सलामत नहीं था। किसानों के इसी भीड़ में मेरठ से आये 97 ईलम सिंह भी हैं। चाहे आजादी का आंदोलन हो चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का किसान आंदोलन इन सभी आंदोलन में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई है।

ऐसे में जब केंद्र सरकार ने नया कृषि कानून पारित किया और राकेश टिकैत के नेतृत्व में जब भारतीय किसान यूनियन ने दिल्ली जाकर आंदोलन में शामिल होने का फैसला लिये तो ईलम सिंह भी खुद को रोक नहीं पाये। चल पड़े सरकार से दो दो हांथ करने। एक ही उम्मीद की सरकार को झुकना ही होगा और किसानों की बात माननी ही होगी। ऐसे में पिछले कई दिनों से यूपी बोर्डर पर जमे ईलम सिंह के लिए न तो ठंढ बाधा है और न ही बरसात। इन दोनों दिनों में रात कटी है चाय और लगातार जल रहे अलाव के सहारे। नींद आंखो से दूर ही रही। बावजूद इसके हौसला इतना ​कि या तो सरकार तीनो कृषि कानून वापस लेगी या शहादत स्वीकार करेगी। वैसे भी अबतक कई किसानों की जान जा चुकी है। शनिवार को ही कश्मीर सिंह ने आत्महत्या कर लिया था।
सिर्फ ईलम सिंह ही क्यों दिल्ली के सभी प्रवेश द्वार पर कमोबेश यही हाल रहा। पहले ही खुली सड़क पर आसियां बसा था। जहां ट्रैक्ट्रर,ट्राली और छोटे-छोटे टेंट ही सहारा बने हुए हैं, वैसे में आफत वाली बारिश और हाड़ कंपाती ठंढ़।
दिन चढ़ रहा था। बारिश के रूकने का नाम नहीं। सरकार से बातचीत की तैयारी भी तो है। पिछली बैठक में यह तय हुआ था कि 4 जनवरी को अगली बैठक होगी। लेकिन बड़ा सवाल यही कि यदि सरकार ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेना स्वीकार नहीं किया तो। जवाब पहले ही आ चुका है। यदि सरकार नहीं मानी तो 6 जनवरी से आंदोलन और तेज किया जाएगा। वामपं​थी किसान संगठनों के नेता पहले ही प्रेस काफ्रेंस कर आगे की रणनीति की घोषणा कर चुके हैं।
अन्नदाताओं पर बरसे आंसू गैस के गोले
सरकार से बातचीत विफल होने की आशंका लिए बड़ी संख्या में किसान दिल्ली की ओर कूच करने की कोशिश में थे। लेकिन सरकार ने इन किसानों को रेवाड़ी में दिल्ली जयपुर हाइवे पर रोक लिया। तरीका पहले वाला ही रहा। खेड़ा बार्डर व संगवाड़ी में किसानों का रास्ता रोकने के लिए पुलिस ने सड़क पर कंटेनर लगाकर रास्ता रोका। पहले की तरह ही दिल्ली जाने को तत्पर किसानों ने कंटेनर हटाने की कोशिश की। इस दौरान पुलिस ने किसानों को रोकने के लिए आंसू गैस के गोले दागे। पहले से ही ठंढ़ उपर से आंसू गैस के गोले। किसानों ने शाम करीब चार बजे दिल्ली की ओर कूच कर दिया। लेकिन पुलिस ने खेड़ा बॉर्डर से करीब 20 किमी दूर धारूहेड़ा के मसानी बैराज पर किसानों को कंटेनर लगाकर रोक दिया है। इसके चलते किसान डिवाइडर पार करते हुए दिल्ली से जयपुर की ओर जाने वाली लेन पर आ गए। इसके चलते ही पुलिस व किसानों में टकराव बढ़ गया। अभी भी धारूहेड़ा के पास करीब एक हजार किसान व सैंकड़ों की संख्या में ट्रैक्टर-ट्रॉली सड़क पर हैं।
सोनिया-राहुल ने बोला सरकार पर हमला
कांग्रेस नेता राहुल गांधी वैसे तो अभी नानी को देखने के लिए ईटली के मिलान में हैं लेकिन किसानों के पक्ष में सोशल मीडिया माध्यमों के जरिए सरकार पर हल्ला बोल जारी रखे हुए हैं। राहुल गांधी ने ट्वीट करके कहा, ‘देश एक बार फिर चंपारण जैसी त्रासदी झेलने जा रहा है। तब अंग्रेज कंपनी बहादुर था, अब मोदी-मित्र कंपनी बहादुर हैं। लेकिन आंदोलन में भाग ले रहा हर एक किसान-मजदूर सत्याग्रही है, जो अपना अधिकार लेकर ही रहेगा।’
क्या कहा सोनिया गांधी ने
उधर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी आज सरकार पर हमला बोला। एक तरफ उन्होंने असमय मौत की मुंह में समा रहे किसानों की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुये प्रधानमंत्री नरेंद मोदी को सवालों के कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि पिछले 39 दिनों से किसान आंदोलन कर रहे है जिनके लिए पूरा देश दुआएं मांग रहा, मेरा मन भी परेशान है। लेकिन सरकार अपनी जिद में बैठी है। आंदोलन को लेकर सरकार की बेरुख़ी के चलते अब तक 60 जान चुकी हैं। कुछ ने तो सरकार की उपेक्षा के चलते आत्महत्या जैसा कदम भी उठा लिया। पर बेरहम मोदी सरकार का न तो दिल पसीजा और न ही आज तक प्रधानमंत्री या किसी भी मंत्री के मुंह से सांत्वना का एक शब्द निकला। मैं सभी दिवंगत किसान भाईयों के प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए प्रभु से उनके परिजनों को यह दुख सहने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना करती हूं।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मोदी सरकार को आज़ादी के बाद देश के इतिहास की पहली ऐसी अहंकारी सरकार करार दिया जो सत्ता में आई है जिसे आम जनता तो दूर, देश का पेट भरने वाले अन्नदाताओं की पीड़ा और संघर्ष भी दिखाई नहीं दे रहा। लगता है कि मुट्ठी भर उद्योगपति और उनका मुनाफ़ा सुनिश्चित करना ही इस सरकार का मुख्य एजेंडा बनकर रह गया है।

उन्होंने मोदी सरकार से सत्ता के अहंकार को छोड़कर तत्काल बिना शर्त तीनों काले क़ानून वापस ले और ठंड एवं बरसात में दम तोड़ रहे किसानों का आंदोलन समाप्त कराए। यही राजधर्म है और दिवंगत किसानों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि भी।
अब सरकार कितना झुकेगी ये तो कल की बैठक के बाद तय हो जाएगा। लेकिन यदि तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का फैसला नहीं लेती है तो किसान आंदोलन और तेज होगा और विपक्षी भी किसान आंदोलन के पक्ष में खड़ा होकर सरकार की मुश्किल बढ़ायेंगे यह तय दिखता है।

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