
जब भारत आज़ाद हुआ तब इसकी पहचान कृषि प्रधान देश की थी और प्रधानमंत्री की योजनाएं कृषि के साथ ही कृषकों का जीवन स्तर सुधारने को बाध्य थीं। आज तक कृषि विकास की जो धारा पूरे देश में प्रवाहमान है, चाहे वह मृदा संरक्षण, बांध, नदी और नहर के पानी की सुविधाएं हों या बिजली, नलकूपों का विकास अथवा बैंकों से कर्ज की सुविधा जैसी योजनाएं उसी का प्रतिफल है लेकिन आज़ादी के सात दशक बाद जब कृषकों का आंदोलन संकेत दे रहा है कि कुछ ऐसा हो रहा है जो न तो कृषि के लिए उचित है और न ही कृषकों के लिए…. कृषक-आंदोलन के दौरान 40 किसानों की मौत का होना एक ऐसी दुर्घटना है जिसके लिए कृषि प्रधान देश कहे जाने वाले भारत का प्रत्येक नागरिक शर्मसार है। ऐसे में केंद्र सरकार का उपेक्षापूर्ण रवैया दुःखद है।

इसी किसान, मज़दूर के बेटे पुलिस फोर्स से लेकर सरहद पर तैनात फौजी हैं जो नागरिक सुरक्षा से लेकर देश और सत्ता की सुरक्षा में लगे हैं। आज उन्हीं बेटों के माँ-बाप कंपकपाती सर्दी में सड़कों पर अपनी सुरक्षा की मांग कर रहे हैं और सत्तारूढ़ राजनीतिज्ञों को गर्म-नर्म बिस्तर पर उनके साथ अठखेलियाँ करने की सूझ रही है, यह शर्म की बात है। आप जिसके लिए कानून बना रहे हैं, जब उसे ही इस कानून से खतरा है तो क्यों नहीं उसके हितों की बात सुनकर उसके अधिकारों की रक्षा की जा रही है। यह अड़ियल रवैया देश को आर्थिक स्तर पर और भी पीछे की ओर धकेल रहा है।
सरकार की यह उपेक्षा नागरिकों के उस विश्वास के लिए घातक है जिन्हें यह भरोसा था कि यह सरकार उनकी चुनी हुई है और उनके हितों की रक्षा करेगी। अभी तो गनीमत कहिए कि किसान ही सड़क पर हैं और मात्र तीन कृषि कानून को रद्द करने की मांग कर रहे हैं कहीं ऐसा न हो कि तमाम सामाजिक संगठन उनके साथ खड़े हो जाएं और आपके तमाम जनविरोधी नीतियों और कानूनों को रद्द करने की मांग करने लगें।

कोई भी सरकार किसी एक वर्ग की उपेक्षा कर सकती है लेकिन जब देश ही उसे अस्वीकार करने लगे तब…? यह सरकार को सोचना-समझना चाहिए कि जिस पुलिस फोर्स और फौज के दम पर वह किसानों के आंदोलन को दबाने की कोशिश कर रहे हैं यदि वह पुलिस फोर्स और फौज के जवान, किसानों के साथ खड़े हो गए तब क्या होगा ? बहुत सारे फोर्स और फौज के लोग सत्ता के अंधभक्त नहीं होते। सत्तर साल के इतिहास में ऐसी तमाम घटनाएं हुईं हैं जो बताती हैं किसानों की तरह जवानों को भी अपने देश और परिवार से प्यार होता है और इस प्यार के लिए वह कुछ भी कर गुजरते हैं। किसानों से बात करके जल्दी समाधान ढूँढ लिया जाना देश ही नहीं, सरकार के भी हित में होगा।
किसान-आंदोलन में 40 किसानों की मौत की बात पर जब एविडेंस की बात कही गई तो सुनकर हैरानी हुई कि सत्ता के प्रतिनिधियों में इतनी असंवेदनशीलता कहाँ से आ गई। यह निहायत ही शर्मनाक घटना है। जहाँ उनके परिजनों के प्रति आपको संवेदना व्यक्त करनी चाहिए, वहाँ आप एविडेंस की बात कर रहे हैं। आप अन्न नहीं खाते कि अन्नदाता की मौत के बाद भी आप असंवेदनशीलता के शिखर को छू रहे हैं। गलती ऐसी कीजिए जिसकी माफी मांग सके, ऐसी नहीं कि उसे अपराध की संज्ञा दी जाए।
