खुशहाल गांव, जाने पर या तो कुछ बच्चे मिलते हैं या बूढ़े

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विजय शंकर सिंह
कहते हैं, चंदौली जिला के रामगढ़ गांव में अकबर सिंह के घर में एक संत जन्में जो बाद में बाबा कीनाराम नाम से विख्यात हुए। बाबा कीनाराम की एक चाची थीं जो विधवा थीं और उनको एक पुत्र था। परिवार में उस चाची का सम्मान कम था। बाबा कीनाराम को यह देख कर अच्छा नहीं लगता था। कीनाराम रामगढ़ से टांडा घाट पर अक्सर गंगा स्नान के लिए जाते थे और वहीं उनका एक छोटा-सा मठ भी था। वह मठ आज भी है। बाबा ने अपनी चाची और उनके बेटे को अपने मठ के पास बसा दिया। वहीं से मेरे गांव की कहानी शुरू होती है। उस चाची का नाम तो नहीं पता, पर उस बालक का नाम नाथू था। उसी बालक के नाम पर उस गांव का नाम पड़ा नाथुपुर।

यह गांव वाराणसी से गाजीपुर जाने वाली सड़क पर बनारस से 25 किमी दूर स्थित गांव कैथी के ठीक उस पार गंगा से आधा किलोमीटर दूर है। नाथूपुर राजस्व अभिलेखों में दर्ज गांव नहीं है। यह गांव टांडा का माजरा है। टांडा एक बड़ा गांव है और बिल्कुल गंगा के किनारे ऊंचाई पर है। मेरे गांव के सभी निवासी ठाकुर बल्कि एक ही परिवार के अंश हैं जो परिवार बाबा कीनाराम का था। कुल तीस-चालीस घर हैं। गैर ठाकुर जातियों में दो घर यादवों और दो घर गोंड़ जाति के हैं। कहते हैं कि इन्हें बाद में बसाया गया था। गांव सम्पन्न है और शांतिपूर्ण है। विवाद या झगड़े तो थोड़ा-बहुत हर घर में होते हैं, यहां भी हैं पर वह सामान्य सी बात है। अधिकतर घर पक्के के हैं। सम्पन्नता दिखती है। पर संपन्नता का कारण खेती या नौकरी उतनी नहीं थी जितना कि लोगों का जीवनयापन के लिए देश के बाहर जाना था। पहले गांव के बहुत से लोग सिंगापुर चले जाते थे और वहीं छोटा मोटा काम करते थे। मेरे घर से ही कोई सिंगापुर नहीं गया। कारण शिक्षा थी। मेरे बड़े पिताजी 1929 के इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से एलएलबी करने के बाद बनारस में वकालत करने लगे और उनकी वजह से परिवार में शैक्षणिक वातावरण बना।

हमारा गांव और आसपास के इलाके बहुत समय से विकसित हैं। 1969 में मेरे गांव में बिजली आ गयी थी। घरों में बल्ब तो थे, पर पंखों का चलन नहीं था। पंखे बाद में आए। बिजली का आना एक बड़ी घटना थी। बचपन मे लालटेन का शीशा हमलोग राख से रगड़ कर साफ करते थे। गांव में घर दो हिस्सों में होता है। एक को घर कहते हैं दूसरे को दुआर। घर को जनानखाना भी कह सकते हैं। घर में महिलाओं के आवास, रसोई और अन्य तामझाम थे जबकि दुआर जिसे कहीं-कहीं बैठका भी बोला जाता है, पुरुषों के रहने के लिए होता है। दुआर अक्सर खुला हुआ और एक कैम्पस में होता है, पर घर बन्द और उसके दरवाजे छोटे और खिड़कियां पहली मंजिल के कमरों में ही होती थी। खिड़कियां छोटी होती हैं और खुलती भी कम ही हैं। इसका कारण निजता होती है। रोशनी का प्रबंध घर के भीतर के बड़े आंगन से होता है। आंगन जो चारों तरफ एक बरामदा जिसे ओसारा भी कहते हैं, से घिरा रहता है और फिर उस बरामदे में कमरे के दरवाजे खुलते है। यह विवरण मेरे गांव के घर का है पर अब यह न तो उतना व्यवस्थित है और न ही उतना सम्पन्न। कारण परिवार के सभी सदस्यों का बनारस शहर में शिफ्ट हो जाना है।

गांव की तस्वीर भी अब पहले जैसे नहीं रही। दिन में गांव जाने पर या तो कुछ बच्चे मिलते हैं या बूढ़े। किशोर और युवा पढ़ाई-लिखाई और रोजी-रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन कर गए हैं। यह पलायन सत्तर के दशक में शुरू हुआ। पहले भी लोग कमाने जाते थे पर वे अकेले जाते थे और साल में एक माह की छुट्टी में लिए गांव आते थे। लेकिन उनके परिवार, पत्नी और बच्चे सभी गांव में ही रहते थे। अब यह हालत है कि जिसके पास थोड़ी भी संपन्नता आई, उसने बनारस में अपना ठिकाना कर लिया। पहले लोग किराए के मकान में आए, फिर जैसे—जैसे हैसियत बढ़ी लोगों ने अपने घर बना लिए।

हालांकि मेरे गांव में बहुत पहले से ही प्राइमरी स्कूल और जुनियर हाई स्कूल था। 1950 के बाद हाई स्कूल खुला और वह इंटर कॉलेज में उन्नत हुआ। अब तो वह इंटर कॉलेज जिसका नाम सरस्वती इंटर कॉलेज टांडा है, काफी समृद्ध हो गया है। पर बनारस के करीब होने के कारण अधिकतर परिवारों के बच्चे बनारस में ही पढ़ते हैं। गांव में शिक्षा का प्रसार बहुत है। लोग पढ़े लिखे हैं। देश दुनिया की खबरों से जुड़े हुए हैं और सामुहिक चर्चा भी खूब करते हैं। पर गांव के सामाजिक परिवेश में बहुत तेजी से परिवर्तन हुआ है। खेती की जमीन बहुत नहीं हैं। सामान्य जोत के किसान हैं। लोगों के परिवार बढ़े तो लोग गांव के बाहर निकल गए। गांव के घर अब पहले जैसे गुलजार नहीं रहे। शादी विवाह में जहां पहले पूरा कुनबा जुटता था, शादी की हर रस्म लम्बी होती थी और कई-कई दिनों तक भोज भात चलता था। अब लोगों की व्यस्तता ने उसे औपचारिकता में बदल दिया है। इसका कारण अर्थाभाव नहीं है बल्कि समयाभाव और शहरों की सुविधाजीविता भी है।
मेरे गांव में एक व्याधि बहुत सामान्य हो गयी है। वह है नशे का चलन। यह गांव के बेरोजगार लड़कों में बहुत तेजी से फैल रहा है। इस पर कोई नियंत्रण नहीं है। समय और जरूरतों के अनुसार गांव का रहन सहन भी बदल रहा है। गांव पक्की सड़क से जुड़ा है, बिजली है, मोबाइल टावर हैं, आने-जाने के साधन हैं, पर गांव जाने पर लगता है जो कभी पहले था कुछ वह अब कहीं खो गया है। क्या पता यह मेरा अतीत मोह है या समय के साथ कदम मिला कर न चल पाने की आदत।
सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी

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