आरण गांव में मोर का दर्शन

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मुख्तार आलम
कई महीनों से आरण जाने के लिए सोच रहा था। दूर-दराज से लोग आरण आए घूमकर चले गए, किन्तु समयाभाव के कारण नजदीक में रहते हुए भी मैं नहीं जा सका। आज ईद के दिन आरण घूमने की अभिलाषा पूरी हुई। साथ मिला प्रिय मित्र इफ्तेखार का। प्रकृति के अद्वितीय सौंदर्य के बीच बसा है-आरण गांव। इस गांव की ख्याति किसी प्रसिद्ध धार्मिक स्थल या सुविधा सम्पन्न अस्पताल या किसी शैक्षणिक संस्थान के कारण नहीं, बल्कि आरण की ख्याति मोरों के कारण है। वही मोर जो हमारा राष्ट्रीय पक्षी है।
सहरसा जिला मुख्यालय से लगभग पांच-छह किलोमीटर की दूरी पर बसा है आरण गांव। इस गांव तक पहुंचने के लिए सड़कों का जाल-सा बिछा है। मधेपुरा और सुपौल से भी जाने-आने में कोई कठिनाई नहीं होगी। बलखाती सड़कें जिस पर चलने में आनंद आए, लेकिन सड़कों की चैड़ाई काफी कम है जिसके कारण चारपहिए वाहन को आर-पार होने में भारी दिक्कत होती है। चारों तरफ विभिन्न प्रकार के हरे-भरे पौधे, भांति-भांति के आम, अमरूद के पेड़, फलों के भार से झुकी डालियां, आमों की खुशबू से महकती हवा। हवा चलती है तो सुरभि बिखेरती चलती है जिससे चित्त को प्रसन्नता और कल्पना को सुंदर खुराक मिलता है। मस्त निवासी, जिनसे बात करने में आनंद आता है।
आरण गांव बहुत व्यवस्थित ढंग से बसा है। सड़क के दोनों तरफ किसी ने सड़क से ऊंचा अपना दरवाजा नहीं किया है जिसके कारण सड़क पर पानी नहीं जमता है। यहां तक पहुंचने में राहगीरों को किसी तरह की दिक्कत नहीं होती है।

शाम का समय है। महिलाएं खेतों में घास काट रही हैं। मूंग, मकई और घसेड़ के पौधे लहलहा रहे हैं, जैसे यहां वालों के भाग्य लहलहा रहे हों। धान की क्यारी की भी हरियाली न्यारी है। उसके आसपास में ही मोर अपने भोजन की तलाश में जुटे हैं। मोरों का साथ मैना दे रही हैं। बाहरी लोगों को देखते ही मोर फसल या झाड़ी में छुप जाते है। सादगी की अवतार ग्रामीण महिलाएं खिस्स..से निश्छल हंसी-हंस देती हैं। हमें थोड़ा संकोच और कुतूहल होता है। फिर वह बड़ा स्नेह से कहती हैं -बाहरी लोककेँ देख केँ मोर भागि जाए छैक। गांव के आसपास के बांस, बाड़ी, झाड़ी, आम बगान, खेत आदि में मोर बड़ी आसानी से दिख जाते हैं।

आरण में सभी जाति, धर्म के लोग हैं। सभी एक-दूसरे से रिश्ते-नाते से बंधे हैं। कोई हिन्दू, मुसलमान, दलित,महादलित या सवर्ण नहीं हैं। वे एक-दूसरे के चाचा, भतीजा, नाती, पोता, चाची, भाभी, भाई, बहन हैं। ग्रामीण संस्कृति की यही सबसे बड़ी खासियत भी है। इसीलिए तो कहा जाता है कि भारत की आत्मा गांव में बसती है।
आरण बहुत सुखी संपन्न गांव नहीं है। गरीबी और बेरोजगारी दूसरी जगहों की तरह यहां भी है। किंतु उपजाऊ मिट्टी और कर्मठ निवासी यहां की सबसे बड़ी पूंजी हैं। धान,गेहूं और मकई के साथ-साथ सब्जी की खेती बड़े पैमाने पर होती है। यहां के लोग बागवानी के शौकीन हैं, इसलिए धरती हरियाली की चादर ओढ़े हुई है। वन प्रमंडल सहरसा की ओर से सड़क के दोनों किनारे में काफी संख्या में पेड़ लगाए गए हैं। जिससे आने वाले समय में गांव का सौंदर्य और बढ़ेगा। चैराहे पर ही बैंक और विद्यालय है। दो-चार चाय, नास्ता और पान की दुकानें हैं। सड़क के किनारे में जगह-जगह बोर्ड लगा हुआ है-मोर ग्राम आरण। उस पर मोर का चित्र बना हुआ है जो लोगों को आह्लादित करता है। कहीं लिखा है-घनी आबादी, धीरे चलें। आजकल इस तरह के दिशा-निर्देश का उल्लंघन मामूली बात है।

हम उस व्यक्ति के तलाश में जुट गए जिसके कारण यह गांव चर्चा में आया है। उस बुजुर्ग को बुलाने में एक बालक ने हमारी मदद की। दुर्योग से उसका नाम नहीं पूछ सका। उस व्यक्ति का नाम है-अभिनंदन यादव उर्फ कारी झा। मैं ठहरा शहरी और जातिवादी। यादव और सिंह का तालमेल तो सुन चुका हूं किन्तु मुझे यादव और झा का तालमेल कुछ समझ में नहीं आया। संकोच के साथ मैंने नहीं चाहकर भी उत्सुकतावश पूछ ही लिया। एक रहस्यमयी हंसी हंसते हुए अपने पिताजी के हवाले से उन्होंने कहा-मेरा नामकरण पंचगछिया के एक पंडित लाल झा ने किया। उनका नाम लाल था इसलिए मुझे कारी कर दिया। उसी दिन से लोग कारी झा,कारी झा कहने लगे। बहुत कम लोग ही जानते हैं कि मेरा नाम अभिनंदन यादव है।

अब मोर की कहानी सुनिए कारी झा की जुबानी। नब्बे की दशक की बात है। गांव के लोग पंजाब काम करने जाते थे। कमाकर लौटते समय तरह-तरह के सामान लाते। रिश्ते-नाते के बंधन में बंधे होने के कारण किसी ने पूछा- आपके लिए क्या लेता आऊँगा? कारी झा ठहरे धार्मिक प्रवृत्ति के। पंजाब से आए कामगारों से मोर की चर्चा खूब सुनते। कार्तिक भगवान की सवारी होने के कारण इनके मन में मोर पालने की इच्छा बलवती हो रही थी। इन्होंने कह दिया-मेरे लिए मोर लेकर आना। कुछ दिनों के बाद कामगारों ने पंजाब से चिट्ठी भेजी कि एक जोड़ा मोर पकड़ के रखा हूं। आकर ले जाइए। कारी झा ने एक साधु (बेरसु मंडल) को पंजाब भेजा। साधु को इसलिए कि रेल किराया नहीं लगता। किशोर मंडल और सुदीप ठाकुर पंजाब से बेरसु मंडल के साथ हुए। रास्ते में साधु किसी स्टेशन पर उतर गए। परिवार के लोगों ने खूब खोजबीन की। फिर सोचा कि साधु हैं घुमक्कड़ प्रवृति के हैं, कहीं होंगे- रमता जोगी- बहता पानी। किन्तु आजतक नहीं लौटे। बारह वर्ष, एक युग, पूरा होने के बाद उनका श्राद्ध कर्म भी कर दिया गया। उसी दो मोर से आज आरण में लगभग पांच-छह सौ मोर हैं। यह सर्वभक्षी पक्षी है। दो से आठ अंडे देता है। इसकी जान को जंगली मांसाहारी जानवरों से खतरा रहता है। मादा मोर अपनी जान दे देती है, पर अंडा छोड़कर नहीं भागती है।

मैंने कारी झा से पूछा- मोर कार्तिक भगवान की सवारी है। लोग कहते हैं कि इसको पालने से समृद्धि आती है। क्या आपको ऐसा कुछ महसूस हुआ है? उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा- देश भर में गांव का नाम हो रहा है, यही प्रगति है। हाल ही में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आरण में मोर अभयारण बनाने की घोषणा की है। पर देखना है कि अभयारण्य कब तक बनता है और क्या उसमें सभी मोर आ पाएंगे? जो भी हो, आइए एक बार आरण। प्राकृतिक सौंदर्य के बीच मोर दर्शन का आनंद लीजिए।
(कुमेदान टोला, सिटानाबाद, सहरसा। सभी तस्वीर:विपिन कुमार सिंह)

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