मंगरूआ
नयी दिल्ली: आज यानी 17 अप्रैल को भारत के नौवें प्रधानमन्त्री रहे चंद्रशेखर की जयंती है। आज ही के दिन 17 अप्रैल 1927 को बलिया के इब्राहिम पट्टी गांव में उनका जन्म हुआ था। चंद्रशेखर के व्यक्तित्व की चर्चा करते हुए राज्यसभा सांसद व उपसभापति और चंद्रशेखर के करीबी रहे हरिवंश जी ने मंगरूआ से अनौपचारिक बातचीत में कहा था कि राजनीति चंद्रशेखर के पूरे व्यक्तित्व का एक छोटा सा हिस्सा था। एक बार जब मार्क टली से मंगरूआ की बात हुई तो उन्होंने कहा कि भारत यात्रा के दौरान लोगों का उत्साह देखते हुए मैंने कहा था कि यदि चंद्रशेखर राजनीति छोड़ केवल समाज के ही काम में लगे रहते तो देश उनको किसी और रूप में याद कर रहा होता और वे ज्यादा सफल होते। जी हां आप सब जानते हैं कि चंद्रशेखर ने भारत यात्रा के दौरान देश के अलग-अलग राज्यों में 8 भारत यात्रा केंद्र बनाये थे जिसका मकसद था कि ये केंद्र अपने—अपने ईलाके में सामाजिक, सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र बने। पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण के सवाल पर लाईट हाउस की तरह काम करें। वॉच डॉग की भूमिका निभाएं। थिंक टैंक के रूप में विचार का विस्तार हो।
बातचीत के क्रम में हरिवंश जी ये भी कहते हैं कि जब ये भारत यात्रा केंद्र बनाये जा रहे थे तो चंद्रशेखर पर यह आरोप लगाया कहा गया कि इन केंद्रों का मकसद जमीन हथियाना है। लेकिन आज स्थिती ये है कि किसी भी केंद्र पर चंद्रशेखर के परिवार के किसी भी सदस्य का किसी भी हस्तक्षेप नहीं है और जो केंद्र चंद्रशेखर ने बनाये थे उन सभी केंद्रो पर उन्हीं लोगों की देखरेख में काम हो रहा है जो उस जमाने में नियुक्त किये गये थे। जबकी जेपी विश्वविद्यालय, छपरा, बिहार के कुलपति रहे डॉ हरिकेश सिंह ने गांव की कहानियों के कारवां में अपने गांव की कहानी में लिखा है कि मैं चन्द्रशेखर जी की भारत यात्रा से जुड़ा था। वह यात्रा लगभग 15 हजार किलोमीटर चली थी। सुदूर दक्षिण से लेकर और सिक्किम तक। उन्होंने सात बिन्दुओं को उजागर किया था। स्वच्छ पानी, शौचालय, विद्यालय, गांव की पंचायत आदि। कटनी, मध्यप्रदेश में जिस पानी को लोग पीते थे, वह इतना गंदा था कि लोगों को पेट में कीड़ा होता था। उसके बाद पेट में सड़न होती थी, फिर पैर के नीचले हिस्से से कीड़े निकलते थे। उसेे भी उन्होंने देखा। उनकी भारत यात्रा बहुत ही महत्वपूर्ण थी। जगह—जगह पर उन्होंने ग्रामदान कराया। वे चाहते थे कि भारत का जो ग्राम-लोक है वह आपस में संवाद करे। इसके लिए उन्होंने जगह जगह भारत यात्रा केन्द्र बनाए थे, करीब 7 हजार केन्द्र थे। उन केन्द्रों को वे विकास केन्द्र का रूप देना चाहते थे। वे ऐसे विकास केन्द्र होंगे जो बिना किसी सरकारी अमले के लोक भाषा में, लोक जीवन के लिए, लोक विकास की बात करेंगे। पर उसमें भटकाव आया। जो उनके साथ भारत यात्री थे, वे भी उस चीज को नहीं समझ पाए। प्रयास असफल रहा। यात्रा खत्म होते ही उनके सहयोगी डा. सुब्रमण्यम स्वामी ने प्रश्न उठा दिया था कि यह तो पद के लिए यात्रा है। उन्होंने यह भी कह दिया कि यात्रा में जो धन आया, जमीन ली गयी, गांव लिया गया उसका हिसाब नहीं दिया गया। जब सह-यात्री संदेह करने लगता है तो व्यापक लक्ष्य नहीं पाया जा सकता है।

यद्यपि चंद्रशेखर जी का कार्य बहुत ही प्रशंसनीय था। हरियाणा के तीन गांवों के लोगों ने भोंडसी में जमीन दिया तो उसे भुवनेश्वरी आश्रम के रूप में विकसित किया गया। और वहां जो लोग जाते थे, वे एक वृक्ष लगाते थे। परन्तु उस पर विराम लग गया। मेरा मानना है कि सभी सामाजिक दायित्व वाले व्यक्ति को गांव में जाना चाहिए। और मैं इस मायने में चन्द्रशेखर जी और नानाजी देशमुख दोनों का बहुत आदर करता हूं। गांव के लिए, गांव के नाम पर विदेशी चंदा या सरकारी पैसा ले लेना बहुत होता है। पर वे लोग गांव को नहीं जानते।
तो ऐसे थे चंद्रशेखर जी।
वरिष्ट पत्रकार राम बहादुर राय ने बातचीत में कहा था कि चंद्रशेखर संस्थान निर्माता थे, लेकिन उसका आगे कैसे संचालन हो इसके तरफ वो पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाये या ये व्यवस्था नहीं कर पाये। बात भी सही है तभी तो आईटीओ स्थित चंद्रशेखर भवन आज मुंशी मैनेजरों के हवाले होकर निर्जिव सा हो गया है और उस महान व्यक्तित्व की याद में बना धरोहर तालाबंदी देख रहा है। विगत फरवरी माह में ही आचार्य नरेंद्र भवन जहां से चंद्रशेखर स्कूल आफ अप्लायड पॉलिटिक्स का संचालन होता था, उस भवन को मुंशी मैनेजरों के इसी खींचतान में बुलडोजर चढ़वा दिया गया और रहबर परदे के पीछे से खेल रचते रहे। मुंशी कहता है मैं मालिक..मुख्तार कहता है मैं मालिक। इसके ट्रस्टी कमल मोरारका, किशोरी लाल और एचएन शर्मा थे। जब तक चंद्रशेखर जी रहे सब कुछ ठीक चल रहा था। चंद्रशेखर जी के मरने के बाद एचएन शर्मा और रवींद्र मनचंदा पर ट्रस्ट चलाने की जिम्मेवारी आती है। अचानक 12 तारीख को ये आदेश जारी होता है कि इस ट्रस्ट का आवंटन रद्द किया जाता है। चूंकि एचएन शर्मा ही कागजी कार्रवाई कर रहे थे इसलिए आदेश की कॉपी उन्हें 12 तारीख को प्राप्त होती है। हालांकि शर्मा जी से जब मैंने पूछा तो उन्होंने कहा कि लेटर 13 को प्राप्त हुआ। और 14 तारीख को चंद्रशेखर की आत्मा और उनके भरोसे पर बुल्डोजर चला दिया जाता है। भवन जमींदोज कर दिया जाता है। घटनास्थल पर उपस्थित व्यवस्थापकों को इतना मौका भी नहीं दिया जाता कि वे चंद्रशेखर के जीवन काल से जुड़े दस्तावेजों और धरोहरों को संजो सकें। उनके कारवां, जेल-डायरी, 1000 किताब, पांडुलिपि, पूर्व उप प्रधानमंत्री देवीलाल की चिट्ठी, समाजवादी आंदोलन से जुड़े दस्तावेज, अरूणा आसफ अली का नरेंद्र देव के नाम पत्र आदि बहुमूल्य धरोहरों को संजो सकें। यहां तक अध्यक्ष जी कुर्सी को भी तोड़ दिया गया। चंद्रशेखर के संदर्भ में हरिवंश जी की उपर कही गयी बात इसलिए भी सही प्रतीत होती है कि जब नरेंद्र भवन पर बुलडोजर चल रहा था तो नीरज शेखर का कहना था कि चूंकि इस ट्रस्ट में उनका नाम नहीं था इसलिए वे कुछ नहीं करेंगे यानी मुंह पर जाबा लगा के रखेंगे। हालाकि बलिया के लोग और देश भर के चंद्रशेखर प्रेमी नीरज शेखर इस रवैये से हैरान थे। उन्होंने सवाल किया कि वो दिन दूर नहीं जब नीरज शेखर ये भी कहना शुरू कर देंगे कि वो चंद्रशेखर के बेटे भी नहीं हैं।
चंद्रशेखर ने जितने भी भारत यात्रा केंद्र बनाये हैं उन सबके रख-रखाव की जिम्मेवारी सुधींद्र भदौरिया की है, जो बहन जी मायावती के हो चुके हैं। चंद्रशेखर के विचारों से उनका कोई लेना देना नहीं फलत: इस मामले में भी उनकी सुविधाभोगी चुप्पी है। इस ट्रस्ट को चंद्रशेखर जी ने बनाया था। इस दिशा में भी चंद्रशेखर से जुड़े लोगों को गंभीरता से आगे बढ़ना चाहिए कि कैसे उनके नेता के सपनों को आगे बढ़ाया जा सकता है। मंगरूआ ने सोच रखा था कि चंद्रशेखर द्वारा बनाये गये सभी भारत यात्रा केंद्रो को रिविजिट करेगा ताकि समझा जा सके इन केंद्रो पर चंद्रशेखर के सपनो को कितना साकार किया गया। लेकिन सोचा हुआ जल्दी हो कहां पाता है पता नहीं कब लॉक डाउन हटेगा। वैसे इस कोरोना संकट के समय जिस तरह से शहर में लोग लॉक डाउन पीरियड को काटने के लिए गांव लौटने की आपाधापी मचाये हुए हैं उससे यही लगता है कि गांव का पुर्नजीवन का रास्ता नये सिरे से सोचे जाने की कवायद शुरू हो गई है और उसका सूत्र वाक्य चंद्रशेखर ने भारत यात्रा के दौरान जिन सात बिंदुओं को प्रमुखता से रखा था उसी में गांव की तरक्की का राज छुपा हुआ है


